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Showing posts from 2008

बहिनजी गलती हो गई माफी कैसे मिल पाएगी

उत्तर प्रदेश की जनता को कर्कश आवाज में मुलायम के जंगलराज के खिलाफ चीखकर मायावती ने ठग लिया है। जिन दलितों के दबे होने को लेकर वो सत्ता में आई अब वही दलित होना मायावती के लिए इतना बड़ा हथियार बन गया है कि पूरा उत्तर प्रदेश दलित बन गया है। मनुवाद को गाली देने वाली मायावती सबसे बड़ी मनुवादी हो गई है।

मायाराज- जंगलराज का समानार्थी शब्द लगने लगा है। लेकिन, दरअसल ये जंगलराज से बदतर हो गया है। क्योंकि, जंगल का भी कुछ तो कानून होता ही है। 24 अगस्त को मैंने बतंगड़ ब्लॉग पर लिखा था कि गुंडे चढ़ गए हाथी पर पत्थर रख लो छाती पर लेकिन, अब ये जरूरी हो गया है कि हाथी पर चढ़े गुंडों को पत्थरों से मार गिराया जाए। क्योंकि, पहले से bimaru उत्तर प्रदेश की बीमारी अब नासूर बनती जा रही है। शुरू में जब अपनी ही पार्टी के अपराधियों को मायावती ने जेल भेजा तो, लगा कि मायाराज, मुलायम राज से बेहतर है। लेकिन, ये वैसा ही था जैसा नया भ्रष्ट दरोगा थाना संभालते ही पुराने बदमाशों को निपटाकर छवि चमकाता है और अपने बदमाश पाल-पोसकर बड़े करता है। पता नहीं अभी up (उल्टा प्रदेश) को और कितना उलटा होना बाकी है।

और, सच्चाई तो यही ह…

Nawaz does an antulay on Zardari … I don’t think so .. what do u think

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मेरे शीर्षक का पहला हिस्सा शनिवार को मुंबई के the free press journal की हेडलाइन थी जिस पर मुझे भयानक एतराज है। और, ये एतराज इसलिए भी बढ़ जाता है कि सिर्फ तुक ताल बिठाने के लिए फ्री प्रेस जर्नल ने ये हेडलाइन ठेल दी। वैसे तो, फ्री प्रेस जर्नल कितने लोग पढ़ते हैं इसका मुझे पता नहीं है लेकिन, फिर भी जाहिर है कुछ लोग तो ऐसे होंगे ही जिन्होंने इस हेडलाइन को पढ़कर नवाज शरीफ के साथ गैरशरीफ अंतुले को भी एक खांचे में डाल दिया होगा।

अब जरा एक नजर डालें कि आखिर पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और यूपीए सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री ने क्या ऐसा किया कि मीडिया उनमें समानता खोजने लगा है। ऊपर से तो, दरअसल सिर्फ एक समानता दिखती है वो, ये कि ये दोनों अपने देश की सरकारों को सांसत मे डाल रहे हैं। और, इन दोनों के बयानों से- अंतुले के बयान से पाकिस्तान और शरीफ के बयान से भारत को- पड़ोसी देश को आरोप में मजबूती मिली है और इन दोनों के अपने देश का पक्ष कमजोर हुआ है।

अब सवाल ये है कि दिक्कत क्या है लोकतंत्र है और दोनों देशों में ऐसे सुर रखने वाले लोग हैं ये, …

मुंबई में जिंदगी की रफ्तार से तेज दौड़ रही है दहशत

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मुंबई में जिंदगी की रफ्तार कुछ ऐसी है कि छोटे शहरों से आया आदमी तो यहां खो जाता है। उसे चक्कर सा आने लगता है। इस रफ्तार को समझकर इसके साथ तो बहुतेरे चल लेते हैं। लेकिन, इस रफ्तार को कोई मात दे देगा ये, मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था। पर 16 दिसंबर को रात 8 बजे की करी रोड से थाना की लोकल ट्रेन में सफर के दौरान दहशत मैंने अपने नजदीक से गुजरते देखी।

करी रोड से स्टेशन पहुंचकर रुकी तो, अचानक हवा में कुछ आवाजें सुनाई दीं कि कोई लावारिस बैग पड़ा है। 30 सेकेंड भी नहीं लगे होंगे कि ठसाठस भरी ट्रेन में एक दूसरे के शरीर से चिपककर पिछले 40 मिनट से यात्रा कर रहे यात्री एक दूसरे से छिटककर प्लेटफॉर्म पर पहुंच गए। फर्स्टक्लास का पूरा कंपार्टमेंट खाली हो गया था। शायद ये मुंबई की लोकल में चलने का लोगों का अभ्यास ही था कि लोग क दूसरे से रगड़ते 30 सेकेंड में ट्रेन के डिब्बे से बाहर हो गए और कोई दुर्घटना न हुई।


4-5 मिनट रुकने और पुलिस की जांच के बाद ट्रेन चल दी और फिर ट्रेन में नशे में धुत एक आदमी की इस बात से कि- कौन साला इस मारामारी की जिंदगी को ढोना चाहता है-जब मरना होगा तो, मरेंगे ही। क्या बाहर मौत नहीं ह…

जरदारी पर भरोसा करने में हर्ज क्या है

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पाकिस्तान पर हमला बोल देना चाहिए। पाकिस्तान से सारे रिश्ते खत्म कर लेना चाहिए। मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले और उसके बाद इसमें पाकिस्तानी धरती के इस्तेमाल के साफ सबूत के बाद इस तरह की आवाजें तेज हो गई हैं। राजनीतिक नफा-नुकसान के लिहाज से ही सभी पार्टियों के नेता सड़क पर बयान दे रहे हैं। हां, अच्छी बात ये है कि संसद के भीतर आतंकवाद पर हुई चर्चा में बरसों बाद भारतीय नेता की ही तरह सारी पार्टियों ने बात की। कांग्रेस-भाजपा-लेफ्ट के चिन्हों से भले ही जनता उन्हें अलग नहीं कर पा रही है। अब सवाल ये है कि उस दिन की चर्चा के बाद क्या।

पाकिस्तान और भारत की सरकारें लगभग एक जैसे सुर में बात कर रही हैं। दोनों अपने देश के लोगों का भरोसा खोना नहीं चाहते। दोनों देशों की सरकारों को अब आतंकवाद नासूर बन गया दिख रहा है। और, उस नासूर का मवाद इस कदर बढ़ता जा रहा है कि शरीर का अंग कटने की नौबत आ गई है। वैसे, इस नासूर को पालने-पोसने में 1947 के बाद से दोनों देशों की सत्ता संभालने वालों ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत धार्मिक बुनियाद पर नहीं बंटा था, सब रंग मिले थे इसलिए खूनी रंग हम पर बहुत कम चढ़ा और इसक…

नपुंसक नेताओं के हाथ में कब तक रहेगा देश

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खून खौल रहा है। इच्छा ये कि क्यों नहीं मैं भी किसी फोर्स में हुआ। और, क्यों नहीं ऐसा मौका मुझे भी मिला कि दो-चार आतंवादियों को मार गिराता। साथ में कुछ नपुंसक नेताओं को भी। हम टीवी वाले भले ही देश को न्यूज दिखाने के चक्कर में हर खबर को नाटकीय अंदाज में पेश करने वाले बन गए हैं। लेकिन, सच्चाई यही है कि कलेजा हमारा भी कांपता है। औऱ, खून हमारा भी खौलता है।


लगातार आतंकवादी चुनौती दे रहे हैं और जब आतंकवादी ऐसा धमाका करते हैं, सरेआम हिंदुस्तानियों की लाशें गिराते हैं, तब भले ही हम मीडिया वाले झकझोर कर देश को जगाने की कोशिश करते हों लेकिन, ये रात का धमाका सुबह की रोशनी के साथ डर भी खत्म कर देता है। और, आतंकवादियों के लिए सुबह फिर से नई तैयारी का रास्ता बना देती है। क्योंकि, हम नपुंसक नेता और उनके इशारे पर एक ही धमाके के लिए अलग-अलग मास्टरमाइंड पकड़ने वाली एटीएस और पुलिस के बताए भर से ही संतोष कर सकते हैं।


देश का आम आदमी मर रहा है। अब मैं ये सोच रहा हूं कि क्या कोई आम आदमी जागेगा नहीं। देश में घुन की तरह आतंकवादियों के हिमायती ऐसे भर गए हैं कि जाने कितने बुधवार की जरूरत है। मुझे नहीं समझ में आत…

मन के सुकून के लिए

मेरे मित्र रवीश इस बार बहराइच गए तो, उन्हें दर्दनाक खबर सुनने को मिली। उनके दोस्त की हत्या कर दी गई जिसे पुलिस दुर्घटना बता रही है। पत्रकार होने के बावजूद वो, बहराइच में कुछ खास नहीं कर पाए। उन्होंने ये वाकया मेरे पास भेजा जिसे में ब्लॉग पर छाप रहा हूं। कोई और मदद तो हम दूर बैठकर शायद नहीं कर सकते। लेकिन, आवाज तो उठा ही सकते हैं।

अब जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है कम से कम राकेश की मौत ने यह बता दिया...मैं पिछले दिनों अपने शहर बहराईच गया था वहीं पता चला कि मेरे दोस्त राकेश साहू का क़त्ल हो गया....हालांकि पुलिस ने बताया कि उसकी हत्या नहीं बल्कि दुॆघटना हुई...लेकिन मौके-ए-वारदात और मेरे दोस्त महेद्र के प्रयासों के चलते हम यह समझाने में कामयाब रहे कि राकेश का बाकायदा क़त्ल किया गया है....राकेश रंगकॆमी..साहित्यकार..और मददगार शख्श था...हमेशा हंसते हुए वो दूसरों की मदद करता था लेकिन पैसों से नहीं बल्कि साथ खड़े होकर..मैं जब भी अपने घर से वापस दिल्ली या कहीं और जाने लगता तो वह कोशिश करके मुझे छोड़ने रोडवेज तक आता था..और बाद में नम आंखों से हाथ हिलाता रहता तब तक जब तक मेरी बस उसकी आंखों से ओझल …

लतियाए, जूतियाए, काटे, गोली खाने के बाद भी हम ऐसे ही रहेंगे

हमारा पिटना, मरना देश भर की चिंता की विषय बना हुआ है। देश (कहने भर को ही है-हर मुद्दे पर तो बंटा है) पता नहीं ऐसे सोच रहा है कि नहीं लेकिन, हम ऐसे ही सोच रहे हैं। क्योंकि, हम आजादी के बाद से (और, मुझे तो लगता है कि उत्पत्ति के साथ ही) ही ये मानने लगे हैं कि हम कमजोर होते हैं तो, देश कमजोर होता है। हम मजबूत रहते हैं तो, देश मजबूत होता है। ये अलग बात है कि जब हमसे कोई पूछता है कि हमने देश की मजबूती के लिए कभी कुछ किया क्या। तो, जवाब आता है- हमहीं तो, देश चलाते हैं- दिमाग चलाते हैं। और, दिमाग चलाना तो, बड़ा काम है। अब जो, दिमाग नहीं चला पाए 60-62 सालों में अब वो सब हम पर लात-जूते गोली चला रहे हैं। फिर भी हम दिमाग चला रहे हैं- रिरिया रहे हैं थोड़ा लात कम चलाओ भाई।

हम कहते हैं कि हम देश को ढेर सारे प्रधानमंत्री, रेलमंत्री से लेकर पता नहीं कौन-कौन त मंत्री और बड़े-बड़े ब्यूरोक्रैट देते हैं। हम कहते हैं कि हम देश के हर हिस्से में जाकर वहां का उत्थान करते हैं। हम कहते हैं कि हम किसी भी हालात में रह सकते हैं किसी भी हालत तक पहुंच सकते हैं। हमारी वजह से देश के दूसरे राज्यों के उद्योग-धंधे चल रहे…

आइए दीपावली पर भारत को कंजरवेटिव बनाने का संकल्प लेते हैं

मेरी याद की पहली दीवाली है जिसका उत्साह कम से कम मीडिया के जरिए तो काफी ठंडा नजर आ रहा है। कई चैनलों पर तो लुढ़कते शेयर बाजार की वजह से काली दीवाली तक चमकता नजर आया। मुंबई में नौकरियां जाने के बाद हंगामा करते डेंटेड-पेंटेड जेट के कर्मचारी चैनलों पर काली दीवाली की नींव पुख्ता कर रहे थे। ये अलग बात है कि नरेश गोयल की आत्मा की आवाज ने फिर से मंदी में नौकरी जाने की स्टिंग के विजुअल में से इन कर्मचारियों को निकालने पर मजबूर कर दिया।

ये दीवाली ऐसी आई है कि दुनिया के सबसे जवान देश के चेहरे की झुर्रियां और गहरी होती जा रही हैं। अखबारों-चैनलों की खबर की शुरुआत कुछ इस तरह से हो रही है कि बुरी खबरों का सिलसिला अभी बंद नहीं हुआ है.. एक और बुरी खबर ये है.. अंतरराष्ट्रीय बाजार से लगातार बुरी खबरें आ रही हैं.. घरेलू मोरचे से भी बुरी खबरें आ रही हैं.. । हाल कुछ ऐसा कि जवान भारत अगर मीडिया के जरिए अपनी (बीमारी) के बारे में पता करना चाहता है तो, उसे लगता है कि देश तो, ICU में जाने लायक हो गया है।

कभी-कभी तो बीमारी लाइलाज लगने लगती है। 60 साल में बेकारी-बदहाली का मर्ज भी इतना खतरनाक नहीं लगा जितना एक अं…

जहां हर पांचवा पर्यटक भारतीय है

अभी हाल में ही प्रतापजी दक्षिण अफ्रीका होकर लौटे। वहां से लौटने के बाद वहां के सामाजिक परिवेश और उसका भारत से शानदार तुलनात्मक विश्लेषण किया। उनके इन लेखों की सीरीज अमर उजाला में छपी। मैं उसे यहां भी पेश कर रहा हूं। चौथी और आखिरी कड़ी में वहां भारतीय पर्यटकों पर नजर

मेघा सम्पत बता रहीं थी कि हर साल पूरी दुनिया से दक्षिण अफ्रीका जाने वाले पर्यटकों में 20 प्रतिशत से अधिक भारत से आते हैं। यहां से भारत जाने की संख्या लगभग बराबर ही है। बालीवुड के निमार्ताओं को भी जोहांसबर्ग, केपटाउन और डरबन की लोकेशन काफी रास आ रहीं हैं। गांधी और किक्रेट ऐसे दो बिंदु है, जो दो देशों को आपस में जोड़ते हैं। मेघा सम्पत साउथ अफ्रीका टूरिज्म की इंडिया के लिए कंट्री मैनेजर हैं। केपटाउन के होटल मिलेनियर्स में एक शाम हम सब बैठे थे। अपने शक-सुबह और सवालों पर आपस में बातें कर रहें थे।

मेघा जिस समय यह बता रहीं थी, पास की दूसरी टेबिल पर बैठे दो काले लोगों से मैं पूछता हूं। शाम के साढ़े सात बजे हैं, मैं बाहर अकेले घूमने जाना चाहता हूं। दोनों मिलकर मुझे रोकते हैं। बाहर हो सकने वाले संभावित खतरे से मुझे आगाह करते हैं। इ…

लीजिए साहब हैसियत सामने आ गई

हम ये समझ नहीं पा रहे हैं कि हम कैसा देश बनें। लेकिन, हमारे देश की अभी क्या हैसियत है। इस कड़वी सच्चाई का अक्सर दूसरे-चौथे रोज सामना करना पड़ जाता है। अखबार के पन्ने पर बॉक्सर विजेंदर कुमार और पहलवान सुशील कुमार के साथ सोनिया गांधी की मुस्कुराती तस्वीर के ठीक नीचे से असलियत कुछ वैसे ही झांक रही थी जैसे, परदा कहानी में परदा गिरते ही सारी लाट साहबी की सच्चाई पठान के सामने आ जाती है।

अखबार के पहले पन्ने पर सबसे बोल्ड फॉण्ट में खबर है कि दुनिया के एक तिहाई गरीब सिर्फ हमारे महान देश भारत में पाए जाते हैं। यानी, दुनिया के सबसे ज्यादा खतरनाक बीमारी से ग्रसित लोग भारत में ही हैं। गरीबी दुनिया की सबसे खतरनाक बीमारी है इससे भला किसी को क्या इनकार होगा। और, इस बीमारी से पीड़ित मरीज हमारे देश में अफ्रीका के उन इलाकों से भी ज्यादा हैं जहां की गंदी तस्वीरें दिखाकर BBC WORLD और CNN दुनिया (खासकर धनाढ्य देशों) को ये बताते हैं कि गरीब नाम के बीमार ऐसे होते हैं। लगे हाथ ये भी बताने से नहीं चूकते कि ये प्रजाति विलुप्त होने के बजाए बढ़ रही है लेकिन, अमरीका-लंदन जैसी जगहों पर शायद ही इनके कुछ अवशेष बचे हों…

हम कैसा देश बनें

बड़ी भयानक ऊहापोह है। भारत इसी ऊहापोह में आजादी के बाद से ऐसा जूझ रहा है कि खुद का भी वजूद नहीं बचा रह पाया है। कुल मिलाकर ऐसे कहें कि एक बार हम जब गुलाम हुए तब से आज तक यानी सैकड़ों सालों से हम तय ही नहीं कर पा रहे हैं कि हम गुलाम है या आजाद। मुगलों और अंग्रेजों ने हमें ऐसा रगड़ा है कि हम देश वासी मुंबई की रगड़ा पेटीस हो गए हैं। पता ही नहीं चलता- मटर कितनी है, पानी कितना है, कितना गरम है और गरम है तो क्या गरम है आलू की टिक्की या फिर मटर या सिर्फ मटर का पानी।

आजादी के बाद नए मापदंड बने। पहले बरसों हम नेहरूवियन मॉडल में गुटनिरपेक्ष बने- फिर उनकी सुपुत्री इंदिरा गांधी ने कहा- सोवियत संघ जैसा बनना चाहिए। उधर, इंदिरा गांधी की अकाल मौत हुई और इधर सोवियत संघ का संघ ही गायब हो गया और सिर्फ रूस (Russia) रह गया। सोचिए, अगर आज भी रूस, सोवियत संघ (united states of soviet russia) रहा होता तो, अमेरिका से आज भी आगे होता। कहां- अरे, वहीं जहां सबसे आगे निकलकर चीन ने दुनिया को पटक मारा है। वही बीजिंग ओलंपिक जो, कल खत्म हो गया लेकिन, दुनिया को बता गया कि अब दुनिया का दादा वॉशिंगटन नहीं रह गया। नया बा…

हाथी और ड्रैगन की लड़ाई

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अभी हाल में ही प्रतापजी दक्षिण अफ्रीका होकर लौटे। वहां से लौटने के बाद वहां के सामाजिक परिवेश और उसका भारत से शानदार तुलनात्मक विश्लेषण किया। उनके इन लेखों की सीरीज अमर उजाला में छपी। मैं उसे यहां भी पेश कर रहा हूं। तीसरी कड़ी में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के बाजार में चीन और भारत की जंग का नजारा दिखाया है।

जोहांसबर्ग की सडक़ों के किनारे भारतीय कंपंनियों की होर्डिंज्स देखते ही छाती फूल जाती है। यह जानने पर कि भारतीय कंपंनियां यहां इतना बेहतर कर रही हैं कि उनका मुकाबला चीन और दूसरे संपंन्न राष्ट्रों से किया जाता है, भीतर का सुख दोगुना हो जाता है। अपने देश में हम इन उद्यमयिों को लेकर भले ही तरह-तरह के सवाल खड़े करते रहे हैं। दूर देश में लेकिन उनकी तरक्की के किस्से सुनना कानों को प्रिय लगता है।

आप किसी भारतीय मूल के दक्षिण अफ्रीकी से सिर्फ ये पूछिए कि यहां कौन-कौन सी भारतीय कंपंनियां क्या कर रही हैं? एक सांस में वो आपको गिना देगा। ताजातरीन एमटीएन अधिग्रहण का जिक्र सबसे पहले आएगा। दक्षिण अफ्रीका की प्रमुख मोबाइल कंपनी के अधिग्रहण को लेकर अंबानी बंधुओं में जंग चल रही है। शुरूआत में भारती टेल…

देश और शरीर में बड़ा फरक है

कश्मीर मसले को भारतीय लोकतांत्रिक तरीके से सुलझाना नामुमिकन है। भारतीय लोकतंत्र की इतनी मजबूरियां हैं कि वो, कोई फैसला नहीं ले सकता। इस लोकतंत्र के 60 साल सिर्फ सहमति बनाने की चिरकुटाई में बीत गए। वो, भी सहमति बनाने की कोशिश उनसे जो सहमत तो हो ही नहीं सकते। क्योंकि, सहमत होने के बाद उनकी हैसियत ही नहीं रह जाएगी।

अब इस देश का मीडिया, मीरवाइज उमर फारुक, फारुक अब्दुल्ला के सुपुत्र उमर अब्दुल्ला, मुफ्ती की सुपुत्री महबूबा मुफ्ती के साथ कांग्रेस, बीजेपी नेताओं को स्टूडियो में बैठाकर सहमति बनाने की कोशिस कर रहा है। भारतीय लोकतंत्र में मीडिया को इतनी आजादी है कि वो, स्टूडियो में देश के किसी हिस्से को देश से आजादी की मजे से वकालत कर लेते हैं। वकालत नहीं तो, निष्पक्ष और स्वतंत्र मीडिया दिखने की कोशिश में उस प्रेशर ग्रुप में शामिल हो गए हैं। जो, कश्मीर की आजादी का हिमायती है।

मैंने भी कश्मीर के हालात से दुखी होकर 14 अगस्त को ये लिख मारा था कि आज कश्मीर को आजाद कर देना चाहिए। मैंने वो, लेख दरअसल देश जबरदस्त तौर पर उबाल मार रही उस भावना के तहत लिख मारा था कि – एक छोटी सी जन्नत के लिए पूरे देश …

गुंडे चढ़ गए हाथी पे, पत्थर रख लो छाती पे

सब अलटा-पलटी हो गया है। एक अमेरिका के साथ परमाणु करार की बात ने देश के सारे राजनैतिक समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है। दुनिया के दादा अमेरिका की खिलाफत के मुद्दे पर देश में कुछ लोगों को ये भ्रम हुआ कि इस मुद्दे से देश का दादा बना जा सकता है। उसमें बीजेपी के लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी, अमर सिंह जैसे दलाल ! (ये अमर सिंह खुद स्वीकारते हैं कि ये काम वो सबसे बेहतर करते हैं और अब तो, बाकायदा सुर्खियां इसी से बनती हैं) से पटकनी खाए गुस्से से लाल करात और दलितों की मसीहा बहन मायावती सबसे आगे चल रहे थे।

देश का संवैधानिक दादा यानी प्रधानमंत्री बनने की इस इच्छा ने और कुछ किया हो या न किया हो। अलग-अलग राज्यों में बाहुबली सांसदों (असंवैधानिक दादाओं) का बड़ा भला कर दिया। और, इसमें मदद मिली अदालतों से। आप में से कितने लोगों को याद होगा कि अदालत से दोषी करार दिए गए लोगों को संसद-विधानसभा का चुनाव लड़ने से रोकने के लिए बात चल रही थी। लेकिन, जब देश में दादागिरी का मुकाबला चल रहा हो तो, भला छोटे-मोटे दादाओं के दुष्कर्म रोकने की चिंता भला किसे होती। बस यूपी-बिहार के दादा लोगों को जेल से सम्माननीय सांसद (लोकसभा…

बिग बॉस के घर में सबके पाप धुल जाएंगे

आखिरकार बिग बॉस के घर में देश के छंटे हुए लोगों का पहला हफ्ता बीत गया। बिग बॉस की नजर सब पर थी। इसलिए संजय निरुपम को ही जाना था और वो, बिग बॉस के घर से बाहर गए। मुझको तो वजह भी साफ दिखती है। बिग बॉस के घर में रहकर जितनी नौटंकी-कमीनापन और नंगई करनी है वो, संजय कर नहीं पा रहे थे। कम से कम परदे पर बिग बॉस की नजरों के सामने तो नहीं ही कर पा रहे थे (परदे के पीछे तो नेता सब करते ही हैं ये, तो जनता जानती है और मानती भी है)। और, संजय का काम भी हो चुका था-बिग बॉस का भी।

पहले बिग बॉस के काम की बात करें तो, वो ये कि देश में छोटे परदे पर सबसे ज्यादा लोग नई बिग बॉस (शिल्पा शेट्टी) को जानें। और, इससे परदे के पीछे के बॉसेज (प्रोडक्शन हाउस और कलर्स चैनल) को सबसे ज्यादा कमाई हो। वो, दोनों काम तो होने शुरू हो गए हैं। और, बिग बॉस के घर के बादशाह (कमीनतम व्यक्ति) का नाम सबके सामने आते-आते ये काम काफी हद तक पूरा हो चुका होगा।

अब बात संजय निरुपम के काम की। तो, दरअसल ये सिर्फ संजय निरुपम का ही काम नहीं है। बिग बॉस के घर पहुंचे सभी मेहमानों की आखिरी ख्वाहिश (जैसी फांसी पर लटकने से पहले किसी मुजरिम की होती है…

अल्पायु में लगीं लोकतंत्र को बड़ी बीमारियां

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अभी हाल में ही प्रतापजी दक्षिण अफ्रीका होकर लौटे। वहां से लौटने के बाद वहां के सामाजिक परिवेश और उसका भारत से शानदार तुलनात्मक विश्लेषण किया। उनके इन लेखों की सीरीज अमर उजाला में छपी। मैं उसे यहां भी पेश कर रहा हूं। दूसरी कड़ी

दक्षिण अफ्रीका का प्रमुख अंगरेजी दैनिक द स्टार सामने रखा है। तारीख है 27 जून 2008। सुबह की चाय के साथ इस दिन के अंक में प्रकाशित चार खबरों पर पर नजर अटक रही है। यह एक संयोग ही था कि एक दिन के अखबार के जरिए हम दक्षिण अफ्रीका के मौजूदा सामाजिक-राजनैतिक हालात की नब्ज तक पहुंच गए। पहली खबर थी कि दक्षिण अफ्रीका में लोकतंत्र के पितामह नेल्सन मंडेला 90 वें जन्मदिन की खुशी में लंदन में बहुत बड़ा जलसा होगा। दूसरी खबर में वहां के नेशनल पुलिस कमिश्नर जेकाई सेलेबी को भ्रष्टाचार और अपराधियों से सांठ-गांठ के आरोप में अदालत में पेश होना है। मौजूदा राष्ट्रपति थांबो म्बेकी ने पुलिस कमिश्नर पर लगे आरोपों को गलत कहा है, यह तीसरी खबर है। आखिरी खबर दक्षिण अफ्रीका में मौजूदा हाल की मुश्किलों का सबसे खतरनाक चेहरा है। अफ्रीका नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष जेकब जूमा के समर्थन में कांग्रेस …

साझा जीवन शैली के सौ सबूत हैं वहां

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अभी हाल में ही प्रतापजी दक्षिण अफ्रीका होकर लौटे। वहां से लौटने के बाद वहां के सामाजिक परिवेश और उसमें भारतीयों के स्थान का शानदार विश्लेषण किया। उनके इन लेखों की सीरीज अमर उजाला में छपी। मैं उसे यहां भी पेश कर रहा हूं। पहली कड़ी

परिचय और अभिवादन के लिए हम दोनों ने लगभग एक साथ हाथ बढ़ाया। हथेली और उंगलियों के जोशीले स्पर्श के बाद मैने अपना हाथ को पीछे खींचना चाहा, पर उसने पकड़ ढ़ीली नहीं की। मेरे हाथ को पकड़े हुए अंगूठे से अंगूठे को क्रास किया और फिर अंगूठे से हाथ को दबाया। मैने भी उसे वैसे ही अभिवादन लौटाने की कोशिश की। यह सब एक मिनट के भीतर घटित हुआ। मुझे समझ आ गया कि यह दक्षिण अफ्रीका में स्वागत का पारंपरिक तरीका है, जो मेरे हाथ खींच लेने से अधूरा रह जाता। उसने मेरा चेहरा पढ़ लिया था कि मेरे लिए इस अभिवादन से पहला साक्षात है। उसका नाम था एविल, म्युनिशिपल कारपोरेशन में मार्केटिंग मैनेजर। दक्षिण अफ्रीका के सबसे अभिजात्य कहे जाने वाले शहर केपटाउन के एयरपोर्ट पर हमें रिसीव करने आया था।

चेहरे पर तैरती मुस्कुराहट के बीच अभिवादन की व्याख्या से उसने अपनी बात शुरू की। बोला, हाथ मिलाने का म…

दलित एक्ट में मायावती अंदर क्यों नहीं हुईं

9 अगस्त को मायावती ने अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी का एलान कर दिया। वो, भी रैली में। एलान भी कैसा कि उन्होंने अपना उत्तराधिकारी चुन लिया है। लेकिन, उसका नाम लोगों को तभी पता चलेगा जब वो, गंभीर रूप से बीमार हों या फिर उनकी अकस्मात मृत्यु हो जाए या फिर कुछ ऐसी ही बड़ी आपदा हो।

मायावती ने इस एलान के वक्त लखनऊ रैली में जोर देकर कहाकि उनका उत्तराधिकारी दूसरी पार्टियों की तरह उनके परिवार से नहीं बल्कि, एक खेत-खलिहान में काम करने वाली मां का बेटा होगा। अपने वोटबैंक को और पक्का करने के लिए मायावती ने भरी रैली में और आगे जाकर कहा- मेरा उत्तराधिकारी दलितों में भी खास चमार जाति का होगा। अब सवाल ये है कि क्या मायावती को सार्वजनिक मंच से ऐसे जातिसूचक शब्द के इस्तेमाल की इजाजत इसलिए मिल जाती है कि वो भी उसी जाति की हैं।

दलितों को अपमान के बोध तभी होगा जब कोई उनसे ऊंची जाति का ही उन्हें जातिसूचक शब्दों से बुलाए। महेंद्र सिंह टिकैत इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करें तो, दलित एक्ट में फंसें और मायावती इस्तेमाल करें तो, कुछ चर्चा तक नहीं। कानून का यही इस्तेमाल, कानून के गलत इस्तेमाल के रास्ते तैयार कर …

वंदेमातरम- सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा

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आजादी के कुछ रंग




आज कश्मीर को आजाद कर देना चाहिए

हिंदुस्तान मुर्दाबाद, मुजफ्फराबाद (पाक अधिकृत कश्मीर) चलो। भारत की सरकार हमारे लोगों पर जुल्म ढा रही है। भारतीय सेना के लोग हमें मार रहे हैं। प्रताड़ित कर रहे हैं। हमारी बहू-बेटियों की इज्जत लूटते हैं। कश्मीर में पिछले कुछ समय से कुछ इसी तरह की भारत विरोधी भावनाएं फिर से उफान पर हैं। क्या सचमुच कश्मीर (जम्मू-लद्दाख छोड़कर) के लोगों के साथ भारत सरकार और भारतीय सेना इसी तरह का व्यवहार कर रही हैं। क्या सचमुच भारत ने जबरदस्ती कश्मीर पर कब्जा कर रखा है। कश्मीर का एक चक्कर लगाकर आइए तो, आपको ये बात और मजबूती से समझ में आएगी।

फिर, दुनिया में गुटनिरपेक्ष, शांति के प्रतीक और मानवता के सबसे बड़े पक्षधर देश भारत को ये क्यों नहीं समझ में आ रहा कि कब्जा, भारत और भारतीयों के मूल स्वभाव में नहीं है। इसलिए वो, ये काम तो मजबूती से कर ही नहीं सकते। हमारे देश में चीन की तरह तानाशाह शासन तो है नहीं कि जो, फैसला हमने लिया उस पर अमल कर सकें। हमारे पास इतनी भी सैन्य ताकत नहीं है कि हम हर दिन भारतीय सीमा का अतिक्रमण करने वाले पाकिस्तानी सैनिकों और उनकी शह से भारत में आतंक मचाने वालों का बाल भी बांका कर सके।…

मैं पैर छूने के खिलाफ नहीं हूं

मैंने अपनी पिछली दो पोस्टों में बेटियों का पैर छूने की परंपरा के गलत असर का उदाहरण देकर इसकी खिलाफत की थी। जिसके बाद इसके समर्थन में ज्यादातर लोग आए। लेकिन, कुछ लोगों ने इससे ये मतलब भी निकाल लिया कि मैं एकदम से ही पैर छूने के खिलाफ हूं।

मैं एकदम साफ कर दूं कि मुझे नहीं लगता कि अपने से बड़े को सम्मान देने के लिए उसका पैर छूने में कोई बुराई है। चाहे वो फिर मां-बाप हों, दूसरे रिश्तेदार या फिर कोई भी भले ही वो, ऐसे किसी रिश्ते में न आते हों जो, स्वाभाविक-सामाजिक तौर पर पैर छूने की जगह पाते हैं। और, मुझे संजय शर्माजी की एक बात तो एकदम सही लगती है कि आखिर छोटे-बड़े का कोई पैमाना तो होगा ही। और, ऐसे में छोटे, बड़े का पैर छुए, इसमें गलत क्या है। हां, कोई छोटा भी अगर ये समझता है कि किसी बड़े के लिए उसके मन में सम्मान नहीं है तो, फिर उसे अपने बड़े का भी पैर नहीं छूना चाहिए। भले ही उस पर दबाव पड़े।

और, टिप्पणियों में ही ये भी आया था कि अगर, बेटी का पैर छूना गलत है तो, कन्यादान भी। निश्चित तौर पर कन्यादान भी गलत है। पहले के जमाने की परिस्थितियों के लिहाज से बेहतर था कि बेटी जो, पति के घर जाने के…

बेटियों का पैर छूना बंद कर दें तो, बेटियों का बड़ा भला हो जाए

हमारे यहां बेटी-दामाद का पैर छुआ जाता है। और, उसके मुझे दुष्परिणाम ज्यादा दिख रहे थे। मुझे लगा था कि मैं बेहद परंपरागत ब्राह्मण परिवार से हूं इसलिए ये परंपरा हमारे ही यहां होगी। लेकिन, जब मैंने ये जानना चाहा कि, कितने लोगों के यहां बेटियों का पैर छुआ जाता है तो, इसका काउंटर मेरी सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पोस्ट में शुमार था। और, इस पर अब तक 13 टिप्पणियां भी आईं हैं। अब समीरजी और ज्ञानजी की तरह मेरा वृहद नेटवर्क तो है नहीं इसलिए इतनी टिप्पणियां भी मुझे ये बताती हैं कि इस पोस्ट से कितने लोगों का सरोकार है।

टिप्पणियों से मुझे अंदाजा लगा कि ये कुरीति (अगर ये रीति में है तो, जिसके पास इसके पक्ष में तर्क हों वो बताएं) देश के ज्यादातर हिस्से में फैली हुई है। कोई भी टिप्पणी तो, कम से कम इसके पक्ष में नहीं ही है। अब मुझे ये लगता है कि बेटी-दामाद का आजीवन पैर छूना या सिर्फ शादी के समय ही पैर छूना भयानक विसंगति है और इसके साथ जुड़े-जुड़े उससे भी खतरनाक विकृतियां पैदा हो रही हैं।

अब मुझे तो ये लगता है कि बेटी-दामाद का पैर छूकर पहले ही बेटी को कमतर साबित कर दिया जाता है। अब ये कौन सा पैमाना हो सक…