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Showing posts from June, 2017

नोएडा की सबसे ऊंची सड़क पर नीचे जाती राजनीति

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नोएडा के सबसे बड़े बुनियादी ढाँचे का लोकार्पण करने भी @MYogiAdityanath नहीं आ रहे। हालाँकि, इसका लगभग काम @yadavakhilesh के ही शासनकाल में पूरा हो चुका था। क़रीब आधा पुल लखनऊ से ही लोकार्पण करके अखिलेश ने खोल दिया था। दरअसल कोई भी मुख्यमंत्री प्रदेश के सबसे चमकते शहर नोएडा आने से डरता है। डर उस अन्धविश्वास का है कि जो यहाँ आया, उसकी सत्ता गई। ख़ैर, अपना घर-गाँव रहते मायावती नहीं आईं। फिर भी २०१२ में सत्ता से बेदख़ली हो गई। २०१७ में लखनऊ रहकर नोएडा की सारी योजनाओं का लोकार्पणकरते अखिलेश भी चले गए। योगी आदित्यनाथ साधु हैं, फिर भी सत्ता जाने के मोह से उबर नहीं पा रहे हैं। ख़ैर, ये तो पहली बात हुई। दूसरी जरूरी बात ये कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ख़ुद तो आ नहीं रहे हैं। अच्छा होता कि इस सड़क का ज़्यादातर काम जिस अखिलेश यादव के कार्यकाल में पूरा हुआ था, उन्हें भी बुला लेते। हालाँकि, राजनीति में ये कोई नहीं करता। हर सरकार आने के बाद पहले की सरकारों के पूरे किए काम को लोकार्पण करके अपना बना लेती है। लेकिन, मुझे लगता है कि जिस तरह से सोशल मीडिया के जरिए हर छोटी-बड़ी बात सबको पता हो जाती है, उसमें …

नौकरी में भागते रहने का सुख !

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ये सलाह अनुभव से उपजी है और सभी के लिए है। लेकिन ख़ासकर पत्रकारों के लिए। ये सही है कि हम पत्रकार या तो दिल्ली, मुम्बई जैसी बड़ी जगह या फिर अपने राज्य की राजधानी या फिर अपने जिले के ही धाँसू पत्रकार बनना चाहते हैं। इसमें से किसी भी एक मोह से उबर पाना बेहद कठिन होता है। मैं मूलत: प्रतापगढ़ से हूँ। पैदाइश के बाद हमारी पूरी बनावट इलाहाबाद की देन है। सबसे कठिन फैसला था, इलाहाबाद छोड़ना। बहुत कड़ा मन करके ये फैसला लिया था। आज उस फैसले पर मुग्ध होने जैसा भाव रहता है। फिर कानपुर, देहरादून, मुम्बई होते अभी दिल्ली टिका हूँ। हालाँकि, मैं ठहरना दिल्ली ही चाहता था। पहली बार ११ जुलाई २००१ को दिल्ली आकर गिरा था। लेकिन, दिल्ली निरन्तर भगाती रही। उसी भागने में ऊपर लिखे शहरों में रहना हुआ। आत्मीय सम्बन्ध बने। कानपुर और मुम्बई दोनों ही शहरों को लेकर मन में अच्छा भाव नहीं था। लेकिन, कानपुर में ग़ज़ब के आत्मीय सम्बन्ध बने और समझ भी बेहतर हुई। ईमानदार विश्लेषण ये किहर शहर ने मुझे बेहतर होने में मदद की और सबसे बड़ी बात कि समझ का दायरा बहुत बड़ा कर दिया। हिन्दुस्तान इतनी विविधता वाला देश है कि यहां आप एक छो…

मोदीराज में रायसीना पहाड़ी पर एक दलित के विराजने का मतलब

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भारतीय जनता पार्टी के सांसदों को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए प्रस्तावक के तौर पर दस्तखत करने के लिए मुख्तार अब्बास नकवी के यहां जाना था। कमाल की बात ये थी कि उनमें से किसी को भी नहीं पता था कि दिल्ली की सबसे ऊंची और सम्वैधानिक तौर पर देश की सबसे ऊंची रायसीना पहाड़ी पर विराजने के लिए वो लोग किसके नाम पर मुहर लगाने जा रहे हैं। ज्यादातर सांसद लालकृष्ण आडवाणी के ही पक्ष में सहानुभूति रख रहे थे। लेकिन, राष्ट्रपति बनाने के लिए सांसदों की सहानुभूति नहीं, उनके मतों की जरूरत थी। और वो मत पार्टी के तय उम्मीदवार के ही पक्ष में जाना तय था। सांसद मुख्तार अब्बास नकवी के घर पहुंच रहे थे और ठीक उसी समय 11 अशोक रोड में भाजपा मुख्यालय पर राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बताया कि रामनाथ कोविंद एनडीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार होंगे। बिहार के राज्यपाल को राष्ट्रपति बनाने की नरेंद्र मोदी और अमित शाह की इस योजना की जानकारी किसी को नहीं थी। भारतीय राजनीति नरेंद्र मोदी और अमित शाह को आगे कैसे याद करेगी ? एक शातिर राजनीतिक जोड़ी के तौर पर ? उनकी योजना से बाहर काम करने वाले हर नेता का खात्मा करने वाली जो…

मुम्बई की बारिश और पानी की कमी

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टेलीविजन के जरिए मुम्बई को देखते लोगों को लग रहा होगा कि मुम्बई पूरा बारिश में भीगा/डूबा हुआ है। लेकिन, ऐसा है नहीं। बारिश हो रही है, लगभग रोज ही। लेकिन, ऐसी भी झमाझम वाली नहीं हो रही है। हां, इतनी बारिश जरूर हो रही है कि मुम्बई के लिए रेल या सड़क, किसी भी रास्ते से जाते चारों तरफ नदियां, जलाशय लबालब भरे मिलेंगे। इतना पानी बरस चुका है। प्रकृति ने साल भर के लिए पानी का इन्तज़ाम कर दिया है। इसे सम्भालने की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है मुम्बईकरों। लबालब भरे पानी के समय जल संरक्षण की सोचना/करना चाहिए। वरना मार्च आते फिर पानी पानी चिल्लाओगे। ये मसला कितना गम्भीर है, इसका अन्दाजा इससे लगाकि 3 दिन ठाणे में रहते 2 दिन पानी समय से नहीं आया।

समन्दर किनारे की ताजगी और गन्दगी

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वर्सोवा में सफ़ाई का कमाल देखने चला गया। समन्दर किनारे तो अच्छा ही लगता है। लेकिन जो वर्सोवा बीच सफ़ाई की मिसाल बताया जा रहा है, उसकी ये तस्वीरें दिखीं। मन दुखी हो गया। पढ़ा था कि किसी एक व्यक्ति की कोशिश से वर्सोवा बीच गजब का साफ हो गया है। लेकिन, वो लगता है कि मामला अस्थाई टाइप का ही था। साफ समन्दर किनारे कुछ पल भी बिताना ताजगी का अहसास देता है। ऐसी गन्दगी में ताजगी का अहसास भी गन्दा हो जाता है।

मुम्बई मेट्रो: घाटकोपर से वर्सोवा

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मेट्रो शानदार साधन, सुविधा है। मेट्रो सुन्दर, उसके स्टेशन सुन्दर और इसमें यात्रा करते यात्री भी सुन्दर ही दिखते हैं। मुम्बई में घाटकोपर से वर्सोवा की मेट्रो की सवारी भी ऐसा ही अहसास देती है। मेट्रो के बाहर की ये तस्वीर उसी ख़ूबसूरती को और बढ़ाती दिखती है। लेकिन, पहाड़ी के नीचे आती नीली छतों वाली ये तस्वीर उतनी ख़ूबसूरत नहीं है। बल्कि, ये मुम्बई या कहें कि हर बढ़ते शहर की लाइलाज बीमारी है। अवैध झुग्गी-झोपड़ी। मुम्बई की लोकल के किनारे तो जैसे झुग्गी ही स्वाभाविक दृश्य है। अब मेट्रो को इन्हीं झुग्गियाँ के बीच में से अपना रास्ता बनाना पड़ रहा है।

मुम्बई मेट्रो में ये निर्देश देखकर समझ आया कि मुम्बई लोकल जिन्दाबाद थी, है और रहेगी। हालांकि, मेट्रो बची रहे, इसके लिए ये बेहद जरूरी है। निर्देश हिन्दी और मराठी में ही लिखे हैं। क्योंकि, ये तो साफ है कि मराठी या हिन्दी समझ रखने वालों के अलावा तो कोई मच्छी लेकर तो मुम्बई में आने-जाने से रहा। और सबसे अच्छी इस निर्देश के साथ लगी हुई ये तस्वीर। 







दिल्ली मुम्बई हर तरह से अलग है। सोचिए मेट्रो भी अलग हो गई है। दिल्ली मेट्रो में सीट के नीचे पैर पसारने का जु…

क्या सीता के श्राप से मुक्त होने वाली है अयोध्या ?

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किम्वदन्ति है कि जब सीता को अयोध्या छोड़ना पड़ा तो, उन्होंने कहाकि जो अयोध्यावासी उनके ऊपर हो रहे अन्याय के खिलाफ नहीं खड़े हो पा रहे हैं उन्हें समृद्धि-खुशहाली नहीं मिल सकेगी। सवाल ये है कि क्या सीता के श्राप से अयोध्या कभी मुक्त नहीं हो सकेगी। या फिर अयोध्या के लिए सीता के श्राप से मुक्त होने का समय आगया है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या में हैं, इसलिए अयोध्या फिर से खबरों में है। लेकिन, सवाल ये है कि क्या अयोध्या सिर्फ विवादों की वजह से ही खबरों में रहेगी या फिर खबरों से आगे भी भगवान राम वाली समृद्ध अयोध्या अस्तित्व में आएगी। ये तो सच है कि अब देश 1992 से बहुत आगे निकल चुका है। मंदिर-मस्जिद अब वोट तो तैयार नहीं कर पा रहा है। पिछले चुनाव ज्यादातर विकास के मुद्दे पर ही हुए हैं। तो क्या अयोध्या को भी विकास के मुद्दे पर देखे जाने का वक्त आ गया है। अयोध्या विवाद की वजह से केंद्र और राज्य सरकार ने इस छोटे से कस्बे टाइप के शहर को छावनी बना रखा है। बावजूद इसके सालाना करीब 60लाख रामभक्त अयोध्या चले आते हैं। 60 लाख सालाना मतलब 5 लाख लोग हर महीने मतलब हर दिन करीब 15 हजार …