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Showing posts from 2014

समाज की गंदी सोच का शिकार होती लड़कियां

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दिल्ली में एक डॉक्टर के ऊपर हुए एसिड हमले के बाद सरकार ने तेजी से ये दिखाने की कोशिश की है कि उसने अपना काम कर दिया है। सरकार ने इस जघन्यतम अपराध की श्रेणी में डाल दिया है। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि इस तरह के अपराध करने वालों को उम्र कैद या फिर फांसी की सजा हो सकती है। लेकिन,
क्या इससे इस अपराध पर रोक लग सकेगी। फांसी की सजा या ज्यादा से ज्यादा सजा देकर अपराध रोकने का एक सिद्दांत है और वो काफी हद तक काम भी करता है। बलात्कार के मामले में भी इसीलिए बार-बार ये मांग उठती रही कि बलात्कार के अपराधियों को सीधे फांसी की सजा दी जाए। और किसी लड़की के चेहरे या फिर उसके शरीर पर तेजाब फेंककर उसे सजा देने की कोशिश भी काफी हद तक किसी लड़की के साथ बलात्कार करने जैसा ही है। बल्कि, कई मायने में तो किसी लड़की के शरीर या चेहरे पर तेजाब फेंकना, जान से मारने या बलात्कार करने से भी ज्यादा जघन्य है। क्योंकि, किसी लड़की के शरीर या चेहरे पर तेजाब फेंकने के अपराधियों के खिलाफ सरकारी या कानूनी तरीके से जितनी भी कड़ी से कड़ी सजा दी जाए वो, जायज ही है। सरकार ने अपनी तरफ से इसको लेकर समाज में गुस्से को कम करने की…

बंगाल में दक्षिणपंथ, दीदी और वामपंथ

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अमित शाह को अभी भी राष्ट्रीय मीडिया भारतीय जनता पार्टी के पुराने राष्ट्रीय अध्यक्षों की तरह सम्मान देने को तैयार नहीं है। दिल्ली में बैठे पत्रकार अभी भी ये मानने को तैयार ही नहीं हैं कि भारतीय जनता पार्टी को जो अप्रत्याशित सफलता देश के हर हिस्से में मिल रही है, उसमें मोदी लहर के अलावा अमित शाह की शानदार सांगठनिक क्षमता का भी कमाल है। अभी अगर ऐसी सफलता राजनाथ सिंह या किसी हिंदी पट्टी के नेता के नेतृत्व में बीजेपी को मिल रही होती तो यही हिंदी मीडिया उस अध्यक्ष को महानतम साबित कर देता। उसके पीछे सबसे बड़ी वजह ये है कि दिल्ली के पत्रकारों से या ये कह लें कि ज्यादातर पत्रकारों से अमित शाह कम ही मिलते-जुलते हैं। इस वजह से निजी तौर पर पत्रकारों के पास अमित शाह को समझने की दृष्टि कम ही बन पाती है। पत्रकार अमित शाह को गुजरात में नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद के तौर पर हर बुरे काम से जोड़कर याद करना ज्यादा पसंद करते हैं। उसके पीछे वजह ये कि आसानी से साबित किया जा सकता है। लेकिन, अगर अमित शाह को समझना है और अमित शाह की संगठन चलाने की क्षमता समझना है तो इसके लिए अमित शाह को सुनना होगा। फिर चाहे वो निज…

विचार महत्वपूर्ण या व्यवहार

विचार ही असल है। विचार कभी मरता नहीं है। विचार जीवित रहे तो सब जीवित रहता है। हममें से ज्यादातर की सोच कुछ ऐसी ही रहती है। और शायद यही वजह है कि हम ज्यादातर घटनाओं, बदलावों को दूसरे नजरिये से ही देखते, समझते रहते हैं। हमारी सारी लड़ाई, तर्क यहीं जाकर अंटक जाते हैं कि फलाना विचार सफल हो गया है और ढिमकाना विचार असल हो गया है। फिर उस विचार को हम नाम दे देते हैं। धर्म (धर्म के नाम पर जो, जो याद आ रहा हो जोड़ लीजिए मैं कितना लिख सकूंगा और मुझे तो सब पता भी नहीं है), कर्मकांड, पंथ (दक्षिणपंथ, वामपंथ, तटस्थ, तुष्टीकरण ... ऐसे और ढेर सारे)। फिर बात होती है कि इस विचार की ताकत देखिए कि इतनी बड़ी क्रांति हो गई। बात होती है कि उस विचार की ताकत देखिए सब क्रांति धरी की धरी रह गई। फिर बात होती है कि ये विचार ही तो है कि इतनी बड़ी पार्टी हर झटके से उबर गई। उसी में ये भी बात होती है कि वो विचार ही तो उस पार्टी को ले डूबा। हम ऐसे ही बात करते हैं। विचार, विचारक- हम इसी में निपटे जाते हैं।
फिर हम नाम जोड़कर विचार को जोड़ देते हैं। राम का विचार, कृष्ण का विचार, दयानंद, विवेकानंद का विचार, मार्क्स, लेनिन …

GOOGLE BLOG!

हिंदी को लेकर हम काफी हलाकान हुए रहते हैं। और इधर ये भरोसा बढ़ा है कि जब @narendramodi प्रधानमंत्री हो गए हैं तो हिंदी भी प्रधान भाषा हो जाएगी। लेकिन, जरा भारतीयों के लिए हिंदी के कंप्यूटर प्रयोग के सबसे बड़े मंच, साधन गूगल की तरफ ध्यान से देखिए। गूगल हिंदी ब्लॉगरों को विज्ञापन तो नहीं ही देता है। इसीलिए हिंदी ब्लॉगिंग सिर्फ शौक है। Google का कोई भी ऑफीशियल ब्लॉग पन्ना हिंदी में है ही नहीं। जाने कौन कौन सी भाषा में लोगों को गूगल अपनी योजनाओं, तकनीक की जानकारी दे रहा है लेकिन, भारतीयों के लिए सब अंग्रेजी में हैं। गजब है हम इत्ते अंग्रेज हो गए हैं। आप भी इस पन्ने पर जाइए और खुद देखिए।http://www.google.com/press/blog-directory.html  गूगल का जो इंडिया ब्लॉग है वो कहता है
News and Notes from Google India

अच्छे दिन के पीछे कौन

सबकुछ ठीक रहा तो झारखंड, जम्मू कश्मीर चुनाव से पहले पेट्रोल-डीजल दोनों ही 2-3 रुपये लीटर सस्ता हो सकता है। वजह अंतर्राष्ट्रीय है। कच्चा तेल $85.14/बैरल हो गया है। रुपया भी डॉलर के मुकाबले लगभग स्थिर है। इससे मोदी सरकार के अच्छे दिन आ गए हैं। लेकिन, सच्चाई यही है कि इस समय कोई भी सरकार होती तो ये अच्छे दिन आते ही आते। तेल उत्पादन करने वाले देशों के संगठन को गिरते कच्चे तेल के भाव से चिंता हो रही है। हो सकता है कि कीमतों को गिरने से रोकने के लिए वो कुछ उत्पादन घटाने जैसा कदम उठाएं। 27 नवंबर को OPEC देशों की होने वाली बैठक में इस पर फैसला लिया जा सकता है। साथ ही सर्दियां शुरू हो रही हैं। अमेरिका और दूसरे विकसित देशों में गैसोलीन की मांग तेजी से बढ़ेगी। हर तरह का कच्चा तेल महंगा हो सकता है। तब इस सरकार की असली परीक्षा होगी। तभी समझ में आएगा कि तेल नीति (मोटा-मोटा पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस जैसी कीमतें) के मामले में मोदी सरकार कितनी मजबूत है। और तभी ये भी तय होगा कि अच्छे दिन रह-रहकर आएंगे-जाएंगे या सचमुच आएंगे। खैर, सर्दियां बढ़ने तक सस्ते पेट्रोल-डीजल का मजा लीजिए।

काला धन वालों की खास सूची सिर्फ बतंगड़ पर!

बड़ी मुसीबत है। सुप्रीमकोर्ट ने सरकार से कह दिया है कि वो काला धन वाली सूची हमें तो दे ही दो। हम उसको किसी को नहीं बताएंगे। अच्छा रहा कि सुप्रीमकोर्ट अभी ये नहीं कह रहा है कि देश के हर काला धन वाले की सूची हमें सौंपो या देश को सौंपो। फिर तो मामला एकदम गड़बड़ा जाएगा साहब। देश की सरकार को जनसंख्या जानने से भी बड़ी मुहिम चलानी पड़ जाएगी। सड़क पर बैठा मोची, सुबह दूध देने वाला, हमारा धोबी, हमारी गाड़ी साफ करने वाला, हमारा सब्जी वाला, हमारी काम वाली सब काले धन के खातेदार हैं। हालांकि, इन काले धन वालों में कितनों का खाता खुला होगा। भगवान जानता होगा या वो काले धन वाले खुद जानते होंगे। सोचिए हर रोज जो चाय नाश्ता हम-आप सड़क किनारे की दुकान पर करते हैं। कितने की रसीद लेते हैं। तो जाहिर बिना बिल का कोई भी भुगतान काला धन हो गया। अब भारतीय रुपये का नोट हरा हो, लाल हो या फिर और रंग का। लेकिन, कानूनी पैमाने पर तो एक झटके में हर नोट काला हुआ जाता है। सोचिए घर का खर्च चलाने का पैसा नहीं है ये सड़क पर बैठा मोची हर रोज कहता होगा। लेकिन, उसने कब कहा कि उसके पास भी काला धन है। अब सोचिए देश के हर काला धन व…

मित्रों, माफ करना मैं चाहकर भी देशभक्त नहीं रह सका!

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हालांकि, ये कोई देशभक्ति का पक्का वाला पैमाना नहीं है। इसलिए भी कि अब दुनिया के काम करने का तरीका बदल गया है। दुनिया में सबकुछ ग्लोबल है, लोकल भी है। लेकिन, इस बार जब देश की राजनीति ऐसे बदली कि तीन दशक बाद पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। वो भी उस दल की जो, कई मायने में जबरदस्त अछूत है। तो इस पैमाने को फिर से तैयार किया गया। पता नहीं वो संदेश सचमुच नरेंद्र मोदी ने किसी को एक बार भी भेजा था या नहीं। लेकिन, लाखों बार ये संदेश एक दूसरे को भेजा गया। सोशल मीडिया के हर मंच पर भेजा गया। मेरे पास भी आया। संदेश कह रहा है कि इस दीपावली पर भारतीय, स्वदेशी सामानों का ही इस्तेमाल करना है। खासकर Made in China से बचने की सलाह है। वजह भी ये कि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी Make In India की बात कर रहे हैं। हालांकि, ये प्रधानमंत्री Make In India कहकर देसी उद्योगपतियों से ज्यादा विदेशी उद्योगपतियों का आह्वान कर रहे हैं। फिर भी हमने सोचा कि इस प्रधानमंत्री की ये बात सुनते हैं। इसलिए खुद के खरीदे अपने घर की पहली दीपावली के लिए रोशनी Make In India या Made In India उत्पाद से ही करने का इरादा बनाया। लेकिन, पूरे …

उम्मीद से होने से पहले सोचें!

महाराष्ट्र की राजनीति को लेकर भाजपा के जो तीन नाम आ रहे हैं, उसे जानकार राजनीतिक, पीढ़ीगत बदलाव के तौर पर देख रहे हैं। मोदी-अमित शाह कुछ जादू करने के मूड में न हों तो, देवेंद्र फडणवीस, विनोद तावड़े और पंकजा मुडे मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं। विनोद तावड़े 50 से थोड़ा ही ऊपर हैं तो देवेंद्र 40 के ऊपर और पंकजा 40 के भी नीचे। देखने में ये राजनीति नौजवानों के हाथ में आ रही है। लेकिन, महाराष्ट्र समझने वालों के लिए एक छोड़ी सी जानकारी NCP (मोदी जी के मुताबिक नेचुरली करप्ट पार्टी) मुखिया शरद पवार 37 साल की उम्र में ही राज्य के मुख्यमंत्री बन गए थे। इसलिए उम्मीद से होने पहले सोचें, तब उम्मीद से हों तो बेहतर।
और अंत में
ये जो कुछ बड़का लोग हैं। जिन्होंने नरेंद्र मोदी के समर्थक को भक्त कहना शुरू किया या कहें पूरी तरह भक्त साबित कर दिया। उन लोगों का इस मोदी लहर में बड़ा योगदान है। अब भक्त होंगे तो भगवान के लिए कुछ भी कर गुजरेंगे। कर रहे हैं। भक्त श्रृंखला बन गई है।

जान मत दीजिए!

सबको शुभ धनतेरस, दीपावली। हिंदू धर्म इसीलिए मुझे भाता है कि यहां सब मस्त है, सब स्वस्थ है। तो जान मत दीजिए सोना-चांदी का सिक्का खरीदने के लिए। धनतेरस पर कुछ खरीदना शुभ है। इसमें सोना-चांदी कब शामिल हुआ, इसकी कोई प्रमाणिक जानकारी दे सके तो बेहतर। मुझे लगता है कि इसके पीछे नीयत सिर्फ इतनी रही होगी कि घर में कुछ नया आए तो लोगों का मन खुश रहे और दूसरा ये कि कुछ खरीदेंगे ही। तो अपनी हैसियत के लिहाज से कारोबार, अर्थव्यवस्था बढ़ाने में मददगार रहेंगे। इसलिए जिनकी हैसियत है वो चांदी, सोना, हीरा कुछ भी खरीद लीजिए। बाकी अपनी जरूरत का सामान खरीदिए। चम्मच से लेकर कुकर तक। फिर से शुभ धनतेरस, दीपावली।


और अंत में
ये भारत में त्यौहार किसी बड़ी दैवीय साजिश का नतीजा लगते हैं। किसी भी हाल में न देश को दुखी रहने देते हैं, न देशवासियों को। इसीलिए हिंदुस्तान उत्सवधर्मी कहा जाता है। लीजिए फिर उत्सव के साथ धर्म लग गया। शुभ दीपावली।

हिंदी में कुछ दिक्कत तो है!

ब्लॉग अड्डा की तरफ से एक मेल मेरे पास आया। इस मेल में लिखा है कि अगर आप इस प्रतियोगिता में शामिल होते हैं तो आपके INK Conference में नि:शुल्क प्रवेश मिलेगा। मुंबई में होने वाले इस कार्यक्रम के प्रवेश यानी Pass की कीमत 50 हजार रुपये बताई गई है। मुझे लगा मैं भी इसमें शामिल होता हूं। हालांकि, जिस तरह के लोग इसमें दिख रहे थे। उससे मेरी आशंका गहरा गई थी कि यहां भी हिंदी वाले अछूत ही होंगे। उनको प्रवेश नहीं मिलेगा। फिर भी मैंने हिम्मत करके ब्लॉगअड्डा के पन्ने पर जाकर ये सवाल पूछा कि क्या ये हिंदी ब्लॉगरों के लिए भी है। कई घंटे तक वो ब्लॉगअड्डा संचालकों की अनुमति का इंतजार करता रहा। फिर मेरा प्रश्न ही गायब हो गया। मतलब डिलीट कर दिया गया। वजह भी बड़ी साफ थी कि दो देशों के ब्लॉगरों को साथ मिलकर एक ब्लॉगपोस्ट तैयार करनी थी। और देश भले ही भदेस हिंदीभाषी को प्रधानमंत्री बना दे लेकिन, ये बाजार कहां मानने वाला है कि भारत में सिर्फ हिंदी में ब्लॉगिंग करने वाला विदेश के किसी ब्लॉगर से संवाद भी बना सकता है। इसलिए उन्होंने मेरे प्रश्न को डिलीट भी कर दिया कि उनका पन्ना हिंदी में लिखा बात से गंदा न दिखे…

लाइफ इन अ मेट्रो!

मातृशक्ति

आमतौर पर ये धारणा है कि सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं के लिए बड़ी मुश्किल है। उन्हें दुनिया भर की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। उनके साथ हर तरह की बद्तमीजी होती है। लेकिन, मेट्रो में उस दिन मुझे दूसरा अनुभव हुआ। एक अधेड़ उम्र दंपति नोएडा सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन से चढ़े। सीटें भर गईं थीं। लेकिन, अधेड़ उम्र महिला ने दो लोगों को थोड़ा-थोड़ा समेटा और अपने लिए जगह बना ली। महिला निश्चिंत थी। दोनों पुरुष सिमटे बैठे थे। अक्षरधाम स्टेशन पर उनके पति महोदय को मेरे बगल सीट मिल गई। पति को सीट मिलते ही वो अधेड़ उम्र महिला बिजली की गति से मेरे और अपने पति के बीच में जगह बनाने के लिए उपस्थित थी। मुझसे अपना शारीरिक उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं हुआ। मैं तुरंत उठ खड़ा हुआ। पति ने भी खड़े होकर मुझे बैठने को कहा। मैंने जवाब में खड़े रहना ही उचित समझा। पत्नी ने पति का हाथ पकड़ा और लगभग जबरदस्ती बैठा लिया।


बुजुर्ग

दो बुजुर्ग मेट्रो का दरवाजा खुलते ही मेट्रो में वृद्ध एवं विकलांगों के लिए लिखी वाली सीट की ओर दौड़े। एक ने कम उम्र व्यक्ति को उठाकर अपने लिए जगह बना ली। दूसरा बुजुर्ग ही बैठा था। लेकिन, दू…

मिट्टी रो रही होगी

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बच्चे मन के सच्चे होते हैं। ये बात हर कोई कहता रहता है। लेकिन, उसका अनुभव कभी-कभी गजब तरीके से होता है। अभी एक दिन खेल खेल में मुझे भी ये अनुभव हुआ। रविवार के दिन दोनों बेटियों को लेकर अपार्टमेंट के प्ले एरिया में था। झूला झूलते-झूलते बड़ी बेटी अमोलो ने पूछा। पापा ये मिट्टी क्यों दबा दी है। दरअसल हमारे अपार्टमेंट के प्ले एरिया में पता नहीं किस सोच से मिट्टी के ऊपर पूरी तरह से कंक्रीट डालकर पक्का कर दिया गया है। एक वजह हो सकती है कि झूलों और दूसरे खेलने वाले उपकरण मजबूती से जमे रहें। लेकिन, इससे हर समय ये खतरा बना रहता है कि बच्चे गिरे तो उनको चोट लग सकती है। अमोलो ने कहा- पापा मिट्टी रो रही होगी। क्यों मिट्टी को दबा दिया है। मैं जवाब नहीं दे सका। लेकिन, सच है कि हमारे अपने कर्मों से मिट्टी तो रो ही रही है। हमें विकास चाहिए। लेकिन, जाने-अनजाने सच्चे मन से अमोलो ने वो कह दिया जिसका जवाब खोजना असंभव है।

हम मन से गुलाम

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ये खबर पढ़कर समझना मुश्किल है कि जयललिता इतनी महान नेता हैं या मरने, अस्पताल जाने वाले इतने बड़े मूर्ख थे, हैं। लेकिन, इतना तो आसानी से समझ में आ जाता है कि हम गजब गुलाम मन वाले देश में रहते हैं। जयललिता किसी भी तरह के महान कर्म की वजह से जेल नहीं जा रहीं थीं। जयललिता तमिलनाडु के उन लोगों के लिए भी जेल नहीं गईं, जो उनके लिए जान दे रहे हैं, देने को तैयार हैं। जयललिता भ्रष्टाचार की वजह से जेल गई हैं। और ये पहली बार नहीं हुआ है। इसके पहले भी कई बार देश के नेताओं की जान गई है या वो जेल गए हैं तो गुलाम मनस वाली जनता ने उनके लिए जान दी है। अब इसको आप चाहे जैसे मानें। मुझे तो ये सिर्फ और सिर्फ हमारी गुलाम मानसिकता का ही परिचय देता है।

YSR रेड्डी भी बहुत बड़े नेता थे। इतने बड़े कि उनकी दुखद मृत्यु के बाद राज्य के अलग-अलग हिस्सों से 150 से ज्यादा लोगों ने अपनी जान दे दी। सवाल ये नहीं है कि किसी नेता की लोकप्रियता कितनी हो। और उसकी अभिव्यक्ति के तरीके क्या हों। लेकिन, अगर किसी नेता की मौत पर उसका समर्थक समाज आत्महत्या कर रहा है। तो, ये समझना आसान हो जाता है कि उस नेता ने अपनी नेतृत्व क्षमता क…

थप्पड़ ने खोली राजदीप के अपराधों की पोटली

राजदीप सरदेसाई को लेकर दुनिया भर की जा बातें हो रही हैं वो अपनी जगह। लेकिन, राजदीप सरदेसाई के अपराध बहुत हैं। इस थप्पड़ से सारे अपराधों की बात होगी। इससे कम से कम मैं तो खुश हूं। और कम से कम आज की तारीख तक किसी की चवन्नी भी मैंने बेईमानी के एवज में नहीं ली है। मैं भी ये मानता रहा कि राजदीप बड़े और ईमानदार पत्रकार हैं। देश के जाने कितने पत्रकारिता पढ़ने वाले बच्चे राजदीप को देखकर पत्रकारिता करते हैं। उन सबको राजदीप ने ठगा है। उन सबके साथ राजदीप सरदेसाई ने बेईमानी की है। किसी पत्रकार के साथ धक्कामुक्की या मारपीट पहली बार नहीं हुई है। रिपोर्टिंग करते समय कई बार होती है। लेकिन, राजदीप ने जो इरादतन टाइप की मारपीट अपने साथ करवाई उसकी वजह से पूरे देश की छवि को जो बट्टा लगा। उसकी भरपाई किसके हिस्से से होगी। राजदीप को अगर सचमुच की पत्रकारिता करनी होती तो क्या डॉक्टर ने बताया था कि करीब दो दशक से संपादक रहने के बाद उन्हें फिर से किसी संस्थान में नौकरी करनी पड़े। क्या दोनों पति-पत्नी पत्रकार देश में सचमुच की पत्रकारिता करने की शुरुआत नहीं कर सकते थे।

सीएनएन आईबीएन और आईबीएन सेवन के संपादक की नौ…

विकल्पहीनता

किसी से भी पूछकर देखिए। ज्यादातर का जवाब यही आएगा कि विकल्प ही नहीं है। विकल्प होता तो ये थोड़े न करते। नौकरी कर रहे हैं तो कारोबार की बात करेंगे। कारोबार कर रहे हैं  तो नौकरी की बात करेंगे। राजनीति कर रहे हैं तो कुछ समय बाद वही भाव कि विकल्प ही नहीं है। विकल्प बन जाए तो राजनीति छोड़ दें। ऐसे ही कोई दूसरा बोल सकता है कि विकल्प मिल जाए तो कल से राजनीति करनी शुरू कर दें। बात करिए तो ऐसे लगता है कि पूरा समाज ही विकल्पहीनता का शिकार है। 95 प्रतिशत लोगों को विकल्प मिले तो कुछ और करने लगें। फिर इससे दूसरे तरह की भी विकल्पहीनता की बात आती है। लंबे समय तक इस देश में ये सामान्य धारणा बनी रही कि इस देश में राजनीतिक दल के तौर पर कांग्रेस का विकल्प नहीं है। देश बचाना है तो संघ का विकल्प नहीं है। पिछड़ों की राजनीति जारी रखनी है तो लालू-मुलायम-शरद यादव का विकल्प नहीं है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों के लिए चौधरी साहब की विरासत का विकल्प नहीं है। दलित राजनीति में उत्तर में मायावती तो दक्षिण में करुणानिधि का विकल्प नहीं है।

ये विकल्पहीनता भी गजब की है। हर दिन विकल्प मिलता जाए तो भी विकल्पहीनता ही र…

डॉक्टर हर्षवर्धन त्रिपाठी!

ये एतिहासिक शोध मैंने पूरा किया है। इसे मैं नए माध्यम यानी कि ब्लॉग पर पेश कर रहा हूं। मेरे शोध का विषय रहा- बीमारी की हद तक वामपंथ से ग्रसित व्यक्ति स्वस्थ होने की हद तक दक्षिणपंथी कैसे बन सकता है। इस शोध का परिणाम भी एक ही लाइन का है। परिणाम है देश में दक्षिणपंथी विचारधारा वाली सरकार का होना। अब इस शानदार शोध के लिए मुझे डॉक्टरेट मिले ना मिले। वैसे तो राह चलते कई विश्वविद्यालय बुलाकर बड़े लोगों को बिना शोध ही डॉक्टरेट की उपाधि दे देते हैं। बड़ा आदमी न होने से इतना महत्वपूर्ण शोधपत्र प्रस्तुत करने के बाद भी शायद ही कोई विश्वविद्यालय अदालतों की तरह स्वत: संज्ञान ले। बीमारी से ग्रसित ढेर सारे वामपंथियों के स्वस्थ दक्षिणपंथी में बदलने की कुछ कहानियां भी मैं यहां लिख सकता हूं। लेकिन, इसकी कोई जरूरत नहीं है। अपने आसपास के बीमारी की हद तक वाले वामपंथी पर नजर रखिए। खुद सब साफ हो जाएगा।

(नोट- मैं तो आलसी, अगंभीर किस्म का शोधार्थी हूं। इसलिए ऐसे ही इतना महत्वपूर्ण शोध कर लिया। लेकिन, कोई गंभीर, सक्रिय, कामकाजी शोधार्थी चाहें तो सचमुच इस विषय पर शोध कर सकते हैं। और पक्का उन्हें डॉक्टरेट की उप…

हर बार कमतर आंके जाते हैं मोदी!

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बीजेपी का उम्मीद से अच्छा प्रदर्शन!

कम से कम मेरे अनुमान को बीजेपी ने ध्वस्त कर दिया। मुझे ये लग रहा था कि भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में 11 विधानसभा और एक लोकसभा सीट पर कहीं लड़ाई में नहीं है। दो घोर शहरी सीटों- नोएडा और लखनऊ पूर्वी - को छोड़कर बीजेपी के लिए हर जगह मुश्किल दिख रही थी। शहरी से भी ज्यादा ये दोनों सीटें ऐसी हैं जहां तरक्की, जेब में कमाई, विकास टाइप के शब्द पर भी राजनीति की जा सकती है। ये उम्मीद मैंने इसके बावजूद लगा रखी थी कि भारतीय जनता पार्टी ने लखनऊ पूर्वी और नोएडा में भी प्रत्याशी ऐसे और इतनी देर से चुने कि जिनके ऊपर दांव लगाना सही नहीं ही था। आशुतोष टंडन उर्फ गोपाल की सारी राजनीति हैसियत पिता लालजी टंडन की वजह से रही है। खबरें ये है कि अपनी राज्यपाल की कुर्सी दांव पर लगाकर लालजी टंडन ने बेटे को आखिरकार विधायक बनवा ही दिया। और बीजेपी ने उससे ज्यादा प्रदर्शन करते हुए सहारनपुर भी जीत लिया। वो भी योगी आदित्यनाथ को चेहरा बनाने के बावजूद। उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने में योगी आदित्यनाथ के साथ मीडिया भी पूरा सहयोग करने में जुट गया था। उस योगी आदित्यनाथ को जो पूर्वी उत्तर प्रदेश में …