पुनर्मूषको भव

सर का ताज कब पांव की जूती बन गया पता ही नहीं चला और पांव की धूल उड़कर सर की शोभा बढ़ा रही है। राजनीति का बेजोड़ रंग इस समय भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में देखने को मिल रहा है। 2004 में जब यूपीए की सरकार बनी थी तो, लगा था कि ये सरकार तो बमुश्किल ही चल पाएगी। लेकिन, चली लड़ते-झगड़ते वामपंथी और कांग्रेसी बैठकों पर बैठकें करते। बैठक से पहले मीडिया के जरिए एक दूसरे पर दबाव बनाने की कोशिश करते और बैठक के बाद एक दूसरे के साथ गलबहियां डाले ऐसे निकलते जैसे सबकुछ मीडिया का ही किया धरा हो।

वैसे अब भी कांग्रेस और लेफ्ट के नेता टीवी चैनलों की बहस में बीच-बीच में ये बताते रहते हैं कि कम्युनल फोर्सेज को बाहर रखने का उनका संकल्प अभी भी उतना ही मजबूत है। कम्युनल फोर्सेज को बाहर रखने का यही संकल्प लिए समाजवादी पार्टी परमाणु समझौते का समर्थन कर रही है। और, मुलायम सिंह यादव कह रहे हैं कि वो, सिर्फ परमाणु समझौते का ही समर्थन नहीं कर रहे हैं। संसद में सरकार के पक्ष में वोट भी देंगे। अमर सिंह चीख-चीखकर खुद के सेक्युलर होने की दुहाई दे रहे हैं। और, आडवाणी को जॉर्ज बुश से भी खतरनाक बता रहे हैं। अमर सिंह लगे हाथ ये भी कह रहे हैं उन्हें पूरा भरोसा है कि लेफ्ट किसी भी कीमत पर सांप्रदायिक बीजेपी के साथ वोट नहीं करेगा। लालू यादव को भी यही भरोसा अपने वामपंथी मित्रों पर है।

लेफ्ट पार्टियों के नेता परमाणु समझौते को ही मुस्लिमों के खिलाफ बता रहे हैं। लेफ्ट भी बीजेपी को देश के लिए सबसे खतरनाक बता रहा है। लेकिन, वो, कह रहे हैं कि जॉर्ज बुश के साथ परमाणु समझौता ज्यादा खतरनाक है। इतना खतरनाक कि देश की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष गठजोड़ वाली यूपीए सरकार को वो पांचवें साल में गिराने पर आमादा हो गए हैं। लेफ्ट के नेता अमर सिंह और लालू की सलाह पर चिढ़कर बोल रहे हैं- हमें इनसे ये सीखने की जरूरत नहीं है कि सांप्रदायिक ताकतों से लड़ाई किस तरह से लड़नी है।

लेफ्ट पार्टियां दुहाई दे रही हैं कि वो, सरकार गिराना नहीं चाहते थे लेकिन, प्रधानमंत्री ने परमाणु समझौते पर IAEA में जरूर जाने की बात कहकर उन्हें उकसाया। उनके स्वाभिमान को ठेस पहुंचाई। कांग्रेस भी यही कह रही है कि ये देश के लिए जरूरी है और वो, देशहित और सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने के लिए कोई भी कुर्बानी देने को तैयार हैं। वैसे मायावती भी सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने की बात कह रही हैं। वो, भी परमाणु समझौते को मुस्लिमों के हितों के खिलाफ बता रही हैं। लेकिन, कमाल ये है कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देकर वापस लेने के फैसले पर कोई भी धर्मनिरपेक्ष पार्टी अपनी जुबान नहीं खोल पाई। जबकि, उत्तर प्रदेश के बड़े-बड़े मौलानाओं ने भी साफ कहाकि देश भर में हज हाउस सरकारी जमीन पर ही बने हैं। और, अमरनाथ यात्रियों के लिए सरकारी जमीन देने में बुराई क्या है।

फिर जब सब सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ ही हैं और किसी भी तरह भाजपा को सत्ता से बाहर रखना चाहते हैं तो, फिर ये लड़ क्यों रहे हैं। वजह है राजनीति का वो रंग जो, इस समय भारतीय राजनीतिक पटकथा पर बुरी तरह से चढ़ा हुआ है। दरअसल सारी कहानी छिपी है 2004 में यूपीए सरकार बनने के समय समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह की बेइज्जती में। सत्ता से ही जीवन रस पाने वाले अमर सिंह सरकार बनने की पार्टी में जाने का मोह छोड़ नहीं पाए जबकि, उन्हें बुलाया तक नहीं गया था। बेआबरू होकर वो, कांग्रेस के कूचे से निकले और सत्ता को बाहर से समर्थन देकर किंगमेकर के रोल में बैठे लेफ्ट के नेता उन्हें समझा रहे थे कि कोई बात नहीं भाजपा को बाहर रखने के लिए इसे सहन कर लेना चाहिए। लेकिन, कांग्रेस ने उन्हें धूल समझकर उड़ा दिया है ये बात अमर सिंह और मुलायम सिंह भूले नहीं। और, ये भी नहीं भूले कि उनकी राजनीतिक छतरी लेफ्ट पार्टियों ने चार साल से ज्यादा सत्ता से बाहर रहकर भी सत्ता सुख लिया और वो, दोनों दिल्ली से दुरिया दिए गए।

फिर, यूपी से सत्ता जाने के बाद मायावती ने उन्हें उत्तर प्रदेश से भी तड़ीपार कर दिया। मायावती और और सोनिया नजदीक दिखीं तो, सपा को और मिर्ची लग गई। लेकिन, लंबे फायदे के लिए मायावती को कांग्रेस के नजदीक जाने में नुकसान दिखा। बस, यूपी के राजनीतिक समीकरण ने कांग्रेस, सपा और राष्ट्रीय लोकदल को नजदीक ला दिया। और, लालकृष्ण आडवाणी की प्रधानमंत्री बनने की इच्छा ने अंदर ही अंदर भाजपा और बसपा को नजदीक ला दिया। इधर नंदीग्राम और बंगाल के दूसरे हिस्सों में हो रहे बवाल पर वामपंथी सरकार के तानाशाही रवैये को छिपाने के लिए ब्लैकमेलिंग पूरी हो चुकी थी।

चुनाव का समय नजदीक आ गया था। महंगाई से चौतरफ परेशान कांग्रेसी अगुवाई वाली केंद्र सरकार किसी भी तरह चुनाव से अभी बचना चाहती है। और, देश का ध्यान दूसरी तरफ मोड़ना चाहती है। पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों में मात खा चुकी लेफ्ट पार्टियां फिर से देश के कमजोर आदमियों की वकालत का अपना एजेंडा लेकर लोकसभा चुनाव में जाना चाहती हैं। विचारधारा के तौर पर अमेरिका की खिलाफत भी उनका स्वाभाविक एजेंडा है। सबकुछ सही था कांग्रेस को लतियाने के लिए कांग्रेस की लतियाई सपा अब लेफ्ट को लतियाकर उन्हें उनकी हैसियत याद दिलाना चाहती है। अमर सिंह कुछ समय के लिए ही सही सत्ता की दलाली कर कॉरपोरेट जगत में अपना रसूख बना लेना चाहते हैं। और, यही वजह है कि चार साल पहले यूपीए सरकार के समर्थन के लिए राष्ट्रपति को सौंपी गई सपा की चिट्ठी आज नए सिरे से भेजी जाएगी।

राजनीति 4 साल में एक पूरा चक्र घूम चुकी है। 4 साल तक यूपीए सरकार के सर का ताज बना लेफ्ट सरकार के लिए कांटेदार जूती बन चुका है। और, 4 साल पहले की समाजवादी पार्टी की धूल भरी राह ही अब यूपीए सरकार के लिए एक्सप्रेस हाईवे बन चुकी है। भइया यही हैं भारतीय राजनीति के रंग ...