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Showing posts from February, 2008

देश में लोकतंत्र की सबसे मजबूत पाठशाला है इलाहाबाद विश्वविद्यालय

( इलाहाबाद विश्वविद्यालय का पहला अंतराष्ट्रीय पुरातन छात्र सम्मेलन 16-17-18 फरवरी को हुआ। किसी वजह से इसमें मैं जा नहीं पाया। इस पुरातन छात्र सम्मेलन की पत्रिका के लिए मुझसे भी विश्वविद्यालय में मेरे विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दिनों के बारे में लेख मांगा गया था। जो, विश्वविद्यालय की पत्रिका में छपा है। अब तक मेरे पास पत्रिका आई नहीं है, इसलिए वो पत्रिका नहीं दिखा पा रहा हूं। मैं यहां वो लेख वैसे का वैसा ही छाप रहा हूं। ये लेख इस बात पर भी मेरे विचार हैं कि पढ़ाई के साथ छात्र राजनीति कितनी सही है।)

पढ़ाई हमेशा अच्छे भविष्य और मजबूत व्यक्तित्व की बुनियाद होती है। और, मैंने जो, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अपनी पढ़ाई के दौरान पाया कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों का गजब का व्यक्तित्व विकास होता है। मैं आज जो कुछ भी हूं उसका बड़ा योगदान इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मेरे पढ़ाई के 7 साल रहे हैं।

मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कोई भी चुनाव नहीं लड़ा। लेकिन, पढ़ाई के दौरान छात्रसंघ चुनावों में सक्रिय हिस्सेदारी की वजह से मैं उन्हीं दिनों देश की संसदीय परंपरा से भली-भांति वाकिफ …

पत्थर में जान डाल देते हैं ज्ञान भाई

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पत्थरों में जिंदगी का अनुभव कितने लोगों ने किया होगा। लेकिन, ज्ञान सिंह के लिए ये बेहद सहज कार्य है। इतना सहज कि वो उनकी जिंदगी का अंग बन गया है। और, अब तो पत्थर ही ज्ञान सिंह की पहचान बन गए हैं। पत्थरों का मोह ही उन्हें इलाहाबाद से उदयपुर खींच ले गया। इलाहाबाद से बनारस के रास्ते पर इलाहाबाद से बाहर निकलते ही अंदावा के पास ज्ञान सिंह का गांव हैं। बनारस हिंदू युनिवर्सिटी से ही ज्ञान सिंह ने मास्टर्स इन फाइन आर्ट्स (स्कल्पचर) की डिग्री ली।

मार्बल स्कल्पचर के लिए 1996 में राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाले ज्ञान सिंह आजकल मुंबई में हैं। महात्मा गांधी मार्ग पर जहांगीर आर्ट गैलरी में उनकी कला का बेजोड़ नमूना देखा जा सकता है। ये प्रदर्शनी 18 फरवरी को शुरू हुई है और 24 फरवरी तक सुबह 11 बजे से शाम 7 बजे तक चलेगी। उनकी कला के कुछ बेजोड़ नमूने मैं यहां दिखा रहा हूं। यही प्रदर्शनी दिल्ली में तानसेन मार्ग पर स्कल्पचर कोर्ट में 12 से 21 मार्च तक देखी जा सकती है।

‘Rhythm’ Pink Marble




‘Bird myth’ with fountain और ‘Emerging Form’ with fountain




‘Akchhayvateshwar’ Black Marble और ‘Head’ Black Marble




‘Me…

ये राज ठाकरे और उनके समर्थकों के पढ़ने के लिए है

राज ठाकरे की ठकुरैती इस समय शांत हो गई है। लेकिन, मराठी अस्मिता के नाम पर कब वो जाग जाए ये कोई नहीं जानता। मैं दैनिक जागरण अखबार में इलाहाबाद का पन्ना पढ़ रहा था। मैं खुद भी इलाहाबाद का हूं और मेरे मोहल्ले दारागंज के ही मराठियों से जुड़ी खबर है। मुझे आजतक अंदाजा नहीं था कि मेरे मोहल्ले में ही 1000 से ज्यादा मराठी रहते हैं। ये मराठी क्या सोचते हैं पढ़िए

चीन में भी शहरों और गांवों के विकास में बड़ा फर्क है

भारत के लिए अक्सर ये कहा जाता है कि तरक्की के साथ सामाजिक विकास के मामले में भी चीन से सीखा जा सकता है। ये भी दावा किया जाता है कि वहां के कम्युनिस्ट शासन में सभी लोगों में बराबर बंटवारा है। अभी कुछ दिन पहले जब खबर आई थी कि भारत के तीन सबसे बड़े पूंजीपतियों के पास जितना पैसा है, उससे कम पैसा वहां के सबसे बड़े 120 पूंजीपतियों के पास है। साथ ही ये भी खबर थी कि भारत में अमीर और अमीर हुआ है जबकि, गरीब और गरीब। आज एक खबर और मैंने पढ़ी जो, चीन में गांव और शहर के बीच के विकास के अंतर को दिखाती है। यहां तक कि कई मां-बाप को छोटे शहरों में अपने बच्चों को छोड़कर इसलिए बड़े शहरों में जाना पड़ता है कि अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ा सकें। और, अच्छी जिंदगी जी सकें। पूरी खबर यहां पढ़े

ई लल्लूपना न होये ऊ, सच्चाई है जउने प आंख मूंदे कइउ पीढ़ी बरबाद होई ग बा

मैंने उत्तर प्रदेश के बारे में ASSOCHAM की एक रिपोर्ट के आधार पर तरक्की की उम्मीद जताई थी। उस पोस्ट के आधार पर एक ब्लॉगर लल्लू ने बहुत गंभीर बातें कह डाली हैं। इस पोस्ट को लल्लूपना टैग दिया गया है लेकिन, ये बात गंभीरता से न लेने से ही कई पीढियां बरबाद हो चुकी हैं। मैं वहां टिप्पणी करना चाह रहा था। लेकिन, वहां टिप्पणी फॉर्म न होने से यहीं चिपका रहा हूं। और, पूरी पोस्ट डाल रहा हूं।

वाकई हम यूपी के लोगों को दूसरे राज्य में पिटने जाने की कतई जरूरत नहीं है.
हम जिस काम को आपस में अच्छी तरह से कर सकते हैं उसके लिये दूसरे प्रांत के लोगों का सहारा लेना पड़ता है? छी.
हमारे अन्दर बहुत प्रतिभा है और हम आपस में ही इत्ती मार कुटाई कर सकते हैं कि जरूरत पड़ने पर दूसरे प्रांत या देश के लिये भी मारकुटाई करने वाले भेज सकते हैं. इतने सालों से हम एक दूसरे को पीटने या लतियाने के अलावा कर ही क्या रहे हैं!

सबसे बड़ी बात तो ये है कि हमें मार पिटाई करने के लिये मुद्दों की जरूरत नहीं पड़ती. जब दिल में आग हो तो मुद्दों की क्या कमी. धर्म जात के नाम पर तो हम एक दूसरे को सदियों से पीटते आये ही हैं. कभी कभी तो ह…

अगले 3 सालों में उत्तर प्रदेश में 25 लाख नौकरियां

देश के बीमारू राज्यों में अगुवा उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए इससे अच्छी खबर नहीं हो सकती है। ASSOCHAM को अब उत्तर प्रदेश में संभावनाएं दिख रही हैं। देश के दो सबसे बड़े उद्योग संगठनों में से एक ASSOCHAM की ताजा स्टडी रिपोर्ट कह रही है कि उत्तर प्रदेश उद्योगों के लिहाज से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छा प्लेटफॉर्म बन सकता है। लेकिन, ASSOCHAM को सबसे बड़ी समस्या implementation की ही लग रही है।

ASSOCHAM ने जो स्टडी की है, उसका नाम रखा है "Uttar Pradesh: a rainbow of opportunities". ASSOCHAM की रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी ताकत राज्य का मानव संसाधन और जमीन को बताया गया है। ASSOCHAM के चेयरमैन वेणुगोपाल धूत के मुताबिक, राज्य में मेन्युफैक्चरिंग की विकास दर 10.5 और खेती में 4 प्रतिशत की विकास दर होनी चाहिए। राज्य में देश की 17 प्रतिशत आबादी रहती है। साथ ही देश की कुल खेती की जमीन में से 11.8 % खेती की जमीन उत्तर प्रदेश ही है।

ASSOCHAM का कहना है कि विकास की ये रफ्तार पाने के लिए राज्य में 50,000 करोड़ रुपे का निवेश होगा। उत्तर प्रदेश में IT और ITES सर्विसेज…

ए भाई लोगों इन मराठियों की भी जरा चिंता कर लो

मराठी माणुस के भले का दावा करने वालों ने एक मराठी माणुस की जान ले ली। और, दूसरा एक मराठी माणुस हत्यारा बन गया। यानी दो मराठी परिवार बरबाद हो गए। लेकिन, अभी भी मराठियों की चिंता करने वालों की सेना का अभियान जारी है। मराठी हितों की चिंता करने वाले सचमुच कितने चिंतित हैं अपने वोट के लिए या मराठी हितों के लिए ये सब जानते हैं। फिर भी महाराष्ट्र के 2000 के सेंसस से इसे समझने में और आसानी होगी। सच्चाई ये है कि मराठियों को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल पा रहीं और ये आंकड़ा सिर्फ मुंबई का नहीं है। जहां गैर मराठियों को मराठियों के संसाधनों पर कब्जा करते प्रचारित किया गया है।

पूरे महाराष्ट्र के आधे से ज्यादा घरों में टॉयलेट तक की सुविधा नहीं है। जब उत्तर भारतीयों की संख्या मुंबई में बहुत कम थी, तब भी देश का अकेला शहर मुंबई ही था जहां, चॉल सिस्टम में बीसों घरों के लोग एक ही टॉयलेट का इस्तेमाल करते थे। मराठी संस्कृति, अस्मिता का ढोल पीटने वालों अब जरा गैर मराठियों को गंदगी में रहने वाले और गंदगी करने वाले बोलने से पहले इन आंकड़ों का ध्यान कर लेना। देश में सबसे ज्यादा शहरीकरण गुजरात के बाद महाराष…

राज की गिरफ्तारी और जमानत के ड्रामे का सच

राज ठाकरे को जमानत मिल गई। अगर किसी ने बुधवार चार बजे के पहले टेलीविजन बंद कर दिया होगा और किसी वजह से सात बजे तक टीवी नहीं देख पाया होगा तो, उसे लगेगा कि राज को जमानत क्यों लेनी पड़ी। जब पिछले 48 घंटों से राज्य सरकार की पूरी मशीनरी और केंद्र की ओर से भेजी गई अतिरिक्त अर्द्धसैनिक बलों की फौज राज के घर का सुरक्षा घेरा प्रधानमंत्री निवास से भी ज्यादा किए हुए थी और गिरफ्तारी नहीं हो पाई तो, फिर ये जमानत का ड्रामा क्या है।

बुधवार शाम चार से सात बजे के बीच की गिरफ्तारी से लेकर जमानत तक का ये ड्रामा महाराष्ट्र की गंध भरी राजनीति की असली कहानी कह देता है। शुरुआत में राज ठाकरे की उत्तर भारतीयों के खिलाफ गंदगी करने की कोशिश सिर्फ ठाकरे खानदान के वर्चस्व की लड़ाई के तौर पर देखी जा रही थी। लेकिन, अब ये पूरी तरह साफ हो गया है कि मायानगरी में अब तक बनी किसी भी फिल्म से ज्यादा ड्रामे वाली इस पटकथा को राज्य के सबसे कमजोर मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख और राज्य के वोटविहीन (शायद रियल लाइफ की बांटो-काटो की राजनीति कुछ वोट भीख में दे दे) नेता राज ठाकरे ने मिलकर तैयार किया है। और, पिक्चर अभी खत्म नहीं हु…

एक गुंडा ‘राज’ के साये में कई गुंडे ‘राज’ कर रहे हैं

कहावत है चोर-चोर मौसेरे भाई लेकिन, यही कहावत महाराष्ट्र में अंदाज बदल लेती है, यहां पर वही कहावत गुंडा-गुंडा चचा-भतीजा में तब्दील हो जाती है। और, अब तो हाल ये है कि पूरे राज्य के नेता एक दूसरे के भाई-भतीजे नजर आ रहे हैं। क्या पक्ष, क्या विपक्ष। सरकार और सरकार से बाहर किसी में कोई भेदभाव नहीं है। सब एक दूसरे की गुंडई बढ़ाने में मदद कर रहे हैं।

लेकिन, गुंडा ‘राज’ में भी पूरी विनम्रता के दर्शन हो रहे हैं। पुणे में एक समारोह के बाद जब आयोजकों ने राज ठाकरे को वहां आने के लिए धन्यवाद दिया तो, राज ने पूरी विनम्रता से इसका सेहरा श्रीमान राजाधि ‘राज’ प्रदेश के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के सिर पर सजा दिया। राज ने स्वीकारा कि अगर देशमुख साहब ने उन्हें गिरफ्तार करवा दिया होता तो, वो आयोजन में शामिल न हो पाते। वैसे राज ठाकरे पुलिस ‘राज’ मुंबई के पुलिस कमिश्नर डी एन जाधव को उनका प्रशस्ति पत्र सार्वजनिक मंच से देना या तो भूल गए या फिर सरकारी नौकर छोड़कर बख्श दिया।

सेना की शुरुआती तालीम के दिनों से ही गुंडा ‘राज’ शुरू हो गया था। शुरू में बड़े ठाकरे, जिनका मुंबई में किसी भी कीमत पर कोई ‘बाल’ भी बां…

... और अब चाहिए कोडिफाइड मीडिया

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेन्टर ऑफ फोटो जर्नलिज्म एण्ड विजुअल कम्युनिकेशन, इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज की पत्रिका ‘बरगद’ का ताजा अंक मीडिया पर है। इस अंक में मीडिया का कोड ऑफ कंडक्ट होना चाहिए क्या। पत्रकारिता की नई प्रवृत्तियां बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समाचारों में सनसनी और टीआरपी की होड़, विशेषीकृत पत्रकारिता न तकनीकी लेखन, सिनेमा, क्रिकेट, क्राइम बनाम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा मीडिया की भाषा कैसी होनी चाहिए विषय पर तीन दिन तक चली राष्ट्रीय संगोष्ठी का पूरा निचोड़ है।

इस गोष्ठी में केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के उपाध्यक्ष रामशरण जोशी, माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय, भोपाल के पूर्व कुलपति राधेश्याम शर्मा, सहारा टाइम्स के प्रमुख उदय सिन्हा, जामिया मिलिया, नई दिल्ली से प्रोफेसर हेमंत जोशी, एनडीटीवी, दिल्ली के समाचार संपादक प्रियदर्शन, वरिष्ठ टीवी पत्रकार मंजरी जोशी, नया ज्ञानोदय नई दिल्ली के संपादक रवींद्र कालिया, इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जी के राय और दूसरे कई मीडिया के दिग्गजों के साथ मुझे शामिल होने का मौका मिला था। मैंने कौन बन…

गांधी के मुंह में मरते समय राम ठेल देने से किसका भला हुआ

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महात्मा गांधी का इस्तेमाल उनके मरने के बाद भी हो रहा है। कौन कर रहा है किसके भले के लिए हो रहा है। या सिर्फ मरे हुए गांधी को जिंदा रखकर उनका इस्तेमाल करने की कोशिश चल रही है। और, गांधी की महानता भले ही पूरे देश के काम आ रही हो। लेकिन, सच्चाई यही है कि धोती में मुस्कुराते गांधी की मुस्कान वाली फोटो पर हार डालकर सबसे ज्यादा फायदा कांग्रेस को मिला है। और, इसीलिए देश में गांधी के मुंह से निकले आखिरी ‘हे राम’ का सबसे ज्यादा प्रचार-प्रसार भी कांग्रेस ने ही किया।

कुछ दिन पहले ही गांधी के मरने के आखिरी शब्द ‘हे राम’ की जगह ‘राम-राम’ में बदले। और, अब गांधीजी के साथ 1943 से 1948 तक काम करने वाले एक गांधीवादी कह रहे हैं कि गोली लगने के बाद महात्मा गांधी के मुंह से कोई शब्द नहीं निकला। वो, हतप्रभ रह गए थे और तुरंत उनकी मृत्यु हो गई थी। चेन्नई में रहने वाले 85 साल के कल्याणम वेंकटरमण का कहना है कि गांधी का पहले ही मोहभंग हो चुका था।

वेंकटरमण कहते हैं कि जब नाथूराम गोडसे ने गांधीजी पर पांच गोलियां दागीं वो, उस समय गांधीजी से मुश्किल से आधा मीटर की दूरी पर खड़े थे। वेंकटरमण का कहना है कि गांधीजी …

पद्मश्री पाने वाला देश का पहला किसान

भारत एक कृषि प्रधान देश है। तो, इसमें नया क्या है। नया ये है कि देश में पहली बार किसी किसान को भी पद्मश्री के लायक समझा गया है। उत्तर प्रदेश के मलीहाबाद के हाजी कलीमउल्ला को ये सम्मान मिला है। बड़े-बड़े नेता, पत्रकारों, व्यापारियों के बीच में पद्मश्री पाने वालों की लंबी सूची में कलीमउल्ला कहीं बहुत नीचे दब गए। लेकिन, सुखद ये रहा कि कई अखबारों में कलीम उल्ला को खासी तवज्जो मिली। कलीम आम के सिर्फ एक पेड़ पर आम की 300 किस्में उगा चुके हैं। बरसों का कलीम का खुद का ही शोध है। अमर उजाला के संपादकीय पृष्ठ पर अमर उजाला कानपुर के स्थानीय संपादक प्रताप सोमवंशी ने कलीम उल्ला की काबिलियत को जगजाहिर करने वाला एक लेख लिखा है। प्रतापजी के साथ मैंने इलाहाबाद से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। काम करना सीखा था। मैं उस संपादकीय का लिंक दे रहा हूं। कलीम की काबिलियत की पूरी जानकारी के लिए ये लेख पढ़ें

गलत है कि नई पीढ़ी, प्रतीकों के बारे में हमसे कम सोचती-विचारती है

मेरा छोटा भाई आनंदवर्धन नोएडा के FDDI से रिटेल मैनेजमेंट का कोर्स कर रहा है। कल मेरे जीमेल पर दिखा कि छोटे भाई ने ऑर्कुट पर कुछ स्क्रैप भेजा है। मुझे लगा शायद भैया क्या हाल है। या फिर कुछ ऐसा ही हल्का-फुल्का संदेश होगा। लेकिन, उसका संदेश मुझे अंदर तक हिला गया। पत्रकार होने के नाते ये भ्रम थोड़ा बहुत तो बना ही रहता है कि हम दूसरों से सामाजिक विषयों पर, अपने प्रतीकों के बारे में अपनी राष्ट्रीय अस्मिता या दूसरा सामाजिक मुद्दों पर ज्यादा संवेदनशील होते हैं। लेकिन, MBA की पढ़ाई कर रहे छोटे भाई के स्क्रैप ने मुझे थोड़ा सुकून भी दिया और चौंकाया भी। मैं तो पत्रकारिता में आने से पहले छात्र राजनीति, सामाजिक आंदोलनों से भी जुड़ा रहा हूं। लेकिन, मेरे छोटे भाई ने तो आज तक किसी राजनीतिक हलचल या सामाजिक आंदोलन में शिरकत नहीं की है। लेकिन, शायद अपने प्रतीकों पर हमला उसे मुझसे ज्यादा खल रहा है। ये पूरा संदेश मैं नीचे डाल रहा हूं।

anand vardhan:
pranam bhaiya read it & think y this happen in INDIA
its a serious matter for all of d INDIANS

Shame on this goverment !!!

Bhagat singh, Rajguru and Suk…

नेहरूजी की लोकसभा सीट से अतीक होगा अगला कांग्रेस प्रत्याशी

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मायावती को उनके प्रदेश के अपराधी डराते हैं। कहा जाता है कि अगर कोई किसी को कभी झापड़ भी मार दे तो, झापड़ खाने वाला चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, झापड़ मारने वाले से हमेशा डरता रहता है। यही मायावती के साथ हो रहा है। वैसे मायावती का अतीक से डरना बेवजह नहीं है।

मायावती को लखनऊ के वीवीआईपी गेस्ट हाउस में समाजवादी पार्टी के रमाकांत, उमाकांत यादव और अतीक अहमद की बदसलूकी आज भी डराती होगी। वैसे जब मायावती ने अतीक से अपनी जान का खतरा बताया तो, पहले से ही उत्तर प्रदेश से भगोड़ा घोषित किए जा चुके अतीक की पुलिस मुठभेड़ में हत्या की आशंका बलवती हो गई। लेकिन, न तो कल्याण सिंह का जमाना था और न ही अतीक अहमद, शिव प्रकाश शुक्ला की तरफ सिर्फ अपराधी था। अतीक माननीय सांसद हैं और आने वाले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस, सपा के लिए काम की ताकत बन सकते हैं।

अब अगर दिनदहाड़े हुई हत्या के बाद भी अतीक जैसा बदमाश मुस्कुराते हुए मुख्यमंत्री पर आरोप लगाकर मजे से जेल जा सकता है तो, मारे गए बीएसपी विधायक राजू पाल की विधवा पूजा पाल और राजू की मां रानी पाल का डरना तो बेवजह नहीं ही है। उनके पास तो मुख्यमंत्री जैसी स…