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Showing posts from November, 2016

बच्चों के लिए बड़ों का बहुत बड़ा आंदोलन

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नोबल पुरस्कार के लिए जब कैलाश सत्यार्थी का नाम घोषित किया गया, तो हम जैसे लोगों के लिए सबसे बड़ी बात यही थी कि एक भारतीय को दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार दिया जा रहा है। ये पुरस्कार इसलिए भी अहम हो गया क्योंकि, भारत की गरीबी, मुश्किलें और असमानता को दूर करने के काम में जब भी कोई काम होता हुआ दिखता है या कहें कि अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जब ऐसे किसी काम की चर्चा होती है, तो वो ज्यादातर कोई विदेशी संस्था ही कर रही होती है। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि भारत की धरती पर भारतीय व्यक्ति और संस्थाओं के किए काम को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कम ही महत्व मिल पाता है। इसीलिए जब नोबल पुरस्कार के लिए कैलाश सत्यार्थी को चुना गया, तो भारत के लिए ये बड़ी उपलब्धि रही। कैलाश सत्यार्थी ने बच्चों का जीवनस्तर सुधारने के लिए जिस तरह का काम किया और जिस तरह से बिना किसी साधन, संसाधन के लम्बे समय तक उसे जिया, वो काबिले तारीफ है। लेकिन, ये सब शायद दूर से अहसास करने जैसा ही रह जाता, अगर एक दिन कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउन्डेशन के कन्टेंट एडिटर अनिल पांडे का बुलावा न आता। बुलावा भी बहुत खास था। उन्होंने कहाकि कैला…

महंगाई पर काबू रखने के लिए जीएसटी की 5 दरें

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आखिरकार लंबी जद्दोजहद के बाद केंद्र सरकार ने जीएसटी की दरों पर सहमति बनाने में कामयाबी हासिल कर ली। जीएसटी परिषद की बैठक में चार कर दरें लागू करने पर सहमति बनी है। जीएसटी को लेकर सबसे बड़ी आशंका इसी बात की जताई जा रही थी कि जीएसटी लागू होने के बाद उसके अच्छे परिणाम तो देर से दिखेंगे लेकिन, बुरे परिणाम पहले नजर आने लगेंगे। और उन बुरे परिणामों में सबसे बड़ा महंगाई का तुरंत बढ़ना था। अब अच्छी बात ये है कि जीएसटी परिषद की हुई बैठक ने जिस तरह से जीएसटी की दरों को 4 श्रेणी में बांटा है, उससे जरूरी सामानों की महंगाई तो कतई नहीं बढ़ने वाली। सेवाओं पर कर बढ़ेगा। जिससे सेवाएं महंगी होंगी। लेकिन, इसे लेकर सरकार बहुत ज्यादा चिंतित नहीं दिखती। क्योंकि, सरकार ने जरूरी कई सामानों को तो करमुक्त तक कर दिया है। इस लिहाज से जीएसटी परिषद ने 5 दरें तय की हैं। शून्य, 5, 12, 18 और 28 प्रतिशत की कर दरें समझने से साफ होता है कि सरकार की प्राथमिकता में महंगाई पर काबू रखना कितना ऊपर है। उसके पीछे सबसे बड़ी वजह संभवत: ये भी होगी कि बड़ी मुश्किल से कर्ज पर ब्याज दरें काफी नीचे आई हैं। और इस बात पर सरकार और रिजर्व…

जीएसटी लागू करने में दुनिया की मुश्किलों से भारत के लिए सबक

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दुनिया में 193 देश हैं, जो संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य हैं। और दुनिया के 160 देश हैं, जो कर कानून के तौर पर जीएसटी लागू कर चुके हैं। 160 में से 8 देश ऐसे भी हैं, जो भले ही संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य नहीं हैं। लेकिन, उन्होंने भी अपने देश में कर सुधारों के तौर पर जीएसटी कानून को लागू किया है। दरअसल इस जानकारी से शुरुआत करने से ये आसानी से समझ आ जाता है कि जीएसटी कर सुधार के तौर पर कितना बड़ा और जरूरी है। और साथ ही ये भी हिन्दुस्तान के राजनीतिक दलों ने सारी सहमति होने के बाद भी सिर्फ श्रेय दूसरे को न मिल जाए, इस लड़ाई में जरूरी कर सुधार लागू करने में कितना पीछे कर दिया। ये कहना सही होगा कि दुनिया भर में जीएसटी आसान कर प्रक्रिया के तौर पर लागू किया जा चुका है। फ्रांस ने सबसे पहले 1954 में जीएसटी लागू किया था। इसकी सबसे बड़ी वजह यही थी कि अलग-अलग स्तरों पर लगने वाले कर की वजह से ज्यादातर लोग करों से बचने की कोशिश करते थे। एक विकसित अर्थव्यवस्था होने की वजह से फ्रांस के लिए कर वसूली में आने वाली मुश्किलों को खत्म करने के लिए जीएसटी की जरूरत हुई। जिससे हर स्तर पर किसी सामान या सेवा को लेन…

मीडिया के लिए सवाल पूछने के अधिकार से ज्यादा साख की चिन्ता का वक्त

प्रधानमंत्री @narendramodi के फ़ीडबैक तंत्र पर मुझे बड़ा भरोसा है। इसीलिए लिख रहा हूँ। हालाँकि जरूरी नहीं है मेरी ये बात भी उन तक पहुँचे। लेकिन मुझे लगता है कि @ndtvindia पर प्रतिबंध का फ़ैसला वापस लेना चाहिए और NBSA को इस मसले पर पूछा जाना चाहिए कि स्वनियंत्रण के तहत इस पर आप लोग क्या कार्रवाई करेंगे। ये जरूरी इसलिए भी है कि किसी भी सरकार पर मीडिया की स्वतंत्रता पर लगी रोक- कई बार बेहद जायज़ वजहों से भी लगी हो तो भी- सीधे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला और तानाशाही की ओर बढ़ते क़दम की तरह देखी जाती है/जाएगी। इसीलिए प्रधानमंत्री जी एनडीटीवी पर लगाए गए प्रतिबंध की वजहों को देश के सामने रखिए और स्वनियंत्रण में बुरी तरह से फ़ेल रहे सम्पादकों की संस्था के ही ज़िम्मे इसे कर दीजिए।ये देश को पता चलना जरूरी है कि आखिर किस खबर को दिखाने की वजह से देश में सरोकारी चैनल की छवि रखने वाले एनडीटीवी को एक दिन के बंद करने का कड़वा सरकारी आदेश जारी करना पड़ा। वरना भला सरकार को क्या पड़ी थी कि ढेर सारी छद्मधर्मनिरपेक्ष जमात के सरकार के हर अच्छे काम को भी बुरा बताने के दौर में एक नई आफत मोल लेते। लेकिन, ये …

टाटा का “मॉडल” बदलने के चक्कर में लगे “मिस्त्री” बदल दिए गए

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टाटा समूह के बारे में आम धारणा ये है कि टाटा हिन्दुस्तान की सबसे प्रतिष्ठित कंपनी है और रतन टाटा इस देश के सबसे प्रतिष्ठित कारोबारी। इसकी पक्की बुनियाद भी रही है। कंपनी के इतिहास में मुनाफे से ज्यादा साख कमाने पर जोर रहा। इसीलिए भले ही मुकेश अंबानी देश के सबसे अमीर उद्योगपति हों, लेकिन जब साख की बात आती है, तो रतन टाटा के आसपास देश का कोई भी कारोबारी नहीं नजर आता। समूह की साख और समूह का संस्कार ही टाटा समूह में ऐसे तख्तापलट की वजह बन गया, जो कंपनी की साख पर भारी पड़ता नजर आ रहा है। दुनिया के कारोबारी जगत में इस तरह का तख्तापलट कभी नहीं हुआ। हां, इस तख्तापलट की बुनियाद बड़ी उल्टी है। तख्तापलट आमतौर पर सैन्य या राजनीतिक स्थिति में नीचे के कमांडर करते हैं। लेकिन, टाटा समूह में समूह में 4 साल पहले मार्गदर्शक की भूमिका में आ गएरतन टाटा ने खुद सेनापति को ही हटा दिया। ये सेनापति ऐसा था जिस पर न सिर्फ रतन टाटा को बल्कि पूरे टाटा ट्रस्ट को भरोसा था। वो रतन टाटा और दोराबजी टाटा ट्रस्ट जो दरअसल टाटा समूह का असल मालिक है। 66% से ज्यादा हिस्सेदारी के साथ। और इस भरोसे की कई बड़ी वजहें थीं। ये सही ब…

मुलायम-अखिलेश की लड़ाई अपनी-अपनी जमीन बचाने की है

भला ऐसा भी कभी होता है कि भाई के लिए कोई अपने बेटे का ही राजनीतिक भविष्य चौपट करने पर तुल जाए। वो भी ऐसा भाई जिसकी छवि बहुत अच्छी न हो, उस पर अच्छी छवि वाले बेटे की बलि चढ़ाने की कोशिश करे। लेकिन, जब राजनीति में कुछ इस तरह का हो, तो इसके मायने ठीक से समझने की जरूरत बन जाती है। इसीलिए मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की इस लड़ाई को सलीके से समझने की जरूरत दिखती है। दरअसल मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव एक दूसरे से लड़ने से ज्यादा अपनी-अपनी हासिल की गई जमीन को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और जातियों में गजब तरीके से बंटे राज्य में  जमीन बचाने की लड़ाई इतनी कठिन है कि लग रहा है कि बेटा-बाप एक दूसरे के खिलाफ तलवार भांज रहे हैं। दरअसल इस तलवारबाजी के पीछे एक दूसरे का नुकसान करने से ज्यादा बाप-बेटे की चिंता इस बात की है कि दोनों की जमीन बची रह जाए और समाजवादी पार्टी से छिटककर दूसरी पार्टियों को जाने वाले वोट थम जाएं।
पहले बात करते हैं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बगावती तेवर के पीछे के राजनीतिक गणित की। 2012 में समाजवादी पार्टी पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने में कामयाब रही…