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Showing posts from July, 2008

भले लोगों को पहला मौका मिलते ही पार्टियां लात मार देती हैं

ये सब मानते हैं कि राजनीति में भले लोग कम ही जाते हैं। गए भी तो भले नहीं रह जाते हैं। और, भले रह गए तो, उनकी अपनी पार्टी पहला मौका मिलते ही लात मारकर बाहर कर देती है। यही हाल सोमनाथ का उनकी अपनी पार्टी सीपीएम में हुआ। 40 साल से पार्टी के निर्देश मानने का ख्याल सीपीएम के गुंडा बॉस प्रकाश करात को बिल्कुल नहीं रहा। और, सोमनाथ को पार्टी से बाहर निकालने का फैसला उस आधार पर सुनाया गया जो, पार्टी की खिलाफत तो बिल्कुल ही नहीं था।

लोग भले ही कहें कि ये प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जिद थी कि सरकार को विश्वासमत हासिल करना पड़ा। और, वो इसमें कामयाब होने के बाद पहली बार प्रधानमंत्री की तरह दिखे। मैं मानता हूं कि सरकार को विश्वासमत का सामना यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और सीपीएम महासचिव प्रकाश करात के अहं की वजह से करना पड़ा। सोनिया के दोनों हाथों में लड्डू था। सरकार बची तो, इससे अच्छा क्या होता जो, हुआ और गिरती तो, युवराज की ताजपोशी का रास्ता साफ होता। खैर, दोनों बड़े नेताओं का अहम तुष्ट करने के लिए दो भले लोग भी निशाने पर थे। सोनिया गांधी का अहम तुष्ट हो गया इसलिए मनमोहन मीडिया में बड़े नेता के तौ…

अब गांधी की शरण में मोदी

गुजरात सचमुच इस देश का अनूठा प्रदेश है। तरक्की गुजरातियों के स्वभाव में है। और, ये इस धरती का ही कमाल है कि बारूद के ढेर पर बैठने का अहसास होने के बाद भी यहां के कारोबार पर कोई असर नहीं पड़ा है। गुजरातियों की इसी नब्ज को नरेंद्र मोदी ने पकड़ लिया है। इसका अहसास मुझे और मजबूती से तब हुआ जब मैं अहमदाबाद धमाकों के बाद देर रात वहां पहुंचा। रात के करीब एक बजे हम एयरपोर्ट से निकलकर होटल के लिए जा रहे थे तो, मोदी का काफिला शहर से मणिनगर की ओर जा रहा था।

सबसे ज्यादा धमाके मणिनगर में ही हुए हैं जो, खुद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का विधानसभा क्षेत्र है। खैर, इतने भयानक हादसे के बाद मुझे उम्मीद थी कि इतनी रात में शायद ही सड़कों पर कोई नजर आएगा सिवाय पुलिस फोर्स के। पुलिस फोर्स तो हर जगह चौकस दिखी लेकिन, मुझे रात के एक बजे भी दो-तीन जोड़े मोटरसाइकिल पर और कई परिवार घर लौटते दिखे। फिर भी मुझे ये भरोसा था कि अगले दिन रविवार भी है और इतने बम धमाके भी हुए हैं शायद ही सड़कों पर सन्नाटे के सिवाय कुछ नहीं होगा। लेकिन, गुजरातियों ने मुझे इस बार भी झुठला दिया।

रविवार को सुबह सात बजे मैं होटल से निकला और स…

31,000 फीट की ऊंचाई पर इलाहाबाद

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अपना इलाहाबाद इकतीस हजार फीट की ऊंचाई पर देखा तो, मजा आ गया। वैसे तो अपना शहर, खासकर जहां अपनी पढ़ाई-लिखाई के दिन बीते हों, सबके लिए खास होता है। लेकिन, इलाहाबाद हमारे लिए इसलिए भी खास है कि जिंदगी के शुरुआती फलसफे मैंने यहीं सीखे।

मैं 28 जुलाई की सुबह सात बीस की जेट की फ्लाइट से अहमदाबाद से मुंबई आ रहा था। मुंबई और अहमदाबाद में जबरदस्त बारिश की वजह से उड़ान थोड़ी देर से उड़ी। उड़ान भरने के बाद काफी देर तक मौसम की खराबी की वजह से जहाज कुछ इस तरह चल रहा था (उड़ने में कहां ऐसा होता है) जैसे किसी गांव की सड़क पर महिंद्रा कमांडर जीप। लेकिन, थोड़ी ही देर में बाहर का दृष्य बेहद शानदार हो गया। अनाउंसमेंट हुआ – आप 31,000 फीट की ऊंचाई पर हैं। बाहर का दृश्य इतना मनलुभावन था कि मैंने अपने मोबाइल कैमरे से कुछ फोटो खींची लेकिन, इसमें वो अहसास नहीं मिल पा रहा है।

इसी बीच मैंने आगे पड़े जेट एयरवेज की इनहाउस पत्रिका jetwings उठा ली। और, उसमें मेरी नजर 5 things to do in Allahabad देखा तो, दिल खुश हो गया। पहले पेज आनंद भवन और संगम का जिक्र था।



दूसरे पेज पर जमुना किनारे के किले, अक्षयवट मंदिर के…

अमर उजाला में बतंगड़

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अमर उजाला के संपादकीय पृष्ठ ब्लॉग कोना नाम से ब्लॉग पर लिखा हुआ छपता है। और, 23 जुलाई को इस पेज पर बतंगड़ को जगह मिली है।

अब चड्ढी भी फट जाने दो तब करेंगे कपड़े पहनने की बात

लोकतंत्र नंगा हो गया है। सरकार जीती पर लोकतंत्र हार गया है। कोई कुछ तो कोई कुछ। विश्वास मत पर बहस के दौरान जब कल चार बजे के आसपास बीजेपी के तीन सांसदों ने गड्डी लहराकर एक करोड़ रुपए संसद में उछाले तो, लगा कि अरे ये क्या हो गया। तीनों सांसद खुश थे कि उन्होंने पार्टी के लिए वो कर दिया जो, आज तक के इतिहास में किसी भी पार्टी का सांसद अपनी पार्टी के लिए नहीं कर पाया। वो, बिके और बिककर खुश हुए। सोचा ये था कि जिसने खरीदा उसे नंगा कर देंगे और खुद महान बन जाएंगे।

लेकिन, वो यहीं चूक गए। खरीदने वाला बिकने वाले से हमेशा ज्यादा चालाक होता है। और, नफा-नुकसान का हिसाब भी ज्यादा बेहतर लगा लेता है। चाहे वो बिकती हुई कंपनी हो या फिर बिकता हुआ सांसद। इन तीनों सांसदों की नंगई की नौटंकी तब तक चलती रही जब तक दूसरे महान नंगे टीवी चैनलों पर नहीं चमके थे। इन तीनों नंगों को नंगई की इजाजत देने वाले आडवाणीजी भा बार-बार यही कहते रहे कि उन्होंने मुझसे इजाजत मांगी थी और मैंने उन्हें कहाकि वैसे तो, ये उचित नहीं है लेकिन, देश और संसद को दिखाने के लिए मैं इसकी इजाजत देता हूं।

अचानक मुलायम प्रकट हो गए। टीवी चैनल वाल…

आडवाणी ने बड़ा मौका खो दिया

मनमोहन की सरकार बचेगी या जाएगी ये, आज तय हो जाएगा। बीजेपी के बागी सांसद मनमोहन की डूबती नैया पार कराते दिख रहे हैं। खैर, सरकार बचे या जाए कोई बहुत बड़ा फरक इससे नहीं पड़ने वाला। लेकिन, कल विश्वासमत के विरोध की शुरुआत करने वाले लालकृष्ण आडवाणी ने एक बहुत बड़ा मौका गंवा दिया लगता है।

दरअसल, PM IN WAITING के खिताब से खुद को नवाजने वाले लालकृष्ण आडवाणी को विश्वासमत पर बहस के दौरान हर कोई सुनना चाहता था। उनके प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखने वाले भी उनके आजीवन PM IN WAITING रह जाने की इच्छा रखने वाले भी। सब ये देखना चाहते थे कि अटल बिहारी वाजपेयी के वारिस लालकृष्ण आडवाणी वाजपेयी के कहीं आसपास तक पहुंच पाते हैं या नहीं। लेकिन, ज्यादातर लोगों को मेरी तरह निराशा ही हाथ लगी। मौका ये था कि इस मौके का इस्तेमाल चुनावी रैली की तरह करते।

विश्वासमत के खिलाफ बोलने खड़े हुए आडवाणी से हर किसी को उम्मीद यही थी कि वो, परमाणु करार पर बीजेपी का पूरा पक्ष रखने के साथ ही महंगाई और दूसरे मुद्दों पर सरकार के खिलाफ चुनावी बिगुल की शुरुआत करेंगे। आडवाणी के पास बड़ा मौका था कि वो, संसद में मिले मौके का सदुपयोग …

ये है महंगाई संकट की असली वजह

क्या सचमुच खाद्यान्न की कमी से महंगाई बढ़ रही है। इस सवाल का जवाब मुझे तो नही में दिख रहा है। और, ये नहीं का जवाब पक्का हुआ है आज पिताजी से इलाहाबाद बात करने के बाद। पिताजी का फोन आया तो, उन्होंने बताया कि आज गांव गए थे। लेकिन, सारी फसल बरबाद हो गई। मूंग बुआई थी और कुछ हिस्से में पिपरमेंट। लेकिन, ज्यादा बारिश होने से दोनों फसलें सड़ गईं। पिताजी ने कहा सिर्फ अपने ही खेतों में नहीं ज्यादातर लोगों के खेत में पानी लगने से फसल सड़ गई है।

प्रतापगढ़ जिले में हमारा गांव है। वहां हमारी फसल सड़ गई है, खेत में पानी भर जाने से। और, मैं मुंबई में हूं। जहां 4-5 दिन पहले ही मैंने ये खबर चलाई थी कि महाराष्ट्र सरकार राज्य के 35 जिलों में से 15 को सूखाग्रस्त घोषित कर रही है। साथ ही ये भी महाराष्ट्र में सूखे की वजह से मध्य प्रदेश की मंडियों में दाल के भाव चढ़ गए हैं। क्योंकि, सबसे ज्यादा दाल देश में महाराष्ट्र से ही जाती है।

ये देखने में सीधे-सीधे बारिश की वजह से पैदा समस्या दिख रही है। जो, आम है तो, फिर मैं इसे दुबारा क्यों लिख रहा हूं। दरअसल दुबारा मैं इसे इसलिए चिन्हित कर रहा हूं कि मॉनसून तो, फसल…

संगत से गुण होत हैं संगत से गुण जात ...

ये कहावत बहुत पुरानी है। लेकिन, मुझे आज ये याद आ गई जब मैं ज़ी टीवी पर सारेगामापा देख रहा था। संगीत की महागुरू आशाताई के साथ संगीत के चार धुरंधर आदेश, हिमेश, प्रीतम और शंकर महादेवन बैठे थे। एक सिंगर ने गाना गाया उसमें सुरेश वाडेकर की झलक मिली। इस पर चारों धुरंधरों में थोड़ी बहस हुई।

बहस खत्म किया संगीत की महागुरू आशाताई ने ये कहकर कि – आज बॉलीवुड में ऐसे ही सिंगर की जरूरत है जो, वर्सेटाइल हो। यानी एक फिल्म के अलग-अलग गानों की जरूरत एक ही सिंगर से पूरी होती है – फिर आशाजी ने थोड़ा pause लिया और कहा ऐसा ही वर्सेटाइल सिंगर जैसे आशा भोसले।

आशाजी के गाने का मैं बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। मैं क्या कई पीढ़ियां होंगी। और, इसमें भी कोई शक नहीं कि आशाजी जैसे वर्सेटाइल सिंगर इंडस्ट्री में कम ही हैं। लेकिन, क्या आशाजी का खुद अपने मुंह से खुद की ही तारीफ करना ठीक है। आशाजी ऐसी ही थीं, बड़ा सिंगर होने की वजह से ये चरित्र दिखता कम था या फिर ये संगत का असर है। क्योंकि, वो उसी हिमेश रेशमिया के साथ मंच पर थीं जिसे कभी उन्होंने थप्पड़ मारने की बात कही थी। आप सबकी रा जानना चाहूंगा।

अजीत वडनेरकर जी से निवेद…

भारतीय राजनीतिक रंगमंच का सबसे शानदार ड्रामा देखिए

करीब बीस साल बीते हैं और राजनीतिक समय चक्र ने पूरा एक चक्कर लगा लिया है। 1989 में वीपी सिंह की सरकार को दक्षिणपंथी भाजपा के साथ वामपंथी लेफ्ट पार्टियों का भी समर्थन था। ये दोनों मिलकर कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के लिए जनता दल को समर्थन दे रहे थे। और, उस समय दोनों का ये कहना था कि कांग्रेस देश की सबसे बड़ी दुश्मन है। उस समय मुद्दा भ्रष्टाचार था। आज भी स्थितियां करीब-करीब वैसी ही हैं। उस समय एक सरकार बनाने के लिए साथ थे। आज एक सरकार गिराने के लिए साथ हैं। बस मुद्दा बदल गया है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परमाणु करार पर प्रकाश करात की तारीफ कर रहा है। हार्डकोर संघी लाल कृष्ण आडवाणी और हार्डकोर मार्क्सिस्ट प्रकाश करात एक साथ खड़े हैं। वो, कांग्रेस को देश का सबसे बड़ा दुश्मन बता रहे हैं। एक-दूसरे को गाली दे रहे हैं लेकिन, कह रहे हैं कि संसद में यूपीए सरकार को गिराने के लिए साथ वोट देंगे। भाजपा तो पहले भी हाथी पर सवार हो चुकी है लेकिन, वामपंथी विचारधारा के अगुवा पहली बार किसी दलितवादी नेता के साथ हाथ मिला रहे हैं। वैसे इसके पहले वो, जातिवाद के सबसे पोषक नेताओं मुलायम सिंह यादव और लालू प्रस…

अमर सिंह ये न करें तो, क्या करें आप ही बताइए

शनिवार को जब मायावती प्रेस कांफ्रेंस कर रहीं थीं तो, ऑफिस में मेरे एक सहयोगी ने कहा- सर, ये मायावती जैसे नेता इस तरह के क्यों हैं। बोलने का तरीका ठीक नहीं है फिर भी राजनीति में इतने ऊपर कैसे हैं। ये सवाल सिर्फ मेरे सहयोगी का ही नहीं है। ज्यादातर हम जैसे लोगों (मिडिल क्लास) की चर्चा में ये बार-बार आता है कि बद्तमीज-गालियों की भाषा में मायावती बात क्यों करती है और करती है तो, फिर वो देश की राजनीति में इतनी अहम क्यों है।

मायावती की प्रेस कॉन्फ्रेंस कल थी तो, अमर सिंह की आज थी। थोड़ा अलग मायावती से लेकिन, अमर सिंह भी वैसे ही हैं जैसी मायावती है। अमर सिंह भी विरोधियों को गंदे-गंदे विश्लेषणों से नवाजते हैं। राजनीति के सॉफिस्टिकेटेड लोग कहते हैं कि अमर सिंह दलाल किस्म का नेता है। उसकी कोई राजनीतिक बिसात नहीं है। सिर्फ इसकी-उसकी दलाली (मध्यस्थता) करके अपनी हैसियत बनाता रहता है। अमर सिंह को कहा जाता है कि वो, अनिल अंबानी और दूसरे कॉरपोरेट्स के लिए सत्ता से मदद दिलाकर अपनी जेब भरते हैं तो, मायावती पर आरोप ये कि वो दलितों के हित के बहाने करोड़ो रुपए हड़प चुकी हैं।

मायावती के जन्मदिन पर 80 लाख…

बेचने के चक्कर में हर घर में डर तो मत भरो

टीवी पर सब बिकता है। आंसू-मारधाड़-नौटंकी। हत्या-बलात्कार-रेव पार्टी। लेकिन, इस बेचने के चक्कर में अब टीवी वालों (खबरिया चैनल पढ़िए) का ईमान तक बिक गया है। पता नहीं ये सब दिखाने-चलाने के बाद वो न्यूजरूम में हंसते हैं या रोते हैं। ऐसा तो है नहीं कि उनमें संवेदनाएं नहीं हैं। सब मजबूरी में टीआरपी की अंधी दौड़ में भाग रहे हैं। लेकिन, इतना सब करने पर भी टीआरपी नहीं मिल पा रही है। मैं खुद एक टीवी चैनल में हूं इत्तफाकन खुशनसीब हूं कि इस ईमान बेचने के धंधे से काफी बचा हुआ हूं। बिजनेस चैनल में होने से बच गया हूं। बल्कि सच्चाई तो ये है कि बच क्या गया हूं, जनरल न्यूज चैनल में जाना चाहता हूं लेकिन, डर लगने लगा है। जाके करूंगा क्या।

अब आरुषि को पता नहीं किसने मारा। सीबीआई भले ही तीन नौकरों को हत्यारा बता रही हो लेकिन, सच्चाई शायद ही ये हो। लेकिन, इस मामले पर न्यूज चैनलों ने जो हरकत की वो, आरुषि की हत्या से भी बहुत शर्मनाक है। एक प्यारी सी खूबसूरत बच्ची जो, किसी के भी घर की मासूम बच्ची नजर आती है। आरुषि की मौत की खबर आने के साथ ही न्यूज चैनलों पर जितनी तरह की फैंटेसीज हो सकती हैं वो, दिखानी शुरू क…

मादाम खुश हुईं

कल देर रात सीपीआई नेता एबी बर्धन ने कहाकि अगर कांग्रेस अगले लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर मनमोहन सिंह को पेश न करे तो, वो फिर से कांग्रेस के साथ गठजोड़ बना सकते हैं। ये बयान तब आया है जब अभी ताजा-ताजा ही लेफ्ट की चारों पार्टियों के नेता- जिसमें एबी बर्धन भी शामिल थे- राष्ट्रपति को जाकर कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार से समर्थन वापसी का पत्र सौंप चुके हैं। और,कल भी दिन भर प्रकाश करात चीखते रहे कि कांग्रेस जल्दी से जल्दी सदन में बहुमत साबित करे।

फिर ये दोमुंही बात क्यों। अभी सरकार गिरी भी नहीं। चुनाव हुए भी नहीं। और, अगली सरकार बनाने के लिए उसी पार्टी को समर्थन देने की बात लेफ्ट नेता कह रहे हैं जिसे वो समय से पहले गिरा देना चाहते हैं। वैसे लेफ्ट नेता की इस बात से सबसे ज्यादा खुश मादाम हुईं होंगी। ये बात मैंने परसों ही बता दी थी। आप भी पढ़िए मादाम क्यों खुश हैं।

आखिर क्यों मनमोहन के सर ठीकरा फूटा

क्या मनमोहन सिंह कांग्रेस में इस स्थिति में हैं कि उनके आत्मसम्मान को बचाने के लिए सरकार को दांव पर लगाया जाता। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और दूसरे कांग्रेसी ये जानने के बावजूद की अभी के हालात में चुनाव जीतना बहुत मुश्किल होगा और चुनाव होना अभी बचा भी लें तो, इसके लिए सरकार पर समर्थन की जो शर्तें समाजवादी पार्टी जैसे दल लादेंगे वो, और भी बड़ी कीमत होगी और क्या उसकी भरपाई हो पाएगी।

आखिर हो भी तो यही रहा है सरकार के समर्थन की कीमत कभी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार चुका रहे हैं तो, कभी पीएमओ से लेकर दूसरे मंत्रालयों के बड़े-बड़े अफसर। अमर सिंह का सूखा चेहरा फिर खिल गया है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अमर सिंह और मुलायम सिंह यादव को परमाणु समझौते पर सफाई देते हैं। इतने पर ही बात नहीं बनी तो, अमर सिंह के दुश्मन कॉरपोरेट घरानों (अनिल अंबानी के विरोधी भाई मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज पढ़िए।) के पर कतरने पर भी सहमति बनने लगी है। दिग्गज वित्त मंत्री पी चिदंबरम और पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा हटें न हटें उनके विभाग के अफसर अमर सिंह के सामने दरबारी की मुद्रा में खड़े हैं। प्रधानमंत्र…

पुनर्मूषको भव

सर का ताज कब पांव की जूती बन गया पता ही नहीं चला और पांव की धूल उड़कर सर की शोभा बढ़ा रही है। राजनीति का बेजोड़ रंग इस समय भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में देखने को मिल रहा है। 2004 में जब यूपीए की सरकार बनी थी तो, लगा था कि ये सरकार तो बमुश्किल ही चल पाएगी। लेकिन, चली लड़ते-झगड़ते वामपंथी और कांग्रेसी बैठकों पर बैठकें करते। बैठक से पहले मीडिया के जरिए एक दूसरे पर दबाव बनाने की कोशिश करते और बैठक के बाद एक दूसरे के साथ गलबहियां डाले ऐसे निकलते जैसे सबकुछ मीडिया का ही किया धरा हो।

वैसे अब भी कांग्रेस और लेफ्ट के नेता टीवी चैनलों की बहस में बीच-बीच में ये बताते रहते हैं कि कम्युनल फोर्सेज को बाहर रखने का उनका संकल्प अभी भी उतना ही मजबूत है। कम्युनल फोर्सेज को बाहर रखने का यही संकल्प लिए समाजवादी पार्टी परमाणु समझौते का समर्थन कर रही है। और, मुलायम सिंह यादव कह रहे हैं कि वो, सिर्फ परमाणु समझौते का ही समर्थन नहीं कर रहे हैं। संसद में सरकार के पक्ष में वोट भी देंगे। अमर सिंह चीख-चीखकर खुद के सेक्युलर होने की दुहाई दे रहे हैं। और, आडवाणी को जॉर्ज बुश से भी खतरनाक बता रहे हैं। अमर सिंह लगे हा…

आस्था बची रहे इसका तो ख्याल रखना ही होगा

इसे मैं आज सुबह ही लिखने वाला था। जब मेरी नजर इस खबर पर गई कि पुरी की रथयात्रा के लिए हर साल एक हजार पेड़ों को काटा जाता है। लेकिन, मैं सुबह लिख नहीं पाया। शाम तक खबर आ गई कि पुरी में रथयात्रा में भगदड़ मची और छे लोगों की जान चली गई सैकड़ो लोग घायल हो गए हैं। अब सवाल ये है कि आस्था के साथ छेड़छाड़ न होने के नाम पर क्या गलतियों के समर्थन में चुप रहना या सीना तानकर खड़े हो जाना कौन सा धार्मिक कृत्य है।

किसी के भी धर्म या आस्था के साथ छेड़छाड़ या खिलवाड़ का मैं सख्त विरोधी हूं और एक बार मैंने पहले भी लिखा था कि आस्था पर हमले के बिना भी तो बात बन सकती है। लेकिन, आज भगवान जगन्नाथ के रथ के बारे में पढ़कर मेरे मन में ये विचार आ रहा है कि आस्था या धर्म के नाम कहां तक गलतियां करने का अधिकार मिल सकता है। हर साल जगन्नाथ भगवना की रथयात्रा के लिए जो, रथ बनता है। उसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के लिए बनने वाले तीन रथों के लिए 13 हजार क्यूबिक फीट से ज्यादा लकड़ी लगती है। जिसके लिए हर साल एक हजार हरे पेड़ों को काटा जाता है। और, रथयात्रा पूरी होने के बाद इन रथों को तोड़कर इनकी लकड़ियों …

मुलायम सिंह यादव और सोनिया गांधी साथ आएं तो ...

कांग्रेस से दोस्ती के लिए समाजवादी पार्टी अब अपनी राजनीतिक छतरी लेफ्ट को भी दरकिनार के मूड में आ गई है। लेकिन, समाजवादी पार्टी को ये अहसास है कि बीजेप-बीएसपी गठजोड़ के मजबूत होने की स्थिति में यही अकेली छतरी होगी जिसके नीचे आकर सत्ता से दूर रहने के नुकसान थोड़े कम किए जा सकेंगे। और, तथाकथित सांप्रदायिकता के खिलाफ एक गठजोड़ बना सकेंगे। यही वजह है कि अमर सिंह और मुलायम सिंह यादव लेफ्ट को मनाकर-बताकर कांग्रेस को समर्थन देना चाहते हैं।

दरअसल मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह यूपी की सत्ता से बाहर होने और मायावती के मजबूती से सत्ता हासिल करने के बाद जिस हालात से गुजर रहे हैं। उसमें उन्हें कांग्रेस के साथ जाना फायदे का सौदा लग रहा है। वैसे इसके लिए चार-छे महीने के लिए ही सही सत्ता में बड़ी हिस्सेदारी भी मिलेगी। मैंने महेंद्र सिंह टिकैत के आंदोलन के समय ही ये लिखा था कि किस तरह से यूपी में हाशिए पर पहुंची कांग्रेस और सपा एक दूसरे के नजदीक आ रहे हैं। और, बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी प्रधानमंत्री बनने के लिए मायावती के साथ जाने में फायदा देख रहे हैं। जबकि, सच्चाई यही है कि भले ही भाजपा की अगुवाई व…

इसके बिना बात पूरी नहीं होगी

मेरे घर वाले कश्मीर से लौट आए हैं। मैंने पिछले लेख में बात यहां खत्म की थी कि अगर राजनीति इसी तरह से घाटी को दहशत के माहौल में धकेलती रहेगी। तो, कैसे कोई दुबारा किसी को कश्मीर घूमने जाने की सलाह दे पाएगा और बेरोजगार कश्मीरी महबूबा, उमर अब्दुल्ला और गुलाम नबी आजाद की बात समझेगा या फिर आतंकवादियों की।

लेकिन, आज जब मेरी घर वालों से बात हुई तो, उन्होंने जिस तरह से अपने कैब ड्राइवर की तारीफ की। उससे साफ है कि कश्मीरी बहुत सच्चे और साफ दिलवाले हैं। और, घाटी में एक दशक से जो कुछ शांति आई है। और, इससे वहां जिस तरह से मौके और रोजगार मिल रहा है वो, उसे आसानी से नहीं गंवाएंगे। गुलमर्ग से लौटते समय जब राजनीति दलों की क्षुद्र स्वार्थों को पूरा करने वाले मुट्ठी भर बहके लोग और जाने-अनजाने आतंकवादियों के हितों को पूरा कर रहे लोगों ने गाड़ी रोककर उसे तोड़ने-जला देने की धमकी दी तो, कश्मीरी टैक्सी ड्राइवर ने मेरे घरवालों को भरोसा दिलाया मेरी लाश से गुजरने के बाद ही ये लोग आपको छू सकेंगे। मुसलमान टैक्सी ड्राइवर पर मेरे घर वालों को भरोसा कुछ इतना हो गया था कि जिस दिन वो लोग कहीं घूमने नहीं जा पाए थे तो,…