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Wednesday, July 19, 2017

मायावती को इस्तीफा देने की याद क्यों आई ?

बहुजन समाज पार्टी के ट्विटर खाते से
ये बात मायावती को लोकसभा चुनाव परिणाम के तुरन्त बाद अच्छे से ध्यान में आना चाहिए था। क्योंकि, उत्तर प्रदेश ने हाथी निशान पर एक भी व्यक्ति को संसद में पहुंचने लायक नहीं माना। चलिए उस समय ध्यान में नहीं आया। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे के तुरन्त बाद ये बात पक्के तौर पर ध्यान में आ जाना चाहिए था। लेकिन, उस समय भी मायावती को ये समझ नहीं आया कि वो दलितों की बात नहीं कह पा रही हैं। अब जाकर मायावती को समझ में आया, जब वो लोकसभा चुनाव में साफ हो गईं और विधानसभा में भी बहुजन समाज पार्टी के सिर्फ 19 विधायक चुनकर पहुंचे। 1984 में बीएसपी के अस्तित्व में आने के बाद से पार्टी का इतना बुरा हाल कभी नहीं रहा। 1989 में भी बीएसपी के 2 सांसद चुनकर लोकसभा में पहुंचे थे और 13 विधायक उत्तर प्रदेश विधानसभा में थे। वो उठान पर जाती बीएसपी थी। अब 2014 में बीएसपी का एक भी सांसद लोकसभा में नहीं है और 2017 में सिर्फ 19 विधायक उत्तर प्रदेश में बीएसपी के हैं। बीएसपी के इस हाल पर ‘पुनर्मूषको भव’ एकदम सटीक बैठता है।
‘पुनर्मूषको भव’ होने के बाद भी मायावती को कतई याद नहीं आया कि मायावती दलितों की बात कह नहीं पा रही हैं या फिर दलित सुन नहीं पा रहा है कि वो उनकी बात कह रही हैं। मायावती को ये भ्रम बने रहने की 2 वजहें थीं। पहली बड़ी वजह कि सबके बाद वो देश की सबसे बड़ी दलित नेता थीं। और दूसरी वजह ये कि, उत्तर प्रदेश में भले मायावती की पार्टी के सिर्फ 19 विधायक चुने गए। मायावती की बहुजन समाज पार्टी को 2017 विधानसभा चुनावों में मत प्रतिशत के लिहाज से खास नुकसान नहीं हुआ। बीएसपी को 22.2 प्रतिशत मत मिले। लेकिन, मायावती को डर तब लगना शुरू हुआ जब नरेंद्र मोदी और अमित शाह वाली बीजेपी ने सबको चौंकाते हुए रामनाथ कोविंद को रायसीना पहाड़ी पर पहुंचाने का फैसला किया। मायावती के लिए ये उबले आलू के गले में अंटक जाने जैसी स्थिति थी। न उगलते बन रहा था, न निगलते बन रहा था। मायावती की प्रतिक्रिया थी- कोविंद जी से बेहतर दलित उम्मीदवार विपक्ष उतारेगा, तो हम उसको समर्थन देंगे। विपक्ष ने मीरा कुमार को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाकर मायावती को ‘दलित धर्मसंकट’ से उबार लिया। लेकिन, अन्दर ही अन्दर मायावती को डर लगने लगा था। रामनाथ कोविंद उत्तर प्रदेश के कानपुर से होने और सक्रिय राजनीति में होते भी मायावती को उतना नहीं डरा रहे थे, जितना वो रायसीना पहाड़ी पर बैठने के बाद डराते दिख रहे थे। देश की सबसे बड़ी दलित नेता की पदवी छिनने का डर मायावती को बुरी तरह से परेशान कर रहा था।
इस डर का अन्दाजा राष्ट्रपति चुनाव के दिन भी मिला। 17 जुलाई को मायावती ने कहा- चुनाव कोई भी जीते, राष्ट्रपति एक दलित ही होगा। ये देन किसकी है? ये देन परमपूज्यनीय बाबा साहब अम्बेडकर की है, मान्यवर कांशीराम जी की है। ये देन बहुजन समाज पार्टी की है। मायावती ने राष्ट्रपति चुनाव वाले दिन कहाकि ये सब बहुजन आन्दोलन, पार्टी की जीत है। लेकिन, देश की सबसे बड़ी दलित नेता को देश के सबसे ऊंचे पद पर एक दलित के, वो भी भारतीय जनता पार्टी की राजनीति करते शीर्ष तक पहुंचे, रायसीना पहाड़ी पर विराजने से अपना कद छोटा होने का डर बढ़ने लगा था। ये डर इतना बढ़ा कि दलित के राष्ट्रपति बनने का सारा श्रेय बहुजन आन्दोलन को देने वाली मायावती को राज्यसभा में अहसास हुआ कि दलित की बात सुनी नहीं जा रही है। और अगर अपने समाज की बात ही नहीं रख पा रही हैं, तो उन्हें राज्यसभा में रहने का कोई हक नहीं है। 18 जुलाई 2017 बीएसपी प्रमुख मायावती राज्यसभा से इस्तीफा देने के तुरन्त बाद पत्रकारों से कहा- दलितों के हितों में सहारनपुर जिले में शब्बीरपुर गांव में जो दलित उत्पीड़न हुआ है। और आप लोगों को मालूम है कि मैं दलित समाज से ताल्लुक रखती हूं। जब मैं अपने समाज की बात उधर नहीं रख सकती हूं। सत्ता पक्ष के द्वारा मुझे बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा। मंत्री लोग खड़े हो गए। सभी वहां के जो सदस्य है, सत्ता पक्ष के सब खड़े हो गए। मैं समझती हूं कि ये ठीक नहीं हुआ है। तो जब मुझे अपनी बात रखने का सत्तापक्ष मौका नहीं दे रहा है। मुझे बोलने नहीं दिया जा रहा है, तो मैंने आज राज्यसभा से इस्तीफा देने का फैसला किया है। हाउस में भी कहा और अभी मैं माननीय सभापति जी इस्तीफा देकर आ रही हूं। दलितों की बात राज्यसभा में न कह पाने की टीस के साथ मायावती ने उस राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया है, जिस पर अप्रैल 2018 के बाद उनका रह पाना वैसे भी सम्भव नहीं दिखता है। क्योंकि, अब उन्हें राज्यसभा में पहुंचाने के लिए जरूरी विधायक ही उनके पास नहीं हैं। हालांकि, मायावती को ये बात बहुत देर से समझ आई कि वो दलितों की बात ही नहीं रख पा रही हैं। लेकिन, अच्छी बात ये है कि विपक्ष को इससे एक जुड़ाव बिन्दु मिल गया है। नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी की बढ़ती शक्ति से परेशान विपक्ष एकजुट हो सकता है। यही वजह है कि राष्ट्रीय जनता दल के कोटे से लालू प्रसाद यादव उन्हें बिहार से राज्यसभा में भेजने की बात कह रहे हैं। नरेंद्र मोदी के एकछत्र राज के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर एक नई गोलबन्दी की बुनियाद मायावती बनती दिख रही हैं। हां, विपक्ष का ये बड़ा संकट जरूर हो सकता है कि जरा सा सन्जीवनी मिलते ही मायावती किस तरह से व्यवहार करेंगी। क्योंकि, कांशीराम की विरासत को आगे बढ़ाने वाली मायावती का भी इतिहास किसी के साथ मिलकर 4 कदम चलने का नहीं रहा है। लेकिन, अभी के हालात में मायावती के पास लालू प्रसाद यादव के महागठबन्धन फॉर्मूले को स्वीकारने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। लेकिन, राजनीतिक मजबूरी में बन रहे इस विपक्षी गठजोड़ की सफलता इसी पर निर्भर करेगी कि पार्टियों और नेताओं के मिलन से आगे ये जनता से मिलने का कोई कार्यक्रम ये बनाएंगे या सिर्फ बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के दलित के घर जाने के कार्यक्रम में मीनमेख निकालकर ही अपना काम चलाएंगे। 
(ये लेख QuintHindi पर छपा है)

Friday, March 17, 2017

देखिए कितने तरह के भ्रम टूट रहे हैं

देखिए कितने तरह के भ्रम टूट रहे हैं। @BJP4India को रुढिवादी पिछड़ी सोच की पार्टी के तौर पर स्थापित किया गया। राजीव गांधी के कम्प्यूटर का विरोध उस समय बीजेपी ने किया था, इसे सबसे पक्के आधार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा। बीजेपी समय के साथ चलती रही। मोदी उससे आगे निकल गए। नोटबंदी जैसा फैसला ले लिया। डिजिटल लागू करने के लिए ज़िद सी कर बैठे हैं। सबकुछ आधुनिक, प्रगतिशील कर रहे हैं। कांग्रेस कहती रही, मोदी हमारे किए को आगे बढ़ाकर श्रेय ले रहे हैं। इसी दौरान उत्तर प्रदेश के चुनाव में बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिल गया। फिर क्या था प्रगतिशीलों को प्रतिगामी होने का पक्का आधार मिल गया। मायावती ने शुरुआत की और अब प्रगतिशीलों की आख़िरी उम्मीद अरविन्द केजरीवाल कह रहे हैं कि नया कूड़े में डालो और पुराने को प्रणाम करो। #EVM कूड़े में डालो और बैलट पेपर पर मतदान कराओ। कांग्रेस भी अरविन्द जी के विचार से प्रभावित है। देखिए ना कितने तरह के भ्रम टूट रहे हैं।

Wednesday, February 08, 2017

मुख्तार अंसारी बीएसपी का बनाएंगे या बिगाड़ेंगे ?

कई बार सीधे निशाने पर लगे तीर से कितना फायदा हुआ है, ये अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है। कुछ ऐसा बीएसपी के साथ भी होता दिख रहा है। मायावती ने मुख्तार अंसारी के परिवार की पार्टी कौमी एकता दल का विलय बसपा में करके बड़ा शानदार निशाना साधा है। पहली नजर में तो ऐसा ही दिख रहा है। मुख्तार अंसारी, उनके भाई सिबकतुल्लाह अंसारी और बेटे अब्बास अंसारी को अब बीएसपी ने टिकट दे दिया है। मऊ की सदर विधानसभा सीट और गाजीपुर को मोहम्मदाबाद सीट अंसारी परिवार की पारिवारिक सीट है। और ये दोनों ही सीट अंसारी भाई बिना किसी पार्टी के भी जीतने की क्षमता रखते हैं। मऊ विधानसभा सीट से 1996 से मुख्तार अंसारी विधायक चुनकर आ रहे हैं। 1996 में पहली बार बीएसपी ने ही मुख्तार को टिकट दिया था। उसके बाद बीएसपी से बाहर जाकर भी मुख्तार अंसारी ने मऊ सीट पर कब्जा बनाए रखा। मोहम्मदाबाद सीट पर भी अंसारी परिवार का ही कब्जा है। यहीं से कृष्णानंद राय की पत्नी बीजेपी से चुनाव लड़ रही हैं। मुख्तार अंसारी कृष्णानंद राय की हत्या के आरोपों में ही लम्बे समय से जेल में बंद हैं। हत्या की वजह भी 2002 का विधानसभा चुनाव माना जाता है। जब कृष्णानंद राय ने मुख्तार के भाई अफजाल अंसारी को विधानसभा चुनाव में हरा दिया था। उसके बाद ही कृष्णानंद राय की हत्या कर दी गई थी।

मुख्तार के भाई अफजाल अंसारी गाजीपुर की मोहम्मदाबाद सीट से 1985 से लगातार चुने जाते हैं। सिवाय 2002 और 2005 में हुए उपचुनाव के। 2002 में बीजेपी के कृष्णानंद राय और 2006 के उपचुनाव में कृष्णानंद की हत्या के बाद उनकी पत्नी अलका राय इस सीट को जीतने में सफल रहीं। उसके बाद अफजाल लोकसभा पहुंचे और मुख्तार के दूसरे भाई सिबगतुल्लाह अंसारी इस सीट से विधायक हैं। कुल मिलाकर दो सीटें बीएसपी के खाते में लगभग पक्की दिख रही है। हालांकि, मऊ की घोसी विधानसभा पर अब्बास का कोई पारंपरिक आधार नहीं है। लेकिन, कौमी एकता दल के 2012 के प्रदर्शन के आधार पर तीनों ही सीटें बीएसपी के लिए फायदे के तौर पर देखी जा रही हैं। अंसारी परिवार की कौमी एकता दल ने 2012 में 43 विधानसभा में चुनाव लड़ा और 2 सीटें जीतीं। लेकिन, मत प्रतिशत के लिहाज से मऊ, गाजीपुर और बलिया में करीब 15% मत हथिया लिए। इन तीनों जिलों में कुल 15 सीटें हैं। मुसलमानों में भरोसा बनाने के लिए जूझ रही बहुजन समाज पार्टी के लिहाज से देखें, तो ये बहुत बड़ी सफलता है। और इसीलिए मैंने शुरुआत में लिखा कि पहली नजर में मायावती का मुख्तार अंसारी वाला तीर निशाने पर पक्का लगता दिख रहा है। क्योंकि, 2 पक्की सीटें और कम से कम इन 3 जिलों की 15 सीटों पर मुसलमानों के लिए पसंद की पहली पार्टी बन जाना। लेकिन, इस पूरे घटनाक्रम के दूसरे पहलू को भी देखने को जरूरत है। दूसरा पहलू है कि क्या मुख्तार अंसारी परिवार का बीएसपी में जाने का कोई नुकसान भी हो सकता है।

मुख्तार के बीएसपी में शामिल होने के नुकसान के लिए सबसे पहले तो मुख्तार की छवि क्या है, इसकी बात करनी होगी। मुख्तार अंसारी की छवि पूर्वी उत्तर प्रदेश के मुसलमान माफिया की है। बृजेश सिंह और मुख्तार की दुश्मनी के आधार पर पूर्वी उत्तर प्रदेश में विभाजन साफ दिखता है। बृजेश के सिंह के नजदीकी रहे कृष्णानंद राय ने जब अंसारी परिवार की पारंपरिक सीट से मुख्तार के भाई को हराया तो, कृष्णानंद राय की हत्या कर दी गई। मुख्तार कृष्णानंद राय की हत्या और 2005 में हुए मऊ दंगों के आरोप में जेल में बंद हैं। कृष्णानंद राय की हत्या की वजह से मऊ, गाजीपुर और बलिया के भूमिहार मुख्तार का जमकर विरोध करते रहे हैं। भूमिहारों के बीएसपी से नाराज होने की ताजा वजह उसमें जुड़ जाती है कि अंसारी परिवार को दी गई 2 सीटों पर पहले भूमिहार प्रत्याशी ही बीएसपी ने उतारे थे। इसलिए मऊ, गाजीपुर और बलिया पर भूमिहारों को बीएसपी से विरोध बढ़ गया है। इसी विरोध को कम करने के लिए मायावती ने समाजवादी पार्टी की सरकार में मंत्री रहे नारद राय को बलिया सदर से टिकट दिया है। लेकिन, नारद राय का भूमिहारों में खास प्रभाव नहीं माना जाता। इसलिए इससे बहुत फायदा मिलता नहीं दिख रहा है।


इसकी वजह से एक और जो बात मायावती के खिलाफ जा सकती है, वो है सवर्णों का बीएसपी से दूरी बना लेना। अंसारी परिवार को टिकट देने से पहले ही मायावती ने 97 मुसलमानों को टिकट दिया था। इससे मुसलमानों के नजदीक जाने की मायावती की कोशिश साफ दिख रही थी। लेकिन, मायावती अपने आधार दलित मतों के साथ मुसलमानों को जोड़ने की कोशिश के साथ सर्वजन समाज को जोड़ने की भी कोशिश कर रही हैं। इसीलिए बीएसपी ने 113 सवर्णों को टिकट दिया है। क्योंकि, बहुतायत सवर्ण ब्राह्मणों की अगुवाई में लोकसभा चुनाव से ही बीजेपी के साथ पक्की तरह पर दिख रहा है। बीएसपी ने 66 ब्राह्मण सहित कुल 113 सवर्णों को टिकट देकर उन्हें बीजेपी की तरफ से अपनी तरफ लाने की कोशिश की है। जो रणनीति के तौर पर कुछ हद तक सही भी दिख रही थी। लेकिन, अब मुख्तार अंसारी और उनके परिवार की हाथी की सवारी से कानून व्यवस्था के मसले पर बीएसपी की तरफ जाने का मन बनाने वाला सवर्ण मतदाता फिर से पूरी तरह से बीएसपी से किनारा कर सकता है। और इसका असर सीधे तौर पूर्वांचल के तीनों जिलों- मऊ, गाजीपुर, बलिया- में सवर्ण मतों का पूरी तरह से बीएसपी के खिलाफ जाना हो सकता है। कुल मिलाकर मुख्तार अंसारी को परिवार सहित हाथी पर बिठाकर फौरी तौर पर तो मायावती ने राजनीतिक बढ़त ले ली है। लेकिन, बाद के चरणों में पूर्वांचल तक पहुंचते कितने सवर्ण हाथी से उतर जाएंगे, इसी से समझ आएगा कि मायावती का मुख्तार वाला तीर निशाने पर लगा या खुद को ही घायल कर गया है। 

Monday, January 30, 2017

मजबूर मायावती या मुख्तार अंसारी

उत्तर प्रदेश की राजनीति हर बीतते दिन के साथ बदल रही है। जिस मुख्तार अंसारी की पारिवारिक पार्टी कौमी एकता दल के समाजवादी पार्टी में विलय की घटना ने मुलायम सिंह के बाद सपा के सबसे ताकतवर नेता शिवपाल यादव को एक विधानसभा का नेता बनाकर रख दिया, अब वही कौमी एकता दल मायावती की बीएसपी में समाहित हो गई है। एक दशक से ज्यादा समय से जेल में बंद अपराधी नेता मुख्तार अंसारी की कौमी एकता दल को बीएसपी का हिस्सा बनाते मायावती ने कहाकि मुख्तार के खिलाफ कोई अपराध साबित नहीं हुआ है। अगर अपराध साबित हुआ तो वो कोई कार्रवाई करने से हिचकेंगी नहीं। कौमी एकता दल के विलय के बदले में अंसारी परिवार को तीन सीटें मायावती ने दे दीं। मऊ सदर विधानसभा सीट से मुख्तार बीएसपी प्रत्याशी होंगे। घोसी से मुख्तार का बेटा बीएसपी से लड़ेगा और बगल के जिले गाजीपुर को मोहम्मदाबाद सीट से मुख्तार के सिबगतुल्लाह अंसारी चुनाव लड़ेंगे। 1996 में पहली बार बीएसपी टिकट पर जीतने के बाद जेल में रहने के बावजूद मुख्तार लगातार मऊ सदर से चुनाव जीत रहे हैं। मोहम्मदाबाद सीट पर भी अंसारी परिवार का ही कब्जा है। यहीं से कृष्णानंद राय की पत्नी बीजेपी से चुनाव लड़ रही हैं। मुख्तार अंसारी कृष्णानंद राय की हत्या के आरोपों में ही लम्बे समय से जेल में बंद हैं। हत्या की वजह भी 2002 का विधानसभा चुनाव माना जाता है। जब कृष्णानंद राय ने मुख्तार के भाई अफजाल अंसारी को विधानसभा चुनाव में हरा दिया था। उसके बाद ही कृष्णानंद राय की हत्या कर दी गई थी।
मायावती के मुख्तार अंसारी की पार्टी के विलय के बदले अपने घोषित तीन प्रत्याशियों को हटाने को इस तरह से देखा जा सकता है कि मायावती किसी भी हाल में इस चुनाव में मुसलमानों को अपने नजदीक लाने में कोई कसर छोड़ना नहीं चाहती हैं। इस लिहाज से मायावती के लिए अंसारी परिवार की पार्टी की बीएसपी में शामिल होना सबसे बेहतर विकल्प दिख रहा है। वैसे भी मुख्तार अंसारी पुराने बसपाई हैं। कानून व्यवस्था को दुरुस्त रखने की छवि रखने वाली मायावती ने ही सबसे पहले मुख्तार अंसारी को 1996 में मऊ सदर से विधानसभा पहुंचने का रास्ता दिखाया था। हालांकि, उसके बाद बीएसपी से बाहर रहते भी मुख्तार अंसारी मऊ सदर से लगातार विधायक चुने जाते रहे। जेल में रहकर भी। मुख्तार के भाई अफजाल अंसारी गाजीपुर की मोहम्मदाबाद सीट से 1985 से लगातार चुने जाते हैं। सिवाय 2002 और 2005 में हुए उपचुनाव के। 2002 में बीजेपी के कृष्णानंद राय और 2006 के उपचुनाव में कृष्णानंद की हत्या के बाद उनकी पत्नी अलका राय इस सीट को जीतने में सफल रहीं। उसके बाद अफजाल लोकसभा पहुंचे और मुख्तार के दूसरे भाई सिबगतुल्लाह अंसारी इस सीट से विधायक हैं। अंसारी परिवार को दी गई तीनों सीटों का बीएसपी के खाते में जाना लगभग तय है। सीधे तौर पर मायावती को 3 सीटों का फायदा है। दूसरी बड़ी बात ये कि अंसारी परिवार की कौमी एकता दल ने 2012 में 43 विधानसभा में चुनाव लड़ा और 2 सीटें जीतीं। लेकिन, मत प्रतिशत के लिहाज से मऊ, गाजीपुर और बलिया में करीब 15% मत हथिया लिए। इन तीनों जिलों में कुल 15 सीटें हैं। यहां मायावती की बहुजन समाज पार्टी को मुख्तार परिवार के आने से काफी ताकत मिलेगी। 2005 के बाद कृष्णानंद राय की हत्या के बाद तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने मुख्तार अंसारी की गिरफ्तारी के लिए न्याय यात्रा निकाली थी। 2005 में ही मऊ में दंगे हुए थे और दंगों के बाद लगे कर्फ्यू के दौरान मुख्तार अंसारी की खुली जिप्सी में अपने निजी असलहाधारी अंगरक्षकों और पुलिस के साथ की तस्वीरें मीडिया में खूब चर्चा में आई थी। इन सब वजहों से मायावती के लिए मुख्तार अंसारी जेल में बंद होने के बाद भी मुसलमानों के नजदीक जाने का बड़ा जरिया दिख रही हैं।

मायावती की मजबूरी साफ दिखती है कि मुसलमानों का मत पाने के लिए कुछ भी करेंगी। लेकिन मुख्तार अंसारी भी कम मजबूर नहीं हैं। मुख्तार अंसारी के लिए ये राजनीतिक जीवन-मरण का चुनाव है। करीब 12 सालों से मुख्तार जेल में बंद हैं। और 2012 के चुनाव में भले ही कौमी एकता दल ने 2 सीटें जीत लीं। लेकिन, खुद मुख्तार मऊ सीट पर मतों के मामलों में पिछड़ते दिख रहे हैं। 1996 में मुख्तार ने मऊ विधानसभा सीट पर बीएसपी के टिकट पर 45.85% मत हासिल किए। 2002 में निर्दलीय मुख्तार को पहले से ज्यादा 46.06% मत मिले और 2007 में मुख्तार की लोकप्रियता निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर ही और बढ़ गई। मुख्तार को 46.78% मत मिले। लेकिन, 2012 मुख्तार के लिए खतरों की घंटी साबित हुए। मुख्तार अंसारी विधायक बन गए। लेकिन, मत प्रतिशत जबर्दस्त तरीके से घटकर 31.24% रह गया। बीएसपी ने इस सीट पर मऊ डिग्री कॉलेज के महामंत्री रहे मनोज राय को टिकट दिया था। मनोज राय का मऊ सीट पर मजबूत आधार है। समाजवादी पार्टी ने यहां अलताफ अंसारी को टिकट दिया है। ऐसे में बिना किसी पार्टी के मुख्तार अंसारी को अपनी सीट जाती दिख रही थी। इसीलिए मुख्तार अंसारी ने पहले समाजवादी पार्टी में अपनी पार्टी की विलय की कोशिश की और असफलता मिलने पर हाथी की सवारी कर ली। कुल मिलाकर कौमी एकता दल के बीएसपी में विलय बीएसपी के तीन सीटों पर लगभग पक्की जीत की कहानी नहीं है। ये मुसलमान, मायावती और मुख्तार का ऐसा राजनीतिक मेल है, जो कई संभावनाओं और आशंकाओं की जमीन तैयार कर रहा है। 

Tuesday, January 24, 2017

बाबा साहब का “आरक्षण” न होता, तो बीएसपी में दलित कहां होते?

बहुजन समाज पार्टी दलितों की पार्टी है। ये जवाब बताने के लिए कोई राजनीतिक-सामाजिक जानकार होने की जरूरत नहीं है। लेकिन, क्या ये जवाब 2017 के विधानसभा चुनावों के समय भी सही माना जाएगा। छवि के तौर पर अभी भी यही सही जवाब है। क्योंकि, देश की सबसे बड़ी दलित नेता मायावती बीएसपी की अध्यक्ष हैं। इसलिए बहुजन समाज पार्टी बहुजन यानी दलितों की ही पार्टी मानी जाएगी। लेकिन, अब जब मायावती उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए 403 में से 400 प्रत्याशी घोषित कर चुकी हैं, तो बीएसपी के दलितों की पार्टी होने पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। सबसे पहले बात कर लेते हैं बांटे गए टिकटों में दलितों की संख्या की। टिकटों की संख्या के लिहाज से बीएसपी यानी दलितों की पार्टी में दलितों का स्थान चौथा आता है। मायावती ने सबसे ज्यादा टिकट सवर्णों को दिया है। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में 403 में 113 सीटों पर सवर्ण उम्मीदवार हाथी की सवारी कर रहे हैं। दूसरे स्थान पर पिछड़ी जाति के प्रत्याशी हैं। पिछड़ी जाति से आने वाले कुछ 106 प्रत्याशियों को बीएसपी ने टिकट दिया है। इसके बाद बीएसपी में मुसलमानों का स्थान आता है। 97 मुसलमानों को मायावती ने टिकट दिया है। और चौथे स्थान पर दलितों को जगह मिली है। विधानसभा चुनावों के लिए कुल 87 दलितों को बीएसपी ने हाथी की सवारी करने का मौका दिया है। सोचिए कि जिन सवर्णों और पिछड़ों के शोषण के खिलाफ पहले बाबा साहब ने और बाद में कांशीराम ने लड़ाई लड़ी। आज उन्हीं आदर्शों पर राजनीति करने का दावा करने वाली मायावती की बीएसपी में दलितों का प्रतिनिधित्व सवर्णों और पिछड़ों से भी कम हो गया। 2007 में 89 ब्राह्मणों को टिकट देकर मायावती ने सामाजिक समीकरण चमत्कारिक तरीके से साध लिया था। उत्तर प्रदेश में मायावती की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी। लेकिन, 2012 में 74 ब्राह्मणों और 2014 के लोकसभा चुनाव में 21 ब्राह्मणों को टिकट देने के बाद भी मायावती को अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। इसीलिए मायावती ने इस बार 66 ब्राह्मणों को ही विधानसभा का टिकट दिया है। लेकिन, दूसरी सवर्ण जातियों के साथ ये संख्या दलितों से काफी ज्यादा हो जाती है।
दरअसल उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में किसी एक जाति या धर्म के आधार पर राजनीति करना बेहद मुश्किल है। और ऐसी पार्टियां भले ही एक बड़ा मत प्रतिशत हासिल करने में कामयाब होती रही हों। लेकिन, बिना दूसरी जातियों को जोड़े उन्हें सत्ता का सुख अपने दम नहीं मिल सका। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तब देखने को मिला था, जब सवर्णों को गाली देकर ही बीएसपी का आधार मजबूत करने वाली मायावती ने दलित-मुसलमान के तय खांचे से आगे निकलकर सवर्णों (खासकर ब्राह्मणों) को लुभाने की सफल कोशिश की। 2007 के विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित तौर पर बीएसपी को ब्राह्मणों को मत मिला और 30.43% मतों के साथ मायावती की पूर्ण बहुमत की सरकार सत्ता में आ गई। उस चुनाव में समाजवादी पार्टी 25% से ज्यादा मत पाने के बावजूद 97 सीटों पर ही सिमट गई। लेकिन, 2012 के चुनाव में मायावती का ये मंत्र काम नहीं कर पाया। बहुजन समाज पार्टी को 26% से कम मत मिले और इसकी वजह से सीटें घटकर 80 रह गईं। समाजवादी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बन गई। लेकिन, फिर भी बीएसपी को ये लगता है कि सिर्फ दलित-मुसलमान से यूपी की सत्ता हासिल नहीं की जा सकती। इसीलिए फिर से 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए बहनजी के उम्मीदवारों में सबसे ज्यादा सवर्ण हो गए। और दलितों को संख्या 87 रह गई।

87 की संख्या देखकर फिर भी ये माना जा सकता है कि राजनीतिक मजबूरियों के चलते सवर्ण और पिछड़ों को टिकट बांटना मजबूरी हो गई है। फिर भी मायावती ने अपने प्रतिबद्ध मतदाताओं का ख्याल रखा है। लेकिन, इसके बाद का ये आंकड़ा दलितों को परेशान कर सकता है। और वो आंकड़ा ये है कि दलितों को जिन 87 सीटों पर टिकट दिया गया है, उसमें से 85 विधानसभा सीटें अनुसूचित जाति के लिए ही आरक्षित हैं। ये वही आरक्षण है, जो बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने महात्मा गांधी से लड़कर हासिल किया था। जो बाद में संविधान का हिस्सा बन गया। यानी अगर बाबा साहब का राजनीतिक आरक्षण न होता, तो बीएसपी में सिर्फ 2 उम्मीदवार दलित होते। भला हो बाबा साहब के लड़कर लिए गए आरक्षण का कि, 87 दलित हाथी पर सवार होकर विधानसभा पहुंचने की कोशिश तो कर पा रहे हैं। वरना राजनीतिक मजबूरी में जाने कितने दलित हाथी की सवारी कर पाते। जो दलित मायावती के इशारे पर किसी को भी बिना सवाल किए मत देता रहा है, उन्हीं दलितों में से मायावती को आरक्षित सीटों के अलावा योग्य जिताऊ उम्मीदवार नहीं मिल सका। वो भी तब जब 2007 में पूर्ण बहुमत की 5 साल की सरकार और उससे पहले भी टुकड़ों में 3 बार मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। अब फिर से मैं वही सवाल पूछ रहा हूं। क्या बीएसपी दलितों की पार्टी है। अब इसका जवाब देना आसान नहीं रह गया है। 

Friday, August 12, 2016

अब ब्राह्मणों के भरोसे नहीं हैं बहनजी

एक क्षत्राणी ने बहन मायावती को पूरी चुनावी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। हालांकि, अकेली स्वाति सिंह नहीं हैं, जिनकी वजह से मायावती को अपनी चुनावी रणनीति बदलनी पड़ी हो। लेकिन, सबसे बड़ी वजह स्वाति सिंह ही हैं। उत्तर प्रदेश में 2017 में फिर से सत्ता में आने का रास्ता ब्राह्मणों या कह लीजिए कि सवर्णों के जरिये खोज रही मायावती को स्वाति सिंह ने ऐसा झटका दिया है कि ब्राह्मणों की बहन जी अब मुसलमानों की माया मैडम ही बनने की कोशिश में लग गई हैं। दरअसल 2007 में मायावती का ब्राह्मण भाईचारा बनाओ समिति का फॉर्मूला अद्भुत तरीके से कामयाब रहा। लेकिन, सच्चाई ये भी है कि उसके बाद 2012 और फिर 2014 में तो वो भाईचारा पूरी तरह से टूट गया। इसीलिए बसपा का ताजा समीकरण DM (दलित+मुसलमान) ही हो गया है। बहुजन समाज पार्टी अब पूरी तरह से दलित और मुसलमान के भरोसे ही 2017 की चुनावी वैतरणी पार करने की योजना बना रही है। इसकी ताजा झलक तब मिली, जब लखनऊ में बसपा नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने प्रेस कांफ्रेंस करके बताया कि कांग्रेस के तीन मुस्लिम विधायक अब हाथी की सवारी करेंगे। समाजवादी पार्टी का भी एक मुस्लिम विधायक अब हाथी की सवारी करेगा। पार्टी महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी अब बीएसपी के अकेले बड़े नेता कहे जा सकते हैं। हालांकि, बीएसपी में बहनजी को छोड़कर कोई नेता नहीं है। ये बात पार्टी के दूसरे महासचिव और ब्राह्मण चेहरा सतीश मिश्रा ने कह ही दिया है। सतीश मिश्रा ने ये बयान मीडिया में तब दिया था जब पार्टी के एक और महासचिव रहे स्वामी प्रसाद मोर्या ने टिकट बेचने का आरोप लगाकर पार्टी छोड़ दी थी। सतीश मिश्रा के इतने निष्ठा भरे बयान के बाद भी मायावती की तरफ से कहीं भी किसी मंच पर फिलहाल मिश्रा को मान्यता नहीं मिली। यहां तक कि जब बीजेपी के उपाध्यक्ष रहे दयाशंकर सिंह ने मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाने में बेहद शर्मनाक तुलना कर दी और उसके बाद लखनऊ में बहुजन समाज के लोगों ने लखनऊ में बड़ा प्रदर्शन किया। उस प्रदर्शन की अगुवाई भी नसीमुद्दीन सिद्दीकी ही कर रहे थे। सतीश मिश्रा की भूमिका खास नहीं रही।

सतीश मिश्रा और नसीमुद्दीन सिद्दीकी को बहनजी कैसे आगे रखती हैं। दरअसल यही साफ कर देता है कि अब बहुजन समाज पार्टी की ताजा चुनावी रणनीति क्या है। पूर्वांचल में एक सीट से बीएसपी का टिकट हासिल कर चुके सवर्ण प्रत्याशी ने बताया कि, मुश्किल तो बढ़ गई है। हमने बीएसपी का टिकट इसीलिए लिया कि सवर्ण जातियों के साथ दलितों का वोट मिलेगा और जीत पक्की हो जाएगी। लेकिन, स्वाति सिंह और उनकी बेटी के खिलाफ लखनऊ में हुई बीएसपी की रैली में अपशब्दों के प्रयोग ने सिर्फ ठाकुरों का ही नहीं पूरे सवर्ण समाज का मन बीएसपी के लिए खट्टा कर दिया है। इस कदर कि प्रदेश में ज्यादातर सवर्ण प्रत्याशी बीएसपी के टिकट पर सवर्णों को वोट दूर जाता हुआ देख रहे हैं। अचानक लड़ाई भाजपा-सपा में होती दिखने लगी है। हालांकि, अभी भी बीएसपी के टिकट पर 50 से ज्यादा ब्राह्मण प्रत्याशी चुनाव लड़ते दिख रहे हैं। लेकिन, बदली परिस्थितियों में बीएसपी दलित और मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा देगी, ऐसी खबरें हैं। नवाब काजिम अली खान, मुस्लिम खान, दिल नवाज खान और नवाजिश आलम खान भले ही कांग्रेस और सपा से टूटकर आए विधायक हैं। लेकिन, दरअसल ये बहनजी की ताजा चुनावी रणनीति के चेहरे हैं। इसका सीधा सा गणित है। अभी तक ब्राह्मण और पूरे सवर्ण वोटों के लिए मायावती को भारतीय जनता पार्टी को ही ध्यान में रखकर रणनीति बनानी थी। जो 2007 में 89 ब्राह्मणों को टिकट देकर मायावती ने साध लिया था। लेकिन, 2012 में 74 ब्राह्मणों और 2014 के लोकसभा चुनाव में 21 ब्राह्मणों को टिकट देने के बाद भी मायावती को अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। इसीलिए 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद ही बीएसपी ने ये तय कर लिया था कि दलित-मुसलमान के गठजोड़ को ही पक्का करना है। इस गठजोड़ को स्वाभाविक तौर पर अभी देश भर में चल रहे गाय-दलित बहस से भी समर्थन मिल रहा है। और देश में एक दलित-मुस्लिम वोटबैंक बनाने की कोशिश तेजी से चल रही हैं। बीएसपी इसी उभार को अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लेना चाह रही है। इसीलिए दयाशंकर सिंह की पत्नी और बेटी के खिलाफ शर्मनाक टिप्पणी करने के आरोपी नसीमुद्दीन पर कोई कार्रवाई करने के बजाए मायावती सिद्दीकी को और प्रमुखता से आगे कर रही हैं।


मायावती के चुनावी रणनीति बदलने के पीछे एक बड़ी वजह ये भी है कि कांग्रेस पूरी तरह से ब्राह्मणों, सवर्णों को साधने में लगी है। शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री का प्रत्याशी बनाकर कांग्रेस ने एक लॉलीपॉप तो फेंक ही दिया है। खबर ये भी है कि कांग्रेस दो दशक पहले छात्र राजनीति में आगे रहे सवर्ण नेताओं को ज्यादा से ज्यादा टिकट देने का मन बना रही है। बीएसपी को ये अच्छे से पता है कि ऐसे में ब्राह्मण और सवर्णों की पसंद के विकल्प के तौर पर भाजपा के बाद कांग्रेस भी सामने है। दूसरा मुसलमान और दलित का गठजोड़ अगर बेहतर हो तो बीएसपी के लिए तारनहार हो सकता है। उत्तर प्रदेश में दलितों का मत 21 प्रतिशत और मुसलमानों का करीब 18 प्रतिशत है। 14 प्रतिशत ब्राह्मण प्रदेश की करीब डेढ़ सौ सीटों पर खेल बदल सकता है। लेकिन, ये भी सच है कि 18 प्रतिशत मुसलमान पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित के साथ मिलकर मायावती को बड़ी बढ़त दिला सकता है। कुल मिलाकर स्वाति सिंह के पक्ष में भावनात्मक रूप से सवर्णों का जुड़ना, कांग्रेस का भी सवर्ण वोटों के लिए हर कोशिश करना और दलितों पर हो रहे हमलों के बाद दलित-मुसलमान गठजोड़ की नई राष्ट्रीय परिकल्पना ने मायावती को विधानसभा चुनाव की रणनीति सर्वजन से मुस्लिम और बहुजन करने का बड़ा स्वाभाविक आधार दे दिया है। 
(ये लेख QuintHindi पर छपा है)

Friday, July 22, 2016

दलित-स्त्री विमर्श का स्वर्णकाल!

न्यूज एजेंसी ANI से बात करते हुए दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह
12 साल की है ये बच्ची। लेकिन, दलित नहीं है। किसी राजनीतिक दल के समर्थक भी इसके पीछे नहीं हैं। इसके पिता दयाशंकर सिंह भारतीय जनता पार्टी के उत्तर प्रदेश के उपाध्यक्ष थे। एक शर्मनाक बयान दिया। उस पर तय से ज्यादा प्रतिक्रिया हुई। संसद भी चल रही थी। मोदी के गुजरात में दलितों पर कुछ अत्याचार की घटनाएं आ रही थीं। मामला दलित विमर्श के लिए चकाचक टाइप का था। उस पर महिला विमर्श भी जुड़ा, तो चकाचक से भी आगे चमत्कारिक टाइप की विमर्श की जमीन तैयार हो गई। सारे महान बुद्धिजीवी मायावती की तुलना भर से आहत हैं। देश उबल रहा है। दलित-स्त्री विमर्श अपने स्वर्ण काल तक पहुंच गया है। इस दलित-स्त्री विमर्श के स्वर्णकाल में एक 12 साल की बच्ची को डॉक्टर के पास पहुंचा दिया। लखनऊ के हजरतगंज से लेकर देश भर से इस बच्ची को बसपा कार्यकर्ता पेश करने को कह रहे हैं। दयाशंकर की किसी भी राजनीति में इसका इकन्नी का भी योगदान नहीं है। इस बच्ची ने कभी किसी के खिलाफ कोई बयानबाजी नहीं की है। Mayawati मायावती के बाद बसपा में अब अकेले बचे बड़े नेता की अगुवाई में दयाशंकर की पत्नी और बेटी को बसपा कार्यकर्ता मांग रहे थे। दयाशंकर सिंह की पत्नी Swati Singh स्वाति सिंह का कहना है कि बसपा के लोग उनके परिवार का मानसिक उत्पीड़न कर रहे हैं। वो डरी हैं। सुरक्षा मांग रही हैं। वो कह रही हैं कि मायावती के खिलाफ FIR कराएंगी। दलित-स्त्री विमर्श वालों को पता नहीं जरा भी शर्म आ रही है या वो खुश हैं कि चलो अब हम दयाशंकर की पत्नी-बेटी को जी भरकर अपमानित होता देख सके। बहनजी के अपमान का बदला पूरा हुआ। वो बच्ची कह रही है कि नसीम अंकल मुझे पेश होने के लिए कहां आना है, बता दीजिए। पता नहीं इस पर हम समाज के तौर पर या फिर राजनीति के तौर पर कैसे प्रतिक्रिया देंगे। दिक्कत तो ये भी है कि यूपी का चुनाव नजदीक है। भला कौन दल साहस दिखाएगा कि Dayashankar Singh दयाशंकर की बेटी के अधिकारों पर भी बात कर सके। इस देश का दलित-स्त्री विमर्श यहां तक पहुंच गया है। इसके लिए समाज के ठेकेदारों को बधाई देनी चाहिए। बाबा साहब को विनम्र श्रद्धांजलि। पता नहीं वो ऐसे ही शोषित समाज का बदला लेना चाहते थे या इससे कुछ कम ज्यादा। ये सब मैं नहीं तय कर सकता। मैं तो न दलित हूं, न स्त्री। मेरी तो और सलीके से बत्ती लगा दी जाएगी। यही आज की राजनीति और समाज की सच्चाई है।

Wednesday, July 20, 2016

हम दलितों-महिलाओं के सम्मान के लिए गंभीर हो रहे हैं

लीजिए उत्तर प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह को पद से हटा दिया गया। भारतीय जनता पार्टी इस कदर डरती है। दूसरी पार्टियों में ऐसी तुलना करने वाले को तरक्की मिल जाती है। लेकिन, छोड़िए इसे। सवाल ये है कि क्या दयाशंकर के बयान के मूल पर चर्चा होगी। दयाशंकर का बयान और पूरे उत्तर प्रदेश में हर किसी के संज्ञान में ये बात है कि टिकट का ज्यादा दाम मिला नहीं कि कम दाम वाले का टिकट बसपा से कटा नहीं। लेकिन, इस पर क्यों बात करना। इससे कोई लोकतंत्र मुश्किल में थोड़े ना है।


अच्छा मान लीजिए कि किसी ब्राह्मण, सवर्ण, पुरुष अध्यक्ष वाली पार्टी पर कोई पिछड़ों या दलितों वाली पार्टी का नेता ऐसे ही आरोप लगाता कि उस पार्टी में ऐसे टिकट बदल दिए जाते हैं कि वेश्याएं भी पीछे छूट जाएं, तो भी क्या ऐसे ही प्रतिक्रिया होती। क्योंकि, दलित या महिला होने के नाते तो कोई आरोप अभी भी नहीं लगा है। लेकिन, राजनीति में ऐसे सहूलियत हो जाती है और फिर खांचे में राजनीति में ज्यादा मुश्किल भी नहीं होती। बेवकूफ समर्थक उसी खांचे को आराध्य मान लेते हैं। भले ही मूर्तिपूजा छोड़ दें।

Friday, July 27, 2012

नौजवानी सत्ता सुधारने में लगे तो, बेहतर

" राजनीति की समस्या यही है वोट बटोरने के लिए मायावती की मूर्तियां तोड़वाने और पार्क में अस्पताल खुलवाने का बयान जरूरी था। अब यही चुनाव के समय वोट बैंक की जरूरत सत्ता में आने के बाद अखिलेश की मुसीबत बन रही है। चलिए बनवाइए मूर्ति। देखिए कितने दिन संभाल पाते हैं। "

Saturday, July 07, 2012

का भई अखिलेश, पिताजी के आगे नहीं बढ़ोगे ?

‎5 साल अखिलेश यादव और उनके पिता मुलायम सिंह यादव के साथ उत्तर प्रदेश के समाजवादी मायावती की कुर्सी के पीछे पड़े रहे। आखिरकार मायावती वाली कुर्सी मुलायम ने अखिलेश को सौंप दी। सबने सोचा यूपी में नए जमाने का मुख्यमंत्री कुछ नया लाएगा। लेकिन, अभी जो, फैसले होते दिख रहे हैं उससे लग रहा है कि अगले 5 साल अखिलेश, उनकी सरकार और उनके समाजवादी मायावती सरकार के पिछले 5 साल के फैसले के पीछे पड़े रहेंगे। नतीजा- उत्तर प्रदेश तो, पीछे ही जाएगा। इससे बेहतर तो, बहन जी ही थीं। कम से कम आगे वाला काम तो, करती थीं। शाने अवध अब उनके लखनऊ के पार्क में बढ़िया अहसास कराती है। F 1 ट्रैक पर यूपी भी रफ्तार भरने का अहसास दिलाता है। बंद ही सही लेकिन, शानदार नोएडा का पार्क भी विकसित देशों के शहरों से टक्कर लेता दिखता है। यहां तो, बस सारी मेहनत अखिलेश की पलटने में ही जाती दिख रही है।

Saturday, September 03, 2011

मायावती के दलित उत्थान की एक बानगी

मायावती की सरकार में दलित उत्थान हो रहा है। सचमुच काफी हद तक हुआ भी है। मायावती मनुवाद को गाली देतीं हैं। मायावती ने शादी नहीं की है। परिवारवाद का आरोप कम ही लगेगा। लेकिन, मायावती के खासमखास स्वामी प्रसाद मौर्य देखिए क्या मिसाल पेश कर रहे हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य प्रतापगढ़ जिले से हैं। अब बेटे  को ऊंचाहार विधानसभा से चुनाव लड़ाना चाह रहे हैं। भतीजे को पहले ही प्रतापगढ़ जिला पंचायत का अध्यक्ष बना चुके हैं। हमें इस सबसे कोई एतराज नहीं है। लेकिन, देखिए लोकतंत्र में कितने ठसके से ऊंचाहार विधानसभा के लोगों से अपील कर रहे हैं। पूरी होर्डिंग पढ़िए सब साफ हो जाएगा। ये साहस तो सोनिया गांधी भी बेटे राहुल के लिए नहीं कर पाएंगी।

Wednesday, June 09, 2010

उत्तर प्रदेश में पावर फुल NDA

चौंकिए मत उत्तर प्रदेश में बहन मायावती की बहुजन समाज पार्टी भले ही सत्ता में है लेकिन, यहां चलती NDA की है। कम से कम सरकारी अधिकारियों के लिए तो सुकून का यही रामबाण है। दरअसल ज्यादा कमाई वाले विभागों में पोस्टिंग के लिए पैसे देना तो अभ पुरानी बात हो गई है। नई-- वैसे इसको भी लागू हुए काफी टाइम हो गया है—बात ये है कि अगर किसी अच्छी जगह (मलाईदार-कमाई वाली) टिके रहना है तो, NDA देना ही होगा।

NDA यानी नॉन डिस्टर्बेंस अलाउंस। मायावती सरकार में इस समय पैसे लेने-देने के मामले में गजब की पारदर्शिता है। नौकरी चाहिए रेट तय हैं। नौकरी में बने रहना है रेट तय हैं। और, अब तो, हाल ये है कि किसी पोस्ट पर जरा थमकर रहना है तो, उसका पैसा अलग से देना होता है। एक मित्र से बात हो रही थी तो, उसने बताया कि सिंचाई विभाग बाढ़ प्रखंड में एक इंजीनियर साहब 50 लाख रुपए देकर पहुंचे और दो महीने बाद ही फिर से उन्हें वहां पर टिके रहने के लिए NDA यानी नॉन डिस्टर्बेंस अलाउंस देना पड़ा। अब ये रकम कम-ज्यादा हो सकती है। लेकिन, चल ऐसा ही रहा है।

हमारे एक रिश्तेदार जो, पंचायत विभाग में हैं, NDA यानी नॉन डिस्टर्बेंस अलाउंस न देने की वजह से एक साल में सात बार स्थानांतरण झेल चुके हैं। जय मायाराज।


Wednesday, March 24, 2010

मुलायम ने हराया डिंपल यादव को!

 अब तो ये सबको पता चल चुका है कि मुलायम सिंह यादव नहीं चाहते थे कि उनके घर की बहू डिंपल यादव संसद में चुनकर पहुंचे। दरअसल मुलायम को डर ये था कि संसद में डिंपल के पहुंचने पर लड़के डिंपल को देखकर सीटी बजाएंगे और भला ये नेता जी को कैसे बर्दाश्त होता। बेवजहै बेचारे अमर सिंह इस इल्जाम के ही भार से दबकर बरसों की समाजवादी निष्ठा छोड़कर अब क्षत्रिय सम्मान जगाने में जुट गए हैं।

आज मुलायम सिंह ने महिला आरक्षण के विरोध में वो सारी हदें लांघ दीं जो, उनके और लालू यादव के सांसद राज्यसभा और ये दोनों यादव नेता संसद के बाहर अब तक नहीं लांघ पाए थे। मुलायम सिंह यादव ने भरी सभा में कहाकि --- वर्तमान विधेयक में कैसी महिलाएं आएंगी। मैं आप सबके सामने कहना नहीं चाहता। इसमें बड़े-बड़े उद्योगपतियों, बड़े-बड़े अफसरों के घरों की लड़कियां आएंगी। और, उन्हें देखकर (महिला सांसदों को) लड़के सीटी बजाएंगे। उन्होंने इस बयान पर फिर से मुहर लगाते हुए कहाकि हां ऐसी ही लड़कियां चुनकर आएंगी। उसके बाद उन्होंने गांव-गांव में बड़े आक्रमण की तैयारी भी करने को अपने समाजवादी कार्यकर्ताओं को कह दिया।

अब इस पर अगर कहीं से कोई डिंपल यादव की भा राय ले आता तो, सचमुच पता चल जाता कि नेताजी की राय की उनके घर में ही क्या हैसियत है। खैर, नेताजी तो इस पर बयान देने के लिए टीवी चैनल वालों को तुरंत मिले नहीं। मिल गए मुलायम सिंह के नए ठाकुर सिपहसालार मोहन सिंह। लेकिन, ये क्या कुतर्क में तो मोहन सिंह, अमर सिंह को भी पीछे छोड़ने की कसम खाकर बैठे दिख रहे हैं। पहले तो मोहन सिंह ने कहाकि नेताजी ने ऐसा नहीं कहाकि महिला सांसदों को देखकर लड़के सीटी बजाएंगे। एंकर के ये कहने पर कि उन्होंने कहाकि बड़े अफसरों, बड़े उद्योगपतियों के घरों की लड़कियां महिला आरक्षण से आएंगी और उन्हें देखकर लड़के सीटी बजाएंगे।

मोहन सिंह ने भी कहाकि – जब संभ्रांत घरों की महिलाएं, लड़कियां आएंगी तो, यही होगा। मुझे तो लगाकि मोहन सिंह को ये क्या हो गया है। लेकिन, फिर समझ में आया कि भइया यही मुलायम का समाजवाद है जिसमें महिलाओं को सीटी बजाने से ज्यादा के लायक समझा ही नहीं गया है। इसीलिए उन्होंने शायद बड़े नेताजी की बहू डिंपल यादव को चुनाव हरवा दिया होगा। वैसे एक महिला ने मुलायम सिंह यादव की पूरी राजनीति की सीटी बजा रखी है। और, ये महिला किसी बड़े अफसर या बड़े उद्योगपति यहां तक कि बड़े नेता के घर की भी नहीं है। नेताजी इसी सीटी बजने से डर रहे हैं।

Thursday, July 23, 2009

दलितों के बलात्कार की कीमत मिलती रहेगी

माफ कीजिएगा मैं ये लिखना नहीं चाहता था। लेकिन, न्यूज एजेंसी PTI पर आई इस खबर के बाद मैं खुद को रोक नहीं पाया। अपनी बहनजी की ही सरकार में दलितों का सम्मान बच नहीं पा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ने तो एक बयान देकर खुद का और पार्टी का काम फिट कर लिया। लेकिन, उस बयान का झटका (अंग्रेजी में Aftereffect) एक के बाद एक लगता ही जा रहा है।


अब सुनिए जरा यूपी के गृह सचिव महेश कुमार गुप्ता क्या कहा रहे हैं। मैं PTI पर आया उनका बयान वैसे का वैसा ही छाप रहा हूं- "Now, District Magistrates in presence of concerned SP and DIG will hand over cheques to Dalit rape victims"। यानी प्रदेश सरकार दलितों की इज्जत नहीं बचा पाएगी। इसीलिए दलितों के बलात्कार को वो एक सामान्य घटना मान रही है जो, होती रहेगी और इसीलिए इस पर कानून बना दिया कि अब पीड़ित दलितों को चेक जिलाधिकारी ही दे दिया करेंगे। यानी दलितों के साथ व्यवहार वैसा ही होता रहेगी जिसके खिलाफ लड़झगड़कर, मायावती के पीछे जय भीम-जय भारत का नारा लगाकर इन्होंने मायावती को राज्य का 'मुख्तार' बना दिया है। यानी इनकी पूज्य बहनजी इनके सम्मान बचाने का भरोसा नहीं दे सकतीं। लेकिन, बहनजी जगह-जगह पत्थर के हाथी जरूर लगवा रही हैं जिससे इन्हें लगे कि सत्ता में इनकी हिस्सेदारी बनी रहेगी।



अब ये भी जान लीजिए कि दलित लड़कियों-महिलाओं के बलात्कार की कीमत देने के तरीके में ये बदलाव इसलिए हुआ क्योंकि, कांग्रेस अध्यक्ष रीता जोशी ने ये कह दिया था कि जितनी रकम सरकार पीड़ित दलितों के जख्म पर मरहम लगाने के लिए दे रही है उससे ज्यादा राज्य के पुलिस प्रमुख के हेलीकॉप्टर से वहां पहुंचने पर खर्च हो जाता है। खबर के मुताबिक, एक जून से DGP राज्य में 18 जगहों पर पीड़ित दलितों को चेक देने जा चुके हैं।


अब अगर राज्य सरकार को जरा भी शर्म होती तो, ऐसे नियम बदलने और उसकी जानकारी के लिए गृह सचिव को न तैनात करती। अच्छा तो ये होता कि मायावती ये दिखा देतीं कि पहले तो किसी दलित क्या राज्य की किसी लड़की अस्मिता से कोई खिलवाड़ नहीं कर पाएगा। और, उस कानून के बारे में उनका गृह सचिव मीडिया को बताता जिसे सुनकर किसी बदमाश, लफंगे की हिम्मत न होती कि किसी की इज्जत की ओर आंख उठाकर भी देखता।

Thursday, July 16, 2009

एक बयान से काम बन गया

मायावती को लगता है कि एक प्रेस कांफ्रेंस हर मर्ज की दवा है। उनकी सरकार कितना भी नरक कर दे वो, समझती हैं कि एक बार टीवी-अखबार के जरिए जो, उन्होंने बोल दिया। जनता उसे संत वचन की तरह आखिरी सत्य मान लेगी। लेकिन, अब बहनजी माफ कीजिएगा- आप गलती कर रही हैं।


गलती ये कि कांग्रेस जो चाह रही है वही आप कर रही हैं। कांग्रेस चाह रही है कि आप रीता 'बहुगुणा' जोशी को जेल में बंद कर दें। ज्यादा दिन तो भारतीय कानून की कोई धारा है नहीं जो, नेताओं को जेल में रख सके। वो, आपने कर दिया है। अब अगर रीता बहुगुणा जोशी जेल में 14 दिन बिता देती हैं तो, ये 14 दिन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए दिए गए स्टिमुलस पैकेज से भी ज्यादा कारगर साबित होगा।


मैं इस बहस में तो पड़ना ही नहीं चाहता कि कौन कितना सभ्य-असभ्य है। उत्तर प्रदेश की खराब कानून व्यवस्था के खिलाफ मुरादाबाद में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भाषण दे रही थीं। कांग्रेसी कार्यकर्ता आजकल फिर जरा ज्यादा जुटने लगे हैं, जुट गए। भाषण की हर लाइन पर ताली पीट दे रहे थे। रीताजी खांटी नेता है ये तो मैं निजी तौर पर जानता हूं, बहुत नजदीक से इलाहाबाद में देखा भी है। हेमवती नंदन बहुगुणा की असल वारिस होने का सबूत वो हर राजनीतिक कदम से साबित कर देती हैं। बस यहीं वो, राजनीतिक बहुगुणा के खून का प्रवाह तेज हो गया। ताली और तेज पिटवाने के चक्कर में जुबान तेज चल गई।


रीता बहुगुणा जोशी ने कह दिया- प्रदेश में बलात्कार की शिकार लड़कियों को मायावतीजी 25 हजार, 75 हजार मुआवजा दे रही हैं। मैं कह रही हूं कि ये पैसा महिलाओं को उनके मुंह पर मार देना चाहिए। अगर मायावती का रेप हो जाए तो, मैं एक करोड़ मुआवजा दे दूंगी। ये बयान कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में जोश भर गया। अब इसमें तो कोई संदेह है नहीं कि इस देश में इसी तरह बयान बहादुर ही राजनीति में आगे जा पाते हैं।


इसके बाद बसपा के कार्यकर्ता अपनी बहनजी के अपमान से इतने गुस्साए कि रीता जोशी का लखनऊ का घर जलाकर खाक कर दिया। मुरादाबाद से गाजियाबाद पहुंचते-पहुंचते रीता जोशी गिरफ्तार हो गईं। जमानती-गैरजमानती मिलाकर 7-8 धाराएं यूपी सरकार ने चिपका दीं। अब इसमें मैं एक चीज जो समझ नहीं पाया कि ये SC/ST एक्ट किस आधार पर लगा है। इसमें कोई जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल तो हुआ ही नहीं था। जबकि, इससे पहले खुद बहनजी के जाति सूचक शब्दों के इस्तेमाल के बावजूद उन पर डरावना SC/ST एक्ट नहीं लगा था। ।



खैर ये वही मायावती हैं जिन्होंने जनवरी 2007 में मुलायम सिंह यादव के जंगलराज के खिलाफ कुछ इसी तरह की अभद्र (पता नहीं कितने नेता इसे अभद्र मानेंगे कितने रीता के बयान को) भाषणबाजी की थी, अच्छी-खासी रैली में। तब मायावती के खिलाफ कुछ नहीं हुआ था। आज तक मायावती ने उस बयानबाजी के खिलाफ माफी भी नहीं मांगी है। रीता जोशी तो, तुरंत माफी मांगकर दलित अपमान के बोझ से मुक्त हो गईँ। अब भले ही इसे बसपा इसे दलित अपमान का मुद्दा बनाकर राजनीतिक फायदा उठाना चाहे। सच्चाई यही है कि उनके कर्म अब दलितों को नए सिरे से जगा रहे हैं। यूपी में गंगा में जितना पानी बह चुका है वो, साफ बता रहा है कि मायावती का दलित कार्ड अब खास काम नहीं आ पाएगा।


बसपा का कुछ बने न बने। भाई सतीश मिश्रा फिर चमक गए हैं। उनकी फोनर प्लेट बनाकर टीवी चैनलों पर करीब 20 मिनट चिपकी रही। लोकसभा में मिश्राजी कुछ कानूनी बातें भी कर रहे थे। अब हो सकता है कि बसपा के किनरिया दिए गए सतीश मिश्रा की बजार कुछ दिनों के लिए फिर चमक जाए।


सारे टीवी चैनल रीता के बयान की निंदा कर रहे हैं लेकिन, फुटेज या तो, गिरफ्तारी के बाद एक महिला पुलिस अधिकारी को धकियाते रीता की तस्वीरें चल रही हैं। या फिर मायावती का पुतला फूंकते कांग्रेसी कार्यकर्ता और पुलिस के बीच की धक्कामुक्की की। कुछेक चैनल तो, मुंबई हमले की तरह से रीता के जले घर के कमरे, खिड़की--दरवाजों की मार्मिक कहानी सुना रहे हैं। एक लाइन की बात ये है कि ये टीवी पर टूं .... टूं .... करके चलने वाले एक और बयान ने कांग्रेस और रीता बहुगुणा जोशी को चमका दिया है। कांग्रेस भले ही अभी यूपी सरकार को बर्खास्त करने की मांग नहीं कर रही है। लेकिन, बेटे वरुण के दर्द से उबर न पा रही मेनका और किसी भी तरह मायाराज के खत्म होने का इंतजार कर रही समाजवादी पार्टी ने राष्ट्रपति शासन की मांग कर डाली है। एक बयान ने वरुण को बंपर वोट से लोकसभा तो पहुंचा ही दिया है।


वैसे तो, कांग्रेस राष्ट्रपति शासन लगाने की उस्ताद है लेकिन, फिलहाल वो ऐसा नहीं करेगी। क्योंकि, उसे साबित करना है कांग्रेस अपने दम पर सत्ता में आई है। यूपी में पार्टी की मजबूती के रास्ते उसे देश का राज अगले कई सालों के लिए पक्का दिख रहा है। अब कोई राजनीतिक जानकार इसे कैसे भी देखे। सभ्य समाज मायावती, रीता के बयानों-कर्मों में से किसी को अच्छा बुरा बताए। मैं तो इसे सिर्फ ऐसे देख रहा हूं कि कांग्रेस का काम बन गया है। राहुल के चमत्कार को रीता का ये बयान 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में और बड़ा बना देगा।

Friday, July 10, 2009

ये सब जनता की भलाई के लिए है!

सुप्रीमकोर्ट ने नोएडा में बन रही मायावती की मूर्तियों पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। सुप्रीमकोर्ट का कहना है कि वो तब तक इसमें दखल नहीं दे सकती जब तक ये साबित न हो जाए कि इसमें जनता के पैसे का गलत इस्तेमाल हो रहा है। अब मुझे समझ में नहीं आता कि जनता के पैसे से सैकड़ो हाथी और मूर्तियां बनवाना दुरुपयोग नहीं तो क्या जनता की भलाई है?

लगे हाथ इसे भी पढ़ लीजिए - पत्थर के सनम

Tuesday, June 30, 2009

पत्थर के सनम ... बड़ी भूल हुई

पत्थर के सनम तुझे हमने मुहब्बत का खुदा जाना ... बड़ी भूल हुई। फिल्म में ये गाना दो लोगों के निजी प्रेम संबंधों के उम्मीदों पर खरा न उतरने को बखूबी बयां करता है। लेकिन, गीत लिखने वाले को शायद ये अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि ये लाइनें किसी ऐसी शख्सियत पर बखूबी फिट बैठेगा जो, करोड़ो की उम्मीदों को तोड़ रही है। धूल-धूसरित कर रही है।


मनुवाद, ब्राह्मणवाद, पूंजीवाद की विरोधी मायावती की मूर्तियां लखनऊ में हर थोड़ी दूर पर नजर आने लगी हैं। मायावती शायद देश की पहली नेता होंगी जो, जीते जी ही खुद अपनी मूर्तियां लगाने पर जुटी हैं। गांव-समाज में एक देसी कहावत अकसर सुनने को मिल जाती है फलनवा बड़ा आदमी रहा। अपने जीते जी मरे के बादौ क इंतजाम कई गवा। काहे से कि केहु ओकरे करै वाला नहीं रहा। मायावती भी कुछ गांव-समाज के उसी बड़े आदमी जैसा बर्ताव कर रही हैं। लेकिन, मामला सिर्फ ये नहीं है कि मायावती ने किसी से प्रेम नहीं किया-शादी नहीं की तो, उनकी फिकर करने वाला भी कैसे होगा। दरअसल, ये मायावती तो, उन करोड़ों लोगों की उम्मीद थी जिन्हें लगता था कि ये हमारे लिए बहुत कुछ करने के लिए शादी-ब्याह नहीं कर रही। अपना जीवन-करियर सब त्याग दिया।


ये वो मायावती थी जिसकी मूर्ति कहीं नहीं थी लेकिन, यूपी का करोड़ो दबा-कुचला अधिकारविहीन पीछे डंडा-झंडा लिए गर्मी-पानी-जाड़ा में मायावती के नाम का झंडा बुलंद करता घूम रहा था। फिर मायावती को ये करने की क्यों सूझी। इन करोड़ो लोगों पर मायावती को भरोसा क्यों नहीं रहा कि ये उनके मरने के बाद भी उनका नाम उसी बुलंदी पर रखेंगे जहां आज बिठा रखा है।


ये वो लोग थे जो, मायावती के बनाए अंबेडकर पार्क में इकट्ठा होते हैं। एक दिन की रोजी-रोटी त्यागकर लखनऊ पहुंचते हैं। मनुवाद की खिलाफत में मायावती के साथ खड़े होने के लिए गंगा का किनारा छोड़कर लखनऊ के अंबेडकर पार्क में बनी नहर को भीमगंगा बना देते हैं। गंगा से पवित्र मानकर उसी पानी से आचमन करते हैं।

अब देखिए मायावती क्या कर रही हैं। मायावती इन अधिकार विहीन लोगों को अधिकार दिलाने की मृगमरीचिका दिखाकर सत्ता में आ गईं। अधिकार छीनने वालों की जिस टोली के मुलायम के साथ होने का ढिंढोरा पीटकर ये सत्ता में आईं सत्ता में आते ही उन्हीं लोगों को मंच पर खड़ा कर दिया। और, उन अधिकार विहीन लोगों से कहा- ये आपके मसीहा हैं इन्हें अधिकार दीजिए ये, आपके अधिकारों के लिए लड़ेंगे।


हाथी इन अधिकार विहीन लोगों की ताकत था। फटे पुराने नीले कपड़े पर हाथी लहराता देख इन्हें अपनी ताकत का अहसास होता था। अब लंबी-लंबी कारों पर साटन-मखमल के कपड़े पर हाथी लहरा रहा है। इन्हें लगता है कि जैसे ठगे गए हों। लखनऊ में खड़े 60 हाथी इन पर भार बन रहे हैं। बहनजी और उनके साथ दूसरे अधिकार विहीनों के लिए लड़ने वाले नेताओं की मूर्तियों पर सिर्फ लखनऊ में 2700 करोड़ रुपए खर्च हो गए। और, कहते हैं न कि हाथी पालने से ज्यादा उसे खिलाना भारी पड़ता है। कुछ ऐसा ही है। यूपी के अधिकार विहीनों की मेहनत की कमाई का 270 करोड़ रुपए हर साल सिर्फ इन पत्थर की मूर्तियों और हाथिय़ों को खिलाने में (मरम्मत) बरबाद होगा।


गांव-गिरांव में इन अधिकार विहीनों की जमीन का पट्टा नहीं हो पा रहा है। रत्ती-धूर जमीन में ये परिवार चला लेते हैं। जमींदार टाइप के लोग इनकी जमीन पर कब्जा कर लेते हैं। इनको गांव की जमीन दिलाने का वादा करने वाला मायावती अब यूपी की सबसे बड़ी जमींदार हो गई है। जमींदार है इसलिए जमींदारी भी कर रही है। सिर्फ लखनऊ में 413 एक़ड़ की इस जमींदारी कब्जे की जमीन पर पत्थर के हाथी, पत्थर की मायावती, पत्थर के कांशीराम और पत्थर के दूसरे नेता खड़े हैं जो, जमींदारी मिटाने की लड़ाई लड़ रहे थे। पूरा का पूरा वो आंदोलन पत्थर होता दिख रहा है जो, नोएडा के एक गांव की अधिकार विहीन सामान्य महिला को कुछ महीने पहले तक देश की प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने की जमीन बना चुका था।


और, ये आंदोलन खत्म होगा ऐसा नहीं है। सिर्फ अधिकार विहीनों की ही बात क्यों। मायावती की जिस सोशल इंजीनियरिंग ने यूपी में सारे समीकरण ध्वस्त कर दिए थे। वो, भी टूटेगा। सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय नारा भर बनकर रहा गया है। मायावती के नजदीकी हिताया और सिर्फ उन्हीं का सुखाय। और, सबको सिर्फ इन पत्थरों में ही अपना सुख खोजना होगा। 413 एकड़ जमीन और 2700 करोड़ रुपए इतनी बड़ी रकम तो, थी ही कि अधिकार विहीनों (5 करोड़ 90 लाख लोग इस प्रदेश में गरीबी रेखा के नीचे हैं) के अधिकार कुछ तो मिल ही जाते।

बात सिर्फ लखनऊ की ही नहीं है। मायावती अपने आखिरी निशान हर जगह छोड़ देना चाहती हैं। दिल्ली से नोएडा घुसते ही लखनऊ जैसे ही गुलाबी राजस्थानी पत्थरों की ऊंची दीवार दिखने लगती है। करीब 3 किलोमीटर का ये पूरा क्षेत्र जंगल था-हरा-भरा था। इन पत्थरों की ऊंची दीवारों के बीच में पत्थर के हाथी और मूर्तियां हैं जो, गर्मी की चिलचिलाती धूप में चिढ़ पैदा करते हैं। मेरा मन इन मूर्तियों को ढहाने का होता है।


नोएडा के दूर-दराज गांवों में भी लोगों के रहने के लिए घर मिलना मुश्किल है। इनता महंगा कि आम आदमी तो, सिर्फ देखते हुए जिंदगी बिता लेता है। ये पत्थर के जंगल वहां तैयार हो रहे हैं जहां, ठीक सामने की जमीन पर करोड़ो के बंगले हैं। मायावती का मनुवाद विरोध एक चक्र पूरा कर चुका है। करोड़पति बंगले वाले और मायावती और उनके पहले के मनुवाद विरोध नेता पत्थर के ही सही लेकिन, पड़ोसी हैं। आमने-सामने रहते हैं। खैर, मैं भी यूपी में ही रहता हूं इसलिए ज्यादा हिम्मत नहीं करूंगा लेकिन, मायावती के पीठ पीछे ये धुन जरा ऊंची आवाज में सुनने का मन करता है।

पत्थर की मायावती ... तुझे हमने दलितों का खुदा जाना ... बड़ी भूल हुई ...

पीछे से बैकग्राउंड स्वर – भूल हुई तो, भुगतो


और, सुना-पढ़ा कि सुप्रीमकोर्ट अब इन मूर्तियों के बनने, जनता के पैसे की बर्बादी पर सवाल पूछ रहा है –

ऑर्डर .. ऑर्डर .. ऑर्डर .. ये अदालत का मामला है चलता ही जाए

Tuesday, March 03, 2009

पिटते राष्ट्रीय मुद्दे और राष्ट्रीय पार्टियां

लोकसभा चुनाव का एलान हो गया है। देश भर से चुने गए सांसद अपनी पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के लिए एक दावेदार पेश करेंगे जो, देश चलाने का दावा करेगा। लेकिन, चुनावी महासमर से पहले इतना तो साफ हो गया है कि प्रधानमंत्री भले ही दोनों राष्ट्रीय पार्टियों (कांग्रेस या बीजेपी) में से किसी का किसी तरह से बन जाए। देश पर राज अब क्षेत्रीय पार्टियां ही करेंगी। क्षेत्रीय पार्टियों का दबाव होगा, स्थानीय मुद्दे हावी होंगे। राष्ट्रीय मुद्दों पर भाषण खूब होंगे लेकिन, वोट नहीं मिलेंगे।


मैं अगर कह रहा हूं कि सब कुछ क्षेत्रीय-स्थानीय हो गया है। राष्ट्रीय मुद्दा, राजनीति पीछे छूट रहे हैं तो, ऐसे ही नहीं कह रहा हूं। कल जब गोपालस्वामी चुनाव की तारीखों का एलान कर रहे थे तो, देश की दोनों बड़ी पार्टियां राज्यों में अपने सांसद बढ़ाने के लिए स्थनीय-क्षेत्रीय दलों को साष्टांग प्रणाम कर रहीं थीं। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस, लेफ्ट का गढ़ ढहाने के लिए ममता के सहारे थी तो, उत्तर प्रदेश में उसे मुलायम-अमर की जोड़ी का सहारा है जिन्होंने साम-दाम-दंड-भेद से यूपीए सरकार को परमाणु समझौते के मुद्दे पर बचा लिया था।



मामला सिर्फ इतना ही नहीं है कि कांग्रेस का हाथ इन क्षेत्रीय पार्टियों से मिलने के लिए बेकरार है, असल बात तो कांग्रेस को क्षेत्रीय पार्टियों का पिछलग्गू बनने से गुरेज नहीं है। बंगाल में कांग्रेस के संकटमोचक प्रणव मुखर्जी प्रदेश अध्यक्ष हैं। लेकिन, राष्ट्रीय पार्टी के इस अंतराष्ट्रीय संकटमोचक के पास अपनी पार्टी की राष्ट्रीय उपस्थिति बनाए रखने का कोई नुस्खा नहीं है।


लेकिन, संकटमोचक महाराज पर ही सवाल क्यों खड़ा किया जाए? जब त्यागी सोनिया माता के साथ देश भर में कांग्रेस को खड़ा करने की अनोखी योजना तैयार करने का दावा करने वाले राहुल भइया और नौजवान आंधा-प्रियंका गांधी अपनी खानदानी विरासत वाले राज्य उत्तर प्रदेश में ही कोई ढंग की योजना नहीं दे पा रहे हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के समय दिल्ली में गांधी परिवार के एक निकट व्यक्ति ने मुझसे कहाकि राहुल भइया की नजर लोकसभा चुनाव पर है। विधानसभा चुनाव तो सिर्फ रिहर्सल भर है।


योजना ये थी कि राहुल के विदेशों में पढ़ी नौजवानों की एक टीम लोकसभा चुनाव का खाका तैयार करेगी। विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए मजबूत सीटों को तलाशा जाएगा और पुराने-नए चेहरों को मिलाकर 15-20 सांसद उत्तर प्रदेश से भेजने को कोशिश होगी। अब वो कोशिश कहां तक पहुंची है ये तो मुझे नहीं पता। लेकिन, कांग्रेस का हाल ये है कि 80 सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में मुलायम उसे 17 से ज्यादा देने को तैयार नहीं हैं। वो, भी तब जब बहनजी के प्रकोप से मुलायम डरे-डरे से घूम रहे हैं। अब 17 सीटं लड़ने को ही मिलेंगी तो, 15-20 सांसद जीतेंगे कैसे ये गणित तो, किसी चमत्कार से ही सिद्ध हो पाएगा।


राष्ट्रीय पार्टियों का हाल कितना बुरा है। इसका सही-सही अंदाजा उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के अभी हुए विधानसभा चुनावों से मिल जाता है। इन दोनों ही राज्यों में सत्ता में काबिज बसपा और लेफ्ट फ्रंट को अभी हुए विधानसभा चुनावों में करारी हार झेलनी पड़ी है। दोनों ने ही पूरा दम लगा रखा था। लेकिन, सब टांय-टांय फिस्स हो गया। काबिलेगौर बात ये कि इसका फायदा मिला दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों को- उत्तर प्रदेश में सपा और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस। दोनों ही जगह कांग्रेस-बीजेपी बहुत पिछड़ी हुई दिखीं।


पश्चिम बंगाल की विश्णुपुर (पश्चिम) विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने सीपीएम प्रत्याशी को 30 हजार वोटों के भारी अंतर से हरा दिया। लेकिन, राजनीति की नब्ज बताने वाली हार थी उत्तर प्रदेश की भदोही विधानसभा सीट से बहनजी की बसपा की। भदोही सीट मई 2007 में बसपा ने 5000 वोटों से जीती थी। अब करी इतने ही वोटों से सपा ने ये सीट जीत ली है।


भदोही विधानसभा सीट जीतने के लिए मायावती ने पूरी ताकत झोंक दी थी। 80 हजार दलित, 55 हजार मुस्लिम और इतने ही ब्राह्मण मतदाताओं वाली सीट पर बहनजी के पक्ष में सारे समीकरण दिख रहे थे। लेकिन, सब उल्टा हो गया। बावजूद इसके लिए मायावती की रैली हुई। ब्राह्मण-दलित एकता फॉर्मूले को अग्रदूत सतीश चंद्र मिश्रा और उनके खास ब्राह्मण सिपहसालारों – नकुल दुबे, अनंत मिश्रा, राकेशधर त्रिपाठी (सारे मंत्री)- और मायावती सरकार के ताकतवर मुस्लिम चेहरे नसीमुद्दीन सिद्दिकी ने पूरी ताकत झोंक दी थी।


यहां जो वोट मिले हैं वो, राष्ट्रीय पार्टियों की हैसियत को देश के इस सबसे बड़े सूबे में आइना दिखाते हैं। भदोही उपचुनाव में सपा की मधुबाला पासी को 60,507 वोट मिले। दूसरे नंबर पर रहे बसपा के अमर सिंह सरोज को 55,487 वोट मिले। अब जरा दोनों राष्ट्रीय पार्टियों का हाल देखिए। बीजेपी के दीनदयाल सोनकर बसपा, सपा से बहुत पीछे – हां, तीसरे नंबर पर ही- 14,693 वोट ही जुटा पाए। अब आपको लग रहा होगा कि चौथे नंबर पर तो कांग्रेस ही होगी। जी नहीं, कांग्रेस प्रत्याशी को यहां सिर्फ 2,275 वो मिले हैं। जो, क्षेत्रीय में क्षेत्रीय किसी प्रगतिशील मानव समाज पार्टी के प्रत्याशी के 4,258 वोटों से भी कम हैं।


यही वजह है कि लौह पुरुष आडवाणी को अजीत की राष्ट्रीय लोकदल को 7 सीटें देना फायदे का सौदा लग रहा है। लेकिन, ये भी काफी हद तक तय है कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को गाजियाबाद सीट से लोकसभा में पहुंचने का फायदा भले इस गठजोड़ से हो जाए। ज्यादा फायदा अजीत सिंह को ही मिलना है।


ये हाल सिर्फ उत्तर प्रदेश बंगाल का नहीं है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और 7 लोकसभा सीटों वाली दिल्ली को छोड़ दें तो, पूरे देश में राष्ट्रीय पार्टियां क्षेत्रीय पार्टियों के पीछे कदमताल कर रही हैं। यही वजह है कि दिल्ली में बैठे नेताओं का पुराना दंभ – कि लोकसभा चुनाव में तो राष्ट्रीय मुद्दों पर बात होती है- टूट गया है। मुझे क्षेत्रीय पार्टियों के उत्थान से समस्या नहीं है। मुझे समस्या ये है कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग क्षेत्रीय पार्टियों के पीछे जैसे राष्ट्रीय पार्टियां चल रही हैं। वैसे ही हर राज्य में क्षेत्रीयता ही लोकसभा चुनाव पर हावी होती दिख रही है।



राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे रैली में झंडा-बेनर लगाने वाले कार्यकर्ता की तरह दरी पर किनारे बैठाए गए हैं। सजे मंच पर क्षेत्रीयता, जातिवाद, सांप्रदायिकता हावी है। इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार वैसे दोनों राष्ट्रीय पार्टियां ही हैं। आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा, महंगाई, परमाणु करार पर अखबारों, टीवी चैनलों पर बहस तो चलेगी। कोई 4-6-10 हजार लोगों को लेकर मीडिया घरानों के सर्वे में इस पर 50-60 प्रतिशत लोग चिंता भी जताएंगे। लेकिन, देश की दिशा तय करने वाला एक और चुनाव पूरी तरह से क्षेत्रीय हो गया है। ये एक संप्रभु देश का चुनाव नहीं, अलग-अलग छोटे-छोटे देशों की सहमति से बने एक समूह का चुनाव हो रहा है। ये स्थिति थोड़ी बहुत बदल सकती है तो, हमारे-आपके वोट से। लेकिन, इसके लिए बहुत प्रयत्न करना होगा।


(ये लेख अमर उजाला के संपादकीय पृष्ठ पर छपा है)

Friday, February 20, 2009

हाथी पर गुंडे ही गुंडे

देश का संवैधानिक दादा यानी प्रधानमंत्री बनने की इच्छा ने अलग-अलग राज्यों में बाहुबली सांसदों-विधायकों (असंवैधानिक दादाओं) का बड़ा भला कर दिया है। और, इसमें रोक लगाने में अदालतें भी कामयाब नहीं हो पा रही हैं। पता नहीं कितने लोगों को याद होगा कि, अदालत से दोषी करार दिए गए लोगों को संसद-विधानसभा का चुनाव लड़ने से रोकने के लिए बात चल रही थी। लेकिन, अबतक इस पर कुछ ठोस नहीं हो सका। जाहिर है जब देश का दादा बनने के लिएमुकाबला चल रहा हो तो, भला छोटे-मोटे दादाओं के दुष्कर्म रोकने की चिंताभला किसे होती।



और, इसका सबसे बुरा असर दिख रहा है उत्तर प्रदेश पर। प्रधानमंत्री बननेकी इच्छा ने मायावती के मन में ऐसा जोर मारा है कि मायावती जिन्हें मरवाना चाहती थीं (ऐसा भगोड़े अतीक अहमद ने पहली बार टीवी आने के बाद बोला था) अब वही अतीक अहमद हाथी पर सवार होकर लोकसभा में फिर पहुंचना चाहते हैं। जिससे कम से कम लोकतंत्र को बंधुआ बनाए रखकर उसके जरिए अपने दुष्कर्मों को जनता की इच्छा कहने का माद्दा बना रहे।



मायावती के खासमखास मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दिकी इलाहाबाद की नैनी जेल में मिलकर अतीक के साथ इलाहाबाद और आसपास की लोकसभा सीटों को जीतने की योजना बना रहे हैं। यूपीए सरकार के खिलाफ वोट करने के बाद अतीक के सारेकरीबीयों (इलाहाबाद के छंटे बदमाशों) पर मामले हल्के किए जा रहे हैं।



मायावती जब सत्ता में आई तो, चिल्ला-चिल्लाकर सपा के जंगलराज और जंगलराज चलाने वाले बदमाशों के सफाए की बात कह रही थीं। तब से अब तक त्रिवेणी संगम में बड़ा पानी बह गया है। इलाहाबाद से जौनपुर, बनारस, गाजीपुर होते हुए गोरखपुर की तरफ बढ़िए। मायावती के सत्ता में आने के बसपा किस तरह से बाहुबलियों की हो गई है ये मजे से दिख जाता है।



चलिए एक बार फिर से पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े बदमाशों की एकलिस्ट देखते हैं-अतीक अहमद (फूलपुर, इलाहाबाद), मुख्तार अंसारी (गाजीपुर अब मऊ सेविधायक), रघुराज प्रताप सिंह (विधायक, कुंडा, प्रतापगढ़), धनंजय सिंह(विधायक, रारी, जौनपुर), हरिशंकर तिवारी (हारे विधायक, चिल्लूपार,गोरखपुर)। इन पांचों की हैसियत ये है कि निर्दल चुनाव जीतते हैं या जीतनेका माद्दा रखते हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार आने से पहले येमुलायम के खासमखास थे। ये लिस्ट सिर्फ उनकी है जिनकी चर्चा पूरे प्रदेश में होती है। हर जिले के बदमाशों की गाड़ी पर भी अब नीला हाथी वाला झंडा ही लहराता दिखता है।



मुख्तार पर भाजपा विधायक कृष्णानंद राय और अतीक अहमद पर बसपा विधायक राजूपाल की हत्या का आरोप है। मायावती ने सत्ता में आते ही सबसे पहले इन्हींलोगों की नकेल कसी। लेकिन, अब ये दोनों हाथी की सवारी कर रहे हैं।मुख्तार अंसारी को बनारस से बसपा ने लोकसभा प्रत्याशी बना दिया है। मुख्तार के साथ ही उसके भाई अफजाल अंसारी को बसपा ने गाजीपुर सेप्रत्याशी बना दिया है। बात न बिगड़ी तो, अतीक अहमद के लिए इलाहाबाद या फिर इलाहाबाद की ही दूसरी फूलपुर लोकसभा सीट से हाथी सजा तैयार खड़ा है। जैसे संजय दत्त को लड़ाने के लिए अमरसिंह ने तैयारी कर रखी थी वैसी ही तैयारी बहनजी ने वीवीआईपी गेस्ट हाउस में मुलायम सरकार के समय उनके साथ बद्तमीजी करने वाले अतीक के लिए कर रखी है। अतीक चुनाव नहीं लड़े तो, अतीक से आधी से भी कम उम्र की अतीक की बीवी लोकसभा चुनाव लड़ सकती है। कुंडा विधायक रघुराज प्रताप सिंह अपने प्रताप से प्रतापगढ़ की सीट भी समाजवादी पार्टी को जिता चुके हैं। अब राजा के भी कस-बल ढीले पड़ रहेहैं। सुनते हैं कि वो, भी बहनजी के भाई बनना चाहते हैं।



मायाराज के सहारे अपनी गुंडई परवान चढ़ाने की इच्छा रखने वालों में जौनपुर की रारी विधानसभा से विधायक धनंजय सिंह भी शामिल है। लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान धनंजय गुंडई में पारंगत हुआ। अब संसदमें पहुंचने के लिए मायावती ने धनंजय को हाथी दे दिया है। धनंजय को संसदमें पहुंचाने के लिए पहले से घोषित बसपा प्रत्याशी का टिकट कट गया है। धनंजय को बहनजी की ही सरकार ने 50 हजार रुपए का इनामी बदमाश बनाया था।



वैसे धनंजय के रास्ते में ताजा रोड़ा बना है उत्तर प्रदेश के पांच लाख रुपए का इनामी बदमाश रहा बृजेश सिंह। बृजेश जब तक भगोड़ा रहा तब तक उसकेतार भाजपा से जुड़े होने की बात चलती रही। जब दिल्ली पुलिस ने उसेभुवनेश्वर से पकड़ा उसके बाद माहौल बदल गया है। अब बृजेश हाथी की पीठ परचढ़ने के लिए मुंहमांगी कीमत (हवा 40 करोड़ रु की है) देने को तैयार है।और, चर्चा गरम है कि बृजेश को जौनपुर या चंदौली से बसपा से लोकसभा प्रत्याशी बनाया जा सकता है।



एक जमाने में उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े बदमाश हरिशंकर तिवारी भी हाथी कीसवारी कर रहे हैं। छोटा बेटा विनय शंकर भले ही पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे के हाथों हार गया। बड़ा बेटा भीष्म शंकर खलीलाबाद से,बसपा सांसद बन चुका है। अब 2009 के लोकसभा चुनाव में पूरा परिवार हाथी परझूमते हुए दिल्ली पहुंचने की तैयारी में है। गोरखपुर लोकसभा सीट से हरिशंकर तिवारी का छोटा बेटा विनयशंकर, सटी खलीलाबाद सीट से बड़ा बेटा भीष्मशंकर और गोरखपुर के ही बगल की महाराजगंजसीट से भांजा गणेशशंकर पांडे बसपा प्रत्याशी घोषित हो चुके हैं।



अब बताइए मायावती गुंडों की बिग बॉस हुई या नहीं (दुर्भाग्य ये कि वो, देश का प्रधानमंत्री बनने की जबरदस्त दावेदार हैं)। दरअसल यही वो दीमक है जो, इस देश के लोकतंत्र को अंदर से काफी हद तक खोखला कर चुका है। देश का संवैधानिक दादा (प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री) बनने के लिए बड़े नेता जिस तरह के कुकर्म (जाने-अनजाने) कर गुजरते हैं। उसी पर खुद बाद में रोते भी रहते हैं। इन बदमाशों के पुनर्जीवन के लिए आखिर लालकृष्ण आडवाणीऔर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी कितने जिम्मेदार हैं। मायावती और दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्री तो घोषित तौर पर अपराधियों केसरदार बन ही जाते हैं। क्या इसका जवाब कभी खोजा जाएगा। और, ये कहानी सिर्फ उत्तर प्रदेश की नहीं है, पूरे देश की है।



उम्मीद सिर्फ इतने से ही बची है कि उत्तर प्रदेश का माहौल कुछ बदला तो है। इसका अंदाजा सिर्फ दो नारों से लग जाता है

--यूपी विधानसभा चुनाव के समय बसपा कार्यकर्ता नारा लगाते थे

---चढ़कर गुंडों की छाती पे, मोहर लगेगी हाथी पे

जो, बसपा को नहीं चाहते थे वो, भी सपा को हराने के लिए नारा लगाते थे

---पत्थर रख लो छाती पे, मोहर लगाओ हाथी पे

और, उत्तर प्रदेश का नया नारा है

---गुंडे चढ़ गए हाथी पे, पत्थर रख लो छाती पे



वैसे पत्थर रखने से नहीं पत्थर मारने से ही बात बनेगी। क्योंकि, उत्तर प्रदेश में हाथी पगला गया है। और, हाथी की पीठ पर सारे बदमाश चढ़कर उत्तर प्रदेश की जमीन रौंद रहे हैं।

Tuesday, July 22, 2008

आडवाणी ने बड़ा मौका खो दिया

मनमोहन की सरकार बचेगी या जाएगी ये, आज तय हो जाएगा। बीजेपी के बागी सांसद मनमोहन की डूबती नैया पार कराते दिख रहे हैं। खैर, सरकार बचे या जाए कोई बहुत बड़ा फरक इससे नहीं पड़ने वाला। लेकिन, कल विश्वासमत के विरोध की शुरुआत करने वाले लालकृष्ण आडवाणी ने एक बहुत बड़ा मौका गंवा दिया लगता है।

दरअसल, PM IN WAITING के खिताब से खुद को नवाजने वाले लालकृष्ण आडवाणी को विश्वासमत पर बहस के दौरान हर कोई सुनना चाहता था। उनके प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखने वाले भी उनके आजीवन PM IN WAITING रह जाने की इच्छा रखने वाले भी। सब ये देखना चाहते थे कि अटल बिहारी वाजपेयी के वारिस लालकृष्ण आडवाणी वाजपेयी के कहीं आसपास तक पहुंच पाते हैं या नहीं। लेकिन, ज्यादातर लोगों को मेरी तरह निराशा ही हाथ लगी। मौका ये था कि इस मौके का इस्तेमाल चुनावी रैली की तरह करते।

विश्वासमत के खिलाफ बोलने खड़े हुए आडवाणी से हर किसी को उम्मीद यही थी कि वो, परमाणु करार पर बीजेपी का पूरा पक्ष रखने के साथ ही महंगाई और दूसरे मुद्दों पर सरकार के खिलाफ चुनावी बिगुल की शुरुआत करेंगे। आडवाणी के पास बड़ा मौका था कि वो, संसद में मिले मौके का सदुपयोग करते और वाजपेयी की कमी को पूरा करते। लेकिन, आडवाणी बड़ा मौका चूक गए। पता नहीं कौन से रणनीतिकार-सलाहकार आजकल आडवाणी के चारों तरफ हैं जिन्होंने इतने अहम मौके पर आडवाणी को अंग्रेजी ज्ञान पेलने की सलाह दे डाली।

अब क्या आडवाणी इंटरनेशनल मीडिया और अमेरिका भर को ही अपनी बात सलीके से समझाना चाहते थे। क्योंकि, देश की करोड़ो जनता जो आज कल के प्रधानमंत्री को देखने बैठी थी। उसे तो आडवाणी छू भी नहीं पाए होंगे। हां, इसमें मायावती ने बाजी मार ली। मैंने बहुत पहले लिखा था कि किस तरह मायावती, फिर से बीजेपी के नजदीक आती दिख रही हैं। और, उत्तर प्रदेश के समीकरणों के लिहाज से आडवाणी और मायावती में एक अनकहा समझौता भी हो गया है। लेकिन, अब मायावती का प्रधानमंत्री बनने का दावा और मजबूत होता दिख रहा है। और, अब अगर लोकसबा चुनाव के बाद समझौते की नौबत आई तो, साफ ज्यादा सांसद संख्या के साथ आई मायावती और तीसरे मोरचे का साथ आडवाणी की बीजेपी-एनडीए को मायावती का साथ देने के लिए मजबूर कर देगा।

इधर, लोकसभा में आडवाणी ने बोलना शुरू किया। कुछ ही देर बाद संसद में आडवाणी के बोलने के साथ-साथ मायावती की प्रेस कांफ्रेंस की तस्वीर भी नजर आने लगी। और, मायावती की हैसियत की झलक ये थी कि ज्यादातर हिंदी चैनलों ने मायावती का ऑडियो बढ़ा दिया और आडवाणी सिर्फ दिखते रह गए। उनका कहा किसी को सुनाई नहीं दे रहा था। वजह ये कि वैसे भी वो अंग्रेजी में बोल रहे थे जो, हिंदी दर्शकों कम ही लुभा रहा था। इसी फॉर्मूले पर अंग्रेजी चैनलों को आडवाणी की ही बोली अच्छी लग रही थी। लेकिन, वोट अंग्रेजी चैनल का दर्शक शायद ही देता हो। इस मामले में बंगाल के सीपीएम सांसद मोहम्मद सलीम भी शानदार हिंदी भाषण देकर महफिल लूटने में कामयाब रहे।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...