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Showing posts from January, 2010

गलत नीति से सही समाधान की उम्मीद

केंद्र सरकार ने राज्यों से कहा है कि वो, टीचरों के रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाकर 65 साल कर दें। साथ ही प्रोफेसरों को 70 साल तक पढ़ाने दिया जाए। केंद्र सरकार का ये निर्देश राज्यों को इस वजह से आया है कि देश के स्कूलों में पढ़ाने वालों की बेहद कमी है और अगर ऐसे में टीचरों, प्रोफेसरों की 58-60 उम्र वाले लोग रिटायर हो गए तो, विद्यालयों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वालों की समस्या और बढ़ जाएगी।
पहली नजर में देखें तो, लगता है कि देश में जिस तरह से शिक्षकों के पद खाली हैं उसमें ये राहत की बात होगी। देश भर में आठवीं तक के विद्यालयों में ही करीब दस लाख शिक्षकों की कमी है। सरकार बरसों से शिक्षाकार्य में लगे इन बुजुर्ग शिक्षकों के जरिए गुणवत्ता बेहतर करने की भी बात कह रही है। अब सवाल ये है कि जहां लाखों नौजवान अपने बुजुर्गों से कई गुना ज्यादा प्रतियोगी माहौल में पढ़ाई करके नौकरी के लिए आवेदन करते घूम रहे हैं। और, उन्हें कोई नौकरी नहीं मिल रही है। वहां संन्यास की उम्र में पहुंच चुके लोगों से अपने परिवार के साथ आखिरी समय का बेहतर इस्तेमाल करने का ये मौका सरकार क्यों छीनना चाह रही है।
पहले ही सरक…

बेवजह नर्वस नहीं हैं शीला दीक्षित

ज्यादातर सरकारी नीतियां शहरों को ही ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं। पिछले बजट में सबसे ज्यादा पैसा जिन मदों में आवंटित किया गया, उनमें शहरों की बेहतरी प्रमुख है। देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रहते हुए लगता भी है कि सरकार शहरों की बेहतरी के लिए हर कोशिश कर रही है। ये अलग बात है कि अभी दिल्ली के वर्ल्ड क्लास बनने में अक्टूबर 2010 में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स की डेडलाइन का डर ज्यादा है।

लेकिन, कॉमनवेल्थ गेम्स की डेडलाइन के डर में सरकार की पूरी ताकत लगा देने के बाद भी दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित बोल ही पड़ती हैं कि वो, कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों को लेकर नर्वस हैं। और, शीला दीक्षित का इस तरह से नर्वस होना देश के शहरी सिस्टम और सरकार के बेहतर शहर बनाने के फोकस पर काले धब्बे जैसा दिखता है। क्योंकि, दरअसल दिल्ली ही पूरे देश में ऐसा शहर है—राज्य भी कहा जाता है—जहां से शहर बनाने के सारे पैमानों का परीक्षण होकर ही देश के दूसरे शहरों में लागू किया जाता है। यही वजह है कि दूसरे शहरों से काफी ज्यादा चमकती दिल्ली में हर शहर से लोग आकर इस शहरी चमक के हकदार पहले बन जाना चाहते हैं। लेकिन,…

शहर तो हमने बनाए ही नहीं

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सात साढ़े सात परसेंट की ग्रोथ का भरोसा हमारे प्रधानमंत्री-वित्त मंत्री को फिर होने लगा है। सब ठीक हो रहा है। शहरी अर्थव्यवस्था, शहरी उपभोक्ता पर फिर भरोसा जग रहा है। कंज्यूमर (जिसकी जेब में पैसे हैं और जो सबकुछ खरीद सकता है) फिर महत्व पाने लगा है। लेकिन, सारी तरक्की शहरों के जरिए होते देखने वाली सरकारों ने क्या सचमुच के शहर बनाए भी हैं।


देश के महानगरों की बात आज मैं छोड़ रहा हूं। अगले लेख में देश का सबसे बड़ा शहर, दिल्ली कितना शहर हो पाया है इसकी बात करूंगा लेकिन, अभी बात देश के दूसरे शहरों की जो, किसी जिले के मुख्यालय होते हैं। कुछ समय पहले जौनपुर गया। वैसे तो, हमेशा ही जौनपुर में गाड़ी चलाना मौत के कुएं में कार चलाने जैसा होता है। जैसे मौत के कुएं में जरा सा चूके तो, जान गई वैसे ही जौनपुर में गाड़ी चलाते जरा सा सावधानी हटी कि बड़ा दुर्घटना घटी। सड़कें तो शहर जैसी हैं नहीं लेकिन, नरसिम्हाराव-मनमोहन की जोड़ी के करीब दो दशक पहले लाए गए उदारीकरण ने सबकी जेब में गाड़ी खरीदने लायक पैसे डाल दिए हैं।


इस बार जौनपुर के प्रशासनिक अधिकारियों ने शहर के तंगहाल ट्रैफिक को सुधारने का नया रास्ता निकाल…

हम कुछ जुगाड़ तो खोज ही लेंगे

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सर्दी के मौसम में भी इस बार बिजली की काफी किल्लत हो रही है। दिल्ली से लेकर इलाहाबाद कुछ घंटे की बिजली कटौती पक्की रही। नोएडा में 1-2 घंटे गई तो, इलाहाबाद में 10-1 का बिजली कटौती का कोटा पक्का रहा। बिजली बनाई ही नहीं जा पा रही है लोगों की जरूरत भर का।
फिर एक आंकड़ा और सामने आता है कि डिस्ट्रीब्यूशन लॉस में ही करीब 30 प्रतिशत बिजली बेकार चली जाती है। यानी ये बिजली बिजलीघरों से चलती है लेकिन, खंभों, ट्रांसफार्मरों और बिजली चोरों के कटिया की भेंट चढ़ जाती है। अब इस बिजली को खास बिजलीचोरों के कटिया से बिजली की हत्या न हो इसका इंतजाम किया जा रहा है। उम्मीद है कि ये हर जगह हो रहा होगा। हमने इलाहाबाद में देखा कि बिजली के खुले तारों की जगह नए तार आ रहे हैं जो लैमिनेटेड हैं। यानी पहले के खुले तारों की तरह अब इस तार पर कहीं से भी कटिया मारकर बिजली नहीं चुराई जा सकेगी। मैं बड़ा प्रसन्न था कि चलो अच्छा है कि जो, जितनी बिजली जलाएगा उतना बिल देगा। विभाग का रेवेन्यू बढ़ेगा। नए पावरहाउस बनाने में आसानी होगी।
इस नए तार का कमाल था कि जिस दिन तार बदला अचानक वोल्टेज ऐसा हो गया कि बल्ब, ट्यूब दिन जैसा रोशनी …

ये हाईवे तो तरक्की के हैं लेकिन, ...

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तरक्की की कई नई इबारतें साफ दिखने लगी हैं। इबारतें अभी पूरी कॉपी में 2-4 पन्नों पर ही लिखी हैं। इसलिए इन इबारतों का असर अभी खास नहीं दिखता। लेकिन, ये इबारतें पूरी कॉपी भर दें तो, सचमुच तरक्की के हाईवे पर हमारी रफ्तार तेज हो जाएगी।
अटल बिहारी वाजपेयी जीवित हैं लेकिन, ज्यादा ध्यान देकर न सोचा जाए तो, ये तगड़ा भ्रम होगा कि वाजपेयी जी हमारे बीच हैं या नहीं। मैं जब भी किसी शानदार हाईवे पर गाड़ी दौड़ाता हूं तो, अनायास मुझे अटल बिहारी वाजपेयी याद आ जाते हैं। अभी दिल्ली से मथुरा और फिर भरतपुर के रास्ते कटकर आगरा जयपुर हाईवे पर जाना हुआ। अब मुझे ध्यान में नहीं आ रहा है कि इन दोनों में से किसी हाईवे की बेहतरी में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार का योगदान रहा है या नहीं। लेकिन, शानदार चमकते किसी भी हाईवे को देखकर अटल सरकार की स्वर्णिम चतुर्भुज योजना याद आ जाती है।
दिल्ली से बालाजी तक के रास्ते में दिल्ली से फरीदाबाद तक और मथुरा से आगरा-जयपुर हाईवे को मिलाने वाले रास्ते की दूरी को छोड़ दें तो, सफर शानदार था। गाड़ी में किसी तरह की थकान नहीं महसूस हो रही थी। मजे से 80-90 की रफ्तार पर बिना किसी तनाव के गा…

अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा

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भारत देख समझ लिया जाए तो, जीवन सफल हो जाए। अभी मेंहदीपुर के बालाजी हनुमान के दर्शन के लिए गया था। आगरा-जयपुर के शानदार हाईवे से होकर वहां के लिए रास्ता जाता है। मथुरा से इसके लिए रास्ता कटता है।



आगरा-जयपुर हाईवे पर घुसने के कुछ ही देर में हमारी नजर अगल-बगल के गांवों के नाम वाले बोर्ड पर पड़ी। लगा ये सारे नाम कुछ अलग हैं। कम से कम उत्तर प्रदेश के गांवों-शहरों में ऐसे नाम तो हमें नहीं दिखे। यूं ही लिखता चला गया। दरअसल इनके अर्थ वैसे ही होंगे जैसे दूसरे राज्यों के गांवो-कस्बों के नाम होते हैं। बस ये नाम राजस्थान की बदलती भाषा के लिहाज से भी बदल गए होंगे।


विनउवा
बहुआ का नगला
छौंकरवाड़ी
लुधावई
सेवला
पहरसर
रैना
डेहरा
नदबई
महवा
हंतरा
वैर
अरोडा
हलैना
नया गांव माफी
नसवारा
तिलचिवी
झालाटाला
बछरैन
खेडाली
गदसिया
रौत हंडिया
हिंडौन
समलेटी
पडाली
पीपलखेड़ा
टिकरी जाफरानी
उलूपुरा
लुलहारा