Wednesday, April 30, 2008

टीटी-जेई सब मेरे गांव में ही रहते हैं, कहीं नहीं जाते

(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। शहर वालों जैसे क्यों नहीं रह पाते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। इसी ठहराव-बदलाव का मैं एक बड़ा चित्र खींचने की कोशिश कर रहा हूं। इसी श्रृंखला की ये चौथी कड़ी।)

मैंने पहली कड़ी में ही बताया था कि मेरे गांव में पिताजी की जेनरेशन में ज्यादातर लोग सरकारी नौकरी में थे। थोड़ा ऊपर-थोड़ा नीचे। और, जो नीचे या थोड़ा पीछे रह गए उन्होंने अपने बच्चों के जरिए अपनी अधूरी ख्वाहिशें पूरी करने की कोशिश की। गांव में उन्होंने अपने बच्चों के नाम जेई, गार्ड, टीटी रख दिए लेकिन, इनमें से कोई भी उसके आसपास भी नहीं पहुंच सका।

दोनों मेरे चचेरे दादा लगेंगे। एक रेलवे में ड्राइवर थे अब रिटायर हो गए हैं तो, दूसरे पीडब्ल्यूडी में अभी भी मेठ हैं। ड्राइवर दादा के दो लड़के हैं। एक का नाम है गार्ड दूसरे का टीटी। ये अलग बात है कि बड़ा गार्ड बनने के बजाए उनके ही जुगाड़ से किसी तरह से गार्ड का बक्सा ढोने की नौकरी पा गया तो, दूसरा ट्रेनों में टिकट चेक करने के बजाए खेती का काम देख रहा है लेकिन, ज्यादा पढ़ा लिखा न होने के कारण खेती का हिसाब भी बहुत अच्छा नहीं लग रहा है। टीटी की पत्नी यानी मेरी भाभी जो, शादी के बाद गांव की सबसे खूबसूरत बहुओं में से थी। इस बार उनकी शकल मुझे कुछ डरावनी सी लग रही थी।

टिटियाइन भाभी अब पहले की तरह हंसी-मजाक भी कम ही कर रहीं थीं। जबलपुर में अपने मामा के यहां पढ़ीं-लिखीं और बचपन में ही शादी हुई। आधार वही कि ससुर रेलवे मे ड्राइवर है। इलाहाबाद के सूबेदारगंज में बड़ा सा घर है। खैर, टीटी भैया कुछ कर नहीं पाए और भाभी के चेहरे की चमक धीरे-धीरे गायब होती गई। इस बार तो वो, अपनी उम्र से कुछ ज्यादा ही बुढ़ाई दिख रही थीं। ये भाभी वही हैं अन्नू की मां। भाभी ने बताया लड़ाई हे के बाद अन्नूआ क कुछ दिन के बरे हियां से हटाई देहे अही। बुआ के हियां रही तो, कम से कम झगड़ा झंझट तो न करी। ये बताते वक्त उनकी आंखों में ये डर साफ दिख रहा था कि बेटा कहीं बाप (टीटी) की तरह बेकार न रह जाए।

भाभी ने मुझसे पूछा- का भइया तू तो बंबइया होइ गया। अब कहां तू गांव अउब्या। का, इलाहाबादौ नाही आइ सकत्या। मैं सिर्फ मुस्कुराकर रह गया। मैं कम बोल रहा था। शायद उनसे संवाद के लिए मेरे पास शब्द कम हो गए थे। भाभी ने कहा- तू तो ऐसे चुपचुप बइठा अहा। जैसे बरदेखुआ आय होवा। मैंने भी थोड़ा मजाक किया अब तोहका का देखी तू तो बुढ़ाइ गइउ। फीकी हंसी हंसते भाभी ने कहा- भइया, हम तो बुढ़ाए गए। नानी बनि गए। तब मुझे ख्याल आया कि भाभी की बेटी, जिसकी उम्र अभी भी इतनी ही है कि वो, पढ़े-लिख-कुछ करे, के भी बच्चा हो गया है। सचमुच गांव बदलने में अभी बहुत समय लेंगे। शायद यही वजह थी कि पिछले साल मेरी शादी होने के पहले तक गांव में ये होने लगा था कि अरे भइया रमेंद्र (मेरा घर में बुलाने का नाम) क तो बियाहवै नाहीं होत बा। चाचा (मेरे पिताजी) मोट असामी (ज्यादा दहेज देने वाला) खोजत होइहैं औ का। जबकि, शादी के लिए मैं अपने करियर के थोड़ा सेट होने का इंतजार कर रहा था और पिताजी को बार-बार गच्चा दे रहा था।

खैर, गार्ड-टीटी का ये हाल ता तो, जेई का हाल भी कम नहीं है। पीडब्ल्यूडी में मेठ हमारे पट्टीदारी के दादा ने बेटे का नाम जेई सोचकर तो यही रखा होगा कि जेई न सही पीडब्ल्यूडी में बाबू तो हो ही जाएगा। लेकिन, वो भी आरईएस डिपार्टमेंट में मेठ से आगे न बढ़ पाए। पत्नी शहरी मिली। तेज थी, गांव के लड़कों (देवरों) से जरा खुलकर-हंसकर बात करती थी। इसलिए गांव के बूढ़े-बुजुर्ग जेइयाइन भाभी के चरित्र पर भी टिप्पणी करने से नहीं चूकते थे। बाद में भाभी की इसी योग्यता ने उन्हें पहले गांव का नेता और बाद में भाजपा महिला मोर्चा का बिहार ब्लॉक का अध्यक्ष बना दिया था। उनके साथ टिटियाइन भाभी भी कभी-कभी पार्टी की बैठकों में जाने लगीं। अच्छी बात बस इतनी है कि अभी भी उन लोगों में थोड़ा बहुत ही सही लेकिन, जोश (जिंदादिली ज्यादा सही शब्द होगा) बाकी है।

अगली कड़ी में गांवों में सूखती जमीन, जमीन का झगड़ा

8 comments:

Udan Tashtari said...

हा हा!!! हमारे गाँव के भी दरोगा सिंग स्कूल में मास्टर हैं. बाकी खेती के कारण मजे में हैं. :)


आनन्द आ गया महाराज..अगली कड़ी का इन्तजार है.

दिनेशराय द्विवेदी said...

हर्ष जी आप ने अपने ही परिवार से इतनी सहजता से यह तथ्य प्रस्तुत किया है कि छोटी-छोटी आकांक्षाओं भी किस तरह इस व्यवस्था में बलिदान हुई हैं? आप को बधाई। इस लेख-माला को विस्तार दीजिए, बहुत कामयाब भी होगी और दस्तावेज भी बनेगा।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

सूचना,सन्दर्भ और हालात के ज़रिए
संभावनाओं की पड़ताल भी
करते जा रहे हैं आप.
प्रभावी लेखमाला .
इसे आप मन से ,श्रमपूर्वक लिख रहे हैं .
==============================
पत्रकार के दायित्व-बोध की झलक भी
साफ़-साफ़ दिखती है आपके लेखन में.

साभार बधाई.

अभय तिवारी said...

बहुत ही रोचक और जानकारीप्रद सीरीज़.. बहुत खूब!

चंद्रभूषण said...

अच्छा चल रहा है।

DR.ANURAG ARYA said...

likhte rahiye......ham aglikadi ke intzar me hai.

Lavanyam - Antarman said...

हर्षवर्धन जी आपने अपने गाँव का जो चित्र खीँचा है उससे ऐसा लगा सारे लोग आँखोँ के सामने साक्षात खडे हैँ
वहाँ की बोली से सारा सजीव हो उठा है -
क्या नाम रखते हैँ लोग टीटी ?
आपका आभार जो उनकी बातोँ को हम सब तक पहुँचाया --
- लावण्या

satyaprakash azad said...

gaon ko kisi tarah zinda rakhiye taki aage waali peedhi use bhool na jaye

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