Monday, November 09, 2009

निजी जिंदगी की अहम पदोन्नति

ये बड़ा प्रमोशन है। हर प्रमोशन की तरह इसमें भी जिम्मेदारी, अधिकार सब बढ़ गए। हमारी बिटिया आ गई है। अभी इलाहाबाद में ही हूं। अभी सिर्फ तस्वीरें डाल रहा हूं







Friday, November 06, 2009

अमर प्रभाष जोशी


इलाहाबाद में हूं और खबरों से कटा हुआ हूं इसलिए अभी थोड़ी देर पहले प्रभाष जी के न रहने की खबर पता चली। निजी मुलाकात का कभी मौका नहीं लगा था। लेकिन, ये खबर पता चली तो, लगा जैसे कुछ शून्य सा हो गया हो हिंदी पत्रकारिता में कौन भरेगा इस शून्य को। अभी कुछ दिन पहले ही तो ये 73 साल का शेर आंदोलनों में दहाड़ रहा था। बड़-बड़ी बहसों को जन्म दे रहा था। एक आंदोलनकारी संपादक शांत हो गया।


हमारे जैसे लोगों के लिए प्रभाष जोशी उम्मीद की ऐसी किरण दिखते थे जिसे देख-सुनकर लगता था कि पत्रकारिता में सबकुछ अच्छा हो ही जाएगा। अखबारों के चुनावों में दलाली के मुद्दे को करीब-करीब आंदोलन की शक्ल इसी शख्स की वजह से मिल गई थी। मुझे नजदीक से उनको सुनने का मौका लगा था कई साल पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघव भवन में। तब भी वो आंदोलन की ही बात कर रहे थे। छात्रों को व्यवस्था, समाज की बुराइयों से लड़ने के लिए तैयार कर रहे थे।


जनसत्ता में नियमित स्तंभ कागद कारे और आंदोलनकारी अखबार जनसत्ता के आंदोलनकारी संपादक के तौर पर प्रभाष जी पत्रकारिता में अमर हो गए हैं। बस मुश्किल ये है कि चश्मा लगाए देश के किसी भी कोने के हर आंदोलनकारी मंच पर पत्रकारों-समाज को सुधारने-बेहतर करने के लिए बेचैन शख्स नहीं दिखेगा। नमन है पत्रकारिता के इस शीर्ष पुरुष को

Sunday, November 01, 2009

फिर से पूछ रहा हूं घूरा बनने में कितना दिन लगता है

2000-2001 में इलाहाबाद महाकुंभ में रिपोर्टिंग के समय दुनिया भर के बाबाओं और साधुओं की हकीकत देखी थी। ऐसा नहीं है कि सब ढोंगी ही थे। कई संत ऐसे भी थे जिन्हें देखकर-मिलकर उनकी संगत का मन होता था। लेकिन, बड़ी संख्या ऐसे ही बाबाओं  की थी जिनके लिए प्रयाग के महाकुंभ की रेती पर उनका आश्रम विदेशी-देसी मालदार भक्तों को बढ़ाने का जरिया भर था। मुझे याद है कि रिपोर्टिंग के दौरान एक रमेश तांत्रिक के आश्रम में हम लोग पहुंच गए थे। अब मुझे नहीं पता कि वो, तांत्रिक होने का दावा करने वाला बाबा क्या कर रहा है। लेकिन, उस समय वो सिर्फ और सिर्फ विदेशियों को नशे की पिनक में रेती पर लोटने का आनंद देकर उनसे ज्यादा से ज्यादा वसूली का तंत्र फैला रहा था। हम लोगों को वो ज्यादा सम्मान इसलिए भी दे रहा था कि उसका फंडा एकदम साफ था। उसने कुटिल मुस्कान के साथ कहाकि देखो अखबार-टीवी से विदेशी भक्त नहीं मिलेंगे। विदेशी भक्त तो इंटरनेट से मिलेंगे।


उस समय मैं http://www.webdunia.com/ के लिए रिपोर्टिंग कर रहा था। आपको लग रहा होगा अचानक मुझे करीब 10 साल पहले की घटना क्यों याद आ रही है। दरअसल इसके याद आने के पीछे एक वजह ये भी है कि इसी समय एक वीडियो मैंने देखा था जिसमें सत्यमसाईं बाबा के चमत्कारों की असलियत बताई गई थी। दिखाया गया था कि किस तरह से सत्यसाईं लोगों की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। आज अचानक जब मैं आज इंदिरा गांधी के विशेष कार्यक्रमों की खोज में टीवी पर पहुंचा तो, खबर दिखी किस तरह से ढोंगी सत्यसाईं के चरणों में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के साथ पूरी सरकार झुकने को बेताब है। मुझे लगा कि क्या तमाशा है चव्हाण और उनकी पूरी सरकार कैसे पूरे राज्य को एक ऐसे व्यक्ति का अअंधभक्त बनने के लिए प्रेरित कर सकती है जिसके चमत्कारों की पोल देसी-विदेशी, हिंदी-अग्रेजी चैनल जाने कितनी बार खोल चुके हैं।


अब अगर अशोक चव्हाण को उनके मुख्यमंत्री बनने में बाबा का चमत्कार दिख रहा है तो, इसके लिए सत्यसाईं बड़े अपराधी साबित होंगे क्योंकि, चव्हाण को मुख्यमंत्री इसलिए बनाया गया कि तब के कांग्रेसी मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख मुंबई और देश की शान ताज पर हमले को भांप-समझ नहीं पाए। उसके बाद जो, घटनाक्रम बने उस शर्म-छीछालेदर से बचने के लिए कांग्रेस को चव्हाण को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। चव्हाण नेताओं में नौजवान थे। मैं उस समय मुंबई में ही था अच्छा लगा था। लेकिन, इस तरह से अशोक चव्हाण सत्यसाईं के चरणों में लोट जाएंगे अंदाजा न था। टीवी की फुटेज में कांग्रेस-एनसीपी सरकार के ढेर सारे मंत्रियों के अलावा पुराने गृहमत्री शिवराज पाटिल भी दिख रहे थे। पता चला कि मुख्यमंत्री के सरकारी निवास 'वर्षा' पर अशोक चव्हाण सत्यसाईं का चरण पूजन करेंगे।


अशोक चव्हाण ने इससे पहले बाबा को बांद्रा वर्ली सी लिंक भी घुमाया था ताकि, पुल को बाबा का 'आशीर्वाद' मिल सके। अब सोचिए खबर जब इसे बरसों की मेहनत के बाद बनाने वाले इंजीनियरों-मजदूरों को पता चली होगी तो, उनके दिल पर क्या गुजरी होगी। खैर, ऐसे बाबाओं के किस्से अनंत हैं और इनके चरणों में गिरने वाले राजनेताओं के भी। नरसिंहाराव के समय में तांत्रिक चंद्रास्वामी के जलवे तो किसी को भूले नहीं होंगे। अब तो बस यही लगता है कि काश घूरा बनने का भी समय तय होता

Wednesday, October 28, 2009

ये पूरा बेड़ा गर्क करके ही मानेंगे

अब सोचिए कि क्या होगा। ये कुछ समझने-मानने को तैयार ही नहीं हैं। वैसे ये मान ही लेते तो, इस हाल में थोड़े न पहुंचते। इतनी गंभीर बीमारी है और इनके शुभचिंतकों से लेकर आलोचक तक अलग-अलग तरीके से इन्हें आगाह कर रहे हैं। लेकिन, इनको क्यों फर्क पड़े आखिर पूरी तरह से स्वस्थ पार्टी को गंभीरमरीज जैसे हाल में पहुंचाने में इनके जैसे बड़े लोगों की पूरी टोली के सत्कर्मों का तो बड़ा योगदान रहा है।


ये हैं बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह जो, ये मानने को तैयार ही नहीं हैं कि भारतीय जनता पार्टी को भारतीय जनता की पार्टी बने रहने के लिए बड़े इलाज की जरूरत है। पार्टी के पेस्ट कंट्रोल की जरूरत हम जैसे लोग तो बहुत पहले से कह रहे हैं। अब तो, ये बात खुद - कम से कम भारतीय जनता पार्टी के तो, सबसे बड़े समाजविज्ञानी- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहनराव भागवत भी कह रहे हैं। पत्रकारों के सवाल पूछने पर भागवत जी ने कहा बीजेपी हमसे सलाह मांगेगी तो, हम देंगे। लेकिन, बिन मांगे सलाह दे ही दी कि भाजपा को बड़ी सर्जरी या कीमोथेरेपी तक की जरूरत है।


लेकिन, अभी करीब डेढ़-2 महीने तक और बीजेपी के ठेकेदार रहने वाले राजनाथ से जब पत्रकारों ने भागवत जी इस सलाह पर प्रतिक्रिया मांगी तो, उन्होंने कहा ये कौन कह रहा है कि बीजेपी का बुरा हाल है। अब पता नहीं राजनाथ सिंह अपने प्रदेश में चार लोगों से मिल बैठके बतियाते भी हैं या नहीं। क्योंकि, अगर जरा भी बतियाते रहते तो, उन्हें पता लग जाता कि उनकी पार्टी की बीमारी इतनी बड़ी हो गई है कि अब लोग पार्टी में रहने वाले लोगों को इस छूत से दूर रहने की सलाह देने लगे हैं। मैं अभी चार दिन पहले इलाहाबाद से लौटा हूं और कांग्रेस के लिए ये सुखद है कि लोग बीजेपी में पड़े अपने नजदीकियों को सलाह देने लगे हैं कि राहुल गांधी से कोई जुगाड़ खोजो ना। क्योंकि, ढंग की राजनीति करने वालों के लिए सपा-बसपा में तो पहले ही जगह नहीं बची है।

Sunday, October 25, 2009

इलाहाबाद से बदलाव के संकेत

हिंदी ब्लॉगिंग पर 2 दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी में शामिल होने के लिए इलाहाबाद आया हूं। ब्लॉगिंग पर कुछ खट्टा-कुछ मीठा टाइप की चर्चा हुई। कुछ खुश हुए कुछ खुन्नसियाए। सबकी अपनी जायज वजह थी। लेकिन, हमको तो भई बड़ा मजा आया। अपने शहर में 2 दिन रहने का भी मौका मिला। और, शहर से कुछ संकेत भी मिले कि भई काफी कुछ बदल रहा है वैसे मेरे गांव की तरह कभी-कभी ठहराव का खतरा भी दिखता है।

इलाहाबाद दैनिक जागरण अखबार के पहले पेज पर खबर है- “वाह ताज नहीं अब बोलिए वाह संगम!”। वाह ताज तो दुनिया कह रही है खबर के जरिए समझने की कोशिश की वाह संगम क्यों। तो, पता चला कि घरेलू पर्यटकों की अगर बात करें तो, 2008 में दो करोड़ सैंतीस लाख से ज्यादा लोग संगम में एक डुबकी लगाने चले आए। बयासी हजा से ज्यादा विदेशी पर्यटकों को भी संगम का आकर्षण खींच लाया।


आगरा करीब साढ़े सात लाख विदेशी पर्यटकों के साथ विदेशियों का तो पसंदीदा अभी भी है लेकिन, देश से सिर्फ इकतीस लाख लोगों को ही ताज का आकर्षण खींच पाया। मथुरा 63 लाख से ज्यादा, अयोध्या 59 लाख से ज्यादा देसी पर्यटक पहुंचे। आगरा के साथ अगर इन स्थानों का टूरिस्ट मैप पर थोड़ा असर बढ़े तो, इस प्रदेश के लिए कुछ बेहतरी की उम्मीद हो सकती है।



जागरण में ही एक और खबर है कि “यहां से भी कटेगा टिकट टू बॉलीवुड”। खबर ये है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में थिएटर का स्थाई सेंटर मंजूर हो गया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इंदिरा गांधी सामाजिक विज्ञान संस्थान भवन में थिएटर एंड फिल्म इंस्टिट्यूट विभाग खुल रहा है। विश्वविद्यालय में अत्याधुनिक थिएटर सेंटर शुरू होगा और यहां से छात्रों को थिएटर में डिप्लोमा और डिग्री मिल सकेगी। विश्वविद्यालय के कुलपित प्रोफेसर राजेन हर्षे के निजी प्रयास से ये थिएटर यहां शुरू हो पा रहा है। गुलजार की इसमें अहम भूमिका होगी।


ये खबरें बदलाव का संकेत तो हैं ही मीडिया कितना आतुर होता है ऐसी खबरों के लिए ये भी दिखता है। दरअसल अगर अच्छी खबरें मिलती रहें और उन्हें पढ़ने सुनने का लोगों के पास समय हो तो, मीडिया अच्छी खबरें दिखाने से क्यों गुरेज करेगा। इस समय हिंदुस्तान अखबार उत्तर प्रदेश 10 साल बाद कैसे बेहतर हो सकता है। इसकी बहस चला रहा है। हिंदुस्तान समागम के नाम से हर दिन हिंदुस्तान अखबार के दफ्तरों में शहर के लोगों को बुलाकर उनसे इस पर चर्चा की जा रही है। ब्लॉगर सेमिनार के नाते इलाहाबाद में था इसी बहाने मुझे भी मित्रों ने इस परिचर्चा में बुला लिया। अच्छा पहलू ये था कि इस बहाने शहर के लोग बैठकर बेहतरी की चर्चा कर रहे थे। बुरा ये था कि चर्चा में राजनीति के भरोसे ही सारी समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश कर रहे थे। खुद से निराश लोगों की जमात कितनी बड़ी हो गई है यहां इसका अंदाजा साफ लग रहा था। आगे के लिहाज से मेरे तैयार होने की बात से बूढ़े साहित्यकार टाइप के लोग इसलिए नाराज हो रहे थे। आगे की दुनिया कुछ लोगों की दुनिया है। नेट का नाम सुनकर वो बिदक रहे थे। वो 20 साल पुरानी चीजों को लेकर ही जी रहे थे।


कुल मिलाकर साहित्यिक-सांस्कृतिक नगरी होने की वजह से धीरे-धीरे ही बदलाव आ रहा है। और, हर चीज में थोड़ी बहुत मठाधीशी भी बचाए रखने की कोशिश जारी है। और, जो मठाधीश बन गए हैं वो, चाहते ही नहीं कि नई पीढ़ी उनसे आगे निकलकर कुछ सोच पाए। बुद्धिप्रधान समाज है ये अच्छाई है लेकिन, मुश्किल भी है किसी चीज पर इतने तर्क-कुतर्क शुरू हो जाते हैं कि बात ही आगे नहीं बढ़ पाती। लेकिन, नई पीढ़ी है तो, वो मान नहीं रही है। धकियाते, उल्टाते बढ़ती जा रही है। इलाहाबाद से संकेत अच्छे लेकर लौट रहा हूं। हां, ये जरूर है कि एक जोर के धक्के की जरूरत है। और, जरा ये पुराने गुमानों को संग्रहालय में रख दें तो, बेहतरी पक्की है।

Saturday, October 24, 2009

इलाहाबाद में हिंदी ब्लॉगिंग और पत्रकारिता पर चर्चा


महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय और हिंदुस्तानी एकेडमी इलाहाबाद की ओर से आयोजित राष्ट्रीय ब्लॉगर संगोष्ठी का पहला दिन कल बेहद शानदार रहा। देश भर के ब्लॉग लिक्खाड़ इस चर्चा में शामिल हुए। चर्चा के दौरान रवि रतलामी जी के सौजन्य से लगातार लाइव रिपोर्टिंग आप लोगों ने कल ज्यादा चित्रों के जरिए देखी। संजय तिवारी ने विस्फोट किया ब्लॉगरों के निशाने पर नामवर सिंह। उसके बाद विनीत ने विस्तार से एक रपट में पूरी चर्चा से आप लोगों को रूबरू कराया। उस चर्चा में मेरे विचार मैं विस्तार से यहां डाल रहा हूं। वैसे, जो वहां बोला वो तुरंत की स्थितियों के लिहाज से दिमाग में आई बात थी लेकिन, ज्यादातर इसी के इर्दगिर्द थी।


हिंदी पत्रकारिता विश्वसनीयता खोती जा रही है। कुछ इसके लिए टीवी की चमक दमक को दोष दिया जा रहा है। और, उसमें मिलने वाले पत्रकारों के पचाने लायक पैसे से ज्यादा पैसे मिलने को तो, कुछ TRP जैसा एक भयावह डर है जो, पत्रकारिता को अविश्वसनीय बना रहा है। लेकिन, सवाल ये है कि जब टीवी की चमक-दमक, पैसे या फिर TRP का दोष दिख रहा है तो, फिर अखबार-पत्रिका क्या कर रहे हैं।

इसका भी जवाब खोजने के लिए ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी। थोड़ा सा दिमाग दौड़ाइए तो, साफ दिखेगा कि दरअसल अखबार-पत्रिका टीवी को सुधारने की बात कहते-उस पर अंकुश लगाने की लंतरानी बतियाते कब टीवी टाइप खबरें पढ़ाने लगे पता ही नहीं चला। अब अखबार न अखबार जैसे रह गए और टीवी जैसे बनने की उनकी प्रकृति ही नहीं है। टीवी तो पहले ही हर सेकेंड ब्रेकिंग न्यूज के दबाव में काम कर रहा था।


निर्विवाद रूप से टीवी के सबसे बड़े पत्रकारों में से राजदीप सरदेसाई को भी लगने लगा है कि भारतीय पत्रकार- फिर चाहे वो उनके जैसे टीवी के संपादक हों या फिर अखबार के विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं' वहीं प्रिंट और टीवी दोनों माध्यमों में लगातार अपने हिसाब से पत्रकारिता गढ़ने वाले पुण्य प्रसून वाजपेयी को ये डर लगने लगा है कि पत्रकारिता कैसे की जाए। वैसे, वो खुद ही अपने ब्लॉग पर आगे ये कह देते हैं कि एक रहो, पत्रकार रहो। सब ठीक हो जाएगा। और, पुण्य प्रसून की ये सलाह उनके टीवी चैनल जी न्यूज के जरिए कैसे आई मैंने नहीं देखी लेकिन, उनके ब्लॉग पर उनका लिखा पत्रकार और राजनीतिक द्वंद पर बहस की सबसे बड़ी वजह बन गया।

यही ब्लॉग की ताकत है। ताकत ये कि इसका कोई सेंसर बोर्ड नहीं है। न सरकार-न अखबार संपादक -न टीवी संपादक या फिर कोई मीडिया हाउस। पुण्य प्रसून बाजपेयी और राजदीप सरदेसाई इतने हल्के लोग नहीं हैं कि ये जहां काम करते हैं वहां उनके मालिक उन्हें इतना दबा दें कि वो, अपने मन की खबर-विश्लेषण दिखा-सुना नहीं सकते। राजदीप तो, अपने अंग्रेगी और हिंदी चैनलों के सह मालिक भी हैं। और, पुण्य प्रसून संपादक की हैसियत में हैं। लेकिन, मीडिया के टीवी माध्यम की मजबूरियां इन्हें अच्छे से पता है। और, ब्लॉग की पकड़ और पहुंच का भी इन्हें अच्छे से अंदाजा है कि ये वो, माध्यम है जिससे बात दुनिया के किसी भी कोने तक पहुंचाई जा सकती है।


अब अगर दुनिया में बैठे किसी व्यक्ति को भारतीय मीडिया के बारे में अंदाजा लगाना होगा तो, वो टीवी चैनल तक पहुंच तो बन नहीं सकता। वो, भरोसे होता है इंटरनेट के। और, इंटरनेट पर भी अगर विषय संबंधित खोज करनी है तो, किसकी सर्च इंजन की मदद लेता है। अब अगर आप किसी विषय पर गूगल अंकल या दूसरे सर्च इंजन परिवार की मदद लेते हैं तो, कमाल की बात ये सामने आती है कि अब किसी न्यूजपेपर-टीवी की वेबसाइट के साथ लगे हाथ ढेर सारे ब्लॉगों का वेब पता भी आपके सामने परोस दिया जाता है। अब आपकी इच्छा है जैसे चाहो चुन लो।


यानी कम से कम इंटरनेट पर तो, इंटरनेट की ही सबसे मजबूत पैदाइश ब्लॉग को तो, स्वीकार किया जा चुका है। और, इसी इंटरनेट के जरिए कुछ तो, टीवी-प्रिंट माध्यम के पत्रकार ही इस विधा को आगे बढ़ा रहे हैं। कुछ एक नई जमात पैदा हो रही है। ये नई जमात है जो, टीवी चैनलों पर एक रुप में दिखती है- सिटिजन जर्नलिस्ट नाम से। टीवी चैनल के माध्यम की मजबूरी की ही तरह इसके सिटिजन जर्नलिस्टों की भी अपनी सीमा है लेकिन, ब्लॉग के अनंत आकाश में विचरने वाले सिटिजन जर्नलिस्ट इसलिए बढ़ रहे हैं क्योंकि, कोई सीमा नहीं है।


पुण्य प्रसून बाजपेयी अपना खुद का ब्लॉग चलाते हैं और गंभीर मुद्दों पर वहां बहस की कोशिश करते हैं तो, राजदीप सरदेसाई अपने टीवी चैनल में काम करने वाले हर पत्रकार से चाहते हैं कि वो, जो खबर टीवी पर नहीं दिखा पा रहे हैं एयरटाइम की मजबूरी से या फिर किसी और वजह से उसे अपने ब्लॉग के जरिए चैनल की वेबसाइट पर पोस्ट करे। और, ये पोस्टिंग टेक्स्ट यानी सिर्फ लिखा हुआ या फिर उस लिखे को जीवंत बनाने वाली कुछ तस्वीरों और वीडियो के साथ का ब्लॉग।


मैंने खुद जब बतंगड़ नाम से अप्रैल 2007 में अपना ब्लॉग शुरू किया तो, उसके पीछे एक जो, सबसे बड़ी वजह ये थी कि बहुत सी बातें हैं जो, दिमाग में आती हैं लेकिन, स्वाभाविक तौर पर किसी चैनल-अखबार या पत्रिका में दिख छप नहीं सकती हैं। ययहां तक कि अगर उनका स्तर किसी भी छपे लेख या विश्लेषण से बेहतर भी है तो, इसलिए नहीं छप सकती कि फलाना अखबार या पत्रिका में छापने के अधिकार वाले संपादक से हमारी कोई जान-पहचान नहीं है।


अब इस ब्लॉग के असर को लेकर मुझे बेवजह का कोई गुमान तो नहीं है। लेकिन, गुमान करने लायक कुछ आंकड़े मेरे पास हो गए हैं। करीब हर महत्वपूर्ण खबर पर और दूसरे समसामयिक विषयों पर मेरे 300 लेख हो चुके हैं। 102 देशों में भले ही एक व्यक्ति ने ही सही बतंगड़ ब्लॉग को देखा है। देश के लगभग सारे हिंदी अखबारों में मेरे ब्लॉग का जिक्र हो चुका है। और, हिंदी के दो बड़े अखबारों के संपादकीय पृष्ठ पर मैं दिखा तो, ये ब्लॉग लेखन की बदौलत है। और, ये कमाल मेरा नहीं है मैं इसे अपने ब्लॉग के उदाहरण से सिर्फ समझाने की कोशिश कर रहा है। ये कमाल है मेरे जैसे ढेर सारे पत्रकार-गैर पत्रकार- नागरिक पत्रकार ब्लॉगरों का। यही कमाल है कि किसी भी हिंदी अखबार, वेबसाइट का काम बिना ब्लॉग चर्चा, ब्लॉग कोना, ब्लॉग मंच जैसे कॉलम के नहीं चल रहा है। यानी इसे माध्यम के तौर पर मान्यता मिलना तो शुरू हो चुकी है।


अब इस ब्लॉगरी के अगर अच्छे पहलुओं को देखें तो, इस पर TRP जैसे डर का दबाव नहीं है। इसमें ब्लॉग पत्रकारिता करने वालों को पूंजी बहुत कम लगानी पड़ती है। टीवी-अखबार की तरह एक खबर का एक ही पहलू एक तरीके से बार-बार देखने की मजबूरी नहीं है। अलग-अलग ब्लॉग पर आपको अलग-अलग तरीके से खबर का विश्लेषण मिलेगा। किसी के विचार पर कोई रोक नहीं है।


लेकिन, इसके बुरे पहलू भी हैं जो, ब्लॉग जगत में अकसर देखने को भी मिल रहे हैं। TRP का दबाव नहीं है तो, कोई भी कुछ भी लिख रहा है। पूंजी लगानी बहुत कम पड़ती है तो, पूंजी मिलने की गुंजाइश उससे भी कम है जिससे फुलटाइम ब्लॉग पत्रकारिता के लिए हिम्मत जुटाना मुश्किल काम हो जाता है। अलग ब्लॉग पर अलग तरह से विश्लेषण मिलता है तो, कभी अति जैसा विश्लेषण होता है जो, पूरी तरह से किसी एजेंडे, अफवाह फैलाने या कम जानकारी की वजह से सिर्फ भावनात्मक तौर पर पोस्ट कर दिया जाता है।


अब सवाल ये है कि इन अच्छे-बुरे पहलुओं के बीच ब्लॉगिंग पत्रकारिता के मानदंडों पर कैसे खरा उतर पाएगी। तो, मेरा साफ मानना है कि जिस वैकल्पिक पत्रकारिता की बात अकसर होती है। वो, वैकल्पिक पत्रकारिता इसी ब्लॉग पगडंडियों से गुजर कर जवान होगी। इसमें सहयात्री मेरे जैसे पत्रकार भी होंगे जो, खबरों को अपने से जोड़कर उससे कुछ अच्छा विश्लेषण करके समझाने की कोशिश करते हैं। ज्ञानजी जैसे सामाजिक पत्रकार भी होंगे जो, रोज सुबह गंगा नहाने जाते हैं और गंगा किनारे की वर्ण व्यवस्था, आस्था के अंधविश्वास, सिमटती नदी पर लोगों को जागरूक करने की कोशिश कर रहे हैं। सही मायनों में ब्लॉग पत्रकारिता – आज की पत्रकारिता के तेज भागते युग के अंधड़ में गायब हुई असल पत्रकारिता को वापस ला सकेगी। जमकर ब्लॉगिंग करिए, खुद पर अंकुश रखिए। बचा काम तो, अपने आप हो जाएगा।

Wednesday, October 21, 2009

ठीक-ठीक सोच तो लो कि क्या करना है

आप करना क्या चाहते हैं। कुछ ढंग का है दिमाग में या बस ये सोच रखा है कि कुछ-कुछ ऐसा करते रहना है जिससे लोग ये तो, जानें कि ये बड़े मंत्री जी हैं। या आपको किसी ने ये समझा दिया है कि जो लोग ये वाले मंत्री जी बन जाते हैं। आगे सबसे बड़े मंत्री जी यानी प्रधानमंत्री जी बनने की रेस में उनका नाम तो आ ही जाता है भले ही वो बने ना बने। वरना एक के एक बाद एक ऐसी ऊटपटांग हरकतें भला आप क्यों करते।


आप समझ तो गए ही होंगे कि मैं अपने मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल साहब की बात कर रहा हूं। बड़े वकील हैं तो, किसी भी बात जलेबी की तरह कितना भी घुमाने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। लेकिन, आपको कुछ तो समझना ही होगा सिब्बल साहब। अभी आप अपने पिछड़ने के ब्लू प्रिंट को जस्टीफाई नहीं कर पाए थे तब तक एक और फॉर्मूला ठेल दिया आपने। अब कह रहे हैं कि IIT’s में दाखिला कैसे हो ये तय करना IIT’s का काम है, सरकार का नहीं। फिर क्यों आपने लंतरानी मार दी कि हम कोचिंग संस्थानों की दुकान बंद कराने के लिए IIT’s के दाखिले में 12वीं की परीक्षा के नंबरों को ज्यादा वरीयता देंगे। कुछ 80 प्रतिशत नंबर लाने पर ही IIT’s में दाखिले लायक समझने की बात आई।


जब बिहार के सारे नेता राशन-पानी लेके चढ़ बैठे। और, सिब्बल के फॉर्मूले को anti poor टाइप कहने लगे तो, सिब्बल साहब डर गए। एक बात बड़ी अच्छी है हमारे देश में गरीबों का भला करने को कोई भले न सोचे। गरीबों के खिलाफ जाने से डरते सब हैं सो, सिब्बल साहब भी डर गए। नीतीश मुख्यमंत्री हैं बिहार के तो, आंदोलन नहीं किया। मंच से मीडिया के जरिए बोला कि ये बिहार के छात्रों को IIT’s में जाने से रोकने की साजिश है। लालू प्रसाद यादव की पार्टी सत्ता में नहीं है तो, उन्होंने आंदोलन शुरू कर दिया।


खैर, अच्छी बात ये है कि चाहे जैसे बिहारी आंदोलित होना नहीं छोड़ रहे हैं। ये अलग बात है कि एक देश के सबसे बड़े आंदोलन से निकले नेताओं ने ही बिहार को नर्क बना दिया। और, अजीब टाइप का बिहारी गौरव-बिहारी उपेक्षा में बदल गया था। अब ठीक बात है कि उसी छात्र आंदोलन से निकला एक नेता ही बिहार को कुछ बदलने की कोशिश कर रहा है। सिब्बल के बेतुके फॉर्मूले के खिलाफ भले ही सिर्फ बिहार के लोग आंदोलित हुए और इसे anti poor टाइप कह रहे हों। सच्चाई ये है कि ये फॉर्मूला anti poor states और anti state education board तो है ही। क्योंकि, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे पिछड़े राज्यों की छोड़िए महाराष्ट्र बोर्ड के भी बच्चों के नंबर शायद ही CBSE, ICSE बोर्ड के छात्रों के नंबर का मुकाबला कर सकें।


अब हो सकता है कि सिब्बल अपने देश भर में एक बोर्ड के फैसले को लागू करने का इस तरह का घुमाके काम पकड़ने वाला तरीका आजमाने की सोच रहे हों। क्योंकि, जब यूपी-बिहार बोर्ड का बच्चा सारी मेहनत करके भी बोर्ड की परीक्षा के तरीके की वजह से 50-60% से ज्यादा नहीं जुटा पाएगा तो, वो CBSE, ICSE बोर्ड के स्कूलों में दाखिला लेकर 80% लाने का रास्ता खोजेगा। धीरे-धीरे करके एक बोर्ड हो जाएगा। अंग्रेजी स्कूलों की दुकान और तेजी से विस्तार ले लेगी। राज्यों के बोर्ड के स्कूल सरकारी विद्यालय जैसे हो जाएंगे। सिब्बल की दिल्ली की इलीट क्लास मानसिकता की विजय हो जाएगी।


और, मैं तो स्वार्थी हूं। मैं यूपी बोर्ड से पढ़ा हूं। नियमित रूप से सेकेंड डिविजनर रहा। अब मैंने तो रास्ता ही ऐसा चुना लिया कि इनके फर्स्ट सेकेंड, डिवीजन से मैं ऊपर उठ गया। लेकिन, अब क्या मुझे जिंदगी के किसी मोड़ पर फर्स्ट डिवीजन की तरफ बढ़ने का हक सिर्फ इसलिए नहीं मिलेगा क्योंकि, हाईस्कूल, इंटर या फिर ग्रैजुएशन में मैं सेकेंड डिविजनर रहा। और, यूपी या राज्यों का बोर्ड खत्म होगा तो, फिर प्रेमचंद या स्थानीय महापुरुषों से परिचय तो होने से रहा। परिचय उनसे होगा जिनका भारत-भारतीयता से वास्ता ही नहीं होगा। पता नहीं देश के सबसे अहम मानव संसाधन विकास मंत्रालय – बार-बार हम ये कहते रहते हैं कि देश की पचास प्रतिशत से ज्यादा आबादी जवान है, उसी पर देश का भविष्य टिका है और जवान होती आबादी को हम ऐसे तैयार करने की सोच रहे हैं - में ऐसे बेतुके फैसले लेने से पहले सिब्बल साहब सोच भी रहे हैं या सिर्फ इसीलिए कि पिछले मानव संसाधन मंत्रियों से ज्यादा चर्चा में बने रहने की सनक सवार है।

Sunday, October 18, 2009

दौड़ादौड़ी की झमाझम चर्चा

बहुत साल बाद ऐसा हुआ कि इस बार इलाहाबाद से वापस दिल्ली लौटने का मन नहीं कर रहा था। खैर, वापसी तो करनी ही थी। रोजी-रोजगार- वापस लौटा लाया। लेकिन, 2 दिनों का भरपूर इस्तेमाल मैंने किया या यूं कह लें कि ऐसे संयोग बने कि दो दिनों का पूरा इस्तेमाल हो गया। 2 दिन में विश्वविद्यालय टाइप की राजनीति, अड्डेबाजी से लेकर कराह की पूड़ी तक खाने का अवसर हाथ लग गया। मस्त कंजरवेटिव भारत के दीपावली मौज से मनाने के उत्साह का दर्शन भी हो गया। वैसे, इस साल तो दीपावली पर- वो क्या कहते हैं न कि सेंटिमेंट सुधर गया है- यानी मंदी भाग गई है- ऐसा मानने से सभी दिवाली मजे से मना गए। पिछले साल तो, कैसा डरावना माहौल था याद है ना। लेकिन, इसी कंजरवेटिव भारत ने दिवाली की रोशनी बचा ली थी।


दरअसल धर्मपत्नी जी को घर छोड़ने जाना था। तो, शनिवार की शिफ्ट करके प्रयागराज से इलाहाबाद के लिए निकल लिए। इलाहाबाद का कार्यक्रम में लगे हाथ मास कम्युनिकेशन के बच्चों की क्लास लेने का आमंत्रण मिला। पहली बार गुरु जी बनने का अवसर था तो, मैं भी भला चूकता कैसे। आर्थिक पत्रकारिता की करीब डेढ़ घंटे की एक बेसिक बातचीत भी हो गई। लेकिन, पता नहीं क्यों- आर्थिक पत्रकारिता इतनी महत्व रखते हुए भी भावी पत्रकारों में रुचि पैदा नहीं कर पा रही है। फिर वो मुंबई, दिल्ली हो या इलाहाबाद- खास फर्क नहीं दिखता।



अब इलाहाबाद पहुंचे थे तो, राजनीति के बिना बात कहां बनती। उस पर पता चला कि अपने प्राणेश जी इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन का चुनाव लड़ रहे हैं। प्राणेश दत्त त्रिपाठी अनुभवी वकील हैं। और, पिछली बार भी बहुत कम वोटों से सचिव बनते-बनते रह गए थे। इस बार चुनाव लगभग पक्का दिख रहा था। अब चूंकि ज्यादातर विश्वविद्यालय के नेता जो, इलाहाबाद रह गए हैं और रोजगार का दूसरा जरिया नहीं ढूंढ़ सके हैं तो, काला कोट पहनकर हाईकोर्ट में उनको अपना सम्मान सबसे आसानी से बचता दिख रहा है तो, पूरा का पूरा चुनाव भी बार का होते हुए भी विश्वविद्यालय जैसा हो गया था। खांटी विश्वविद्यालय के नेताओं की भाषा में- धोवावा कुर्ता जैसे धोवावा काला कोट पहिर के- कॉफी हाउस से हाईकोर्ट चौराहे तक जमावड़ा था।



मेरे भीतर के भी विश्वविद्यालय के अंदर वाले राजनीतिक कीटाणु अइसे सक्रिय भए कि करीब 4 घंटे हम भी कॉफी हाउस, सिविल लाइंस से हाईकोर्ट चौराहा तक पेंडुलम की तरह टहलते रहे। 4 घंटे की टहलाई ने भूख भी बढ़ा दी थी। अब गरम चाय पेट को कितना सहारा दे पाती सो, लगे हाथ हाईकोर्ट के सामने एक के बाद एक सजी बाटी-चोखा की दुकानों पर बैठकी का भी मौका वक्त की जरूरत बन गया। वैसे, हम लोग के विश्वविद्यालय टाइम में एकै दुकान थी। अब तो, पूरा बाटी-चोखा स्पेशियलिटी मॉल रोड जैसा अहसास दे रहा था- इलाहाबाद बैंक के पीछे वाली सड़क पर। बढ़िया घी में सना दिव्य बाटी औ चोखा के साथ मूली, प्याज, मिर्च, चटनी परोसी गई। जिह्वा पेट पर भारी पड़ रही थी 2 में मान नहीं रही थी लेकिन, थोड़ा संयम का ध्यान किया तो, कुछ रोक लगी।


खैर, दो-तीन बार मतगणना रुकने और दो दिन के बाद मतगणना पूरी होने के बाद प्राणेश जी के जीतने की खबर आई। लगा बढ़िया भवा- काफी टाइम बाद कउनौ चुनाव लगे दुइयै-चार घंटा बिना सही- नतीजा पॉजिटिव आवा। ई पॉजिटिव बड़ी सही चीज है- कुछौ पॉजिटिव होत रहै तो, ऊर्जा मिल जाथै। भले सीधे कुछ फायदा होय न होय। का कहथैं ऊ सेंटिमेंट ठीक होए जाथै। वही जइसे मार्केट, देश के मंदी भागै के संकेत से सेंटिमेंट सुधर गवा है। ढाई महीना पहिले तक सावधान, खतरा क बोर्ड लगाए घूमै वाले एनलिस्ट अब मौका हाथ से जाने न दीजिए टाइप सलाह निवेशकों को देने लगे हैं।



खैर, ई एनलिस्ट के सलाह पे बमुश्किल 5-7% इंडिया चल रहा है। कंजरवेटिव भारत मस्त है। सिविल लाइस की महात्मा गांधी रोड अइसे जगमग थी दिवाली में कि मंदी टाइप बात कभो भ रही देश में यादे नै पड़त रहा। पिछली बार की ही तरह मेला भी लगा है औ खरीदारी भी जमकर भई। घर आए तो, पता चला
मामा के यहां गजेंद्र मोक्ष जाप हुआ है। शाम को निमंत्रण है। पूछा कि हम्हीं लोग हैं या लंबा कार्यक्रम है पता चला कि 100 लोग तो लगभग हो ही जाएंगे। हमारे मामा जी जैसे लोग कंजरवेटिव भारत के वही लोग जो, हर चौथे-छठएं सत्यनारायम पूजा सुनके पंजीरी बांट देते हैं तो, गजेंद्र मोक्ष जाप कराके 100 लोगों को भोजन पर बुल लेते हैं। अब जिस इंडिया में तब्दील होने के लिए भारत मशक्कत कर रहा है वहां तो, जिस शाम कोई एक आदमी भोजन पे आ जाए- मियां-बीवी में झगड़ा होने की संभावना बढ़ जाती है। औ बहुत बड़े लोगों के यहां भी सालाना जलसे में बमुश्किल 100 लोग बुलाए जाते हैं।




कॉलोनी में मामा जी का घर है। कॉलोनी की छत पर ही भोजन का इंतजाम था। बढ़िया कड़ाहा चढ़ा था। ज्यादा तामझाम नहीं टाट पट्टी पे मजे से बैठके गले तक चांप के भोजन हुआ वरना तो, ऊ खड़े होके खाने वाले में – का कहते हैं बुफे सिस्टम – तो, न खाना खाया जाता है औ जितना खाया वो पच भी नहीं पाता है। जमकर खाया। काम की नीरसता से दूर दो दिन का इतना एनर्जेटिक दौरा था कि मजा आ गया। लेकिन, ऑफिस भी लौटना था। रात की राजधानी पकड़ी और, दूसरे दिन ऑफिस पहुंच गए। दिवाली तक फुर्सत नहीं थी आज रविवार की छुट्टी मिली तो, लिख मारा।

Friday, October 09, 2009

ई बतकही के बड़ मनई हैं

बराक ओबामा क शांति पुरस्कार मिला है। दुनिया क सबसे बड़ा पुरस्कार है ई। अरे वही वाले का एक हिस्सा है ई पुरस्कार जिसमें हम इत्ते भर से खुश हो जाते हैं कि का भवा अमेरिका में रहि के मिला तो, भारत म पढ़ाई तो किहे रहा। अब भई तब तो बनथ भाई हम सबके खुश होएके चाही।


ई उही वाले ओबामा तो हैं जो, be the change! का जुमला हर बार बोलथैं जरूर। कर केत्ता पावथैं पता नहीं। साल भर में का भवा भइया। भवा ना दुनिया भर में घूम-घूम के कहिन be the change! औ ई बड़ मनई हैं जब बोलेन हर बार दुनिया सुनिस। ऐसा गूंजा be the change! जैसे राखी का थप्पड़ अभिषेक क गाल प। चड्ढी पहिर नहात-धोवत तस्वीरो देखके लगा कि be the change! लेकिन, का सही म कुछ चेंज भवा। इरान म तो अहमदीनेजाद से पूछो-- पाकिस्तान में आसिफ अली जरदारी, जनरल कियानी, यूसुफ रजा गिलानी-- चीनौ म पूछ लेओ। हमरे वसुधैव कुटुंबकम वाले भारत क छोड़ कउनौ से पूछे लेओ- ए भइया कहां भवा ई be the change!


be the change! बस एत्तै भवा कि गांधी के साथ ओबामा के dream date क बात सुनके हम भारतीय अइसन भाव विभोर भए। कइउ दिन तक लहराए घूमत रहे। सबके लगा कि एसे बड़ी खबर का होई औ ओबामा के गांधी के साथ dream date वाली खबर के दिन सारा मीडिया अइसा कइ दीहिस कि उम्मीद बंध गई कि भवा तो change!


ओबामा के मेहरारू मिशेल के dress sense से लैके ओबामा के दुइनौ गदेलन (बेटियों) तक की बात औ व्हाइट हाउस म कूकुर क नई नस्ल तक जमके भवा be the change! दिसंबर 10 क जब ओबामा शांति क नोबल लेइहैं तो, देखो का कहथि। पता नहीं ई याद रही कि नहीं कि दलाई लामा से मिल तक नहीं सके भइया। चीन के डर म।


ए भाई हम तो बेचारे भारतीय हैं हमार तो समझ म आवथै कि हमार जमीन कब्जाए तक बैठे हैं ई हिंदी-चीनी भाई-भाई वाले चीनी। लेकिन, भई ओबामा तुम केसे डेराए रहे हो। बताओ न। अफगानिस्तान, पाकिस्तान से लैके दुनिया क कौने देश म तुम्हार be the change! वाला नारा काम कर रहा है। बताओ न सबसे बड़का वाला शांति पुरस्कार काहे मिला तुमका। सिर्फ बड़-बड़ बोलै के वजह से। सबसे बड़का देस का बड़का मनई बनै के वजह से। पता नहीं हम तो न समझ पाए रहे हैं आप समझे हों भइया तो, बताएओ जरूर। be the change

Monday, October 05, 2009

करीब 3 घंटे तो ‘अमितमय’ ही रह गए

बिग बॉस फिर आ गए हैं। और, इस बार तो सचमुच के बिग बॉस, बिग बॉस के शो में आए हैं। इसीलिए बिग बॉस, अरे वही जिनके घर में 13 लोग 84 दिन रुकेंगे, के पुराने सारे नियम कायदे-कानून टूट रहे हैं। 84 दिन पूरा होते-होते समझ में आएगा कि बिग बॉस सीजन 3 नहीं ... नहीं असली वाले बिग बॉस ने इसे बिग बॉस तृतीय कर दिया है।


बिग बॉस का कॉन्सेप्ट ही ऐसा है कि TRP तो, मिलेगी ही मिलेगी। लेकिन, बच्चन साहब ही इस बार शो की असली जान होंगे। एक राजू श्रीवास्तव को छोड़ दें तो, कोई भी बिग बॉस के घर का मेहमान नहीं है जो, TRP रखता हो। हॉ, ये जरूर है पिछली बार बिग बॉस का घर लोगों के पाप धुलने का जरिया बना था तो, इस बार वो, भूली दास्तां लो फिर याद आ गई वाले अंदाज के लोग बिग बॉस के घर में हैं।


घर के अंदर जाने वाले लोगों की बात फिर कभी। आज तो, बात सिर्फ बच्चन यानी असली बिग बॉस की। जो, भी शो में आ रहा था लटपटाकर बच्चन साहब के चरणों में गिरा पड़ रहा था किसी को उनकी गाड़ी का नंबर याद था तो, कोई दुनिया के सामने बच्चन साहब को टेनिस के मैच की याद दिला रहा था। अब ये जरा कम समझ में आया कि राखी सावंत की मां को उनकी मां के इलाज के लिए बच्चन साहब ने किस आधार पर और कैसे 2 लाख रुपए दे दिए थे।


वैसे तो, मैं खुद भी बच्चन साहब का बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। जीती-जागती पूरी इंडस्ट्री हैं वो, अपने आप में। लेकिन, जिस तरह से जितने प्रतिभागी आए सबके पास अमिताभ बच्चन से जुड़े किस्से सुनाने को थे लगा, सबकुछ स्क्रिप्टेड है। देखिए इस बार का बिग बॉस क्या-क्या दिखाता है। वैसे आपको पायल रोहतगी और संभावना शेठ की कमी ज्यादा खलनी नहीं चाहिए पहले ही दिन जिस तरह से शर्लिन चोपड़ा ने प्रदर्शन किया उससे तय है कि TRP का सारा मसाला इस बार के बिग बॉस में भी है। वो, भी इंडस्ट्री के बिग बॉस बच्चन की मौजूदगी में। हर शुक्रवार वो घर के अंदर भी जाएंगे।
Blog Widget by LinkWithin