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Showing posts from June, 2016

ब्रिटेन की ‘आजादी’ से भारत का भला

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पिछले साल नवंबर में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लंदन में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के साथ यूरोपीय यूनियन पर जनमत संग्रह के लिए तैयार हो रही जनता से एक तरह से यूरोपीय संघ के साथ रहने की ही गुजारिश की थी। नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारतीय नजरिये से यूरोप में जाने का दरवाजा ब्रिटेन ही है। और ग्रेट ब्रिटेन ने उसके बाद जनमत संग्रह में यूरोप से अलग होने का फैसला कर लिया। हालांकि, अब ब्रिटेन के अंदर ही नए सिरे से यूरोप में बने रहने के लिए आवाज मुखर हो रही है। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल भारतीय संदर्भ में ये है कि क्या यूरोप का दरवाजा अलग हो जाने से भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा या फायदा। दुनिया में हो रहे किसी भी घटनाक्रम का पहला आर्थिक असर शेयर बाजार के उतर-चढ़ाव से ही तय होता है। और इस नजरिये से देखें तो भारतीय शेयर बाजार ने ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने के फैसले को बेहद खराब तरीके से देखा। सेंसेक्स 24 जून को छे सौ चार अंक से ज्यादा गिरकर बंद हुआ। इससे ये एक सामान्य धारणा हम भारतीयों के मन में पक्की हुई है कि ब्रिटेन के यूरोप से अलग होने से भारत के लिए आर्थिक तौर पर ढेर सारी…

इलाहाबाद में भाजपा कार्यसमिति से संदेश

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उत्तर प्रदेश चुनाव के लिहाज से संदेश देने के लिए भाजपा ने इलाहाबाद अच्छी जगह चुनी। मुझे लग रहा था कि राष्ट्रीय कार्यसमिति इलाहाबाद में करने के बावजूद जो संदेश इलाहाबाद से भारतीय जनता पार्टी दे सकती थी। वो नहीं दे पा रही है। ये मुझे लगा, जब मैंने देखा कि कार्यसमिति से आ रही मंच की तस्वीरों में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के अलावा लालकृष्ण आडवाणी और अरुण जेटली दिखे। इलाहाबाद ने भले डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी को चुनाव हरा दिया था और वो बनारस से होते कानपुर चले गए। लेकिन, ये भी सच है कि इलाहाबाद डॉक्टर जोशी का शहर है। एक अजीब सा प्यार-नफरत का रिश्ता यहां के लोगों का डॉक्टर जोशी के साथ है। इसलिए अच्छा होता कि इस शहर में जोशी जी को पूरा सम्मान मिलता दिखता। इसीलिए मैंने लिखा कि उम्मीद है रैली स्थल पर डॉक्टर जोशी को सही जगह मिलेगी। और मंच पर डॉक्टर जोशी को अपना प्रेरणास्रोत बताकर नरेंद्र मोदी ने ये दिखा दिया कि उनकी फीडबैक मशीनरी कितनी दुरुस्त और स्वतंत्र है। इतना ही नहीं इलाहाबाद की इस रैली ने लक्ष्मीकांत बाजपेयी के तौर पर भारतीय जनता पार्टी को एक मजबूत ताकतवर ब्राह्मण नेता दे दिया है। ये बात मोदी…

रघुराम के राज में मध्यवर्ग ‘रामभरोसे’

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रिजर्व बैंक के गवर्नर के तौर पर रघुराम राजन पहली बार मौद्रिक नीति जारी करने जा रहे थे। चार सितंबर 2013 को रघुराम राजन ने रिजर्व बैंक के गवर्नर का पदभार संभाला था और बीस सितंबर को उनकी पहली मौद्रिक नीति जारी होने वाली थी। बैंक, बाजार, आम जनता सभी को आशा थी कि रघुराम राजन की नीति से बैंक कर्ज सस्ता होगा। जिससे लोगों की जेब पर पड़ रहा अतिरिक्त बोझ घटेगा। रुपया डॉलर के मुकाबले सत्तर के भाव से मजबूत हो रहा था। सेंसेक्स भी फिर से इक्कीस हजार की तरफ बढ़ रहा था। और कच्चे तेल का भाव भी एक सौ बारह डॉलर प्रति बैरल की ऊंचाई से वापस लौट रहा था। छे प्रतिशत से कुछ ऊपर की महंगाई दर थी। और ये महंगाई दरअसल खाने-पीने के सामानों उसमें भी खासकर प्याज की महंगाई की वजह से थी। मतलब कुल मिलाकर ब्याज दरें घटाने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास भरपूर वजहें थीं। लेकिन, हुआ ये कि रघुराम राजन की दूरदृष्टि दरअसल महंगाई दर के घटने का इंतजार कर रही थी। राजन की इस दूरदृष्टि का उल्टा असर ये हुआ कि देश के सबसे बड़े और सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने बीस सितंबर की मौद्रिक नीति के बाद ब्याज दरें बढ़ा दीं। पहले से ह…

ईमानदारी: मोदी बनाम मनमोहन

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प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह पर आज तक कोई दाग नहीं है। हिंदुस्तान की अब तक की सबसे दागदार सरकार पूरे एक दशक तक चलाने के बाद भी उन पर कोई दाग नहीं है। लाखों करोड़ के घोटाले के बाद भी डॉक्टर मनमोहन सिंह ईमानदार ही रहे। भले कोयला मंत्रालय तक उनके पास था। वो प्रधानमंत्री थे। उनके मंत्रियों को जेल तक जाना पड़ा। लेकिन, डॉक्टर मनमोहन सिंह की ईमानदारी बची रही। बनी रही। अब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं। प्रधानमंत्री पर कोई भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है। पूरी सरकार पर नहीं है। ईमानदार मनमोहन सिंह पर भ्रष्टाचार करने वाले मंत्री हावी रहते थे। ईमानदार नरेंद्र मोदी पर कोई हावी नहीं है। मंत्री प्रधानमंत्री के बराबर चलने में हांफ रहे हैं। और क्या फर्क है मोदी बनाम मनमोहन सिंह की ईमानदारी में। सिर्फ 3 मिनट मुझे सुनिए

गांव की थाली

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#SelfSustainedVillage ये गुप्तकाशी का एक गांव हुडू है। यहां सभी घर पक्के हैं। और जो थाली आप देख रहे हैं। ये पूरी तरह से इसी गांव की है। मतलब सिर्फ इतना नहीं कि इस गांव के लोगों ने हमें ये थाली खाने के लिए दी। बल्कि, इस थाली में जो कुछ भी वो इसी गांव के खेतों में पैदा हुआ है। इस गांव के मसाले किसान संगठन की मदद से शहरों में भी खूब बिक रहे हैं। और इस पूरी समृद्धि की मालकिन महिलाएं हैं। पहले पहल तो खाना शुरू करते मन में थोड़ी हिच बनी हुई थी। जब खाना शुरू किया तो इतना पौष्टिक और रुचिकर भोजन कि पेट की भूख से ज्यादा खाया।

मोदी सरकार में मीडिया ऐसा बंटा क्यों है?

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करीब 4 दशक के वामपंथ और कांग्रेस के बिना किसी लिखित समझौते के तय हुए सत्ता संस्कार ने देश में बुद्धिजीवी, लेखक, साहित्यकार, पत्रकार, कलाकार होने की शर्त तय कर दी। उसी का परिणाम है कि अब @narendramodi की सरकार आने के बाद अखलाक हो या दूसरा कोई मुद्दा मीडिया दो भागों में साफ तौर पर विभक्त नजर आता है। 2 मिनट का समय हो तो इस लिंक पर जाकर मेरी पूरी बात सुन सकते हैं।