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Thursday, July 30, 2015

हे टीवी मीडिया के असहाय मित्रों। अब नरक मत करो।

हे टीवी मीडिया के असहाय मित्रों। अब नरक मत करो। #YakoobMemon #YakoobHanged के बाद अब उसकी शवयात्रा मत दिखाने लगना। नरक के भागी इतना भी न बनो। देश के सर्वप्रिय सबके राष्ट्रपति और सिर्फ राष्ट्रपति ही नहीं सबके साथी, शिक्षक डॉक्टर अबुल पाकिर जैनुलआब्दीन का अंतिम संस्कार भी आज हो रहा है। टीवी के संपादक बार-बार ये बहस करते हैं कि टीवी पर हम वही दिखाते हैं। जो, जनता चाहती है। जनता के दबाव के बहाने सारी गलतियों को छिपा लेने वाले संपादकों थोड़ा तो शर्म करो। कौन सी जनता का दबाव था कि याकूब की फांसी पर इतनी बहस हो ये तो अब पूरी तरह से साफ हो गया है। हा इतना जरूर हुआ है कि इस जनता के दबाव की आड़ में आप संपादकों ने पिछले एक हफ्ते से संपूर्ण विश्राम किया है। न किसी विचार पर काम करने की जरूरत रही। न ही सुबह की मीटिंग में ये तय करने की जरूरत कि आखिर चौबीस घंटे के टीवी न्यूज चैनल पर बारह घंटे की लाइव रिपोर्टिंग में क्या दिखाएंगे। वैसे भी याकूब मेमन के भावनात्मक पक्ष पर तो बहुतायत कहानियां पहले से ही मीडिया में थी हीं। बस उन्हें नई तारीख के साथ छापना, दिखाना था। सुबह से ही सारे संपादकों ने अपने रिपोर्टरों को दिल्ली, मुंबई से लेकर नागपुर जेल तक लगा दिया है। हां, ये अभी तक नहीं पता चल पाया है कि कितने संपादकों के आदेश पर कितने टीवी चैनलों के रिपोर्टर रामेश्वरम पहुंचे हैं। शर्म करो नहीं तो जनता के दबाव की आड़ में हर कुकर्म को छिपा लेने वाली बेशर्म पर जनता की प्रतिक्रिया का दबाव आया तो, क्या करोगे। वैसे भी काले धन के प्रवाह में आई रोक ने बहुतायत बी, सी, डी ... ग्रेड चैनलों पर ताला लगा दिया है। कुछ शर्म करो।


याकूब मेमन की कहानियां किसी भी तरह से किसके हित में हैं। सिवाय मेमन परिवार के। समाज के निर्माण में कौन सी कहानियां मदद करने वाली हैं। रस्मी तौर पर सिर्फ कलाम साहब के अंतिम संस्कार की एजेंसियों से मिली तस्वीरों से काम मत चलाओ। एपीजे अब्दुल कलाम साहब का जीवन दिखाओ। टीवी बड़ा पावरफुल मीडियम है। इस ताकतवर जनता के माध्यम का इस्तेमाल जनता की भलाई के लिए करो। जनता के दबाव की बात बहुतायत करते हो। कभी जनता की भलाई का भी सोचो। मैं खुद टीवी पत्रकार हूं। जानता हूं बड़ा दबाव होता है। सचमुच कठिन है। चौबीस घंटे की दर्शकों को बांधने वाली प्रोग्रामिंग करना। लेकिन, जब एपीजे अब्दुल कलाम जैसी शख्सियत की कहानी सुनानी हो तो, इतना कठिन मुझे तो नहीं लगता। सात दिन के राष्ट्रीय शोक का वक्त है। इस देश को प्रेरणा देने वाले सात दिन में बदलने की ताकत टीवी में ही है। लेकिन, आधा वक्त तो आप फांसी में ही खा गए। आधा वक्त फांसी के बाद की पीड़ा में मत खा जाना। प्रायश्चित इस एक घटना से तो न हो पाएगा। लेकिन, करिए शायद कुछ मन का बोझ हल्का हो जाए। कलाम साहब साहब रहने लायक धरती की बात करते दुनिया से गए। वो कहते थे कि माता-पिता और शिक्षक- ये तीनों ही मिलकर किसी देश का मन मिजाज स्वस्थ कर सकते हैं। भ्रष्टाचार मुक्त कर सकते हैं। टीवी भी बड़ा शिक्षक है। टीवी से जनता जाने-अनजाने सीखती है। सीख रही है। सीखने वाला छात्र होता है। कलाम साहब ने ये भी कहा था कि छात्र को सवाल पूछने से कभी नहीं रोकना चाहिए। सवाल पूछना ही छात्र का, सीखने वाले का मूल होता है। ये खत्म तो, सब खत्म। शिक्षक टीवी की जनता ही छात्र है। जनता को सवाल पूछने दीजिए। कलाम साहब बच्चों के सवालों का जवाब देते रहे, आखिरी क्षण तक। खुद सीखते रहे, दूसरों को सीखने के लिए प्रेरित करते रहे। इस देश में फांसी पर बहस फिर हो सकती है। ऐसे बहुतायत मौके पहले भी मिले। आगे ईश्वर न करे कि मिलें। लेकिन, ये वक्त है देश से एक शिक्षक की विदाई का। इस विदाई को सीख के तौर पर इस्तेमाल किया जाए। टीवी मीडिया भी समाज का शिक्षक है। एक शिक्षक के नाते अपनी जिम्मेदारी निभानी ही होगी। इसी जिम्मेदारी से छात्रों के सवालों के जवाब मिल पाएंगे। अपनी जिम्मेदारी से भागने वाला शिक्षक जैसे छात्र को जिम्मेदार नहीं बना सकता। वैसे ही अपनी जिम्मेदारी से भागने वाले टीवी भी सही समाज नहीं बना सकता। छात्र के दबाव से शिक्षक गड़बड़ाया है। ये साबित करना कब तक हो पाएगा। अगर दुनिया के सारे शिक्षक टीवी वाली लाइन ले लें तो, क्या होगा। दुनिया के सारे छात्र शिक्षकों पर दबाव बना देंगे। बड़ा गलत उदाहरण पेश कर रहा है भारतीय टेलीविजन। इस अपार संभावना वाले माध्यम की हत्या मत करिए संपादकों। 

Saturday, July 12, 2008

बेचने के चक्कर में हर घर में डर तो मत भरो

टीवी पर सब बिकता है। आंसू-मारधाड़-नौटंकी। हत्या-बलात्कार-रेव पार्टी। लेकिन, इस बेचने के चक्कर में अब टीवी वालों (खबरिया चैनल पढ़िए) का ईमान तक बिक गया है। पता नहीं ये सब दिखाने-चलाने के बाद वो न्यूजरूम में हंसते हैं या रोते हैं। ऐसा तो है नहीं कि उनमें संवेदनाएं नहीं हैं। सब मजबूरी में टीआरपी की अंधी दौड़ में भाग रहे हैं। लेकिन, इतना सब करने पर भी टीआरपी नहीं मिल पा रही है। मैं खुद एक टीवी चैनल में हूं इत्तफाकन खुशनसीब हूं कि इस ईमान बेचने के धंधे से काफी बचा हुआ हूं। बिजनेस चैनल में होने से बच गया हूं। बल्कि सच्चाई तो ये है कि बच क्या गया हूं, जनरल न्यूज चैनल में जाना चाहता हूं लेकिन, डर लगने लगा है। जाके करूंगा क्या।

अब आरुषि को पता नहीं किसने मारा। सीबीआई भले ही तीन नौकरों को हत्यारा बता रही हो लेकिन, सच्चाई शायद ही ये हो। लेकिन, इस मामले पर न्यूज चैनलों ने जो हरकत की वो, आरुषि की हत्या से भी बहुत शर्मनाक है। एक प्यारी सी खूबसूरत बच्ची जो, किसी के भी घर की मासूम बच्ची नजर आती है। आरुषि की मौत की खबर आने के साथ ही न्यूज चैनलों पर जितनी तरह की फैंटेसीज हो सकती हैं वो, दिखानी शुरू कर दी गईं। किसी के पास कोई जानकारी नहीं थी। अभी भी नहीं है। लेकिन, जिस चैनल के रिपोर्टर को जिस तरह से आरुषि के मर्डर का प्लॉट समझ में आता। बस उसी का रिक्रिएशन या फिर आरुषि की खून टपकती फोटी लगाकर स्पेशल इफेक्ट्स के साथ अपनी कहानी दर्शकों के दिमाग में ठूंसने की कोशिश बेहयाई की हद तक करते रहे।

हाल ये हो गया कि घरों में कार्टून देखना पसंद करने वाले छोटे बच्चों से लेकर सुबह उठकर आस्था, संस्कार चैनल देखने वाले बुजुर्ग तक हर रोज चैनल पर टकटकी लगाए आरुषि का क्या हुआ जानना चाहते। आरुषि की हत्या हो गई। लेकिन, आरुषि को टीवी वालों ने सबके दिमाग में-मन में जिंदा कर दिया। और, आरुषि की हत्या के साथ ही लोगों के दिमाग में-मन में पश्चिमी दुनिया से आई सारी गंदगी भी दिमाग में बसा दी। आरुषि के मां-बाप के साथ ही उनके सबसे नजदीकी परिवार का भी चित्र ऐसा खींच दिया कि वो, मुंबई-दिल्ली के हाई प्रोफाइल सेक्स रैकेट का हिस्सा से लगने लगे। और, मीडिया वालों की फिल्मी फंतासी की स्क्रिप्ट जहां भी कमजोर होती, सीबीआई और नोएडा पुलिस पूरे मिर्च मसाले के साथ तैयार रहते ही थे।

अब सीबीआई ने पूरे पचास दिनों के बाद राजेश तलवार को निर्दोष ठहराकर तलवार के कंपाउंडर, तलवार के दोस्त दुर्रानी के नौकर और तलवार के बगल के घर के नौकर, तीनों को हत्या का आरोपी बना दिया है। न्यूज चैनल फिर से लग गए हैं। अब नौकरों के परिवार वाले स्टूडियो में हैं। चैनलों के सबसे सीनियर रिपोर्टर्स के साथ राजेश तलवार के भाई दिनेश तलवार के साथ इंटरव्यू करके ला रहे थे। कल तक पुलिस पर तलवार को बचाने का आरोप लगाने वाला एंकर चीख-चीखकर पूछ रहे हैं- कौन लौटाएगा डॉक्टर तलवार के वो 50 दिन। क्या डॉक्टर तलवार को जिल्लत से छुटकारा मिल सकेगा। कल तक खून टपकती आरुषि की फोटो चैनलों पर दिख रही थी। अब पापा की पीड़ा के साथ आरुषि की फोटो घूम रही है।

मैं विनती करता हूं। मैं खुद मीडिया में हूं। बस इतना ही कहना चाहता हूं कि देश के लोगों के दिमाग में इतनी फंतासियां मत भरो कि हर रिश्ते में उन्हें पाप दिखने लगे। हर रिश्ते में शक घुस जाए। लोगों को घर भी महानगरों की रात में तेज रफ्तार से कार चलाते-गली के किनारे आंखें चढ़ाए बैठे नशेड़ियों के बीच की जगह लगने लगे। मैं ईमानदारी से कह रहा हूं मुझमें आरुषि की असामयिक-दर्दनाक-समाज पर लगे काले धब्बे वाली मौत पर कुछ भी लिखने का साहस नहीं था। लेकिन, ऑफिस से लौटने के बाद सभी चैनलों पर फिर से जनाजा बिकते देखा तो, रहा नहीं गया। माफ कीजिएगा ...

Thursday, February 14, 2008

ए भाई लोगों इन मराठियों की भी जरा चिंता कर लो

मराठी माणुस के भले का दावा करने वालों ने एक मराठी माणुस की जान ले ली। और, दूसरा एक मराठी माणुस हत्यारा बन गया। यानी दो मराठी परिवार बरबाद हो गए। लेकिन, अभी भी मराठियों की चिंता करने वालों की सेना का अभियान जारी है। मराठी हितों की चिंता करने वाले सचमुच कितने चिंतित हैं अपने वोट के लिए या मराठी हितों के लिए ये सब जानते हैं। फिर भी महाराष्ट्र के 2000 के सेंसस से इसे समझने में और आसानी होगी। सच्चाई ये है कि मराठियों को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल पा रहीं और ये आंकड़ा सिर्फ मुंबई का नहीं है। जहां गैर मराठियों को मराठियों के संसाधनों पर कब्जा करते प्रचारित किया गया है।

पूरे महाराष्ट्र के आधे से ज्यादा घरों में टॉयलेट तक की सुविधा नहीं है। जब उत्तर भारतीयों की संख्या मुंबई में बहुत कम थी, तब भी देश का अकेला शहर मुंबई ही था जहां, चॉल सिस्टम में बीसों घरों के लोग एक ही टॉयलेट का इस्तेमाल करते थे। मराठी संस्कृति, अस्मिता का ढोल पीटने वालों अब जरा गैर मराठियों को गंदगी में रहने वाले और गंदगी करने वाले बोलने से पहले इन आंकड़ों का ध्यान कर लेना। देश में सबसे ज्यादा शहरीकरण गुजरात के बाद महाराष्ट्र का ही हुआ है। लेकिन, यहां गांवों के लिहाज से 81.8 प्रतिशत और शहरों में 41.9 प्रतिशत घरों को अपना टॉयलेट तक नसीब नहीं है। शहरों की 40 प्रतिशत आबादी ड्रेनेज सिस्टम से जुड़ी नहीं है।

दूसरी सुविधाओं के मामले में भी अगर देखें तो, शहरों में भले ही 70.5 प्रतिशत घरों में टीवी सेट हैं लेकिन, गांव के इससे भी ज्यादा घरों में टीवी ही नहीं है। 35 प्रतिशत घरों मे रेडियो या ट्रांजिस्टर है। 14.1 प्रतिशत घरों में टेलीफोन है। 30.1 प्रतिशत घरों में साइकिल है। 13.2 प्रतिशत घरों में बाइक, स्कूटर या फिर मोपेड है। सिर्फ 3.4 प्रतिशत घरों में ही कारें हैं। और, 36.8 प्रतिशत घरों में इनमें से कोई भी सामान नहीं है। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि मुंबई में चमकती SUV’s में घूमने और मायानगरी की चमकती पार्टियों में शामिल होने वालों को असली मराठी हितों के बारे में अंदाजा भी नहीं होगा।

ऐसा नहीं है कि देश के दूसरे हिस्सों में ऐसा समान बंटवारा है। लेकिन, सच्चाई यही है कि मुंबई जैसी देश की आर्थिक राजधानी होने के बावजूद यहां की सरकारें और यहां के नेता राज्य के दूसरे हिस्सों के विकास का कोई खाका तैयार नहीं कर पा रहे हैं। मुंबई में निश्चित तौर पर जिस तरह से बाहर से लोग आ रहे हैं यहां की भी बुनियादी सुविधें टूट रही हैं। और, इसका कोई न कोई विकल्प भी खोजना पड़ेगा। पर, सवाल ये है कि जब विकसित राज्यों में शुमार महाराष्ट्र की सरकार राज्य के दूसरे हिस्सों में ही ऐसे विकल्प नहीं दे पा रही है और महाराष्ट्र के ही दूसरे हिस्सों से लोग मुंबई भागे चले आ रहे हैं तो, ये उम्मीद कैसे की जा सकती है कि पिछड़े का ठप्पा लगे उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग अपने अवसर खोजने देश की आर्थिक राजधानी में नहीं आएंगे।

और, ये आंकड़ा ये भी साफ करता है कि मुंबई का विकास किसी मराठी या गैर मराठी की वजह से नहीं हुआ। समुद्र के किनारे बसा होना, आज से सौ साल पहले से ही देश का व्यापारिक केंद्र होना और दुनिया भर में भारत के अकेले आर्थिक शहर के तौर पर पहचान- इन सबकी वजह से मुंबई की शान है, मुंबई की चमक है। अब अगर सचमुच मराठी हितों के रक्षकों को अपना दावा सिद्ध करना है तो, महाराष्ट्र के दूसरे हिस्सों को भी मुंबई जैसा चमकाकर दिखाएं और तब कहें कि पिछड़े राज्यों के लोगों को यहां घुसने नहीं देंगे। क्योंकि, अभी तो महाराष्ट्र के ही दूसरे हिस्से बहुत पिछड़े नजर आ रहे हैं।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...