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Showing posts from August, 2016

पुरुषवादी सोच है किराए की कोख में अपना बच्चा?

केंद्र सरकार को इस बात के लिए बधाई देनी चाहिए कि लंबे समय से बिना किसी नियंत्रण के चल रहे किराए की कोख के बाजार को नियंत्रित करने के लिए एक कानून बनाने की कोशिश की है। हालांकि, कानून बनने से पहले ही किराए की कोख के कानून पर ढेर सारे मोर्चे खुल गए हैं। हालांकि, सरकार ने बड़ी मशक्कत करके काफी सावधानी से सरोगेसी पर कानून बनाने की कोशिश की है। लेकिन, इसपर पार्टी के भीतर भी दोफाड़ है। खासकर इस बात पर बहुत ज्यादा विवाद है कि अगर कोई गोद ले सकता है, तो उसे किराए की कोख की इजाजत क्यों नहीं होगी। प्रगतिशील जमात सिंगल पैरेंट और एलजीबीटी समुदाय के लोगों के लिए भी सरोगेसी कानूनी करने की मांग कर रही है। एक बहस ये भी खड़ी हो रही है कि आखिर जिस महिला का शरीर है, उसकी कोख है, उसके अलावा सरकार कौन होती है, ये तय करने वाली। बहस है कि किसी में भी ममत्व और बापत्व जग सकता है। ऐसे में विज्ञान ने अगर ऐसी तरक्की कर ली है कि कोई अपना शुक्राणु के जरिये किसी दूसरे की कोख में अपना बच्चा पैदा कर सकता है और अगर उस कोख को देने वाली को एतराज नहीं है, तो फिर सरकार को क्या बीच में आना चाहिए। कई लोग तो विदेशियों और भार…

बेटी हो या बेटा, खिलाड़ी शानदार हैं, दरअसल इस देश में सिस्टम बिगड़ा है

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योगेश्वर दत्त भी बिना सोना-चांदी जीते निकल लिए हैं। अब तो हिंदुस्तान के बेटों की इज्जत बचना नामुमकिन है। पहले भी कहां बची थी। बेटों की बेइज्जती जाने-अनजाने लगभग पूरा का पूरा हिंदुस्तान बेटियों की इज्जत बढ़ाते कर रहा था। व्हाट्सएप पर अब नारी सशक्तिकरण के कुछ और नए चुटकुले, जुमले ईजान होंगे। लेकिन, सवाल क्या इस देश में खेल में बेटी-बेटा के मुकाबले का है। क्योंकि, मुझे तो लगता है कि बेटी हो या बेटा, खेल के मैदान में मजबूत होने के लिए गैर खिलाड़ी खेल संघों के धुरंधर, जमे-जमाए कोचों और सरकारी व्यवस्था से सबका मुकाबला होता है। उस कठिन मुकाबले से जीतकर बाहर निकलने वाले आपको दिख जाते हैं। दीपा कर्माकर की आज पूरे देश में चर्चा है। लेकिन, दीपा कर्मकार के कोच बता रहे हैं कि कैसे एक दूसरे गैरजिम्नास्ट कोच ने दीपा का भविष्य खत्म करने की पूरी योजना तैयार कर ली थी।दीपा के कोच बिशेस्वर नंदी ने 9 फरवरी 2012 को त्रिपुरा खेल संघ के सचिव को लिखी एक चिट्ठी में दीपा के खिलाफ की जा रही साजिश के बारे में लिखा था। कमाल की बात ये कि दीपा के खिलाफ ये साजिश करने का आरोप जिम्नास्टिक फेडरेशन ऑफ इंडिया के जीवन पर्य…

गैर जाटव वोटों के लिए बीजेपी इस “आरक्षण” के खिलाफ है

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लोकसभा चुनावों के पहले दिल्ली में यूपी भवन में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने एक कार्यकर्ता को पैर छूने से रोका, तो उस भाजपा कार्यकर्ता ने कहा- आप ब्राह्मण हैं और हमारे अध्यक्ष भी। लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने जवाब दिया- मैं हिंदू हूं, बस। उस समय लोकसभा का चुनाव चढ़ाव पर था और किसी को ये कल्पना भी नहीं थी कि भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में इस तरह का चमत्कार करने जा रही है। लगभग हर जिले में खुद प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी रैली कर रहे थे। उस समय समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर कैसे नरेंद्र मोदी और तब के उत्तर प्रदेश के प्रभारी अमित शाह को ये भरोसा है कि उत्तर प्रदेश में सभी जातियों के लोग कमल के फूल पर मुहर लगाने जा रहे हैं। दरअसल, भारतीय जनता पार्टी ने गैर जाटव छोड़ सभी दलित जातियों और गैर यादव छोड़ सभी पिछड़ी जातियों को अपने पाले में लाने की मुहिम चुपचाप चला रखी थी। यही वजह रही कि जब उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को अप्रत्याशित तौर पर बयालीस प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले। अब ये कोई रहस्य नहीं है कि मायावती की अपनी जाति के लोगों को छोड़कर काफी…

बाबू सिंह कुशवाहा की तरह दिखने लगे हैं स्वामी प्रसाद मौर्या

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बीएसपी के एक पूर्व सांसद ब्रजेश पाठक भी बीजेपी में शामिल हो गए हैं। दिल्ली में उन्होंने मायावती को छोड़कर अमित शाह को अपना नेता मान लिया। कल तक वो आगरा में थे, बहन जी की रैली के संयोजक थे। आगरा से बढ़िया एक्सप्रेस वे मिला, तो सीधे 11 अशोक रोड पहुंच गए। आगरा से दिल्ली डेढ़ घंटे का ही रास्ता है और उन्होंने बीएसपी से बीजेपी की दूरी भी डेढ़ दिन से कम में तय कर ली। दिल्ली के बीजेपी कार्यालय से आ रही तस्वीरें ठीक वैसी ही हैं, जैसी 2012 में थीं। 2012 के विधानसभा चुनावों के पहले भी दूसरे दलों से भारतीय जनता पार्टी में हो रही भगदड़ से ऐसा लगने लगा था कि भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ रही है। लगभग ऐसा ही दृष्य बना था। बहुजन समाज पार्टी के कद्दावर नेता बाबू सिंह कुशवाहा भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे। बाबू सिंह कुशवाहा के अलावा बादशाह सिंह, दद्दन मिश्रा, अवधेश वर्मा और जिलों में तो जाने कितने छोटे बड़े नेता हाथी से उतरकर कमल का फूल पकड़ने को बेताब हो रहे थे। हालांकि, 2012 और 2017 के बीच में 2014 भी आया था। 2014 के बाद की भारतीय जनता पार्टी एकदम अलग है। पार्टी पूरी तरह से ने…

650 किलोमीटर बाद भी एक जैसा अहसास!

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कोस कोस पर पानी बदले चार कोस पर बानी। ये हिन्दुस्तान की विविधता को लेकर कहा जाता है। लेकिन, मुझे लगता है कि हिंदुस्तान में चार कोस तो क्या कितना भी लंबा सफर तय कर लिया जाए, एक जैसा ही है। और ये एक जैसा पानी या बानी नहीं, उससे भी बढ़कर हर हिन्दुस्तानी की वीआईपी बनने की ललक है। और ये वीआईपी या वीवीआईपी बनने की ललक बेवजह नहीं है। इसकी बड़ी पक्की टाइप की वजह है। क्योंकि, बिना वीआईपी या वीवीआईपी बने धौंस नहीं जमती। यहां तक चौराहे पर खड़े ट्रैफिक वाला शायद नियम कानून से चलने वाले पर तो फटकार लगा देगा। लेकिन, अगर वीआईपी, वीवीआईपी टाइप का कोई बिल्ला, पट्टा स्टिकर की शक्ल में कार, SUV पर चिपका है, तो फिर कहां किसी की मजाल। यही वो अहसास है जिसने पूरे हिन्दुस्तान को एक सूत्र में बांध रखा है और इसी मसले पर देश की सारी विविधता, एकता में अद्भुत तरीके से बदल जाती है। रक्षाबंधन पर घर जाना था। 17 की रात प्रयागराज एक्सप्रेस से जाना और 18 की रात प्रयागराज एक्सप्रेस से आना। 16 तारीख दफ्तर से लौटते बोटैनिकल गार्डन वाले चौराहे के पहले एक स्कॉर्पियो में Press के साथ VIP का स्टिकर लगा देखा। लेकिन, जब उसी के …

GST के शुद्ध राजनीतिक मायने

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(GST पर ऑस्ट्रेलिया के SBS RADIO से बातचीत भी आप सुन सकते हैं।) आर्थिक सुधारों की बुनियाद पर कर सुधार के साथ देश की एक शानदार आर्थिक इमारत तैयार करने की कहानी को आगे बढ़ाने का नाम है गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स। जीएसटी मंजूरी पर और इसके लंबी प्रक्रिया के बाद कानून बन जाने के बाद तक ढेर सारे आर्थिक विद्वान इसके अच्छे और अच्छे की राह में आने वाली बाधाओं पर बहुत कुछ बताएंगे। लेकिन, राज्यसभा में जीएसटी बिल पर हुए संशोधनों के लोकसभा में मंजूरी की बहस सुनते मुझे इसके विशुद्ध राजनीतिक मायने दिखे। और इसीलिए मैं जीएसटी बिल राज्यसभा और लोकसभा दोनों से बिना किसी विरोध के मंजूर होने को विशुद्ध रूप से राजनीतिक संदर्भों में ही देख रहा हूं। दिल्ली दरबार यानी दिल्ली के उच्चवर्ग वाले क्लब को सीधे चुनौती देकर प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी के लिए इस जीएसटी के मंजूर होने के गजब के संदर्भ हैं। इसलिए ये संदर्भ ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि इसी बिल को मुख्यमंत्री रहते खुद नरेंद्र मोदी ने किसी भी कीमत पर मंजूर न होने देने की बात की थी। शायद यही वजह रही होगी कि राज्यसभा में प्रधानमंत्री जीएसटी पर चर्चा के समय …

अब ब्राह्मणों के भरोसे नहीं हैं बहनजी

एक क्षत्राणी ने बहन मायावती को पूरी चुनावी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। हालांकि, अकेली स्वाति सिंह नहीं हैं, जिनकी वजह से मायावती को अपनी चुनावी रणनीति बदलनी पड़ी हो। लेकिन, सबसे बड़ी वजह स्वाति सिंह ही हैं। उत्तर प्रदेश में 2017 में फिर से सत्ता में आने का रास्ता ब्राह्मणों या कह लीजिए कि सवर्णों के जरिये खोज रही मायावती को स्वाति सिंह ने ऐसा झटका दिया है कि ब्राह्मणों की बहन जी अब मुसलमानों की मायामैडम ही बनने की कोशिश में लग गई हैं। दरअसल 2007 में मायावती का ब्राह्मण भाईचारा बनाओ समिति का फॉर्मूला अद्भुत तरीके से कामयाब रहा। लेकिन, सच्चाई ये भी है कि उसके बाद 2012 और फिर 2014 में तो वो भाईचारा पूरी तरह से टूट गया। इसीलिए बसपा का ताजा समीकरण DM (दलित+मुसलमान) ही हो गया है। बहुजन समाज पार्टी अब पूरी तरह से दलित और मुसलमान के भरोसे ही 2017 की चुनावी वैतरणी पार करने की योजना बना रही है। इसकी ताजा झलक तब मिली, जब लखनऊ में बसपा नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने प्रेस कांफ्रेंस करके बताया कि कांग्रेस के तीन मुस्लिम विधायक अब हाथी की सवारी करेंगे। समाजवादी पार्टी का भी एक मुस्लिम विधायक अब …

सरकारी योजनाएं बेहतर करेंगी मजदूरों का जीवन?

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महात्मा गांधी ने देश में फैली असमानता पर अपने जीवन के आखिरी दिनों में जो कुछ लिखा। उसी में से कुछ पंक्तियां हैं कि मैं तुम्हें एक ताबीज देता हूं। जब तुम्हें भ्रम होने लगे। तुम्हारा अहम तुम पर हावी होने लगे तो, इस आजमाकर देखो। उस आदमी या औरत का चेहरा याद करो। जो तुम्हें अब तक सबसे कमजोर, गरीब दिखा हो। और सोचो कि जो तुम करने जा रहे हो, उससे उसका क्या कुछ भला हो सकेगा। महात्मा गांधी ने ये पंक्तियां कतार में खड़े आखिरी व्यक्ति को ध्यान में रखकर लिखी होंगी। देश की सामाजिक असमानता को ध्यान में रखकर लिखी होंगी। लेकिन, आज के संदर्भ में ये पंक्तियां असंगठित क्षेत्र के मजदूरों पर एकदम सटीक बैठती हैं। और मुझे लगता है कि ये ताबीज देश की सरकार को भी इस्तेमाल करनी चाहिए। देश में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को लेकर ढेर सारी रिपोर्ट अब तक आ चुकी हैं। इससे इतना तो पता लगता है कि दरअसल देश की जीडीपी असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के ही बूते चल रही है। लेकिन, शायद ही आजाद भारत में कोई सरकार आई हो जिसने असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की दशा सुधारने के लिए कोई ऐसा कदम उठाया हो जिससे उनके जीवनस्तर में सकारात्मक बदल…

रहम करो बाबा रहम!

हे बाबा! रहम करो रहम। वइसहीं बाबा लोगन पर भरोसा उठ सा गया है। थोड़ा बहुत स्वस्थ होने के चक्कर में योग के जरिए आप पर जम गया। अब आप पतंजलि उत्पाद बेचने के चक्कर में सब कंपनी को चोर साबित करने पर तुले हो। दरअसल आपने टीवी चैनलों, अखबारों में चौड़े से 10 हजार का लक्ष्य तय कर लिया। अब मार्केटिंग वाले लड़के-लड़कियों की तरह दूसरे के सामान को खराब प्रोडक्ट और अपने वाले को बढ़िया उत्पाद बता रहे हैं। अंग्रेजों भारत छोड़ो टाइप का आंदोलन खड़ा कर दे रहे हो। बाबा जी रेडियो पर सुन रहे थे तो हंसी आई। अब टीवी पर देखा तो बहुत जोर गुस्साए रहे हैं। सुन लो, समझ लो। नै तो बाबा जी बस इत्ता बताए दे रहे हैं। भारत में लोगों की बजार सेंसेक्स से तेज चढ़ती है, तो उतरती भी है। बाबा जी समझ रहे हो ना। रहम कर दो बाबा जी ई वाला विज्ञापन वापस ले लो। क्योंकि, हम तो चड्ढी से लेकर कार तक सब विदेशी कंपनी की पहन/इस्तेमाल कर रहे हैं। कर तो आप भी रहे होगे बाबा जी। बताते नहीं होगे। अपनी दुकान के चक्कर में देशी और स्वदेशी टाइप का गाल बजावन बंद करो। बंद करो बाबा, बंद करो। वरना अपना तो बुरा करोगे ही, देश की जनता का भी बुरा करोगे औ…

पूर्ण राज्य से बेहतर होगा दिल्ली का फिर से पूर्ण शहर बनना

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ऐसा हुआ तो निश्चित तौर पर इसका पूरा श्रेय अरविंद केजरीवाल को जाएगा। दिल्ली में चुने हुए प्रतिनिधियों के अधिकारों को लेकर स्पष्टता की बड़ी सख्त जरूरत है। अरविंद केजरीवाल चाहते हैं कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिल जाए और वो भी इसलिए कि दिल्ली की पुलिस से वो केंद्रीय मंत्रियों और यहां तक कि देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ भी सीधी कार्रवाई करा सकें। महत्वाकांक्षाओं के साथ इस तरह की राजनीति की मिसाल अरविंद केजरीवाल ही पेश कर रहे हैं। न भूतो न भविष्यति जैसा उदाहरण दिखता है। दिल्ली उच्च न्यायालय के ताजा फैसले के बाद ये बहस और तेज हो गई है कि दिल्ली में चुने प्रतिनिधियों के अधिकार क्या हैं। कमाल ये कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने संवैधानिक व्याख्या के आधार पर साफ कर दिया कि दिल्ली केंद्रशासित होने की वजह से केंद्र सरकार के अधीन आता है और इसीलिए केंद्र के प्रतिनिधि के नाते उप राज्यपाल का ही फैसला अंतिम होगा। अब सवाल ये खड़ा होता है कि आखिर इस तरह की जरूरत क्यों आ पड़ी। दरअसल दिल्ली के लोकतांत्रिक ढांचे को लेकर हमेशा से उलझन रही है। और ये उलझन ही थी कि 1952 में बनी दिल्ली विधानसभा 1966 आते-आते दिल…

भाजपा की हिंदू राजनीति का तुरुप का पत्ता हैं विजय रूपानी

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2013 के आखिर में भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह से बदल गई। ये अंदाजा शायद ही किसी को लगा हो। ये अंदाजा इसलिए नहीं लगा क्योंकि, नरेंद्र मोदी के भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनने के एलान के बाद अंदाजा लगाने वाले सारे राजनीतिक पंडित तो यही अंदाजा लगाने में फंसे रह गए कि गुरु-चेले की ये लड़ाई भाजपा को दो फाड़ करेगी क्या? इस अंदाजा लगाने में राजनीतिक पंडितों को ये कतई समझ में नहीं आया कि दरअसल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदूओं को एकजुट करने के लिए सामाजिक अभियान के साथ राजनीतिक दांव भी चलने जा रहा है। एक ऐसा दांव जो मंडल-कमंडल से बहुत आगे का था। ये दांव था देश में अनुमानित राजनीति को ध्वस्त करने का। और इस राजनीति के लिए विशुद्ध हिंदुत्व वाले चेहरे लालकृष्ण आडवाणी से बहुत बेहतर चेहरा था नरेंद्र मोदी का। नरेंद्र मोदी का इसलिए क्योंकि, मोदी उस घांची तेली समाज से आते थे जो, किसी भी तरह से किसी जातीय ताकत का केंद्र नहीं बन सकता था। इसलिए नरेंद्र मोदी संघ की उस हिंदू संगठन की कल्पना के सटीक वाहक थे। साथ ही नरेंद्र मोदी हिंदू हृदय सम्राट से बड़े सलीके से विकास पुरुष बन चुके थ…

मंजूर GST हुआ, प्रतिष्ठा इन नेताओं की बढ़ गई

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GST बिल राज्यसभा में मंजूर हो गया। हालांकि, इसके कानून में बनने में अभी लंबी प्रक्रिया है। लेकिन, इतना तो तय दिख रहा है GST के कानून बनने से देश की आर्थिक तरक्की की रफ्तार सुधरेगी। देश दुनिया में आर्थिक तौर पर और ताकतवर होगा। ये इसका आर्थिक पहलू हुआ। लेकिन, इसका एक राजनीतिक पहलू भी है। इस GST बिल के मंजूर होने से भाजपा और कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं का कद और बड़ा हो गया है। साथ ही खुद प्रधानमंत्री भी स्वीकार्य हुए हैं। देखिए और कौन से नेता हैं जिनकी प्रतिष्ठा GST बिल राज्यसभा में मंजूर होने से और बढ़ गई।
नरेंद्र मोदी- ढेर सारे आर्थिक सुधारों का इस सरकार ने एलान किया। कारोबार में आसानी से लेकर बहुत सी उपलब्धियां प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी के माथे सज सकती हैं। लेकिन, अभी तक यही माना जाता था कि नरेंद्र मोदी अपनी जिद में विपक्ष को साथ लेकर नहीं चलना चाहते। GST के राज्यसभा से मंजूर होने के बाद नरेंद्र मोदी पर ये आरोप हल्का होगा। साथ ही प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी की स्वीकार्यता सभी दलों में बढ़ने का संकेत है। ये भी कह सकते हैं कि कांग्रेस ने ढाई साल बाद आखिरकार नरेंद्र मोद…