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Showing posts from May, 2009

जान लीजिए राहुल ने कमाल कैसे किया

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कांग्रेस की इस जीत ने कई इतिहास बनाए हैं। और, सबसे बड़ी बात ये कि इसका पूरा श्रेय मी़डिया उन राहुल गांधी को दे रहा है जिनको अभी कुछ समय पहले तक राजनीति का नौसिखिया-बच्चा कहा जा रहा था। फिर आखिर अचानक राहुल ने क्या कमाल कर दिया। दूसरी बात ये भी कोई कमाल किया भी है या सिर्फ महज ढेर सारे संयोगों के एक साथ होने ने राहुल के गाल के गड्ढे बढ़ा दिए। और, अपनी मां सोनिया की ही तरह उन्होंने बड़प्पन दिखाते हुए मंत्री बनने से इनकार कर दिया।


अब देखते हैं कि राहुल ने आखिर किया क्या जो, पूरा मीडिया और पूरी कांग्रेस राहुल गांधी के आगे नतमस्तक है। राहुल गांधी ने दरअसल कोशिश करके अनी उन सभी कमियों पर खुद हमला करने की कोशिश की जिसका इस्तेमाल उनके खिलाफ विपक्षी जमकर कर रहे थे। वंशवाद, सिस्टम की कमी, भ्रष्टाचार, नौजवानों को राजनीति में जगह न मिलना और सबसे बड़ा गांधी-नेहरू परिवार का राज। राहुल ने एक-एक करके इस सब पर चोट पहुंचाई। बहुत कम लोगों को याद होगा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय दिया गया राहुल का वो बयान जिसमें राहुल ने गैर गांधी कांग्रेसी प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहाराव को ही दोषी ठहराते हुए कहा था…

ये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हार है

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बीजेपी के देश भर में तेजी से घटे ग्राफ पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहली टिप्पणी आई- बीजेपी को बेहतर करना है तो, अपना चेहरा बदलना होगा। ये टिप्पणी कुछ वैसी ही मिलती-जुलती है जैसे दो साल पहले उत्तर प्रदेश में मायावती को पूर्ण बहुमत और बीजेपी को पहले से भी कम सीटें मिलने पर RSS के मुख्यपत्र ऑर्गनाइजर में कहा गया कि बीजेपी ने आधे मन से हिंदुत्व का रास्ता अपना लिया। और, मायावती ने इंदिरा गांधी के सॉफ्ट हिंदुत्व के फॉर्मूले से चुनाव जीत लिया। अब दो साल बाद भी RSS की ओर से वैसी ही टिप्पणी पर तो नौ दिन चले अढ़ाई कोस कहावत से भी गई गुजरी लगती है। संघ ने तब भी नहीं माना था कि यूपी के जातियों में बंटे धरातल पर संघ के विचार फेल हुए हैं। और, इस तरह से सच्चाई से आंखें मूदने से RSS के और कमजोर होने का रास्ता बन रहा है।


लोकसभा चुनाव 2009 में बीजेपी की इस तरह की हार के बाद बीजेपी का असली चेहरा माने जाने वाले आडवाणी की राजनीतिक करियर भी खत्म हो गया। इस हार को समझने के लिए सबसे पहले उत्तर प्रदेश में 2007 विधानसभा और 2009 लोकसभा तक जो परिवर्तन हुए हैं उनको समझना होगा। उत्तर प्रदेश ही वो राज्य था जहां से…

ट्रॉमा सेंटर बनते जा रहे हैं शहर

सेक्टर 49 नोएडा में रहता हूं। पॉश कॉलोनी है। सब बड़ी-बड़ी कोठियां हैं। सामने ही प्रयाग हॉस्पिटल है। अभी थोड़ा ही समय हुआ जब प्रयाग हॉस्पिटल में ट्रॉमा सेंटर भी खुल गया है। मेरी डॉक्टर पत्नी ने बताया- मतलब इमर्जेंसी में यहां इलाज कराया जा सकता है।


लेकिन, मुझे तो लग रहा है कि जब पूरा शहर ही ट्रॉमा सेंटर बन गया हो तो, ऐसे सेक्टरों के बीच में खुले एकाध अस्पतालों के ट्रॉमा सेंटर से कैसे काम चल पाएगा। चुनाव में नोएडा (गोतमबुद्ध नगर) से BSP प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह नागर जीते हैं। BSP जीती है लेकिन, S से सड़क छोड़कर BP- बिजली, पानी- का बुरा हाल है। इतना कि लोगों का BP- ब्लड प्रेशर इतना बढ़ जाए कि उन्हें ट्रॉमा सेंटर खोजने की जरूरत पड़ जाए।


पता नहीं लोग कह रहे हैं- बार-बार सुनते-सुनते मुझे भी कभी-कभी लगता है- कि अब BSP ही चुनावों में सबसे बड़ा मुद्दा बन रही है। जहां नेता जनता की BSP- बिजली, सड़क,पानी- की जरूरत नहीं पूरी कर रहे हैं। जनता उन्हें लात मारकर भगा रही है। जो, BSP से जनता को संतुष्ट रख पा रहे हैं उन्हें, जनता दोबारा मौका दे रही है।


पता नहीं समझ में तो नहीं आता ये सब। सड़के नोएडा में…

बिन मांगे मोती मिले.. मांगे मिले न चून

पुरानी कहावतें यूं ही नहीं बनी होतीं। और, समय-समय पर इन कहावतों-मिथकों की प्रासंगिकता गजब साबित होती रहती है। कांग्रेस-यूपीए ने सबको साफ कर दिया। थोड़ा सा बच गया नहीं तो, अकेले ही सरकार बना लेते। अब 10-12 सांसदों का समर्थन बचा रह गया है।।


और, मनमोहन बाबू तो अपनी किस्मत भगवान के यहां से ही गजब लिखाकर लाए हैं। इतना पढ़ना-लिखना, राजनीति से एकदम दूर रहना और एकदम से राजनीति के शिखर पर पहुंच जाना। सब किस्मत का ही तो खेल है। अब कांग्रेस-यूपीए गजब जीती है तो, गजब-गजब विश्लेषण भी आ रहे हैं। राहुल की स्ट्रैटेजी, शरीफ मनमोहन पर आडवाणी का गंदा वार। लेकिन, दरअसल ये सब अपने मनमोहन जी की किस्मत का ही कमाल है।


किस्मत गजब लिखाई है। अब देखिए चुनाव के पहले तक सब कैसे मनमोहन के नाम पर भिन्ना रहे थे। लेफ्ट ने समर्थन ही इसी बात पर वापस ले लिया और समर्थन वापस लेने के बाद लेफ्ट की तरफ से बयान भी आए कि बिना मनमोहन के तो वो कांग्रेस को समर्थन दे भी सकते हैं। मनमोहन रहे तो, सवाल ही नहीं उठता। लीजिए साहब मनमोहनजी क्या गजब किस्मत लिखाकर लाए। लेफ्ट के समर्थन का ही सवाल नहीं उठा।


मुलायम-लालू-पासवान ने तिकड़ी बना…

देखिए शायद यही गणित ठीक बैठ जाए

चुनाव नतीजे आने से पहले सर्वे-एक्जिट पोल का मौसम है। मैंने भी एक सर्वे कर डाला है। बस ऐसे ही कोई न तो सैंपल साइज है न तो मैं किसी राज्य में गया हूं। यहीं दिल्ली में बैठकर अपनी राजनीतिक समझ के आधार पर ये सर्वे किया। सर्वे क्या यूं कहें कि ये पूरी तरह अंदाजा भर है।


इसके लिहाज से कांग्रेस+ यानी UPA के कुल 199 सांसद बनते दिख रहे हैं। जिसमें कांग्रेस के साथ डीएमके, एनसीपी, तृणमूल कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा और नेशनल कांफ्रेंस शामिल हैं।


BJP+ यानी NDA के कुल 180 सांसद बनते दिख रहे हैं। इसमें TRS के 5 सांसद जोड़ दें तो, ये संख्या 185 पहुंच जाती है।

तीसरे मोर्चे की बात करें यानी लेफ्ट पार्टियों के साथ जेडीएस, टीडीपी, जयललिता, बीएसपी, बीजू जनता दल को जोड़ें तो, ये बनते हैं 112।


और, यूपीए और तीसरे मोर्चे से टूटकर बने चौथे मोर्चे यानी लालू-मुलायम-पासवान की तिकड़ी की बात करें तो, इसे कुल 26 सीटें ही मिलती दिख रही हैं।


इन मोर्चों के अलावा दूसरी पार्टियों और अन्य को बीस के आसपास सीटें मिल सकती हैं। कुल मिलाकर सारा दम करीब 31 सीटें जीतने वाली मायावती और 20 के पास सीटें जीतने वाली जयललिता के गठजोड…