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Friday, April 28, 2017

नेता बदले गांधी परिवार, लौटता दिख रहा कांग्रेस का आधार

पूर्ण बहुमत लोकतंत्र में स्थिरता के लिए जरूरी होता है। लेकिन, कई बार पूर्ण बहुमत की वजह से चुनावी विश्लेषण में कई जरूरी मुद्दों पर बात ही नहीं हो पाती है। कुछ ऐसा ही दिल्ली नगर निगम के चुनाव में भी हुआ है। चर्चा सिर्फ पूर्ण बहुमत वाली बीजेपी और दूसरे स्थान पर रहने वाली आम आदमी पार्टी की हो रही है। कांग्रेस की कोई चर्चा करने को ही तैयार नहीं है। कांग्रेस की चर्चा हो भी रही है तो, सिर्फ इसलिए कि अजय माकन ने इस्तीफे की पेशकश की है। कांग्रेस की बात मैं क्यों कर रहा हूं, इसे समझने की जरूरत है। दिल्ली नगर निगम में अपने सारे उम्मीदवारों को निकम्मा मानकर उन्हें बदलने की रणनीति बीजेपी के लिए ब्रह्मास्त्र बन गई। 2012 से भी ज्यादा सीटें दिल्ली के तीनों निगमों में बीजेपी को मिल गए। ये साफ है कि दिल्ली नगर निगम का चुनाव नगर निगम के मुद्दों पर लड़ा ही नहीं गया। 270 में से 183 सीटें साफ बता रही हैं कि भारतीय जनता पार्टी के पास नरेंद्र मोदी जैसी एक पॉलिसी जो कम से कम 2019 तक तो बीजेपी को बाकायदा लाभांश देती रहेगी। लाभांश कम-ज्यादा हो सकता है लेकिन, मिलता रहेगा, इतना पक्का है। 5 साल की इस पक्की पॉलिसी को जनता अगले 5 साल के लिए फिर से लेती है या नहीं, ये देखने वाली बात होगी। फिलहाल तो बीजेपी विजय रथ पर सवार है। आंकड़ों के लिहाज से 270में से 183 सीटों वाली बीजेपी के बाद आम आदमी पार्टी को सिर्फ 47 सीटें मिल सकी हैं। कांग्रेस के हिस्से सिर्फ 29 सीटें आई हैं। 2012 के चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस की आमने-सामने की टक्कर थी। बीजेपी को तीनों निगमों में मिलाकर 142 सीटें मिली थीं और कांग्रेस को 77। इस आधार पर कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत बुरा रहा। 77 से घटकर 29। इस आधार पर प्रथम दृष्टया अजय माकन का नैतिक आधार पर इस्तीफा देना बनता है।
ये सीधे-सीधे किया गया विश्लेषण है, जिसमें निगम चुनावों में तीसरे स्थान पर चले जाने और पिछले चुनाव से बहुत कम सीटें पाने की वजह से कांग्रेस की चर्चा नहीं की जानी चाहिए। और उसके प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन का इस्तीफा पक्के तौर पर बनता है। लेकिन, ये विश्लेषण करते हम ये भूल जा रहे हैं कि 2012 और 2017 के बीच में 2013, 2014 और 2015 भी आया था। 2013 के विधानसभा चुनावों में पहली बार दिल्ली में चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी तेजी से उभरी और 40% मतों पर कब्जा जमा लिया। आम आदमी पार्टी को 28 सीटें मिलीं थीं। बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। बीजेपी को 45.7% मत मिले और सीटें मिलीं 32। कांग्रेस एकदम से गायब हो गई। कांग्रेस को सिर्फ 11.4% मत मिले थे और सिर्फ 8 विधायक चुनकर पहुंचे। 8 विधायक चुनकर आए थे लेकिन, कांग्रेस के खात्मे की भविष्यवाणी राजनीतिक विद्वानों ने करना शुरू कर दिया था। उसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव हुए और नरेंद्र मोदी की लहर पर सवार बीजेपी ने 46.4% मत हासिल करके दिल्ली की सातों लोकसभा सीटें जीत लीं। आम आदमी पार्टी को 32.9% मत मिले लेकिन, सीट एक भी नहीं मिल सकी। लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का मत प्रतिशत भी थोड़ा बढ़ा। कांग्रेस को 15.1% मत मिले। यहां एक बात समझने की थी कि मोदी की लहर और केजरीवाल के दिल्ली में तत्कालीन करिश्मे के बीच भी कांग्रेस का मत प्रतिशत विधानसभा चुनावों के मुकाबले बढ़ा। इसके बाद केजरीवाल की सरकार गिरने की वजह से हुए चुनाव में केजरीवाल के पक्ष में सहानुभूति लहर ऐसी चली कि सब साफ हो गए। 2015 विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी 54.3% मतों के साथ 67 विधानसभा सीट जीतने में कामयाब रही। बीजेपी को 32.2% मत मिले लेकिन, सीट मिली सिर्फ 3 और कांग्रेस को मत मिले 9.7% लेकिन, सीट के मामले में खाली हाथ रह गई।
अभी नगर निगम के चुनाव में जो मत प्रतिशत दिख रहा है। उस पर नजर डालिए। पूर्वी दिल्ली में बीजेपी को 38.61% मत मिले हैं। आम आदमी पार्टी को 23.4% और कांग्रेस को 22.84%। दक्षिणी दिल्ली में बीजेपी को 34.87% मत मिले हैं। आम आदमी पार्टी को 26.44% और कांग्रेस को 20.29% मत मिले हैं। उत्तरी दिल्ली में भी कमोबेस यही स्थिति है। बीजेपी को 35.63% मत मिले हैं। आम आदमी पार्टी को 27.86% और कांग्रेस को 20.73%। कुल मिलाकर अगर तीनों नगर निगमों के ताजा चुनाव की बात की जाए तो बीजेपी को 36.08% मत मिले हैं। आम आदमी पार्टी को 26.23% और कांग्रेस को 21.09% मिले हैं। दरअसल यही समझने की बात है। कांग्रेस पार्टी अपना खोया हुआ आधार वापस हासिल कर रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन के गुबार में खड़ी हुई आम आदमी पार्टी पर लोगों का भरोसा तेजी से घट रहा है। ये बात पंजाब और गोवा के चुनावी नतीजों से साफ हो गई थी। पंजाब में बड़ी आसानी से कांग्रेस ने सरकार बना ली। और गोवा में कांग्रेस के चुनाव प्रबंधकों की गलती और लापरवाही का फायदा बीजेपी ने उठा लिया। मणिपुर में भी लगभग यही रहा कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व हताशा से उबर ही नहीं पा रहा है और भारतीय जनता पार्टी अपनी मजबूती का फायदा लगातार उठा रही है। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की प्रचण्ड जीत के सामने कांग्रेस के अपने आधार मत को वापस पाने की चर्चा लगभग ना के बराबर हुई। और अब यही दिल्ली नगर निगम के चुनाव नतीजों पर भी हो रहा है। जिस पार्टी का पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ठीक चुनाव के बीच विरोधी पार्टी में चला जाए और बड़े-बड़े नेता पार्टी छोड़ने की कतार में लग जाएं, अगर उस पार्टी का मत प्रतिशत 2015 के विधानसभा चुनावों से करीब ढाई गुना बढ़ गया हो तो इसकी चर्चा होनी चाहिए। और इसका श्रेय भी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन को देना चाहिए। इसलिए अजय माकन को इस्तीफा देने की कतई जरूरत नहीं है। हां, इतना जरूर है कि कांग्रेस राज्यों में अपना खोया आधार वापस पाने की लड़ाई मजबूती से लड़ रही है और दिल्ली जैसी जगह में तो एक बार अरविन्द की छवि कमजोर होने लगी तो बड़ी आसानी से कांग्रेस उसी जगह पर खड़ी हो जाएगी। लेकिन, राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को अपना नेता तलाशना होगा, वरना 2019 में ये सारी बढ़त फिर गायब हो जाएगी।
 (ये लेख QuintHindi पर छपा है)

Tuesday, June 23, 2015

शिमला, सोनिया गांधी और सुविचार

ये कल्पना से बाहर की बात थी। भला ये कैसे सोचा जा सकता है कि सोनिया गांधी हिंदी पर महान विचारक हो सकती हैं। वो भी केंद्र सरकार के अधीन एक सरकारी कंपनी के अतिथि विश्राम गृह में। शिमला में एनएचपीसी के अतिथि विश्राम गृह के तीनों तलों पर सीढ़ियों की शुरुआत में एक विचार पट्टिका लगी हुई है। 
सबसे पहले मेरा ध्यान मुंशी प्रेमचद के विचार पर गया। अच्छा लगा कि सरकारी कंपनी के अतिथि गृह में इस तरह के सद्विचार लिखने का यत्न किया है। लेकिन, एक दूसरी ऐसी ही सद्विचार वाली तख्ती पर नजर पड़ी तो पहले उस कहे को कहने वाले से मैं जोड़ने में थोड़ा असहज हुआ। 



उसके बाद में सोचने लगा कि आखिर सोनिया गांधी के ये विचार किस हैसियत से एक केंद्र सरकार की कंपनी के अतिथि गृह में लिखे हुए हैं। अब जरा सोचिए कि क्या बीजेपी के किसी राष्ट्रीय अध्यक्ष के विचार ऐसे किसी सरकारी कंपनी के अतिथि गृह में लिखे जा सकते हैं। अभी के संदर्भ में सोचिए तो बीजेपी पूर्ण बहुमत से केंद्र की सरकार में है। अब अगर सरकारी कंपनियों के दफ्तरों और अतिथि गृहों में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का कहा सुविचार के तौर पर ऐसे चिपका दिया जाए तो कैसा लगेगा। सुविचार का बड़ा मतलब होता है। इस मतलब को ही सोनिया गांधी का हिंदी पर कहा और एक केंद्र सरकार की कंपनी के अतिथि गृह में लिखा होना ध्वस्त कर देता है। कमाल ये भी है कि कांग्रेस की अब सरकार भी नहीं है फिर भी वो तख्ती वहां शोभा दे रही है। 
इसके बाद तो और कमाल हो गया। कोई जानसन साहब हैं उन्होंने भी कुछ कहा है कि जिसको एनएचपीसी ने अपने अतिथि गृह में लिखना जरूरी समझा है। 

Friday, May 21, 2010

सोनिया मैडम, ये कौन सी पॉलिटिक्स है

शासन चलाने के साथ विपक्षी भूमिका भी अपने पास रख लेने की कला कांग्रेस से बेहतर किसी के पास नहीं है। नक्सलियों से निपटने पर केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम का ताजा बयान कुछ इसी नीति को पुख्ता करता है। वैसे इस काम के लिए कांग्रेस अलग-अलग समय पर अलग-अलग नेताओं को इस्तेमाल करती रहती है जो, सरकार में न होकर पार्टी में होते हैं। और, UPA 1-2 में ये भूमिका मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह बखूबी निभा रहे हैं। लेकिन, नक्सल समस्या जैसे गंभीर मसले पर शायद कांग्रेसी पॉलिटिक्स सिर्फ दिग्विजय के बयानों से अपना काम नहीं साध पा रही थी इसलिए चिदंबरम को भी ये बयान देना पड़ा कि नक्सलियों के आतंक से निपटने के लिए धैर्य की जरूरत है।

ये वही चिदंबरम साहब हैं जो, नक्सलियों के खिलाफ बेहद कड़ी सैन्य कार्रवाई तक करने के पक्षधर होने की वजह से कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के निशाने पर भी आ गए थे। शायद और कोई रहा होता तो, वो अनुशासनात्मक कार्रवाई के दायरे में आ गया होता लेकिन, इकोनॉमिक टाइम्स में चिदंबरम की यानी अपनी ही सरकार की नक्सल से निपटने की रणनीति को जिस तरह से बेकार बताया था, उस पर भी सोनिया मैडम ने कुछ भी नहीं कहा। हां, चिदंबरम को जरूर अपनी कड़ी रीढ़ की हड्डी नरम करनी पड़ी। दरअसल अब कांग्रेस को ये लग रहा है कि जिस तरह से रमन सिंह आक्रामक हो रहे हैं अगर इस समय सैन्य कार्रवाई की इजाजत दी गई तो, आम लोगों में उस अभियान की सफलता का सेहरा बीजेपी के मुख्यमंत्री रमन सिंह के सिर बंध सकता है।

संसद में भी कड़े तेवर अपनाते हुए बहस के दौरान विपक्ष के नेता अरुण जेटली खुलेआम कह चुके हैं कि चिदंबरम के साथ हम हैं लेकिन, उनकी पार्टी ही नहीं है। चिदंबरम बेचारे अपनी कड़क मंत्री की छवि बनाए रखना चाहते हैं लेकिन, वो भूल गए कि कांग्रेस की पसंद गृह मंत्री पद के लिए शिवराज पाटिल जैसे ढुलमुल नेता रहे हैं वो, तो मुंबई हमले के बाद बहुत हल्ले की वजह से उनकी बलि लेना पड़ी। अब कांग्रेस को नक्सलियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने वाला गृह मंत्री नहीं चाहिए। वजह साफ है लालू प्रसाद यादव ने जिस तरह से बिहार चुनाव के मद्देनजर नक्सल नीति पर गंदा बयान जारी किया है उसने कांग्रेसी रणनीतिज्ञों के कान खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस को भी तो बिहार में अपना हाल थोड़ा ठीक करना है। उस पर बंगाल में ममता और कांग्रेस की बीच गठजोड़ में पड़ी दरार और ममता को माओवादियों का पूरा साथ इन सबने कांग्रेस को रणनीति थोड़ा बदलने पर मजबूर कर दिया है। हो, सकता है इसकी वजह से अब चिदंबरम के गृह मंत्रालय की ओर से जारी होने वाले नक्सल विरोधी बड़े-बड़े विज्ञापन भी बंद कर दिए जाएं। यही कांग्रेसी पॉलिटिक्स है।

एक नहीं कई नमूने हैं। संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु की फांसी की फाइल गृह मंत्रालय और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बीच गजब फंसी हुई है। और, जब मामला खुलने पर सरकार की किरकिरी होनी शुरू हुई तो, हमेशा कांग्रेस की ओर से मुस्लिमों के बड़े नेता बनने की कोशिश करते दिखने वाले परम धर्मनिरपेक्ष दिग्विजय सिंह ने बयान जारी कर दिया कि अफजल गुरु को जल्द फांसी हो। अब अगर ये सिर्फ बयान भर नहीं है तो, ये बात चिदंबरम, शीला दीक्षित को बतानी थी। राहुल गांधी के इस प्रमुख सलाहकार की बात टालने की हिम्मत भला कौन कांग्रेसी इस समय कर सकता है।

इससे पहले बाटला हाउस एनकाउंटर पर भी दिग्विजय सिंह आजमगढ़ जाकर आतंकी परिवारों तक में अपनी ही सरकार की रिपोर्ट को झुठलाकर आए थे। जांच का आश्वासन भी दिया था। ये अलग बात है कि दिल्ली आते-आते पलट गए। वाह रे कांग्रेसी पॉलिटिक्स।


Tuesday, September 15, 2009

ये गजब की इकोनॉमी है!!!

लग ऐसे रहा है जैसे आजकल पूरा देश ताजा-ताजा बचत करना सीख रहा हो। नए काम की शुरुआत जैसा दिख रहा है। प्रधानमंत्री ने कहा, फिर प्रधानमंत्री से भी बड़ी सोनियाजी ने कहा, फिर सबसे बड़े आदर्श राहुलजी ने कहा। फिर इन लोगों ने करके दिखाना शुरू कर दिया। अब इकोनॉमी की चर्चा हो रही है। लोग इकोनॉमी में चलने लगे हैं। ये मनमोहन-मोंटेक वाली इकोनॉमी नहीं है। ये हवाई जहाज की इकोनॉमी वाली सीट है। इस पर सफर खबर बन रही है।


दिख कुछ ऐसे रहा है जैसे इस बचत क्रांति को देश की हरित क्रांति और दुग्ध क्रांति के बराबर ले जाकर खड़ा कर दिया जाएगा। या शायद उससे भी बड़ी क्रांति हो। शनिवार को वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने दिल्ली से कोलकाता इकोनॉमी क्लास में सफर किया। फिर सोनिया गांधी ने दिल्ली से मुंबई की यात्रा इकोनॉमी क्लास में की। ये अलग बात है कि सुरक्षा के मद्देनजर जो इंतजाम सोनियाजी के लिए जरूरी हैं उसकी वजह से खर्च कम तो हुआ नहीं। क्योंकि, अगर सोनियाजी बिजनेस क्लास में यात्रा करतीं तो, खर्च आता 62,000 रुपए और इकोनॉमी में आगे 5 कतारें बुक की गईं जिसका खर्च आया 55,000 रुपए यानी किराए में बचत हुई सिर्फ 7,000 रुपए की और हल्ला ऐसे हुआ जैसे पूरे देश में बचत आंदोलन की योजना का उद्घाटन हुआ हो। सुरक्षा के लिए जो 3 टाटा सफारी दिल्ली से मुंबई हवाई जहाज में लादकर ले जाई गई उसका खर्च आया 3 लाख रुपए। जिस फ्लाइट में सोनिया मैडम गईं हैं उसी में बिजनेस क्लास में 8 में से 4 सीटें खाली गईं- ये कौन सी बचत है।


सोनिया या किसी भी VVIP के सुरक्षा इंतजामों कोई कोताही नहीं होनी चाहिए। लेकिन, सवाल ये है कि ये संदेश देने की जरूरत क्यों पड़ रही है और किसे संदेश देने की जरूरत पड़ रही है। ये वो, देश है जहां आज भी छोटे-बड़े शहरों में सोने के गहने और बचाई गई रकम घर के किसी कोने में छिपाकर आड़े वक्त में काम आने के लिए रख दी जाती है। ये वो देश है जहां अभी भी 35 प्रतिशत से ज्यादा लोग बचत पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं। फिर ये संदेश आम जनता को तो देना नहीं है। पिछले 5 साल इन्हीं सोनिया-मनमोहन की सरकार रही है और अगले 5 साल भी इन्हीं की सरकार रहने वाली है। फिर जो, करना है करिए ये नौटंकी क्यों कर रहे हैं।


एक्शन दिखाइए ना। मुझे पूरा खतरा इस बात का दिखता है कि ये सब कुछ दिनों का चोचला भर बनकर रह जाएगा। राहुल शताब्दी में दिल्ली से लुधियाना एक्जिक्यूटिव क्लास में सफर नहीं कर रहे हैं। शशि थरूर बंगाली स्वीट्स में खाना खाकर बिल देते दिख रहे हैं। क्या है ये सब सिर्फ नौटंकी। इससे कितने खर्च बचते होंगे। राहुल गांधी को अपने कुर्ते का कॉलर दिखाकर ये कहने की जरूरत क्यों पड़ रही है कि --- सादा जीवन उच्च विचार जरूरी है। सादगी का संदेश इस तरह से देने की जरूरत क्यों आ पड़ी है।


खर्च जहां बचना चाहिए वहां कितना बचा। जब मंत्रिमंडल बना तो, इस बार लोगों को उम्मीद थी कि पिछली सरकार के दौरान कॉरपोरेट्स को कम सैलरी लेने,सादगी से रहने की सीख देने वाला प्रधानमंत्री महोदय मंत्रिमंडल छोटा रखेंगे। कम मंत्रालय रहेंगे तो, गैर जरूरी खर्चे भी बचेंगे। लेकिन, क्या हुआ वही ढाक के तीन पात। इस बार तो, ये बहाना भी नहीं था कि सरकार चलाने के लिए दूसरी पार्टियों का समर्थन जुटाने की मजबूरी थी। कुल मिलाकर ये एक फितूर है जो, कुछ दिनों में खत्म हो जाएगा। तब कोई नया शिगूफा आएगा। जय हो ...

Friday, July 11, 2008

मादाम खुश हुईं

कल देर रात सीपीआई नेता एबी बर्धन ने कहाकि अगर कांग्रेस अगले लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर मनमोहन सिंह को पेश न करे तो, वो फिर से कांग्रेस के साथ गठजोड़ बना सकते हैं। ये बयान तब आया है जब अभी ताजा-ताजा ही लेफ्ट की चारों पार्टियों के नेता- जिसमें एबी बर्धन भी शामिल थे- राष्ट्रपति को जाकर कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार से समर्थन वापसी का पत्र सौंप चुके हैं। और,कल भी दिन भर प्रकाश करात चीखते रहे कि कांग्रेस जल्दी से जल्दी सदन में बहुमत साबित करे।

फिर ये दोमुंही बात क्यों। अभी सरकार गिरी भी नहीं। चुनाव हुए भी नहीं। और, अगली सरकार बनाने के लिए उसी पार्टी को समर्थन देने की बात लेफ्ट नेता कह रहे हैं जिसे वो समय से पहले गिरा देना चाहते हैं। वैसे लेफ्ट नेता की इस बात से सबसे ज्यादा खुश मादाम हुईं होंगी। ये बात मैंने परसों ही बता दी थी। आप भी पढ़िए मादाम क्यों खुश हैं।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...