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Showing posts from 2011

बंटवारे की राजनीति !

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राजनीति भी गजब है। अलग-अलग संदर्भों में एक ही बात किसी को अच्छी या बुरी लगती है। मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान में उन्हें राष्ट्रपिता का दर्जा हासिल है। हो भी क्यों ना। आखिर पाकिस्तान की पैदाइश तो, उन्हीं के बूते हुई। बूते इसलिए कि बड़ी मेहनत मशक्कत करके भारत से अलग पाकिस्तान बनवा लिया। वैसे, जो ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं वो, यही हैं कि जिन्ना को अगर सत्ता सुख मिलने की गुंजाइश दिखती तो, वो सांप्रदायिक न होते। जिन्ना तो, सांप्रदायिक थे भी नहीं। ठीर नेहरू जैसे थे। जवाहर लाल नेहरू को तो, लोग सेक्युलर ही मानते हैं ना। तो, जिन्ना भी सेक्युलर ही थे। जिन्ना भी विलायती थे। सिगार पीते थे। सूट पहनते थे। अतिआधुनिक थे। ये कहां से इस्लामिक हो गया। लेकिन, जब सत्ता नहीं मिली तो, जिन्ना घोर मुसलमान हो गए। पाकिस्तान बना दिया। 
जिन्ना बड़ा बदमाश था। ऐसा हम भारतीय मानते हैं- सबसे बड़ी वजह उसने अपने राजनीतिक फायदे के लिए भारत-पाकिस्तान का बंटवारा करा दिया। लेकिन, अगर इस कसौटी पर कसेंगे तो, बड़ी मुश्किल होगी। आज के नेताओं को ले लीजिए। क्या कहेंगे। मायावती राजनीतिक फायदे के लिए यूपी 4 टुकड़े में करना चाहत…

काटजू और मीडिया को एक दूसरे का दोस्त ही बनना होगा

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बड़ी मुश्किल होती है जब, आप किसी व्यक्तित्व के बेहद प्रभाव में रहें और उस व्यक्तित्व की बेबाकी की तारीफ करते रहें। और, अचानक ऐसा मौका आए जब वो, व्यक्ति आपकी भी कमियों पर बेबाक टिप्पणी करने लगे। उसकी बात सही होते हुए भी आप उस बेबाकी के खिलाफ ढेर सारे कुतर्क लाने की कोशिश करने लगते हैं। यहां संदर्भ है जस्टिस मार्कंडेय काटजू का। जो, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के ताजा-ताजा अध्यक्ष बने हैं। अध्यक्ष बनते ही जस्टिस काटजू का अदालत में फैसला सुनाने वाला अंदर का न्यायाधीश जग गया और उन्होंने अपने मन  में बनी और समाज के मन में तेजी से बसती जा रही इस धारणा के आधार पर बयान दे डाला कि मीडिया में कम जानकार लोग हैं। कुछ भी लिखते-दिखाते रहते हैं। अब तो, वो मीडिया को लोकपाल के दायरे में लाने की बात भी कर रहे हैं।

फिर क्या टीवी वाले पहले गरजे कि काटजू होते कौन हैं, उन पर टिप्पणी करने वाले। सबको पता है न कि अब काटजू साहब जज तो रहे नहीं जो, अवमानना होगी। काटजू साहब भी जितनी जल्दी ये समझ लें, उतना बेहतर है। मार्कंडेय काटजू ने यहां तक कह दिया है कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के दायरे में टीवी मीडिया भी लाया जाना…

अगर नरेंद्र मोदी-राहुल गांधी की टक्कर हुई तो ...

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राहुल गांधी ने फूलपुर में 14 नवंबर को जो, बोला वो, पार्टी की 22 सालों से सत्ता से जो, दूरी हैं उसे कम करने के लिए बोला। लेकिन, जवानी का जोश ऐसा रहा कि सब उल्टा पड़ता दिख रहा है। सब राशन-पानी लेकर चढ़ दौड़े। राहल गांधी ने फूलपुर में यूपी के लोगों को उत्तेजित करने की गरज से बोला दिया कि कब तक महाराष्ट्र में जाकर भीख मांगोगे। कब तक पंजाब में जाकर मजदूरी करोगे। राहल समझ ही नहीं पाए होंगे कि ये बयान किस तरह से लिया जा सकता है। उत्तर प्रदेश पिछड़ा है। उत्तर प्रदेश के लोग महाराष्ट्र, पंजाब में जाकर नौकरियां, मजदूरी कर रहे हैं। ये सब जानते हैं। जरूरत भी है। क्योंकि, आज के समय में जहां बेहतर रोजी-रोटी का बंदोबस्त होगा, वहीं जाएगा। लेकिन, राहुल जोश में भूल गए कि किसी की एक आंख की रोशनी जा रही हो तो, उसे काना कहकर उसे और पीड़ा नहीं देते हैं। उसे कोशिश करके ऐसे समझाते हैं कि दोनों आंखों की रोशनी जरूरी है। ये बात राहुल नहीं समझा पाए। और, यही वजह है कि बार-बार ये सवाल खड़ा होता रहता है कि राहुल राजनीति में अभी नौसिखिए ही हैं या परिपक्व हो गए हैं। क्षेत्रवाद की राजनीति पर फले-फूले शिवसेना जैसे दल भ…

सुशील कुमार के ब्रांड अबैंसडर बनने से क्या होगा ?

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ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश दुखी हैं कि मनरेगा की चर्चा पत्रकार, मीडिया सिर्फ गलत संदर्भों में करते हैं। जयराम रमेश ने पत्रकारों से पूछा कि आप लोग मनरेगा की अच्छी बातों की चर्चा क्यों नहीं करते।
ये बातें उन्होंने तब कहीं जब वो सुशील कुमार को मनरेगा का ब्रांड अंबैसडर बना रहे थे।

सुशील कुमार वही हैं जो, कौन बनेगा करोड़पति में अमिताभ बच्चन के पूछे सवालों का जवाब देकर 5 करोड़ जीत गए हैं। सुशील कुमार चूंकि इत्तेफाक से मनरेगा में डाटा एंट्री ऑपरेटर हैं। बस इसी मौके को ग्रामीण विकास मंत्रालय ने लपक लिया है। लेकिन, सवाल ये है कि 5 करोड़ रुपए की लॉटरी जीतने वाला ब्रांड अंबैसडर बनकर 100 रुपया रोजाना 100 दिन पक्के तौर पर कमाने की गारंटी वाले लोगों को कैसी प्रेरणा देगा। कौन बनेगा करोड़पति में दे दनादन मैसेज भेजकर केबीसी की हॉट सीट पर बैठने की प्रेरणा और तुक्के पे तुक्का मारकर 5 करोड़ जीतने की प्रेरणा। जयराम रमेश विद्वान मंत्रियों में हैं लेकिन, उनका ये दर्शन मुझे तो समझ में नहीं आया।

सुशील कुमार  भी दार्शनिक हो गए हैं। जब उनसे ये पूछा कि आप मनरेगा का ब्रांड अबैंसडर बनकर उसके लिए कैसे मददग…

इन मदेरणाओं का क्या कुछ बिगड़ेगा?

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राजस्थान के पूर्व मंत्री महिपाल मदेरणा की नर्स भंवरी देवी के साथ रंगरेलियां मनाते चर्चित सीडी अब मीडिया के जरिए सबके सामने आ गई। और, शायद यही सबूत रहा कि अब तक भंवरी को न जानने की बात करने वाले मदेरणा ने माना कि भंवरी से उनके संबंध थे। लेकिन, अब वो कह रहे हैं कि भंवरी के गायब होने में उनका हाथ नहीं है। शक ये भी मजबूत हो रहे हैं कि भंवरी की हत्या हो गई है। कहा ये भी जा रहा है कि भंवरी देवी ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सामने भी गुहार लगाई थी। फिर भंवरी कहां गई और किसने भंवरी को मरवाया या फिर क्या भंवरी अभी जिंदा भी हो सकती है।

खबरें हैं कि भंवरी कांग्रेस के टिकट के लिए मदेरणा पर दबाव बना रही थी। तो, क्या किसी महिला के लिए राजनीति में जाने का बिस्तर के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचा है। या इन नेताओं की फितरत ऐसी है क्योंकि, भंवरी की महत्वाकांक्षा रही होगी वो, टिकट चाहती होगी। नारायण दत्त तिवारी, अमरमणि से लेकर आनंदसेन तक ऐसी सेक्स स्कैंडल की ढेरों कहानियां है जिसमें नेताओं ने दूसरी महिलाओं के साथ संबंध बनाए और अपने राजनीतिक हित पर जब उन्हें भारी पड़ता देखा तो, उनसे कन्नी काट …

राहुल जी गुस्से में हैं !

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  आजकल राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में हैं। बड़े गुस्से में थे। यूपी के लोगों से पूछ रहे थे माया सरकार के खिलाफ उन्हें गुस्सा क्यों नहीं आता। दिल्ली रहते हैं, पता नहीं उनकी बोलती क्यों बंद हो जाती है। गुस्सा कहां चला जाता है। जबकि, देश की जनता दिल्ली (यूपीए) की सरकार से बड़ी गुस्से में है। राहुल गांधी जी गुस्सा सबको आता है और गुस्से का परिणाम भी देर सबेर दिखता है। अच्छा है आपने पूछ लिया कि यूपी के लोगों को गुस्सा क्यों नहीं आता।

ये अन्ना की जीत तो बिल्कुल नहीं है!

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हिसार में मिले वोट- कुलदीप बिश्नोई 355941, अजय सिंह चौटाला 349618, जय प्रकाश 149785। बिश्नोई चुनाव जीते। भजनलाल के बेटे हैं। हरियाणा के गैर जाट नेता। बीजेपी के समर्थन के बिना बिश्नोई नहीं जीतते, अब तो ये साफ है। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से जूझ रहे चौटाला करीब साढ़े तीन लाख वोट पा गए। और, अन्ना का तो सारा आंदोलन ही भ्रष्टाचार विरोधी है। कैसे कोई कह रहा है कि अन्ना की जीत है। कांग्रेस के जयप्रकाश भी डेढ़ लाख पा गए। अब भी लोग कह रहे हैं कि अन्ना इफेक्ट है। अरे कहिए अन्ना की इज्जत बच गई। यूपी में इज्जत बचानी है तो, पहले से तैयारी कर ले टीम अन्ना।

अन्ना को ये फैसला तुरंत लेना होगा

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विजय चौक पर हम लोग खड़े थे। तभी खबर आई कि सुप्रीमकोर्ट के चैंबर में कुछ लड़कों ने वकील प्रशांत भूषण को पीट दिया है। तब तक किसी बीजेपी कवर करने वाले पत्रकार ने कहा- अरे तेजिंदर बग्गा ने तो मारा है। वही भारतीय जनता युवा मोर्चा वाला। हम लोग जितने लोग थे सभी पत्रकारों के मुंह से निकला- अब तो बीजेपी का बेड़ा गर्क हो जाएगा। आडवाणी की यात्रा की खबर गई काम से। अब तो, सिर्फ यही चलगा फासीवादी भाजपा का असली चेहरा। लेकिन, हमारा ये आंकलन जल्दबाजी का था। प्रशांत को पीटने वालों के पर्चे में साफ लिखा था- कश्मीर हमारा था, है और रहेगा। दरअसल ये अन्ना टीम के सदस्य अन्ना की पिटाई हुई ही नहीं थी। ये अरुंधति रॉय के दोस्त अन्ना की पिटाई हुई थी। अन्ना हजारे के साथ की वजह से भले ही प्रशांत भूषण की छवि दूसरी हो गई। और, उन्हें सम्मानित नजरों से देखा जाने लगा। लेकिन, ज्यादा समय नहीं हुआ जब प्रशांत भूषण को देखने के लिए सिर्फ विवादित नजरों का ही सहारा लेना पड़ता था। क्योंकि, बिना विवाद के प्रशांत भूषण का मतलब ही नहीं था। हाईप्रोफाइल मामलों के पीआईएल का विवाद हो या फिर। अमर सिंह सीडी विवाद। और, टीम अन्ना के सहयोगिय…

50 घंटे, 12313 फीट की ऊंचाई चूमकर वापस

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ये यात्रा बिल्कुल तय नहीं थी। सच तो ये था कि ये यात्रा हमारे मित्र मनीष शुक्ला की वजह से हुई। बहुत दिनों से मनीष कह रहे थे कि बद्रीनाथ दर्शन को जाना है। इच्छा हमारी भी थी लेकिन, परिवार के साथ। समस्या इसमें ये थी कि परिवार के साथ जाने के लिए समय ज्यादा चाहिए था। और, छोटे बच्चों को लेकर जाने के लिए अपनी मन:स्थिति के साथ बच्चों की स्थिति का भी ख्याल रखना था। तो, तय हुआ और हम दोनों मित्र निकल पड़े। शुक्रवार की रात 11.55 पर नई दिल्ली स्टेशन से दिल्ली-देहरादून एसी एक्सप्रेस से निकले। टिकट भी जुगाड़ डॉट कॉम से पक्का हुआ। ठीक चार बजे हम लोग हरिद्वार स्टेशन पर थे। अचानक नींद खुली तो, उठकर देखा तो, हरिद्वार आ गए थे। जल्दी से मनीष को भी जगाया और सीधे पहुंचे वेटिंग रूम में। टैक्सी वाला समय का पक्का था। फोन किया और वहीं वेटिंग रुम में फ्रेश हुए और चाय पीकर शुरू हो गई यात्रा। ऋषिकेश से ऊपर डराने वाली सड़कों का डर मनोहारी दृश्य काफी कम कर देते हैं। हम लोग चूंकि समय से करीब पांच बजे हरिद्वार से निकल चुके थे इसलिए रास्ता खाली मिल रहा था। लेकिन, प्राकृतिक बाधाओं के निशान निरंतर मिल रहे थे। हां, अच्छी ब…

जल्दबाजी मोदी को भारी पड़ेगी?

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 गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में अब तक जो, दिखता रहा है कि वो, हर फैसला बड़ा सोच-समझकर लेते हैं। इसी से ताकतवर भी हुए। लेकिन, अब लालकृष्ण आडवाणी का ये विरोध नरेंद्र मोदी के लिए बड़ी मुसीबत बनता दिख रहा है। इतनी हड़बड़ी ठीक नहीं। दिल्ली फिर दूर हो जाएगी।

और, सबसे बड़ी बात ये है कि नरेंद्र मोदी को ये समझना होगा कि अगर उन्हें 6 करोड़ गुजरातियों से आगे बढ़कर 120 करोड़ से ज्यादा हिंदुस्तानियों का नेता बनना है तो, उस अंतर के लिहाज से व्यवहार करना होगा। अगर ये अंतर नरेंद्र मोदी की समझ में नहीं आया तो, बस गुजरात को परिवारों को घूमने की जगह या फिर ऑटो हब बनाकर ही खुश रहना होगा।

नरेंद्र मोदी को तो, वैसे भी अच्छे से पता है कि विद्रोही तेवर दिखाने वाले भाजपाई नेता कितने भी बड़े हों। उनका हश्र क्या होता है। कुछ को तो, उन्होंने ही निपटाया है। और, उन्हें ये तो, अच्छे से पता होगा कि निपटा इसीलिए पाए कि पार्टी उनके साथ थी। एक जमाने के दिग्गज कल्याण सिंह आज जबरन ये बयान देते घूम रहे हैं कि वो, बीजेपी में किसी कीमत पर नहीं लौटेंगे। वो, ये नहीं बता पाते कि कीमत देने के लिए उन्हें खोज कौ…

राम धीरज (तीसरा और आखिरी हिस्सा)

राम धीरज के गांव के हर घर से लोग इलाहाबाद में थे। और, राम धीरज भी चाहता था कि इलाहाबाद में तरक्की करने वाले लोगों के आसपास ही सही वो खड़ा हो सके। राम धीरज के गांव के ही मैनेजर साहब भी थे। बैंक में मैंनेजर। दारागंज में ही अच्छा घर था। गांव के सबसे व्यवस्थित लोगों में थे। राम धीरज की पट्टीदारी के बड़े भाई लगते थे। गांव में भले ही मैनेजर साहब और राम धीरज के घर में खाबदान (यानी दावत-निमंत्रण का संबंध) बीच-बीच में टूटता रहा हो। लेकिन, राम धीरज मैनेजर भैया के यहां से कभी टूट नहीं पाया। वजह भी साफ थी वहीदो मंजिला भैया का मकान पोर्टिको में खड़ी कार दिखाकर तो, वो अपनी हीरो पुक के जरिए फरफराती इज्जत को थोड़ा ठोस आधार भी दे पाता था। लेकिन, गजब का था राम धीरज। अपनी परेशानी, चिंता दूर करने से ज्यादा उसका समय दूसरों को परेशान, चिंतित करने में बीतता था। अब राम धीरज के गांव-देहात से हर घर से बच्चे पढ़ने इलाहाबाद ही पहुंचते थे। और, राम धीरज के समय में इलाहाबाद पढ़ने आए बच्चों के लिए वो, बड़ी मुसीबत बनता था। गांव में मां-बाप बच्चे के फेल होने पर भी उसकी तारीफ करते रहते। लेकिन, राम धीरज से ये कैसे बर्दा…

राम धीरज (दूसरा हिस्सा)

राम धीरज, वो भी ऐसे ही लोगों में था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला नहीं मिला। दाखिला मिला, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध सीएमपी डिग्री कॉलेज में (चौधरी महादेव प्रसाद महाविद्यालय)। कमरा लिया दारागंज में। घर से कम ही पैसा मिलता था। इसीलिए वो, दारागंज की उस गली में छोटे-छोटे कमरे वाले मकान के भी किचेन में रहता था। लेकिन, बहुत महत्वाकांक्षा थी। बहुत कुछ बनना-करना चाहता था। इसीलिए जिस घर में किराए पर रहता था उसी के मालिक के बेटे को भी इतना कुछ बता-समझा दिया कि उसकी यामाहा 100 उसकी सवारी बन गई। बाद में यही यामाहा 100 की सवारी उसकी मुसीबत भी बनी। जिसकी वजह से उसे अपने नाम खुदी हुई पत्थर वाली गली छोड़कर जाना पड़ा। महत्वाकांक्षा कुछ इस कदर थी कि उसने सोचा कि उसकी किस्मत में भी लोकतंत्र में कोई न कोई चुनाव तो जीतना लिखा ही होगा। इसकी शुरुआत हुई सीएमपी डिग्री कॉलेज में नामांकन करने से। खैर, चुनाव जीते न जीते। उसे तो नेता बन जाने की धुन थी। और, ये बात तो सही ही है कि सारे नेता चुनाव जीतते ही थोड़े हैं। बस इसी धुन में खैर। सीएमपी से बीए की डिग्री लेने के दौरान वो, इतना तेज हो चुका था कि किस…

राम धीरज (पहला हिस्सा)

उसने जीवन में ऐसा कुछ नहीं किया कि उसके ऊपर कुछ लिखा-पढ़ा जाए। आखिर उसके बारे में लिखना-पढ़ना चाहेगा भी कौन। किसी का आदर्श तो, क्या छोटा-मोटा उदाहरण भी बनने के काबिल नहीं बन पाया था वो। न तो अच्छा बेटा बन सका। न अच्छा भाई। और, सबसे महत्वपूर्ण कि न ही अच्छा पति। फिर पिता कैसे बन पाता। वैसे, जरूरी नहीं कि अच्छा पति न बन पाने वाले लोग पिता ही न बन पाएं। बनते हैं बहुत से अच्छा पति न बन पाए लोग भी खूब पिता बने हैं। लेकिन, शायद उसके जीवन में कुछ भी ऐसा दर्ज नहीं होना था। इसीलिए जब अच्छा क्या, कामचलाऊ पति बनने की कोशिश भी की तो, शायद दूसरी परिस्थितियों ने साथ नहीं दिया होगा। और, राम धीरज ऐसे ही निकल लिया, इस दुनिया से। ऐसा नहीं है कि राम धीरज में महत्वाकांक्षा नहीं थी। दिमाग नहीं था या फिर कुछ करना नहीं चाहता था। वो, बहुत कुछ करना चाहता था। काफी कुछ किया भी। किया न होता तो, उसके नाम का पत्थर अभी तक कैसे लगा रह पाया होता। बिना कुछ हुए, मतलब बिना किसी राजनीतिक या अधिकारिक पद के मिले, गली के मुहाने पर उसके नाम का पत्थर अभी भी इलाहाबाद के गंगा से सटे पुराने मोहल्ले दारागंज की एक गली में लगा है। …

और, किसी में दम भी तो नहीं?

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भ्रष्टाचार के खिलाफ लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा को पीएम बनने का आखिरी दांव मान रहे हैं। काफी हद तक सही भी है। लेकिन, बड़ी सच्चाई ये है कि बीजेपी में आडवाणी के अलावा कोई ऐसा राष्ट्रीय नेता भी तो नहीं है जो, पूरे देश में एक समान दमदारी से रथयात्रा कर सकता हो। इस बार की रथयात्रा की भी असली परीक्षा उत्तर प्रदेश में ही होगी। वैसे, अच्छी खबर ये है कि उमा भारती लौट आईँ हैं और अपने पिता समान आडवाणी की रथयात्रा को सफल बनाने के साथ अपनी राजनीतिक जमीन सुधारने की भी बड़ी चुनौती उनके सामने होगी।

लेकिन, अब कई मुश्किले हैं। प्रमोद महाजन नहीं हैं। अटल बिहारी वाजपेयी नहीं जैसे ही हैं। गोविंदाचार्य होते हुए भी नहीं हैं। और, कल्याण सिंह हैं भी तो, उल्टे हैं। कौन चलेगा इस बार आडवाणी के साथ। राज्यों में मंच पर कौन से नेता होंगे जो, दहाड़ेंगे। आडवाणी के अलावा किसकी शक्ल देखकर बीजेपी कार्यकर्ता या आम जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में पूरे मन से जुटेगी। कई सवाल हैं। देखिए, इनके जवाब रथयात्रा के बाद कैसे आते हैं।

भारत में ये रुटीन है!

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एक और धमाका। जगह वही दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर जहां 25 मई को कोई नहीं मरा था। अब कितने मरे, किस तरह से धमाका हुआ। सरकार की आपात बैठक। इस संगठन की चिट्ठी। अगले धमाके का इंतजार। बस ना कि और कुछ।

हां, जब धमाके न हों तो, बहस ये कर लें कि आतंकवादियों को भी फांसी देना क्या ठीक है। अब पूरा हो गया।

बेईमानी से कुछ और लोग डरे होंगे

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ईमानदार लोगों को अब भारत में थोड़ा बल तो मिल रहा होगा। अन्ना का भ्रष्टाचार के खिलाफ जोरदार आंदोलन और उसके सामने दंडवत सरकार। कल रेड्डी जेल में, आज अमर सिंह। कलमाड़ी से लेकर राजा तक पहले से हैं। बिहार में भ्रष्ट आईएएस का घर स्कूल बनेगा। मैं बेईमान बनने से पहले से डरता था। अब बेईमान भी डरने लगे होंगे।

जब अमर सिंह के जेल जाने की खबर मैंने सुनी तो, सचमुच मैं बहुत खुश हुआ। अमर सिंह से मेरी कोई निजी दुश्मनी नहीं है न ही दोस्ती। इत्तफाक से पत्रकारिता में होने के बाद भी कभी अमर सिंह नामक प्राणी से मिलने का अवसर नहीं मिला। लेकिन, पत्रकारिता में जो, जानने वाले कभी अमर सिंह के संपर्क में आए वो, अमर लीला बताते रहते हैं। किस तरह अमर सिंह हर किसी को दलाली के नाना प्रकार के तंत्र से वश में करने की क्षमता रखता-दिखाता रहता था ये कोई छिपी बात तो है नहीं। किसी ने कुछ बोला तो, उसके खिलाफ रुपए से लेकर रूपसियों तक का सचित्र विवरण अमर सिंह के लिए ब्रह्मास्त्र जैसा काम करता रहा। यही वजह रही कि मुलायम सिंह यादव का साथ छूटने के बाद भी यही लगता था कि ये अमर सर्वाइव कर जाएगा। अमर सिंह ने दलाली की सारी सीमाएं लां…

मायावती के दलित उत्थान की एक बानगी

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मायावती की सरकार में दलित उत्थान हो रहा है। सचमुच काफी हद तक हुआ भी है। मायावती मनुवाद को गाली देतीं हैं। मायावती ने शादी नहीं की है। परिवारवाद का आरोप कम ही लगेगा। लेकिन, मायावती के खासमखास स्वामी प्रसाद मौर्य देखिए क्या मिसाल पेश कर रहे हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य प्रतापगढ़ जिले से हैं। अब बेटे  को ऊंचाहार विधानसभा से चुनाव लड़ाना चाह रहे हैं। भतीजे को पहले ही प्रतापगढ़ जिला पंचायत का अध्यक्ष बना चुके हैं। हमें इस सबसे कोई एतराज नहीं है। लेकिन, देखिए लोकतंत्र में कितने ठसके से ऊंचाहार विधानसभा के लोगों से अपील कर रहे हैं। पूरी होर्डिंग पढ़िए सब साफ हो जाएगा। ये साहस तो सोनिया गांधी भी बेटे राहुल के लिए नहीं कर पाएंगी।

टीवी देखने से काफी कुछ साफ रहता है, दिमाग भी!

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जो लोग इस आंदोलन में मुसलमानों की गैरमौजूदगी की बात कर रहे हैं। उन्हें टीवी चैनलों को ध्यान से देखना चाहिए। मेरे कैमरे पर भी कई मुसलमानों ने बुखारी की बददिमागी को नकारा है।

इस आंदोलन में दलितों की हिस्सेदारी कितनी ज्यादा है। ये रामलीला मैदान में एक बार आंख खोलकर घूमने से पता चल जाएगा। कल करोलबाग के अंबेडकर टोले से 400 दलित आए थे। सबसे मैंने कैमरे पर ये पूछा कि क्या आप लोग सिर्फ भावनाओं में बहकर यहां चले आए हैं। जबकि, तथाकथित दलित नेता तो, कह रहे हैं ये शहरी, इलीट सवर्णों का आंदोलन है। तो, सबका जवाब था- अन्ना को गरियाने वाले बेवकूफ हैं।

मैंने उनसे नाम के साथ वो, क्या कर रहे हैं। ये सब पूछा है। कुछ भी भुलावे में रखकर नहीं। ये तथाकथित एक धर्म, वर्ग, जाति के नेताओं को दुकान बंद होने का खतरा हमेशा ही सताता रहता है। और, उसमें ये बेवकूफियां भी करते रहते हैं।

कमाल की बेहूदगी है!

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कुछ लोग बेहूदगी की हद तक चले जाते हैं। अभी तक ये फेसबुक और सोशल साइट्स पर ही था। अब टीवी पर भी दिखने लगा। कुछ लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के इस आंदोलन को लोग सवर्णों का आंदोलन कह रहे हैं। कमाल है देश के हर बदलाव वाले मौके को दलित विरोधी करार दे दो। और, आरोप लगाते घूमो कि दलितों को मुख्यधारा में आने नहीं दिया जा रहा। दरअसल ऐसा करने वाले वो, लोग हैं जिनकी दुकान इसी भर से चल रही है।

‎4 दिनों से मैं इस आंदोलन की कवरेज कर रहा हूं। और, मेरा ये आंकलन है कि ये जेपी से बड़ा आंदोलन है। क्योंकि, वो पूरी तरह से राजनीतिक आंदोलन था। ये सामाजिक, पूरी तरह से जनता का आंदोलन है। आप बताइए

अन्ना कैसे सुधारोगे भ्रष्ट भारत

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किसन बाबूराव उर्फ अन्ना हजारे को सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन तक नहीं करने दे रही है। दरअसल, अलग-अलग किस्मों-रंगों में भ्रष्टाचार ऐसे घुस बैठा है कि डर लगता है कि बिना भ्रष्टाचार के हम रह पाएंगे भी या नहीं।

कल ही इलाहाबाद से लौटा हूं। दिल्ली स इलाहाबाद जाते वक्त प्रयागराज में दो लड़कियों का टिकट कनफर्म नहीं था। या शायद एयरकंडीशंड कोच का टिकट ही नहीं था। लेकिन, उनकी किस्मत अच्छी थी। एक सीट खाली थी। दोनों लड़कियां उसी पर सो गईं। टीटी आया- एक लड़की ज्यादा समझदार थी। टीटी के नाराज होते ही उसने 100 का पत्ता पकड़ा दिया। पहले टीटी और नाराज हुआ। फिर, बोला - एक और दो। एक तो ये था सहूलियत का भ्रष्टाचार।

दूसरा इलाहाबाद में ही घर से निकला। इलाहाबाद के गंगा किनारे के इलाके दारागंज में हमारा घर है। वहां से शहर की तरफ निकला। दारागंज से बक्शी बांध से हम लोग एलेनगंज की तरफ चले। बांध खत्म होते-होते एक साईं मंदिर दिख गया। जिसके बगल में बड़ा सा बैनर भी लगा दिखा जो, बिना किसी डर-भय के चंदा देकर मंदिर बनाने की अपील कर रहा है। ये गजब का भ्रष्टाचार है। अब ये अतिक्रमण, अगर अभी ही इलाहाबाद विकास प्राधिकरण…