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Showing posts from September, 2013

हे राजन ये तुमने क्या किया !

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आमदार, खासदार, मंत्री तो मरेगा नहीं?

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अभी ताजा रिपोर्ट आई है डॉक्टर रघुराम राजन की। नए तरीके से इस रिपोर्ट में राज्यो के आर्थिक हालात को समझा गया है। जब रघुराम राजन वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे तब सरकार ने इनको ये महत्वपूर्ण काम सौंपा था। 26 सितंबर को ये रिपोर्ट वित्त मंत्रालय को सौंप दी गई है। इसमें प्रति व्यक्ति उपभोग, अमीरी-गरीबी अनुपात और दूसरे सामाजिक-आर्थिक मानकों पर राज्यों की दशा दिशा कैसी है ये बताया गया है। चौंकाने वाली बात ये है कि इस रिपोर्ट में महाराष्ट्र तो Relatively Developed श्रेणी में है। लेकिन, गुजरात Less Developed श्रेणी में है। इसके राजनीतिक मायने भी देखे जा रहे हैं। क्योंकि, Least Developed राज्यों में उड़ीसा, बिहार के बाद सबसे खराब स्थिति मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की है। सरकार ने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। कमाल ये है कि नरेंद्र मोदी और बीजेपी गुजरात को Less Developed और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ को Least Developed रखने से दुखी होंगे। लेकिन, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अतिप्रसन्न हैं कि उनका राज्य अतिपिछड़ा है। अब वहां की जनता सोचे जो इसीलिए नीतीश का गुणगान करने लगी थी …

वर्धा में जेएनयू !

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महात्मा गांधी अंतरर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा दूसरी बार जाना हुआ। करीब दो साल पहले पहली बार वर्धा जाना हुआ था। नागपुर से वर्धा पिछली बार रेलमार्ग से ही गए थे। इस बार सड़क के रास्ते गए। उसकी कहानी अगली पोस्ट में। लेकिन, इस पोस्ट में बात सिर्फ वर्धा की। वर्धा वैसे तो महात्मा गांधी के सेवाग्राम आश्रम और विनोबा भावे के पवनार आश्रम के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन, अब इसकी प्रसिद्धि में एक और वजह जुड़ गई है महात्मा गांधी गांधी के नाम पर बना अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय। दुनिया में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए ये केंद्रीय विश्वविद्यालय बना है। जैसा मुझे पता है कि करीब चालीस करोड़ रुपए का बजट है। जब दो साल पहले हम यहां सोशल मीडिया पर बात करने के लिए गए थे तो विषय था- हिंदी ब्लॉगिंग की आचार संहिता। जाहिर है जब ब्लॉगिंग, सोशल मीडिया है तो किसी तरह की आचार संहिता की बात तो मानी ही नहीं जा सकती। सिवाय स्वनियंत्रण के। लेकिन, कुछ बातें तय हुईं। उस समय हम लोगों को फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास में रुकने का अवसर मिला था। क्योंकि, तब विश्वविद्यालय के पास और कोई बेहतर जगह नहीं थी…

इसके लिए रेल बजट का इंतजार क्यों करें ?

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सोशल मीडिया को लेकर प्रधानमंत्री ने चिंता जताई है। कहा है कि आजादी भी बनी रहे और इसका दुरुपयोग भी न हो। हालांकि, दुखद ये है कि इस मीडिया को लेकर चिंताएं ज्यादा जताई जा रही हैं। ये कम ही बताया जा रहा है कि आखिर इस सोशल मीडिया या जिसको मैं नागरिक मीडिया कहना ज्यादा पसंद करूंगा वो कितना बेहतर है। और समाज को कितना बेहतर कर रहा है। अब मैं टीवी पत्रकार हूं लेकिन, टीवी के लिए खबर करने के लिए कई ढेर सारी औपचारिकताओं के बाद ही कोई खबर की जा सकती है। फिर समय भी अनुकूल हो ये भी देखना होगा। जैसे रेलवे की खामियों पर बात करनी है तो रेल बजट के आसपास ही ये खबर बेहतर बनेगी। क्योंकि, ट्रेन में गंदगी होती है। खाना ठीक नहीं मिलता। चद्दर, कंबल गंदे होते हैं इसे जानते सब हैं इसकी चर्चा रेल बजट के आसपास ही ठीक रहेगी। यानी रेलवे की कमियों को दूर करने का दबाव पारंपरिक मीडिया सिर्फ रेल बजट के आसपास ही बनाता है कुछ बहुत अलग हटकर न हो जाए। मतलब कोई बड़ी दुर्घटना या ऐसी ही मिलती जुलती खबर। लेकिन, सोशल मीडिया के जरिए हर कोई हर दिन दबाव बनाने में मदद कर सकता है। नागरिक मीडिया है तो उसके लिए पत्रकार होने की भी जरूर…

नितिन गडकरी नागपुर से चुनाव लड़ेंगे?

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जमीन पर रहना-जाना जरूरी होता है। न्यूजरूम से जो पता चलता है वो न्यूजरूम जैसा ही होता है। मतलब चमकता और उस चमक में हकीकत अकसर साफ-साफ दिख नहीं पाती। अभी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के बुलावे पर वर्धा गया था। हिंदा ब्लॉगिंग व सोशल मीडिया पर दो दिन की राष्ट्रीय कार्यशाला और संगोष्ठी थी। मेरा विषय था सोशल मीडिया और राजनीति।  इस संगोष्ठी और वर्धा विश्वविद्यालय की चर्चा आगे की पोस्ट में। अभी बात राजनीति की।
लौटते समय सोचा कि नागपुर कई बार आकर नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय तक जाना नहीं हो पा रहा है। इसलिए स्टेशन से पहले पहुंच गए रेशमबाग के संघ मुख्यालय यानी केशवराव बलिराम हेडगेवार स्मृति परिसर। शानदार परिसर। बहुत बड़ी इमारत। और परिसर में हेडगेवार की चमकती मूर्ति। रात का समय था और मोबाइल से तस्वीरें लीं। इसलिए उसकी भव्यता का उतना अंदाजा लगाना मुश्किल होगा। परिसर में जो सभागार है उसका नाम महर्षि व्यास सभागार है। शाम के आठ बज रहे थे। महर्षि व्यास सभागार के अंदर से आवाजें आ रहीं थीं। झाककर देखा तो शाखा लगी हुई थी। तस्वीर उतारने का मोह नहीं छोड़ पाया। ठीक-ठाक संख्य…

भारतीय राजनीति को बदल रहा है सोशल मीडिया

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महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में दो दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी और कार्यशाला में पहले दिन का आखिरी सत्र सोशल मीडिया और राजनीति पर। इस सत्र के संचालन मुझे ही करना है तो बहुत सी बातें जो मेरे दिमाग में हैं वो शायद पूरी तरह से कहना संभव नहीं होगा। इस लिहाज से मैंने जो लेख तैयार किया था। उसे यहां चिपका रहा हूं।

बहुत समय से भारत में ये बात बार-बार उठ रही थी कि क्या भारत में भी चुनावों में अमेरिकी चुनावों की तर्ज पर नेताओं को आमने सामने बहस करनी चाहिए। लेकिन, ये बात जितनी मजबूती से उठती थी उतनी ही मजबूती से खारिज भी हो जाती थी कि भारतीय लोकतंत्र में चुनाव का तरीका अलग है। यहां विधानसभा और संसद सदस्यों के चुनाव से आखिर में कोई राज्य का मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री चुना जाता है। सभी दल इस छद्म व्यवहार को ही असलियत का जामा पहनाने की हर संभव कोशिश करते हैं। इसीलिए प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री घोषित करने की परंपरा नहीं रही भले ही वो लगभग तय होता हो। लेकिन, तकनीक ने इन छद्म व्यवहार करने वाले राजनीतिज्ञों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है। ये तकनीक आई सोशल मीडिया की। जिसे ट्विटर, फेसबुक,…

ब्लॉगर, स्वतंत्र वेबसाइट संचालक की पत्रकारिता को मान्यता मिले ?

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