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Showing posts from April, 2014

संत चरित्र या कारोबारी चरित्र

साल 2013 के पहले महीने यानी जनवरी के आखिर में लंबी कसरत के बाद भारतीय जनता पार्टी ने जब राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर नितिन गडकरी की दोबारा ताजपोशी नहीं होने दी तो, अलग-अलग कयास लगाए गए। कोई लालकृष्ण आडवाणी के अड़ जाने की खबर ला रहा था तो कोई संघ के खुद की छवि को धक्का न लगने की कोशिश को। कुछ पत्रकार ये भी खबर ला रहे थे कि दरअसल नितिन गडकरी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद जिस तरह से दिल्ली दरबार के डी4  को एकदम किनारे कर दिया था वो, बड़ी वजह बना। आज भी नितिन गडकरी पूरे ठसके से ये बात बोलते सुने जा सकते हैं कि पूर्ति के भ्रष्टाचार का मसला सिर्फ उन्हें हटाने के लिए लाया गया था। उसमें कोई सच्चाई नहीं है। हम जैसे सामान्य समझ और इस मामले में कम जानकारी रखने वाले लोगों को ये एक बार सही भी लगता है। क्योंकि, नितिन गडकरी के अध्यक्ष पद से हटने के बाद कभी पूर्ति की चर्चा न मीडिया ने की, न कांग्रेस ने। तो क्या नितिन गडकरी को भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाकर गलती की। मेरी निजी राय में बिल्कुल नहीं। मेरी निजी राय यही है कि राजनीति से पहले अगर कोई और प्राथमिक काम किसी का है तो उसे …

भारत के शहर, भारत के गांवों के खिलाफ साजिश हैं?

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ये बड़ी बहस का विषय हो गया है कि आखिर इस देश का विकास मॉडल क्या होना चाहिए। शहरी विकास मॉडल या गांवों का विकास मॉडल। इस बात की बहस में आमतौर पर शहरों में रहने वाले या कुछ गांवों में कुछ करके शहरी सुविधाओं का भरपूर उपयोग, उपभोग करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी होते हैं जो कहते हैं कि शहरीकरण इस देश की सारी समस्याओं की जड़ है। वो तर्क देते-देते ऐसे तर्क साबित करने तक पहुंच जाते हैं जहां के बाद लगता है कि अगर भारत में सिर्फ गांव होते तो ये क्या देश होता। अगर भारत में शहर न होते तो कोई समस्या ही न होती। ढेर सारे बहस, तर्क हैं जिन पर बात की जा सकती है लेकिन, अभी उन सारी बातों पर इसी एक ब्लॉग में बहस करने, तर्क देने का मेरा इरादा है नहीं। आज बात करूंगा सिर्फ उस लड़के की जो मुझे ऑफिस के बाहर चाय पीते मिल गया। कंधे पर लटका पिट्ठू बैग। जिसमें लैपटॉप नहीं था लेकिन, उसे लैपटॉप बैग के ही नाम से जाना जाता है। हाथ में ढेर सारे परचे। उसने देखा कि हम दो-चार लोग चाय की चुस्की ले रहे हैं तो मतलब खाली हैं। उसने वो परचे पकड़ा दिए। परचे में प्लॉट ही प्लॉट था। उसकी तस्वीर चिपका रहा हूं। जानबूझकर प्लॉट बेचने व…

प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी मेरी पहली पसंद क्यों हैं?

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हमारी भारतीय राजनीति अद्भुत है कि यहां नेताओं के बड़ा या छोटा होने की कल्पना कभी भी उसके काम के आधार पर नहीं की जाती। यहां सिर्फ भावनाओं के आधार पर नेता छोटा या बड़ा हो जाता है। उसने क्या किया, कितना किया। इसकी चर्चा बड़ी कम होती है। अकसर पार्टी बड़ा बना देती है। जाति बड़ा बना देती है। धर्म बड़ा बना देता है। लेकिन, कितने नेता हैं इस देश में जो अपने काम के बूते बड़े बने हों। ये परंपरा कितनी गड़बड़ रही है इसे मैं कुछ बड़े उदाहरणों से जो मैं खुद जानता हूं या मेरे अनुभव में हैं। उससे ही बताने की कोशिश करता हूं। भारतीय राजनीति में इंदिरा गांधी सबसे मजबूत प्रधानमंत्री रही हैं। और सब ये मानते रहे कि इंदिरा गांधी की नेतृत्व क्षमता का जवाब नहीं है। इंदिरा गांधी का चुनाव क्षेत्र रायबरेली रहा। रायबरेली विकास के मामले में देश के विकसित शहरों के सामने कहां ठहरता है इसके लिए किसी आंकड़े की जरूरत शायद ही हो। उसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व अभी की देश की सबसे ताकतवर महिला सोनिया गांधी कर रही है। सोनिया गांधी को कुछ भी करने के लिए किसी सहारे की जरूरत है। ये बात तो कोई भी मानने को तैयार नहीं होगा। बड़ी-बड…

मोदी पीएम बने तो सरकार कौन चलाएगा?

तरक्की का दस्तावेज है भाजपा घोषणापत्र

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भारत गांवों का देश है। और ये बात हम भारतीयों के दिमाग में ऐसे भर गई है कि अगर कोई गलती से भी शहर की बात करने लगे तो लगता है कि ये भारत बिगाड़ने की बात कर रहा है। लेकिन, उसी का दूसरा पहलू ये है कि शायद ही नई उम्र का और काफी हद तक पुरानी उम्र का कोई भारतीय हो जो पूरे मन से सिर्फ गांव में ही रहना चाहता हो। यहां तक कि गांव में रहकर अच्छा करने वाले ढेर सारे लोग भी अपने उस अच्छे काम के बूते और इसी अच्छे काम की तारीफ पाने के लिए शहर में ही आना-रहना चाहते हैं। लेकिन, फिर भी भारत मतलब गांवों का देश और खेती करने वालों का देश रखे रहना चाहते हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री रहते एक बड़ा शानदार काम किया कि इस गांवों वाले भारत को शहरों की इच्छा रखने वाले इंडिया में बदलने की शुरुआत कर दी। और इसे बड़े सलीके से उन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने आगे बढ़ाया जिनकी मूल विचारधारा गांव, देश, भारत के गर्व से जुड़ी हुई थी। लेकिन, अटल बिहारी वाजपेयी ने न उदारीकरण चिल्लाया। न विदेशी पूंजी का हल्ला मचाया। चुपचाप काम किया। दो काम किया। एक देश के सड़क परिवहन को दुरुस्त किया और ऐसा दुरुस्त किया कि भार…

लानत है मुझ पर!

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वैसे ही दो दिन से कष्ट में हूं। जब से साफ हुआ कि मेरे प्रयास के बाद भी मेरा और पत्नी का नाम नोएडा की मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सका। चुनाव आय़ोग ने बड़ी मेहनत की है। पिछले कुछ चुनावों में मतदान का प्रतिशत बढ़ा है तो उसमें बड़ी मेहनत चुनाव आयोग के जागरुकता अभियानों की है। चुनाव आयोग ने बड़े विज्ञापन देकर सबको मतदाता बनाने की शानदार कोशिश की है। इसीलिए मैंने भी इस बार नोएडा की मतदाता सूची में अपना और पत्नी का नाम जुड़वाने के लिए जरूरी दस्तावेज पर्थला खंजरपुर के इसी प्राथमिक विद्यालय में जाकर जमा कर दिया था। फॉर्म लेने वाले से ये भी पूछा कि आगे क्या करना है। उसने बताया कि आपके घर पर मतदाता पहचान पत्र पहुंच जाएगा। फिर होली आई और दूसरी वजहों से दोबारा पता नहीं कर पाया। फिर जब चुनाव आयोग की वेबसाइट पर दिए नंबर पर शिकायत की तो मेरे मोबाइल पर संदेश भी आ गया कि जल्द ही आपके घर पर वोटर आईकार्ड पहुंच जाएगा। लेकिन, जब दो दिन बाद फिर यानी 7 अप्रैल को उसी नंबर पर फोन करके तफ्तीश की तो पता चला कि मेरा तो फॉर्म ही नहीं पहुंचा है। बीएलओ यानी बूथ लेवल अधिकारी ने उस फॉर्म को आगे ही नहीं बढ़ाया। फिर

छोटे हित, छोटी चिंता, छोटे लालच, बड़े सुख

गजब था। मस्त एकदम। अपने में और साथी पंडे की पन्नी में। पन्नी- मतलब मोटी पॉलिथिन जिससे पंडाजी ने धूप, बारिश से बचने का इंतजाम कर रखा था। हवा अच्छी चल रही थी। तेज, तेज। मोटी पॉलिथिन बार-बार तेज-तेज उड़कर फिर बांस के खोंच में लग रही थी। खोंच- मतलब सलीके से बांस जो लगाने से रह गया और ऊपर निकला हुआ था। मुंह पान, गुटका टाइप की एकदम देसी दारागंजी सामग्री से भरा था। कुछ सामग्री तो कई दिनों तक मुंह में रह जाती थी। ऐसी अहसास पंडाजी का मुंह दे रहा था। वही पंडाजी बोले। बचाए लेओ नै तो पन्नी गै तुम्हार। वा देखो दर बनाइ लिहिस। अब ऊंही से फटी औ तुम्हार ग पैसा पानी। जिस पंडे की पन्नी थी उसने ऊपर हाथ लगाकर देखा और जहां दर (निशान) गया था। वहां फटा कपड़ा लपेटा दिया। मस्त पंडे के गुटके टाइप सामग्री से भरे मुंह से फिर आवाज निकली। देखो ई कपड़ा से न रुख पाई। उतार देओ एका। निकालके धै देओ। फिर काम आई। नै तो एत्ती हवा म ग समझो। केत्ते में लिहे रहेओ। जवाब आवा। 750 क रही। औ अब निकालब न। फाट जाए तो फाट जाए। एकै कई गुना दै गइन गंगा माई। माघ म। और का चाही। फाट जाई तो अगले माघ म फिर खरीदी जाई। अब पन्नी की समस्या खत्…

लाहौल विला कुव्वत, सेक्युलर वोट गायब हो रहा था!

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ये जरूरी था। बताइए भारत जैसे देश से पूरी सेक्युलर कौम ही खत्म हो रही थी। क्या हिंदू, क्या मुसलमां। सब बौरा गए थे। सबने विकास की अफीम चाट ली है। सबको लगता है कि तरक्की मिले, जेब में रकम आए। अच्छा जी लें। अच्छे से रह लें। अरे इससे क्या होगा अगर भारत में हिंदू, मुसलमान की बात ही होना बंद हो जाए। बताइए हमारी यही तो ताकत है कि हम धर्मनिरपेक्ष देश हैं। और इसी आधार पर हमारे देश में एक धर्मनिरपेक्ष वोट बैंक तैयार हुआ। इतना मजबूत कि बरसों तो ढेर सारे सांप्रदायिक इस सेक्युलर वोटबैंक को टस से मस तक नहीं कर सके। सवा सौ साल पुरानी पार्टी का साथ भी था इन सेक्युलर वोटरों को। लेकिन, बुरा हो सांप्रदायिक ताकतों का। जिन्होंने लगके समझाना शुरू किया कि धर्मनिरपेक्ष होना ठीक नहीं है। धार्मिक बनाने लगे। बताओ भला हमें धर्म की चिंता सिवाय वोट के करने की जरूरत है क्या। ये हमारा भारत देश है। संविधान के आधार पर ही जब हम धर्मनिरपेक्ष देश हैं तो क्या बद्तमीजी है कि इसे वोट बटोरने के अलावा धार्मिक बनाने की। देश की अच्छी बात ये थी कि मुसलमानों ने हमेशा सांप्रदायिक ताकतों को हराने वाले का ही साथ दिया। पहले कांग्रेस …

अपनी लेडीज के बहाने दूसरे की लेडीज के साथ

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इलाहाबाद के अलोपशंकरी मंदिर में नवरात्रि दर्शन के लिए अच्छी व्यवस्था थी। हमारे लिए भी ये सुखद अनुभव था कि इलाहाबाद के अलोपीदेवी मंदिर में इतने व्यवस्थित तरीके से दर्शन हो रहे हैं। महिला, पुरुष की अलग कतार थी और कतार धीरे-धीरे ही सही लेकिन, लगातार बढ़ रही थी। इसी व्यवस्था की तारीफ करते हुए 2 पुरुष महिलाओं वाली कतार के सबसे पीछे लग लिए थे। और महिलाओं की कतार में पुरुष होने का भय, लज्जा छिपाने के लिए तेजी से बात करते हुए दिख रहे थे कि एकदम गेट पर रोक देगा तो रुक जाएंगे। मुझे लगा कि शायद ये अपने से धार्मिक जगह पर सद्बुद्धि का इस्तेमाल करेंगे और पुरुषों की कतार में आ जाएंगे। लेकिन, वो तो अपनी लेडीज का साथ छोड़ने को तैयार ही नहीं था। दोनों पुरुष अपनी पत्नी के पीछे महिला कतार में ही लगे रहे। आखिरकार मुझे बोलना पड़ गया। बोला तो दोनों एक साथ बोल पड़े हमारी लेडीज साथ में हैं। तो मैंने तुरंत कहाकि मेरी भी लेडीज महिला कतार में आगे हैं। और ये भी बोला मैं कि क्या आप चाहते हैं कि आपकी लेडीज के पीछे भी कतार में कोई और लग जाए। मैंने फिर जोर देकर कहाकि आप लोग व्यवस्था न बिगाड़िए पुरुष कतार में आ जाइ…