आस्था पर हमले के बिना भी तो बात बन सकती है

राम का अस्तित्व था या नहीं, इसे जानने का इन दिनों भारत में महाअभियान चल रहा है। राम को भगवान मानने वाले और उनके अस्तित्व को ही नकारने वाले, दोनों ही जल्दी से जल्दी राम के होने न होने का तर्क खोज रहे हैं। और, जिससे जितना कुछ बन पड़ रहा है वो, लोगों को बता दे रहा है। इस सबके बीच में सबसे ज्यादा फंसे वो लोग हैं जो, तटस्थ हैं यानी न तो अंधभक्त हैं और न ही वो इस बात को सिरे से खारिज करते हैं कि राम थे ही नहीं।

मेरी निजी राय ये है कि भगवान राम का होना न होना एक ऐसा विषय है जो, तर्क के परे हैं। ये उस विज्ञान के आगे की आस्था जैसा ही है। विज्ञान शरीर जानता है लेकिन, ये नहीं पता लगा पाया कि शरीर का प्राण कहां से निकल जाता है। अब तर्क के परे मैं क्यों कह रहा हूं। इसकी भी खास वजह है। अब तक हम ये जान नहीं सके हैं कि आखिर हमारे जन्म से पहले और मृत्यु के बाद क्या है। मैंने देखा है कि जो, जोर-जोर से चिल्लाते हैं कि भगवान होते ही नहीं। अकेले में जब घबराते हैं तो, भदवत्भजन ही कल्याण का रास्ता दिखता है।
अब मैं अपनी ही बात करूं तो, मुझे कभी-कभी मंदिर जाना अच्छा लगता है। थोड़ी पूजा कर लेने से भी मन साफ सा होता दिखता है। लेकिन, अब मुंबई में सिद्धिविनायक मंदिर जाने पर पूजा के बाद मंदिर में दो चूहे के कान में अपनी मुराद को पूरी करने के लिए भगवान से अर्जी लगाना तो, मुझे भी अंधविश्वास लगता है। लेकिन, चूहे के कान में पूरे मन से मुराद मांगने पर बीबी से मैं तर्क मांगकर घर में कलह करूं ये तो, बिल्कुल ही ठीक नहीं है। ठीक है ये अपनी-अपनी आस्था का विषय है। लेकिन, सेतुसमद्रम प्रोजेक्ट पर कुछ ऐसा ही देश में हो रहा है।

छोटी-छोटी बातें हैं। 2000-2001 के महाकुंभ के दौरान मैं रिपोर्टिंग कर रहा था। मेरे घर से सभी लोग कम से कम अमावस्या और दूसरे सभी प्रमुख स्नान पर्व पर गंगा स्नान करके मुक्ति की तलाश कर रहे थे। लेकिन, पूरे तीन महीने वहीं रहने के बावजूद शायद ही एक-दो दिन मैंने गंगा में स्नान किया होगा। वजह ये कि गंगा का पानी इतने लोगों के एक साथ नहाने और जिन शहरों से गंगा गुजरती हैं, वहां के नालों का पानी मिलने से, गंदा हो गया है। गंगाजल को घरों में बोतल में अलग से रखा जाता है। और, महीनों उसमें किसी तरह की खराबी नहीं आती है। अब गंगा गंदी हो गई तो, स्वाभाविक है कि गंदे नाले से मिल रहे गंगा के पानी को बोतल में रखने पर कीड़े आएंगे ही। अब साफ है कि गंगा के पानी में तो कोई गड़बड़ तो है नहीं, गड़बड़ी तो, उसे गंदा करने वाले हम-आप में ही है। उसके बाद तो ये कुतर्क ही हुआ ना कि इतनी गंदी गंगा में स्नान करने से मुक्ति कैसे मिल सकती है।

कुंभ मेले में भी मैंने नजदीक से देखा है कि भगवान से भक्तों को मिलाने का दावा करने वाले ज्यादातर साधु सिर्फ अपनी दुकान चला रहे हैं। लेकिन, ये भी सच्चाई है कि इन ढोंगी-पाखंडी बाबाओं-साधुओं के साथ-साथ समाज कई ऐसे संत भी हैं जो, समाज कल्याण और भगवान के भजन में ही मस्त रहते हैं। और, इनके प्रभाव में समाज का एक बड़ा तबका अच्छे काम करने की कोशिश करता है। जहां तक राम को भगवान मानने वालों की बात है। राम को भगवान मानने वाले इस बहाने कोई गलत काम नहीं कर रहे हैं। राम को भगवान मानने वाले उनके नाम पर अच्छे काम ही करते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम का उदाहरण देकर कुछ मर्यादित रहने की कोशिश करते हैं। अब अगर राम के अस्तित्व को सिर्फ तर्कों के आधार पर नकार दिया गया तो, समाज के उस तबके को रास्ता दिखाने के लिए कौन सा आदर्श महापुरुष होगा। जो, तर्कों के आधार पर खरा उतरता है। इतिहास के आधार पर और तर्कों से सिद्ध किया जाने वाला कोई महापुरुष तो बड़ी मुश्किल से ही दिखाई देता है।

महातमा गांधी और विवेकानंद ही ऐसे महापुरुष हैं, जिनके इतिहास हैं और जिनकी लोग मंदिर बनाकर भी पूजा करते हैं। शून्य पर विवेकानंद के दिए भाषण का हवाला मैं कई बार सुन चुका हूं लेकिन, ये भाषण क्या था ये मुझे आज तक पढ़ने को नहीं मिल सका। इनके ऊपर भी सवाल उठते है। तर्क-कुतर्क भी होते हैं। लेकिन, सवाल ये है कि किसी की आस्था पर चोट की राजनीति कैसे की जा सकती है। भारत जैसे देश में जहां सभी धर्मों-समुदायों के लिए बराबर सम्मान की बात संविधान में कही गई है। वहां किसी को भी दूसरे की आस्था पर चोट करने को क्यों कानून के दायरे से बाहर रखा जा सकता है।

राम के नाम पर देश भर में आंदोलन कर रही विश्व हिंदू परिषद और भारतीय जनता पार्टी हो या राम का होना
ही नकार रहे करुणानिधि हों। सब सिर्फ अपनी राजनीति कर रहे हैं। करुणानिधि राम को झुठलाकर दक्षिण भारत में अपने उस वोटबैंक को और मजबूत करना चाहते हैं जो, पेरियार के समय से किसी भी ऐसी बात का विरोधी हो गया है जो, ब्राह्मणों या ऊंची जातियों से जुड़ी हुई है। तो, विश्व हिंदू परिषद के राम विलास वेदांती जैसे नेता राम के खिलाफ बोलने वाले करुणानिधि का सिर लाने वाले को सोने से तौलने की बात करते हैं। जिससे फिर से उन्हें कुछ ज्यादा लोग पूछने लगें। बाद में वेदांती गीता का गलत हवाला पलट गए।
एक की आस्था पर चोट करने वाले में दूसरे की आस्था हो जाती है। मुसलमानों के खिलाफ उल्टे-सीधे बयान देकर तोगड़िया जैसे नेताओं की हिंदू समाज ज्यादा सुनने लगता है तो, एम एफ हुसैन देवी-देवताओं की गलत तस्वीरें बनाकर दुनिया में मशहूर हो जाते हैं। सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट पूरा हो या नहीं। इस पर विवाद हो सकता है। लेकिन, राजनीति के बहाने आस्था पर चोट करना तो किसी भी तर्क से सही साबित नहीं किया जा सकता। आज जब मैं ये लिख रहा था, उसी समय टीवी चैनल पर सीपीएम के मुखपत्र के संपादक प्रोफेसर एम एन विजयन की प्रेस कांफ्रेंस करते-करते मौत की खबर चल रही थी। अब विजयन के किए को अच्छा मानने वाले कहेंगे कि हंसते-हंसते विजयन को मिली मौत, उनके अच्छे कर्मों का फल है। और, विजयन के विरोधी कहेंगे कि कोर्ट ने भले ही विजयन को बरी कर दिया हो लेकिन, भगवान सब देखता है। उसे सजा मिल गई। कुल मिलाकर आस्था का ही विषय है। वैसे हर बात को तर्क पर कसने वाले तर्क से बता सकते हैं क्या कि अच्छे भले विजयन की प्रेस कांफ्रेंस करते-करते मौत कैसे हो गई।