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Showing posts from April, 2008

टीटी-जेई सब मेरे गांव में ही रहते हैं, कहीं नहीं जाते

(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। शहर वालों जैसे क्यों नहीं रह पाते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। इसी ठहराव-बदलाव का मैं एक बड़ा चित्र खींचने की कोशिश कर रहा हूं। इसी श्रृंखला की ये चौथी कड़ी।)

मैंने पहली कड़ी में ही बताया था कि मेरे गांव में पिताजी की जेनरेशन में ज्यादातर लोग सरकारी नौकरी में थे। थोड़ा ऊपर-थोड़ा नीचे। और, जो नीचे या थोड़ा पीछे रह गए उन्होंने अपने बच्चों के जरिए अपनी अधूरी ख्वाहिशें पूरी करने की कोशिश की। गांव में उन्होंने अपने बच्चों के नाम जेई, गार्ड, टीटी रख दिए लेकिन, इनमें से कोई भी उसके आसपास भी नहीं पहुंच सका।

दोनों मेरे चचेरे दादा लगेंगे। एक रेलवे में ड्राइवर थे अब रिटायर हो गए हैं तो, दूसरे पीडब्ल्यूडी में अभी भी मेठ हैं। ड्राइवर दादा के दो लड़के हैं। एक का नाम है गार्ड दूसरे का टीटी। ये अलग बात है कि बड़ा गार्ड बनने के बजाए उनके ही जुगा…

सरकती जींस के नीचे दिखता जॉकी की ब्रांड और गांव में आधुनिकता

(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। शहर वालों जैसे क्यों नहीं रह पाते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। इसी ठहराव-बदलाव का मैं एक बड़ा चित्र खींचने की कोशिश कर रहा हूं। इसी श्रृंखला की ये तीसरी कड़ी।)

तो, मेरी नजदीकी बाजार में एयरटेल का टावर लग गया। अब हर हाथ में काम तो, सिर्फ नेताओं के भाषण में ही रह गया है लेकिन, हर हाथ में मोबाइल जरूर नजर आने लगा है। गांवों में नोकिया के सस्ते मोबाइल और बीएसएनएल के बाद गांव-गांव में पहुंचे एयरटेल, आइडिया के टावर ने सबके मोबाइल में सिगनल दे दिया है। और, जहां हवा, पानी, बिजली तक नहीं है वहां भी रिलायंस की फुल कवरेज मिलने लगी है। मोबाइल के चमत्कार से चमत्कृत होने की 2002 की एक घटना मुझे याद है। तब नया-नया बीएसएनएल का मोबाइल शुरू हुआ था। इलाहाबाद-लखनऊ रूट पर सारे रास्ते मोबाइल मिलता था। और, इसी वजह से मेरे गांव पर भी बीएसएनएल का सिगनल टू…

बाजार से बदलता गांव में दुराव और प्यार का समीकरण

(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। जैसे शहर वाले होते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। मैं पहले एक पोस्ट में समेटने वाला था। अब कोशिश करता हूं कि भले पोस्ट कई हो जाएं, कुछ ज्यादा बड़ा चित्र खींच सकूं।)

तो, मैं 5 साल बाद गांव गया लेकिन, घर की चाभी खो जाने की वजह से करीब दो साल से बंद पड़े घर में नहीं जा पाया। दादा (पिताजी के बड़े भाई) के यहां ही बैठना होता है। दादाजी साल डेढ़ साल पहले प्राइमरी के प्रिंसिपल से रिटायर हुए हैं। गांव में जिसे राजनीति कहा जाता है वो, करना उन्हें खूब आता है। हमारे बाबा स्वर्गीय श्री श्रीकांत त्रिपाठी शास्त्री रेलवे सर्विस कमीशन में थे और पिताजी बैंक में हैं। इसलिए दोनों भाइयों में बंटवारे के पहले तक दादाजी को किसी तरह की कोई चिंता नहीं थी। खेती में लगने वाला खर्च पिताजी देते थे और बदले में खाने भर का राशन शहर (इलाहाबाद) आ जाता था। गांव में ए…

कहीं कुछ बदल तो रहा है लेकिन, अजीब सा ठहराव आ गया है

(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। जैसे शहर वाले होते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। दरअसल यही गांव और शहर का फर्क भारत और इंडिया का फर्क है। बोधिसत्व अपनी एक पोस्ट में मुंबई में इलाहाबाद खोज रहे थे। गांव खोज रहे लिखा था कि उनके गांव में कोई 300 साल से आकर बसा नहीं है। लेकिन, क्या यूपी के गांव ऐसे बचे हैं कि वहां कोई बसने जाए। मैंने उस पोस्ट पर टिप्पणी भी की थी कि दो-चार कदम चल चुके हर आदमी को ऐसे ही गांव याद आता है। और, ये भी कि मैं इस बार गांव जरूर होकर आऊंगा। लेकिन, गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। जो, वहां के हैं भी पहला मौका मिलते ही कहीं और किसी शहर में बस जाना चाहते हैं। मैं पहले इसे एक पोस्ट में समेटने वाला था। अब कोशिश करता हूं कि भले पोस्ट कई हो जाएं, कुछ ज्यादा बड़ा चित्र खींच सकूं।)

करीब 5 साल बाद मैं अपने गांव गया। प्रतापगढ़ जिले की कुंडा तहसील मे बिहार ब्लॉक (विधानसभा भी) में मेरा गां…

‘सत्यार्थमित्र’ का स्वागत कीजिए

एक और हिंदी ब्लॉग शुरू हो गया है। सत्यार्थमित्र ब्लॉग शुरू किया है, सिद्धार्थशंकर जी ने। 14 तारीख को मेरी सिद्धार्थजी की मुलाकात हुई और 16 अप्रैल को सिद्धार्थजी ने ये ब्लॉग बना डाला। उनसे कुछ ब्लॉगिंग पर चर्चा हुई और दूसरे ही दिन उनका फोन आ गया कि मैंने अपना ब्लॉग बना लिया है। सिद्धार्थ इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र रहे। गोरखपुर से पत्रकारिता की शुरुआत करने की कोशिश की लेकिन, फिर सामाजिक दबाव में प्रशासनिक अधिकारी बन गए। सिस्टम के साथ अभी तक तालमेल बिठाने की कोशिश में लगे हुए हैं। शायद यही वजह है कि अब ब्लॉग को अभिव्यक्ति का जरिया बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

मैं उनकी जिस पोस्ट के जरिए मिला वो, कुत्ते का दार्शनिक विचरण था। उसी पोस्ट को उन्होंने फिर से अपने ब्लॉग पर डाला है। आपको भी पसंद आनी चाहिए। खैर, मैं जब उनसे मिला तो, मेरे मुंह से निकला कि नेट (ब्लॉगिंग) के बहुत फायदे हैं। तो, भाभीजी (सिद्धार्थ जी की पत्नी) ने मुझसे पूछा- फायदा छोड़िए, ये बताइए कि इसका नुकसान क्या है। तो, उन्होंने ही हंसते हुए जवाब भी दे दिया कि अब मेरे समय में से ही ब्लॉगिंग भी समय खाएगी। मैंने कहा – ये तो है ले…

खुद ही देख लीजिए उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के लिए संकेत

मायावती के मस्त हाथी की चाल के आगे सबको रास्ता छोड़ना पड़ा। उत्तर प्रदेश के आधार के भरोसे दिल्ली फतह करने का इरादा रखने वाली मायावती को राज्य के उपचुनावों ने और बल दिया होगा। आजमगढ़ लोकसभा सीट से बसपा के अकबर अहमद डंपी ने जीत हासिल कर भाजपा की रही-सही साख भी बरबाद कर दी। डंपी ने भाजपा के टिकट पर लड़े दागी रमाकांत यादव को 54 हजार से ज्यादा मतो से हरा दिया। डंपी ने इससे पहले भी बसपा के ही टिकट पर रमाकांत यादव को हराया था। ये अलग बात है कि 1998 के लोकसभा चुनाव में रमाकांत सपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे। उत्तर प्रदेश में भाजपा की हालत किसी गंभीर रोग से ग्रसित मरीज के लिए दी जाने वाली आखिरी दवा के रिएक्शन (उल्टा असर) कर जाने जैसी हो गई है। राजनाथ सिंह ने कैडर, कार्यकर्ताओं को दरकिनारकर चुनाव एक लोकसभा सीट जीतने के लिए रमाकांत जैसे दागी को टिकट दिया लेकिन, फॉर्मूला फ्लॉप हो गया।

दूसरी लोकसभा सीट भी बसपा की ही झोली में गई है। खलीलाबाद लोकसभा सीट से भीष्मशंकर तिवारी ने 64,344 मतों से सपा के भालचंद्र यादव को हरा दिया है। भीष्मशंकर (कुशल तिवारी) लोकसभा तक पहुंचने में कामयाब हो गए। खलीलाबाद लोकसभ…

ये विविध भारती की विज्ञापन प्रसारण सेवा का इलाहाबाद केंद्र है

एफएम ने लोगों के रेडियो सुनने का अंदाज बदल दिया है। तेज, हाजिर जवाब रेडियों जॉकी- फोन नंबरों पर जवाब देकर इनाम जीतते श्रोता। मेरे शहर इलाहाबाद में भी दो एफएम रेडियो शुरू हो गए हैं जो, शहर में युवाओं के मिजाज से मेल भी खूब खा रहा है। लेकिन, इन सबके बीच विविध भारती प्रसारण की बात ही कुछ निराली है। इलाहाबाद में मेरे मोहल्ले दारागंज में एक नया जेंट्स ब्यूटी पार्लर खुला है। छोटे भाई के साथ मैं आज जब दाढ़ी बनवाने पहुंचा तो, एसी की ठंडी हवा में मैंने मसाज करने को भी बोल दिया। और, दाढ़ी बनवाते-बनवाते विविध भारती का फोन टाइम कार्यक्रम शुरू हो चुका था। ये कार्यक्रम इतना दिलचस्प था कि मैं इसे आप सबसे बांट रहा हूं।

फोन की घंटी बजी और प्रस्तोता ने कार्यक्रम शुरू किया। फोन टाइम में आपका स्वागत है, मैं हूं अविनाश श्रीवास्तव।
जी, बताइए क्या नाम है आपका।
जी, गीतांजलि।
आप किस क्लास में पढ़ती हैं।
क्लास 8 में
हां, आपकी आवाज से लगा कि आप अभी बहुत छोटी हैं। क्या सुनेंगी आप
जी देशप्रेमी फिल्म का गीत लेकिन, पहले मेरी दोस्त का नाम मैं ले लूं
जी बिल्कुल
फिर अवाज आई देशप्रेमी फिल्म का गाना हमारे पास नहीं…

एक ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थानों में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को मंजूरी दे दी है। 2006 के सरकार के बिल के बाद से अब तक ये मामला लटका हुआ था। कई अलग-अलग संगठनों ने इसे चुनौती दी थी। सुप्रीमकोर्ट ने भी सरकार से इसे लागूकरने का आधार पूछा था।

अब सुप्रीमकोर्ट ने इस लागू करते हुए इससे क्रीमीलेयर को बाहर करने को कहा है। लेकिन, अभी भी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वो, क्रीमीलेयर कैसे तय करेगी। वैसे, कोर्ट ने सांसदों-विधायकों को बच्चों को इससे बाहर कर दिया है। अब IIT, IIM और AIIMS में कोटा के आधार पर आरक्षण लागू हो सकेगा।

राहुल बाबा के आह्वान के बाद राजनीति में युवाओं को तवज्जो मिली

राहुल के डिस्कवर इंडिया कैंपेन में उन्हें कुछ मिला हो या न मिला हो। विरासत में कांग्रेसी राजनीति के खासमखास परिवारों के दो ‘बाबा लोगों’ को आखिर ‘बड़का लोगों’ की राजनीति में जगह मिल ही गई। ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद को चुनावी साल के पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिल गई है। चुनावों को ध्यान में रखकर कुछेक और छोटे-छोटे मंत्रिमंडलीय परिवर्तन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मैडम सोनिया के इशारे पर किए लेकिन, खास बदलाव यही दोनों हैं।

सोनिया गांधी, राहुल को ठीक उसी तरह से गद्दी संभालने के लिए तैयार कर रही हैं। जैसे, महाराजा-महारानी युवराज को गद्दी के लायक बनाते थे। राजशाही और लोकतंत्र में फर्क सिर्फ इतना ही है कि तब 14 साल का युवराज भी खास दरबारियों के भरोसे गद्दी संभाल लेता था। अब, लोकतंत्र में कम से कम 25 साल की उम्र तो होनी ही चाहिए। और, दरबारियों से ज्यादा हैसियत हासिल करनी ही होती है। ये दिखाता है कि जो, वो कह रहा है वो किसी भी वरिष्ठ दरबारी से ज्यादा सुना जा रहा है। वो, काम सोनिया ने राहुल के लिए धीरे-धीरे पूरा कर दिया है।

राहुल ने डिस्कवर इंडिया कैंपेन में कहा कि देश की र…

दिवसों के भरोसे चल रहा है भारत

आज मुंबई में कोई हॉर्न नहीं बजाएगा। पुलिस तो ऐसा ही कह रही है। पुलिस ने नो हॉन्किंग डे घोषित कर रखा है। महानायक अमिताभ बच्चन ने भी अपनी गाड़ी पर नो हॉन्किंग डे का स्टीकर चिपकाया है और टीवी पर लोगों से अपील कर रहे हैं कि कम से कम आज गाड़ी का हॉर्न न बजाएं। दरअसल 7 अप्रैल यानी आज विश्व स्वास्थ्य दिवस है। और ध्वनि प्रदूषण (शोर) से होने वाली बीमारियों पर थोड़ा काबू के लिए मुंबई पुलिस ने हॉर्न बजाने पर एक दिन के लिए जुर्माना लगा दिया है।

मैं मुंबई के लोवर परेल में रहता हूं। बिग बाजार के बगल घर है यानी मुख्य सड़क है। घर की खिड़की खोलना तक मुश्किल है कि सड़क पर गाड़ियों के हॉर्न के शोर से घर में टीवी नहीं देख सकता। बातें भी आपस में थोड़ा तेज स्वर में ही करनी पड़ती है। हाल ये है कि कान तेज सुनने का ही आदी हो गया है। यही वजह है कि ज्यादातर समय हमारा घर खुली हवा से परिचित नहीं हो पाता है। इसलिए, आज हॉर्न पर पाबंदी के पुलिस के फैसले से मुझे तो, दूसरे नो हॉर्न दिवस के पैरोकारों से ज्यादा खुश होना चाहिए। लेकिन, मुझे खुशी नहीं हो रही है बल्कि, चिढ़ हो रही है। वजह नंबर एक- आज भी मेरे घर के सामने ह…

अमेरिकी मान रहे हैं कि अमेरिका गलत रास्ते पर है

अमेरिका- दुनिया का दादा। एक ऐसा देश, जिसकी दुनिया में छवि ये है कि वहां के लोग दुनिया के दादा का ये खिताब अपने पास रखने के लिए अपने प्रतिनिधियों (राष्ट्रपतियों) के हर फैसले पर आंख-मूंदकर मुहर लगा देते हैं। यहां तक कि इराक को नेस्तनाबूद करने के अपने राष्ट्रपति के फैसले को भी उन्होंने दुनिया में अपनी बढ़ती ताकत के सुबूत के तौर पर मान लिया। लेकिन, अब शायद अमेरिकी बदल गए हैं या दुनिया में ताकत, कंज्यूमर, बाजार की बदलती ताकत ने उन्हें बदल दिया है।

The newyork times और CBS News अमेरिकी चुनाव से पहले पूछे गए पोल में शामिल अमेरिकियों में से 81 प्रतिशत कह रहे हैं अमेरिका इतने गलत रास्ते पर चल रहा है कि अब संभालना मुश्किल हो गया है। दरअसल इराक में अमेरिका की मचाई भारी तबाही और अमेरिका पर लादेन के हमले ने अमेरिकियों का डराया भी और चेताया भी है। शायद यही वजह है कि उन्हें ये लगने लगा है कि मामला गड़बड़ा गया है। अमेरिकी, अब अमेरिका से बाहर दुनिया के सबसे ज्यादा लोगों के दुश्मन हो गए हैं।

इसीलिए क्या महिलाएं-पुरुष, क्या बड़े-बच्चे, शहरी, कुछ गांव में बचे अमेरिकी और सिर्फ हाईस्कूल की पढ़ाई कर निकल…

और, कितनी गिरावट-कितना दोगलापन

राजनीति में गिरावट की जब बात होती है तो, नेता बड़ी चतुराई से ये कहकर बच निकलने की कोशिश करते हैं कि समाज से ही नेता निकलते हैं और समाज के हर क्षेत्र में आई गिरावट का असर राजनीति में भी दिखता है। वैसे तो, ये सामान्य सी बात दिखती है लेकिन, राजनीतिक जीवन में बढ़ता दोगलापन भयावह स्थिति की तरफ बढ़ रहा है।

अर्थशास्त्र में मजबूत ईमानदार माने जाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ने अपनी जुबान पर कायम न रह पाने में मिसाल कायम कर दी है। 2004 में आई कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार लोकसभा और राज्यसभा में अपने वादों को पूरा कर पाने के मामले में आजादी के बाद की सबसे फिसड्डी साबित हुई है।

पहले के नेता और सरकारें आज के नेताओं (सरकारों) के मुकाबले कितने ईमानदार थे, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 1984 तक सरकारें लोकसभा-राज्यसभा में किया गया हर वादा पूरा करती थीं। यहां तक कि 2003 तक भी सरकार सदन में किए गए 90 प्रतिशत वादे तो पूरे करती ही थी। ससंदीय कार्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2004 में यूपीए की सरकार आने के पहले तक रही एनडीए सरकार ने लोकसभा में किए गए 85.26 प्रतिशत वादे पू…

मायावती प्रधानमंत्री बनेंगी या उप प्रधानमंत्री

लोकसभा चुनावों की तैयारियों में सभी राजनीतिक पार्टियां जुट गई हैं। और, इस तैयारी में सबसे अहम ये कि किसके साथ, दिल्ली के रास्ते पर कितनी दूर चला जा सकता है। ऐसे देखने पर साफ तौर पर देश पूरी तरह से जाने-अनजाने दो दलीय व्यवस्था पर ही चल रहा है। एक पक्ष एनडीए यानी नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) और दूसरा पक्ष यानी सरकार में बैठा यूपीए, यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (संयुक्त विकासशील गठबंधन)। दोनों के अलावा कहने को एक तीसरा मोर्चा भी है जो, यूपीए को बाहर से समर्थन दे रहे लेफ्ट की अगुवाई में अलग-अलग राज्यों के कुछ क्षेत्रीय दल हैं।

लेकिन, सच्चाई यही है कि तीसरा मोर्चा नाम का विकल्प फिलहाल तो मरा हुआ सा दिख रहा है। तीसरे मोर्चा का अगुवा लेफ्ट तो, पूरी तरह से ही कांग्रेस के साथ है। और, कांग्रेस के साथ चल रहे छद्म मल्लयुद्ध के बीच हुए सम्मेलन में लेफ्ट पार्टियों ने फिर से साफ कर दिया है कि भाजपा उनकी पहली दुश्मन है और अगर जरूरत पड़ी तो, वो फिर से कांग्रेस की मदद कर सकते हैं। तीसरे मोर्चे की बात भी सुनाई नहीं पड़ी। और, जिस तरह के जनादेश आते दिख रहे हैं उसमें, साफ है कि ए…