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Showing posts from October, 2015

छद्म सरोकारी साहित्यकार बनाम पूर्ण बहुमत की सरकार

इतिहास ने कभी साहित्यकारों को इस तरह से दुनिया की किसी सरकार के खिलाफ लामबंद होते हुए शायद ही देखा होगा। सबसे ज्यादा चेतन, सृजन का जिम्मा रखने का दावा करने वाले साहित्यकारों के साथ हिंदुस्तान में ऐसा क्या हो गया। जो, उन्हें इस तरह से सरकार के पैसे से चलने वाली लेकिन, स्वायत्त संस्था साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटाने के लिए बाध्य करने लगा। क्या सचमुच हिंदुस्तान की सरकार ने साहित्य, कला या फिर एक शब्द में कहें, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली है। क्या सचमुच इस देश में ऐसा कुछ नरेंद्र मोदी की सरकार ने गलत कर दिया है, जो पहले किसी सरकार ने नहीं किया था। क्या सचमुच इस समय देश के हालात आपातकाल, सिख दंगे या फिर देश के अलग-अलग हिस्से में हुए दंगों के समय के हालात से भी ज्यादा खराब हैं। क्या सचमुच इस भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकार के समय में अल्पसंख्यक- ईसाई और मुसलमान ही पढ़ें- खतरे में है। इन सवालों का जवाब खोजना इसलिए जरूरी है कि यही सवाल उठाकर जवाब में कुछ साहित्यकारों ने अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस किए हैं।
अब ये भले ही सारे लोग कह रहे हैं कि उदय प्रकाश की शुरुआत को धार …

बिहार के भले की सरकार बननी जरूरी

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बिहार में किसी सरकार बनेगी, ये आठ नवंबर को तय होगा। लेकिन, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कह रहे हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद देश में बीजेपी विरोधी मंच और मजबूत होगा। साथ ही नीतीश ये भी दावा कर रहे हैं कि ये नतीजे बिहार का भी भाग्य बदल देंगे। पहली बात सही हो सकती है कि अगर महागठबंधन की सरकार बनती है, तो देश में भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी विरोधी ताकतें एकजुट होंगी और पहले से मजबूती से होंगी। लेकिन, क्या महागठबंधन की जीत बिहार के लोगों, खासकर नौजवानों का भला कर पाएगी। इस सवाल का जवाब आंकड़ों से समझें, तो ना में ही मिलता है। नीतीश कुमार की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी के साथ चला एनडीए का बिहार देश का सबसे तेजी से तरक्की करना वाला राज्य बन गया था। 2012-13 में बिहार की तरक्की की रफ्तार पंद्रह प्रतिशत थी। जो, देश के किसी भी राज्य से ज्यादा थी। गुजरात, महाराष्ट्र जैसे देश के विकसित राज्य भी बिहार से पीछे छूट गए थे। जून 2013 में नीतीश कुमार ने बिहार में भारतीय जनता पार्टी से अलग होने का फैसला कर लिया। वजह गुजरात के उस समय के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री …

बिहारी कि बाहरी

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‪#‎BiharVotes‬ के समय बिहार में रहा। लेकिन, बिहार के बारे में बिहारी ही तय करेगा, बाहरी नहीं। एक जगह भोजन पर जाना हुआ। जगह है दसरथा। दसरथा और सिपारा दोनों पुराने गांव हैं, जो 1980 आते आते शहर में शामिल होने के फेर में लोग घर बनाने लगे। पटना सचिवालय, स्टेशन से ये जगह सिर्फ 3 किलोमीटर है। अब वोट यहां किस आधार पर पड़ना चाहिए। ये बिहारियों को बताने की जरूरत है क्या। तस्वीरें देखिए इन्हीं रास्तों से हम पहुँचे। ‪#‎PrideOfBihar‬

दलितों की आजादी और उनका विवेक

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आजादी और विवेक के हक में ये प्रतिरोध सभा जिन्होंने कराई। उन सबका नाम साफ-साफ दिख रहा है। जिनको इन्होंने सिर्फ दिखावे के लिए शामिल किया। उनका नाम भी नहीं दिख रहा है। कमाल की बात ये भी है कि दलित लेखक मंच का कोई प्रतिनिधि भी यहां पर नहीं था। इतने ही ईमानदार हैं ये। दलितों की आजादी और विवेक के हक में बस इतना ही हैं ये।
कल आजादी और विवेक के हक में प्रेस क्लब में प्रतिरोध सभा थी। शुरुआत में ही प्रेस क्लब के सचिव नदीम ने साफ कह दिया कि मंच हमारा है। हम जैसे चाहेंगे, चलाएंगे। आप लोग सवाल पूछ सकते हैं। लेकिन, विचार नहीं रख सकते। सवाल भी भटके, तो हम आपको तशरीफ ले जाने के लिए कह देंगे। समझ रहे हैं ना ये आजादी और विवेक के हक में प्रतिरोध सभा थी।
अब हिंदुओं को सचमुच चिंतित होने की जरूरत है। क्योंकि, वो हिंदुओं की चिंता कर रहे हैं। भारतीयता की भी। इतने सालों तक उन्होंने मुसलमानों की चिंता की थी। क्या हाल किया मुसलमानों का। बताने की जरूरत है क्या। आज ये सब प्रेस क्लब में हिंदुओं और भारतीयता की चिंता करने जुटे थे।
ये कमाल है कि विरोधियों के लिए संघ,बीजेपी अब तक मुसलमान विरोधी था। बात नहीं बनी, तो अब वो…

प्रीमियम- संसद मार्ग या नई दिल्ली रेलवे स्टेशन?

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प्रीमियम पार्किंग के नाम पर मैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर लूटा गया। कल्पना कीजिए कि आप कार पार्क करके सिर्फ दो दिनों के लिए कहीं बाहर जाएं। लौटने पर पता चले कि पार्किंग भुगतान 4200 रुपये करना है। अब इससे ज्यादा बड़ी लूट क्या होगी। पता नहीं किस रेलवे के अधिकारी ने ये प्रीमियम पार्किंग का सुझाव सरकार को दिया। और सरकारें इसे जस का तस लागू किए हैं। मैंने दिल्ली की दूसरी प्रीमियम जगहों की पार्किंग का पता लगाया। संसद मार्ग से ज्यादा प्रीमियम इलाका दिल्ली में कोई क्या होगा। वहां NDMC की पार्किंग है। पार्किंग का बोर्ड साफ-साफ बता रहा है कि 20 रुपया प्रति घंटे का पार्किंग चार्ज है। और सुबह 6 बजे से रात 12 बजे तक के लिए कोई कार खड़ी करता है, तो उसे 100 रुपये अधिकतम ही देने होंगे। पूरे महीने कोई इस पार्किंग में कार खड़ी करना चाहता है, तो भी उसको 2000 रुपये का ही भुगतान करना होगा। और, सोचिए नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर प्रीमियम के नाम पर 100 रुपये प्रति घंटा लिया जा रहा है। जबकि, संसद मार्ग पर 100 रुपया पूरे दिन का है। इससे बड़ी लूट क्या होगी। पूरीघटना यहां पढ़ें

पार्किंग के नाम पर भारतीय रेल की खुली लूट

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मुझे नहीं पता कि इस पर रेल मंत्री सुरेश प्रभु @sureshpprabhu और रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा  @manojsinhabjp कुछ करेंगे या नहीं करेंगे। कोशिश करूंगा इन लोगों से मिलकर भी ये बताने की। फिलहाल अभी आप लोगों से साझा कर रहा हूं। एक तो सबको ये पता हो इसके लिए। और दूसरा जितने ज्यादा लोग इसके खिलाफ आवाज बुलंद कर सकें, उसके लिए। मीडिया चौपाल में शामिल होने 10 अक्टूबर की सुबह भोपाल शताब्दी से ग्वालियर जाना था। और 11 की रात भोपाल शताब्दी से ही वापसी थी। मैंने सोचा टैक्सी से स्टेशन जाने से बेहतर है कि खुद की कार से चला जाए और स्टेशन पर ही कार खड़ी कर दी जाए। सुबह 5 बजे मेट्रो भी नहीं मिलती। सो अपनी कार से ही चला गया और स्टेशन पर एक प्रीमियम पार्किंग है। उसी में खड़ी कर दी। 100 रुपये उसका चार्ज है। सोचा अधिकतम कितना लगेगा। खैर, मेरी गलती ये कि न मैंने पर्ची देखी और न ही पूछा। गाड़ी लगाई। सीधे ट्रेन की ओर। दो दिन तो ग्वालियर की मीडिया चौपाल में इसका ख्याल भी नहीं रहा। जब वापस की, तो एक बार ध्यान में आया कि पर्ची देख लें। पर्ची देखी, तो होश उड़ गए। पहले दो घंटे के 100 रुपये, उसके बाद के हर घंटे के लि…

पानी की कहानी बताना सीखें पत्रकार

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एक बार फिर से चौपाली जुटे। इस बार जुटान की जगह रही ग्वालियर। जुटान की जगह भर बदली है। इस बार भी चौपालियों को जुटाने वाले अनिल सौमित्र ही रहे। उन्होंने बीड़ा उठा रखा है। और भोपाल से दिल्ली से ग्वालियर पहुंची चौपाल में इस बार भी दिल्ली की ही तरह चर्चा का मुख्य बिंदु है नदियां। 10 और 11 अक्टूबर को ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय में ये कार्यक्रम हो रहा है। 10 अक्टूबर को उद्घाटन सत्र के बाद तीन समानांतर चर्चा सत्र हैं। भारत की नदियां- कल आज और कल। मध्य प्रदेश की नदियां- कल आज और कल। नदियों का विज्ञान और पारिस्थितिकी। दूसरे पहर में समानांतर सत्रों की रिपोर्टिंग के बाद फिर से तीन समानांतर सत्रों का होना तय रहा। जनमाध्यमों में नदियां- स्थिति, चुनौतियां और संभावनाएं। नदियों का पुनर्जीवन- संचारकों की भूमिका। नदियों की रिपोर्टिंग- विविध पक्ष। इसके बाद दूसरे पहर के समानांतर सत्रों की रिपोर्टिंग तय है। मोट-मोटा देखा जाए, तो पहले पहर के समानांतर सत्र नदियों की स्थिति, परिस्थिति पर बात करने के रहे। जबकि, दूसरे पहर के समानांतर सत्र इस चर्चा के लिए रहे कि कैसे संचारक (ब्लॉगर, पत्रकार) नदियों का जीवन…

संघ जिम्मेदार है

कमाल है इस देश में हर बात के लिए संघ जिम्मेदार है
कमाल है कि जिनकी सरकार है वो भी कहते हैं कि संघ जिम्मेदार है
कमाल है कि जिनकी नहीं सरकार है वो भी कहते हैं कि संघ जिम्मेदार है
कमाल है हिंदुस्तान की पिछली सरकारों के घोषित काबिल पुरस्कार लौटा रहे हैं
कमाल है पुरस्कार लौटाकर वो खुद को और काबिल बताना चाहते हैं
कमाल है पुरस्कारों की इस घर वापसी के लिए भी संघ जिम्मेदार है
कमाल है

Oxytocin पर प्रतिबंध में क्या मुश्किल?

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देश के सबसे बड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद @ABVPVoice की छात्रा संसद में महिला, बाल विकास मंत्री मेनका गांधी से अजब बात पता चली। उन्होंने एक छात्रा के बच्चियों को इंजेक्शन देकर बड़ा करने और Women trafficking के सवाल पर ये बात बताई। Oxytocin नाम का इंजेक्शन है, जिसकी वजह से ढेर सारी बुराइयां हैं। गाय को लगाकर उससे ज्यादा दूध निकालने की कोशश होती है। दूध जहरीला हो जाता है। सब्जियों में लगाकर उसे जल्दी तैयार करते हैं। ज्यादा सब्जी हो जाती है। जहरीली सब्जी खाना होता है। जो, मांस खाते हैं। उन्हें जहरीला मांस खाना होता है। अब Oxytocin का बेहद अमानवीय इस्तेमाल आगे बढ़ा है। अब बच्चियों को ये इंजेक्शन लगाकर उऩ्हें बड़ा किया जा रहा है। अरब देशों में ये बच्चियां बेची जा रही हैं। मुंबई से सटे ठाणे में एक कंपनी है जो इसे आयात करके लाती है। दूसरे कुछ नामों से भी अब ये बिकने लगी है। लेकिन, ये प्रतिबंधित नहीं है। स्वास्थ्य मंत्री @JPNadda से भी उन्होंने इसे प्रतिबंधित करने की मांग की है। इसका आंदोलन होना चाहिए। लेकिन, इसकी चर्चा कहां हो रही है।

सांप्रदायिकता खत्म करना है या बरकरार रखना है?

लड़ाई सांप्रदायिकता से लड़ने की तय होनी थी। लड़ाई अतिवाद से लड़नी थी। लड़ाई इंसान को बचाने की थी। लेकिन, देखिए क्या हो रहा है। विरोध उन्हें सांप्रदायिकता के नाम पर एक पार्टी बीजेपी का करना है। अतिवाद के नाम पर हिंदू का करना है। आगे बढ़कर हर ऐसे किसी काम के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गरियाना है। लीजिए। अपनी प्रगतिशीलता के चक्कर में उन्होंने हिंदू अतिवादियों को पुष्पित-पल्लवित होने का अवसर दे दिया है। बहुतायत हिंदू बेचारा सिर्फ इसलिए गरियाया जा रहा है कि उसने भारतीय जनता पार्टी को मत क्यों दे दिया। @narendramodi की सरकार क्यों बना दी। जबकि, बहुतायत हिंदू और बहुतायत मुसलमान बात ही दूसरी करने लगा है। वो तरक्की चाह रहा है। वो अपने जीवन में थोड़ी बेहतरी चाह रहा है। लेकिन, इससे तो उन लोगों की पूरी "Constituency"ही खत्म होती दिख रही है। अब तक वो इंसानियत की बात करते थे। इस देश की तहजीब उन्हें लगती थी कि कभी किसी सांप्रदायिक ताकत का कब्जा नहीं होगा। वो ये रटे हुए थे। समय, सिद्धांत, समाज सब बदल गया। लेकिन, वो तो रटे थे। उन्होंने ठेका भी ले रखा था। सारे सारोकारों का। अभी भी वही पुर…

सोशल मीडिया से समाज समझता स्वयंसेवक प्रधानमंत्री

कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी की सरकार के 180 दिन पूरे होने पर यू टर्न सरकार का खिताब दे दिया था। ये दरअसल कांग्रेस की आरोप पुस्तिका थी। जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर 25 उन मुद्दों से पलटने की जिक्र किया था। जिसे खुद मोदी ने चुनाव के समय करने का आश्वासन दिया था। उसके बाद हर उस मुद्दे पर जहां भी मोदी सरकार अपने बनाए-बोले किसी नियम में संशोधन की तलाश करने लगती। कांग्रेस वहां यू टर्न सरकार का आरोप उछाल देती है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संबंधित फाइलों को सार्वजनिक करने, काला धन वापस लाने, भूमि अधिग्रहण बिल और नेट न्यूट्रलिटी उसमें सबसे अहम मुद्दे थे। जिस पर नरेंद्र मोदी पर यू टर्न लेने का आरोप लगाया गया था। वैसे यू टर्न आधार कार्ड पर भी इस सरकार ने लिया है। कुछ इसी तरह नीतियों के लिहाज से पाकिस्तान पर भी सरकार का यू टर्न साफ दिखता है। सवाल ये है कि आखिर एक ताकतवर राजनेता से मुख्यमंत्री और फिर प्रचंड बहुमत वाले प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ऐसे यू टर्न क्यों ले रहे हैं जिससे उनकी और सरकार की छवि कमजोर हो रही है। इसका जवाब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फेसबुक मुख्यालय में हुए सवा…