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Showing posts from October, 2009

ये पूरा बेड़ा गर्क करके ही मानेंगे

अब सोचिए कि क्या होगा। ये कुछ समझने-मानने को तैयार ही नहीं हैं। वैसे ये मान ही लेते तो, इस हाल में थोड़े न पहुंचते। इतनी गंभीर बीमारी है और इनके शुभचिंतकों से लेकर आलोचक तक अलग-अलग तरीके से इन्हें आगाह कर रहे हैं। लेकिन, इनको क्यों फर्क पड़े आखिर पूरी तरह से स्वस्थ पार्टी को गंभीरमरीज जैसे हाल में पहुंचाने में इनके जैसे बड़े लोगों की पूरी टोली के सत्कर्मों का तो बड़ा योगदान रहा है।


ये हैं बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह जो, ये मानने को तैयार ही नहीं हैं कि भारतीय जनता पार्टी को भारतीय जनता की पार्टी बने रहने के लिए बड़े इलाज की जरूरत है। पार्टी के पेस्ट कंट्रोल की जरूरत हम जैसे लोग तो बहुत पहले से कह रहे हैं। अब तो, ये बात खुद - कम से कम भारतीय जनता पार्टी के तो, सबसे बड़े समाजविज्ञानी- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहनराव भागवत भी कह रहे हैं। पत्रकारों के सवाल पूछने पर भागवत जी ने कहा बीजेपी हमसे सलाह मांगेगी तो, हम देंगे। लेकिन, बिन मांगे सलाह दे ही दी कि भाजपा को बड़ी सर्जरी या कीमोथेरेपी तक की जरूरत है।


लेकिन, अभी करीब डेढ़-2 महीने तक और बीजेपी के ठेकेदार रहने वाले राजनाथ से जब …

इलाहाबाद से बदलाव के संकेत

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हिंदी ब्लॉगिंग पर 2 दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी में शामिल होने के लिए इलाहाबाद आया हूं। ब्लॉगिंग पर कुछ खट्टा-कुछ मीठा टाइप की चर्चा हुई। कुछ खुश हुए कुछ खुन्नसियाए। सबकी अपनी जायज वजह थी। लेकिन, हमको तो भई बड़ा मजा आया। अपने शहर में 2 दिन रहने का भी मौका मिला। और, शहर से कुछ संकेत भी मिले कि भई काफी कुछ बदल रहा है वैसे मेरे गांव की तरह कभी-कभी ठहराव का खतरा भी दिखता है।

इलाहाबाद दैनिक जागरण अखबार के पहले पेज पर खबर है- “वाह ताज नहीं अब बोलिए वाह संगम!”। वाह ताज तो दुनिया कह रही है खबर के जरिए समझने की कोशिश की वाह संगम क्यों। तो, पता चला कि घरेलू पर्यटकों की अगर बात करें तो, 2008 में दो करोड़ सैंतीस लाख से ज्यादा लोग संगम में एक डुबकी लगाने चले आए। बयासी हजा से ज्यादा विदेशी पर्यटकों को भी संगम का आकर्षण खींच लाया।


आगरा करीब साढ़े सात लाख विदेशी पर्यटकों के साथ विदेशियों का तो पसंदीदा अभी भी है लेकिन, देश से सिर्फ इकतीस लाख लोगों को ही ताज का आकर्षण खींच पाया। मथुरा 63 लाख से ज्यादा, अयोध्या 59 लाख से ज्यादा देसी पर्यटक पहुंचे। आगरा के साथ अगर इन स्थानों का टूरिस्ट मैप पर थोड़ा असर …

इलाहाबाद में हिंदी ब्लॉगिंग और पत्रकारिता पर चर्चा

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महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय और हिंदुस्तानी एकेडमी इलाहाबाद की ओर से आयोजित राष्ट्रीय ब्लॉगर संगोष्ठी का पहला दिन कल बेहद शानदार रहा। देश भर के ब्लॉग लिक्खाड़ इस चर्चा में शामिल हुए। चर्चा के दौरान रवि रतलामी जी के सौजन्य से लगातार लाइव रिपोर्टिंग आप लोगों ने कल ज्यादा चित्रों के जरिए देखी। संजय तिवारी ने विस्फोट किया ब्लॉगरों के निशाने पर नामवर सिंह। उसके बाद विनीत ने विस्तार से एक रपट में पूरी चर्चा से आप लोगों को रूबरू कराया। उस चर्चा में मेरे विचार मैं विस्तार से यहां डाल रहा हूं। वैसे, जो वहां बोला वो तुरंत की स्थितियों के लिहाज से दिमाग में आई बात थी लेकिन, ज्यादातर इसी के इर्दगिर्द थी।

हिंदी पत्रकारिता विश्वसनीयता खोती जा रही है। कुछ इसके लिए टीवी की चमक दमक को दोष दिया जा रहा है। और, उसमें मिलने वाले पत्रकारों के पचाने लायक पैसे से ज्यादा पैसे मिलने को तो, कुछ TRP जैसा एक भयावह डर है जो, पत्रकारिता को अविश्वसनीय बना रहा है। लेकिन, सवाल ये है कि जब टीवी की चमक-दमक, पैसे या फिर TRP का दोष दिख रहा है तो, फिर अखबार-पत्रिका क्या कर रहे हैं।



इसका भी जवाब खोजने के …

ठीक-ठीक सोच तो लो कि क्या करना है

आप करना क्या चाहते हैं। कुछ ढंग का है दिमाग में या बस ये सोच रखा है कि कुछ-कुछ ऐसा करते रहना है जिससे लोग ये तो, जानें कि ये बड़े मंत्री जी हैं। या आपको किसी ने ये समझा दिया है कि जो लोग ये वाले मंत्री जी बन जाते हैं। आगे सबसे बड़े मंत्री जी यानी प्रधानमंत्री जी बनने की रेस में उनका नाम तो आ ही जाता है भले ही वो बने ना बने। वरना एक के एक बाद एक ऐसी ऊटपटांग हरकतें भला आप क्यों करते।


आप समझ तो गए ही होंगे कि मैं अपने मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल साहब की बात कर रहा हूं। बड़े वकील हैं तो, किसी भी बात जलेबी की तरह कितना भी घुमाने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। लेकिन, आपको कुछ तो समझना ही होगा सिब्बल साहब। अभी आप अपने पिछड़ने के ब्लू प्रिंट को जस्टीफाई नहीं कर पाए थे तब तक एक और फॉर्मूला ठेल दिया आपने। अब कह रहे हैं कि IIT’s में दाखिला कैसे हो ये तय करना IIT’s का काम है, सरकार का नहीं। फिर क्यों आपने लंतरानी मार दी कि हम कोचिंग संस्थानों की दुकान बंद कराने के लिए IIT’s के दाखिले में 12वीं की परीक्षा के नंबरों को ज्यादा वरीयता देंगे। कुछ 80 प्रतिशत नंबर लाने पर ही IIT’s में दाखिले लायक समझने क…

दौड़ादौड़ी की झमाझम चर्चा

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बहुत साल बाद ऐसा हुआ कि इस बार इलाहाबाद से वापस दिल्ली लौटने का मन नहीं कर रहा था। खैर, वापसी तो करनी ही थी। रोजी-रोजगार- वापस लौटा लाया। लेकिन, 2 दिनों का भरपूर इस्तेमाल मैंने किया या यूं कह लें कि ऐसे संयोग बने कि दो दिनों का पूरा इस्तेमाल हो गया। 2 दिन में विश्वविद्यालय टाइप की राजनीति, अड्डेबाजी से लेकर कराह की पूड़ी तक खाने का अवसर हाथ लग गया। मस्त कंजरवेटिव भारत के दीपावली मौज से मनाने के उत्साह का दर्शन भी हो गया। वैसे, इस साल तो दीपावली पर- वो क्या कहते हैं न कि सेंटिमेंट सुधर गया है- यानी मंदी भाग गई है- ऐसा मानने से सभी दिवाली मजे से मना गए। पिछले साल तो, कैसा डरावना माहौल था याद है ना। लेकिन, इसी कंजरवेटिव भारत ने दिवाली की रोशनी बचा ली थी।


दरअसल धर्मपत्नी जी को घर छोड़ने जाना था। तो, शनिवार की शिफ्ट करके प्रयागराज से इलाहाबाद के लिए निकल लिए। इलाहाबाद का कार्यक्रम में लगे हाथ मास कम्युनिकेशन के बच्चों की क्लास लेने का आमंत्रण मिला। पहली बार गुरु जी बनने का अवसर था तो, मैं भी भला चूकता कैसे। आर्थिक पत्रकारिता की करीब डेढ़ घंटे की एक बेसिक बातचीत भी हो गई। लेकिन, पता नहीं क्य…

ई बतकही के बड़ मनई हैं

बराक ओबामा क शांति पुरस्कार मिला है। दुनिया क सबसे बड़ा पुरस्कार है ई। अरे वही वाले का एक हिस्सा है ई पुरस्कार जिसमें हम इत्ते भर से खुश हो जाते हैं कि का भवा अमेरिका में रहि के मिला तो, भारत म पढ़ाई तो किहे रहा। अब भई तब तो बनथ भाई हम सबके खुश होएके चाही।


ई उही वाले ओबामा तो हैं जो, be the change! का जुमला हर बार बोलथैं जरूर। कर केत्ता पावथैं पता नहीं। साल भर में का भवा भइया। भवा ना दुनिया भर में घूम-घूम के कहिन be the change! औ ई बड़ मनई हैं जब बोलेन हर बार दुनिया सुनिस। ऐसा गूंजा be the change! जैसे राखी का थप्पड़ अभिषेक क गाल प। चड्ढी पहिर नहात-धोवत तस्वीरो देखके लगा कि be the change! लेकिन, का सही म कुछ चेंज भवा। इरान म तो अहमदीनेजाद से पूछो-- पाकिस्तान में आसिफ अली जरदारी, जनरल कियानी, यूसुफ रजा गिलानी-- चीनौ म पूछ लेओ। हमरे वसुधैव कुटुंबकम वाले भारत क छोड़ कउनौ से पूछे लेओ- ए भइया कहां भवा ई be the change!


be the change! बस एत्तै भवा कि गांधी के साथ ओबामा के dream date क बात सुनके हम भारतीय अइसन भाव विभोर भए। कइउ दिन तक लहराए घूमत रहे। सबके लगा कि एसे बड़ी खबर का होई औ ओबामा के गांध…

करीब 3 घंटे तो ‘अमितमय’ ही रह गए

बिग बॉस फिर आ गए हैं। और, इस बार तो सचमुच के बिग बॉस, बिग बॉस के शो में आए हैं। इसीलिए बिग बॉस, अरे वही जिनके घर में 13 लोग 84 दिन रुकेंगे, के पुराने सारे नियम कायदे-कानून टूट रहे हैं। 84 दिन पूरा होते-होते समझ में आएगा कि बिग बॉस सीजन 3 नहीं ... नहीं असली वाले बिग बॉस ने इसे बिग बॉस तृतीय कर दिया है।


बिग बॉस का कॉन्सेप्ट ही ऐसा है कि TRP तो, मिलेगी ही मिलेगी। लेकिन, बच्चन साहब ही इस बार शो की असली जान होंगे। एक राजू श्रीवास्तव को छोड़ दें तो, कोई भी बिग बॉस के घर का मेहमान नहीं है जो, TRP रखता हो। हॉ, ये जरूर है पिछली बार बिग बॉस का घर लोगों के पाप धुलने का जरिया बना था तो, इस बार वो, भूली दास्तां लो फिर याद आ गई वाले अंदाज के लोग बिग बॉस के घर में हैं।


घर के अंदर जाने वाले लोगों की बात फिर कभी। आज तो, बात सिर्फ बच्चन यानी असली बिग बॉस की। जो, भी शो में आ रहा था लटपटाकर बच्चन साहब के चरणों में गिरा पड़ रहा था किसी को उनकी गाड़ी का नंबर याद था तो, कोई दुनिया के सामने बच्चन साहब को टेनिस के मैच की याद दिला रहा था। अब ये जरा कम समझ में आया कि राखी सावंत की मां को उनकी मां के इलाज के ल…

आडवाणी जी, आपके पास एक बड़ा मौका और है

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पेजावर मठ के स्वामी के बयान मीडिया की सबसे बड़ी खबर बने हुए हैं। स्वामी जी बीजेपी के सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी के गुरु हैं और, वो कह रहे हैं कि आडवाणी जी ने उनसे संन्यास लेने की इच्छा व्यक्त की है। लेकिन, उन्होंने मना किया कि भारतीय राजनीति और बीजेपी को उनकी अभी बड़ी जरूरत है। अब लालकृष्ण आडवाणी अपने गुरु का कहा मानते हैं या अपने मन की- ये तो आने वाले दिन में ही पता चलेगा। लेकिन, क्या आडवाणी इतने असहाय-कमजोर और अकेले हो गए हैं कि खुद के राजनीति छोड़ने की बात कहने के लिए भी उन्हें अपने गुरु का सहारा लेना पड़ रहा है।
लगता ये है कि आडवाणी एक ऐसी भ्रमस्थिति के शिकार हो गए हैं जिसमें उनकी महत्वाकांक्षा और उनके मन के बीच का द्वंद न तो, उन्हें कुछ करने दे रहा है लेकिन, शांत भी नहीं बैठने दे रहा है। यही वजह है कि चुनाव हारने के बाद आडवाणी सक्रिय राजनीति से संन्यास की बात करने लगते हैं। नेता विपक्ष का पद छोड़ने की बात भी हुई लेकिन, ये द्वंद ही था कि जब वो, विपक्ष का नेता बने रहने के लिए मान गए तो, उन्होंने बयान दे दिया कि वो, फिर से देश भर की यात्रा करेंगे और भाजपा कार्यकर्ताओं से हार क…

बच्चे-बच्चे को जो बात पता है वो, सीएम साहब को नहीं पता!

बहुत गलत हुआ। करण जौहर को राज ठाकरे के घर माफी मांगने नहीं जाना चाहिए था। करण को सीधे थाने जाना चाहिए था। थाने जाना चाहिए था- किसलिए। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण साहब कह रहे हैं कि राज ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के खिलाफ करण जौहर को पुलिस थाने में जाकर रिपोर्ट लिखानी चाहिए थी। क्या रिपोर्ट लिखाते कि राज ठाकरे को wake up sid! में बांबे को बांबे कहने पर एतराज है। अब वो कह रहे हैं कि मुंबई करो।


अच्छा मान लो कि करण जौहर ये रिपोर्ट लिखा भी देते तो, क्या होता। होता ये कि चुनावी मौसम में MNS के लफंगे कार्यकर्ताओं को गुंडागर्दी का मौका मिल जाता वो, मराठी माणुस का स्वाभिमान बचाने के झूठे तर्क के नाम पर। आप क्या कर पाते चव्हाण साहब कुछ नहीं। बस इतना हो पाता कि राज और उद्धव दोनों मराठी माणुस को लेकर लड़ते तो, कट्टर मराठी माणुस वोटबैंक बंट जाता और आपकी कांग्रेस फिर से सत्ता में आ जाती। इसके अलावा थोड़ा बहुत ये होता कि एकाध घंटे के लिए शायद राज ठकरे को अदालत तक ले जाया जाता। बिना दमड़ी खर्च किए राज ठाकरे को चुनाव के समय निर्विरोध घंटों की टीवी कवरेज लाइव मिल जाती।


अगर आपको अब भ…

बस इत्ते के ही गांधी जी

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कभी ओबामा गांधी को अपना हीरो बता देते हैं तो, हम खुश हो जाते हैं। कभी दुनिया के किसी कोने में गांधी का नाम कोई बड़ा आदमी ले लेता है तो, हम गांधी और आज की प्रासंगिकता खोजने लगते हैं। कभी 2 अक्टूबर आ जाता है तो, अखबारों के पन्ने रंग जाते हैं। तो, हम आलोचना पर उतर आते हैं।



कभी किसी नौजवान की टीशर्ट पर गांधी का टेढ़ा-मेढ़ा चश्मा दिखता है तो, गांधी को आज के नौजवानों से जोड़ देने की कोशिश शुरू हो जाती है। लेकिन, क्या गांधी सचमुच प्रासंगिक हैं। अभी सुबह एक मित्र का मोबाइल संदेश आया जो, नौजवानों की भाषा में light hearted कहा जा सकता है। लेकिन, लगता है कि सही में गांधी जी बस इत्ते के ही हैं- संदेश पढ़ लीजिए

Dear frnd! For 2nd oct. I m collecting Gandhiji’s Photos. I need ur Contributn 2my collectn. Bas Ghar men jitney bhi 10/50/100/500/1000 k note ho bhej dena



गांधी नोट पर हैं बिकाऊ हैं। गांधी पर वोटबैंक भी मिल जाता है इसीलिए, कांग्रेस उनको तो फिर भी याद कर लेती है। गांधी के ही दिन पैदा हुए और त्याग-नैतिकता के बड़े उदाहरण लालबहादुर शास्त्री जी को तो याद करना भी सब छोड़ देते हैं। अपने पिता का इस …

टीवी के तिलिस्म को समझना होगा, भागने से नुकसान ही होगा

विस्फोट पर एक लेख पढ़ा - टूट रहा है टेलीविजन पत्रकारिता का तिलिस्म पढ़ा तो, मुझे लगा कि एक पक्ष है ये। टीवी के दूसरे पहलू पर चर्चा ही नहीं। मैं प्रिंट में काम करने के बाद टीवी की तरफ आया। मुझे जो लगता है वो, मैंने विस्फोट के लिए लिखा था। उसे यहां अपने ब्लॉग पर भी डाल रहा हूं।




बहस ये कि क्या टेलीविजिन अपने उद्भव के 10 सालों बाद ही भारत में चुक गया है। क्या टेलीविजन पत्रकारिता से सरोकार पूरी तरह से गायब हो गए हैं। क्या ये बात अब सही साबित हो रही है कि टेलीविजिन बुद्धू बक्से से आगे नहीं बढ़ पाया। क्या पत्रकारिता का जिम्मा सिर्फ और सिर्फ अखबारों के ही कंधों पर है। मुझे भी धीरे-धीरे 5 साल टीवी की पत्रकारिता में पूरे हो रहे हैं। कभी-कभी इन उछल रहे सवालों का जवाब मेरे अंदर भी निगेटिव एनर्जी के तौर पर ही आते हैं। लेकिन, क्या ये सच्चाई है। जब इस सवाल पर दिमाग पर थोड़ा सा जोर डालता हूं तो, लगता है कि ये टेलीविजन पत्रकारिता पर एक ऐसा फैसला सुनाया जा रहा है। जिसकी पूरी सुनवाई भी नहीं हुई और फैसला सुनाने वाले वो लोग है जो, या तो टीवी से दूर-अनजान हैं या फिर वो, जो टीवी के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे…