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Showing posts from February, 2014

ये राजनीति जानी तो इसी रास्ते थी

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आखिरकार कम से कम बोलने वाले हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी बोल ही पड़े। बोल रहे हैं कि राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई का फैसला सही नहीं है। प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं कि ये फैसला कानूनी रूप से सही नहीं है। इसलिए जयललिता सरकार हत्यारों को रिहा न करे। मनमोहन जी ये भी कह रहे हैं कि कोई भी सरकार, पार्टी आतंकवादियों पर नरम न हो। हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका से जयललिता के राजनीतिक दांव को अमल में लाने से भले रोक लग गई हो। लेकिन, क्या इससे जयललिता का राजनीतिक दांव उलट जाएगा। अब सवाल ये भी है कि जो बात प्रधानमंत्री कह रहे हैं वो क्या ईमानदारी से वो कह पाएंगे। क्योंकि, कांग्रेस के सारे फैसलों के तरीकों की जानकारी तो उन्हें कम से कम पिछले दस सालों में मिल ही रही होगी। अगर इस खुले रहस्य को मान भी लें कि फैसले कांग्रेस पार्टी में उनसे पूछकर नहीं लिए जाते रहे हैं। तो भी कम से कम वो जानते तो रहे ही होंगे। फिर ये बयान देने का साहस वो कैसे कर पाए होंगे कि किसी सरकार, पार्टी को आतंकवादियों के प्रति नरमी नहीं दिखानी चाहिए। ज्यादा पुराना फैसला नहीं है जब लगातार …

अरविंद की पार्टी का नाम ईमानदार पार्टी क्यों नहीं है?

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आम आदमी पार्टी। नाम भी कमाल के होते हैं। देश के ढेर सारे खास लोगों के इससे जुड़ने के बाद भी ये आम आदमी पार्टी है। और इस पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल सबसे ईमानदार हैं। मुझे समझ में नहीं आता कि सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को अपनी पार्टी का मूलमंत्र बताने वाले अरविंद केजरीवाल ने अपनी पार्टी का नाम ईमानदार पार्टी क्यों नहीं रखा। अरविंद केजरीवाल अब तक ईमानदार दिख रहे हैं। इसमें मुझे कोई संदेह नहीं दिखता। ईमानदारी भले ही सापेक्ष हो। अब मैं क्यों कह रहा हूं कि अरविंद सापेक्ष तौर पर ही सही ईमानदार हैं। इसकी वड़ी सीधी-सीधी वजहें हैं। अरविंद ने राजनीति करनी शुरू की है। या कहें कि राजनीति के इरादे से ही ईमानदारी की बात करनी शुरू की। या और आगे जाकर ये कहें कि राजनीति के इरादे से ईमानदारी का अकेला चेहरा बनने के लिए भ्रष्टाचार को देश की सबसे बड़ी समस्या बताया। और आगे जाएं तो राजनीति के लिए देश के दूसरे सारे राजनीतिज्ञों को भ्रष्टाचारी बताया। अब भ्रष्टाचारी बताया तो इससे होता क्या। क्योंकि, भ्रष्टाचार तो हम सब करते हैं। लेकिन, भ्रष्टाचार भी दाल में नमक की तरह हो। या खाने में मिर्ची की…

हिंदी की मजबूती के लिए ये नायाब तरीका है

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बढ़ती भीड़, बढ़ता भाजपा का संकट!

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यूपीए 2 का आर्थिक शीर्षासन !

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राजनीति अर्थनीति पर हमेशा भारी पड़ती है येतोसमय-समय पर साबित होता रहा है। लेकिन, खुद को सुधारवाद की सबसे बड़ी अगुवा घोषितकरने वाली सरकार  5 साल बीतते-बीतते अगर अपने सारे सिद्धांतों को उलट दे तो क्याकहेंगे। यूपीए सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में कुछ ऐसा ही कर रही है। मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री बने थे तो लगा था कि देश-दुनिया में अर्थशास्त्र के विद्यार्थी, अध्यापक रहते जो कुछ भी उन्होंने सीखा, समझा है उसे ठीक से लागू करेंगे और देश की अर्थव्यवस्था कुछ ऐसी हो जाएगी कि दुनिया के विकसित देशों के साथ हम कंधे से कंधा मिला सकेंगे। मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री रहते हुए जो कमाल किया था, वो भारत के लोगों को अच्छे से याद है। इसीलिए मजबूरी में ही सही जब ऐसा आदमी प्रधानमंत्री बनता दिखा तो नौजवान भारत को लगा कि अब तक सब्सिडी से सरकार और देश चलाने के आदी नेताओं का वक्त खत्म हो गया। क्योंकि, पी वी नरसिंहाराव के प्रधानमंत्री रहते वित्त मंत्री बने मनमोहन सिंह ने वो कर दिखाया था जो, होना संभव ही नहीं था। मनमोहन सिंह ने इस देश को काफी हद तक लालफीताशाही से मुक्ति दिला दी थी। भारत का 1991 दुनिया के लिए मिसाल बना…