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Sunday, December 04, 2016

सम्पादक, किताब, विमुद्रीकरण और मोदी सरकार

 जब मैं 2008 दिसंबर में सीएनबीसी आवाज़ मुंबई से दिल्ली भेजा गया, तो सबने ढेर सारी नसीहतें, अनुभव, हिदायत दिया। आलोक जी ने ये किताब दी। किताब पर आलोक जी का लिखा मेरे लिए बड़ी ताक़त है। आधार का आधार स्तम्भ नंदन नीलेकनि की लिखी #ImaginingIndia आलोक जोशी अब आवाज़ के सम्पादक हैं और उन्होंने सम्पादक बनने के बाद जो पहला काम किया वो था हर हफ़्ते २ किताबें की टीवी पर बात। बेहद जरूरी है टीवी देखने वाले समझें कि किताब क्यों जरूरी है। और ये भी कि टीवी सिर्फ़ तमाशा नहीं है। सम्पादकों को दरअसल अपने साथ रिपोर्टर को, डेस्क पर काम करने वाले को ज्यादा से ज्यादा किताब पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। अच्छी पीटीसी भी रिपोर्टर बिना अच्छा और खूब पढ़े नहीं लिख सकता। और यही हाल डेस्क पर बैठे पत्रकार का भी होता है, जब वो अलग से पढ़ता नहीं है। आजकल के भला कितने सम्पादक हैं, जो पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। देश के अतिप्रतिष्ठित पत्रकार रामबहादुर राय ने एक बार मुझे बताया कि रात में सोने से पहले 2 घंटे वो पढ़ते जरूर हैं। मैंने भी उस दिन के बाद कई दिन पढ़ा, फिर छूट जाता है। लेकिन, बीच-बीच में क्रम चला लेता हूं।


अख़बार में नंदन के मोदी सरकार के विमुद्रीकरण पैनल में शामिल होने की ख़बर पढ़ी तो इसी बहाने ये लिख रहा हूँ। उस किताब को पढ़ते समझ में आता है कि बदलते भारत को किस तरह से झेलना पड़ा कुछ काम समय से न कर पाने की वजह से। ये भी एक ऐसा ही काम है। हालाँकि, नंदन अपनी किताब में बदलते भारत का मज़बूत पक्ष अंग्रेज़ ज्ञान वाले बढ़ते भारतीयों को बताते हैं। यहीं हमारा मतैक्य नहीं है। नंदन बेंगलुरू दक्षिण से कांग्रेस से २०१४ का लोकसभा चुनाव लड़े थे। फिर भी मोदी सरकार ने उन्हें अपने साथ लिया है। इस विषय पर उनकी विशेषज्ञता को देखते बेहद अच्छा फैसला। फिर कह रहा हूँ सरकार सही रास्ते पर है।

Saturday, December 03, 2016

नोटबंदी की मुश्किल और मोदी सरकार के खिलाफ खड़ी बड़ी आफत की पड़ताल

दृष्य 1-
8 नवंबर को 8 बजे जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को अब तक के सबसे बड़े फैसले की जानकारी दी, तो देश के हर हिस्से में हाहाकार मच गया। देश में काला धन रखने वालों, रिश्वतखोरों के लिए ये भूकंप आने जैसा था।
दृष्य 2-
दिल्ली के चांदनी चौक, करोलबाग इलाके में गहनों की दुकान पर रात आठ बजे आए भूकंप का असर अगली सुबह तक दिखता रहा। नोटों को बोरों में और बिस्तर के नीचे दबाकर रखकर सोने वालों की बड़ी-बड़ी कारें जल्दी से जल्दी सोना खरीदकर अपना पुराना काला धन पीले सोने की शक्ल में सफेद कर लेना चाहती थीं। और ये सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, देश के लगभग हर शहर में हुआ। पीला सोना काले धन को सफेद करने का जरिया बन गया।
दृष्य 3-
उत्तर प्रदेश और पंजाब इन दो राज्यों में स्थिति कुछ ज्यादा ही खराब हो गई। दोनों ही राज्यों में चुनाव नजदीक होने की वजह से राजनीतिक दलों से लेकर चंदा देने वालों के पास ढेर सारी नकद रकम जमा थी। इस रकम को ठिकाने लगाने की मुश्किल साफ नजर आ रही थी। जाहिर है जिन राजनेताओं के पास बड़ी रकम पुराने नोट के तौर पर आ गई थी, उनके लिए मोदी सरकार का ये फैसला जहर पी लेने के समान दिख रहा था।  
दृष्य 4-
मुंबई, दिल्ली से लेकर देश के छोटे बड़े शहरों में अब तक बैंकिंग की सेवाओं से काफी हद तक बाहर रहने वाला समुदाय इसे अपने खिलाफ मोदी सरकार की साजिश मान बैठा। लेकिन, विदेशों से आने वाले चंदे की रकम अब पूरी तरह से मिट्टी होती दिख रही थी।
दृष्य 5-
काले धन के बल पर चल रहा रियल एस्टेट क्षेत्र के बड़े खिलाड़ी पहले ही दिवालिया होने के हाल में पहुंच रहे थे। अचानक काले धन पर इतनी बड़ी चोट से बौखलाए रियल एस्टेट कारोबारियों ने इसमें भी रकम बनाने का रास्ता निकालने की कोशिश शुरू कर दी।

हिन्दुस्तान के लोकतांत्रिक इतिहास में किसी राजनेता के इतना बड़ा फैसला लेने की ये पहली घटना थी। और इस घटना के बाद देश में ऊपर जैसे ही नजारे आम हो गए। जिस देश में काला धन और भ्रष्टाचार को एक कभी न खत्म होने वाली सच्चाई के तौर पर स्वीकार कर लिया गया हो, वहां ऐसे किसी फैसले की कल्पना भी नहीं की जा रही थी। यही वजह थी पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखराम से शुरू हुआ नोटों के बिस्तर पर सोने का सिलसिला भारतीय समाज में कोढ़ की तरह फैल गया। इसीलिए जब इस कोढ़ के इलाज की कोशिश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू की तो इस कोढ़ में आनंद खोजने के आदती समाज के एक बड़े हिस्से ने इसे ध्वस्त करने का बड़ा अभियान शुरू कर दिया।

संगठित तरीके से समूह में पुराने नोट बदलने की कोशिश
9 तारीख को बैंक और एटीएम बंद रहे। लेकिन, जैसे ही 10 तारीख को बैंक खुले। काले धन के कुबेरों ने अपना काम शुरू कर दिया। सरकार की तरफ से साफ किया गया था कि जिसका पैसा जायज है, उसे किसी तरह की कोई मुश्किल नहीं आने वाली। लेकिन, जिनके पास काला धन अब भी है, वो किसी भी कीमत पर बख्शे नहीं जाएंगे। काले धन के कुबेर डरे लेकिन, उन्होंने बैंकों में 500, 1000 के पुराने नोटों के बदले नए नोट लेने के लिए संगठित तरीके से लोगों को कतारों में खड़ा कर दिया। नोटबंदी के सरकार के फैसले पर सबसे बड़ी चोट इसी जरिये से की गई। काले धन के कुबेरों ने बाकायदा समूह में लोगों को एक ही शहर की अलग-अलग बैंकों की शाखाओं में और कई बार तो दूसरे इलाकों में भी समूह में लोगों को भेजकर नोट बदली कराई। आम लोगों को परेशानी न हो इसके लिए 4000 रुपये के नोटों की बदली के सरकार के फैसले को काले धन के कुबेरों ने अपना बड़ा अस्त्र बना लिया था। इससे उनका काला धन धीरे-धीरे ही सही सफेद हो रहा था। साथ ही बैंकों और बाद में एटीएम के सामने लगी लंबी कतारें सरकार के इस फैसले के खिलाफ जनमानस बनान की कोशिश कर रही थीं। हालांकि, आम जनता के इस फैसले के पक्ष में होने से ये कोशिश परवान नहीं चढ़ सकी।

मीडिया की पहुंच वाले इलाके में भीड़ बढ़ाने की कोशिश
संसद मार्ग के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में लंबी कतारें लग गईं थीं। और सिर्फ संसद मार्ग के स्टेट बैंक में ही नहीं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से लेकर लुटियन दिल्ली के हर इलाके में लंबी-लंबी कतारें थीं। और ऐसी ही कतार मुंबई के भी प्रमुख इलाके में लगनी शुरू हो गई थी। शास्त्री भवन के एटीएम की कतार में तो मेवात तक से आए लोग मिल गए। कमाल की बात ये कि ज्यादातर लोग किसी समूह में आए थे। पूछने पर उन लोगों का कहना था कि हमारे मेवात में एटीएम मशीन नहीं है। इसलिए हमे यहां आना पड़ा। लेकिन, बड़ा सवाल ये कि मेवात से चलकर दिल्ली के शास्त्री भवन में लगे एटीएम से पैसे निकालने के लिए कतार में ही क्यों लगे। दरअसल एक बड़ा ट्रेंड इस पूरे मामले में ये भी दिखा कि बड़ी भीड़ उन इलाकों में ही लग रही थी, जो ज्यादातर मीडिया की पहुंच के इलाके थे। नोटबंदी के फैसले के एक हफ्ता बीत जाने के बाद भी मीडिया में किसी गांव के या छोटे शहरों के इलाके से ऐसी कोई खबर नहीं आई, जिसमें ये दिखता हो कि लोगों को नकद रकम की इतनी बड़ी दिक्कत हो गई हो कि नेताओं को इसे आर्थिक आपातकाल बोलना पड़ जाए। हां, दिल्ली-मुंबई के हर इलाके में जरूर एटीएम पर लंबी कतारें देखने को मिलीं। इसके पीछे बड़ी वजह वही कि कैमरे के सामने ये कतारें नजर आएं।

बैंकिंग सेवाओं के दायरे से बाहर का बड़ा वर्ग कतार में खड़ा हो गया
लोगों तक बैंकिंग सेवा पहुंचाने की सबसे बड़ी मुहिम जनधन के खाते खोलने के अतिसफल अभियान के बाद भी देश के करोड़ो लोग ऐसे हैं, जिनकी पहुंच बैंकिंग सेवाओं तक है ही नहीं। बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो बैंकिंग सेवा में शामिल भी नहीं होना चाहता। यहां तक कि बैंक खाता खुला भी तो उसका इस्तेमाल सिर्फ रकम जमा करने तक ही सीमित रहा। ऐसा वर्ग दरअसल ज्यादातर नकद पूंजी के जरिये ही जीवनयापन कर रहा था। अब मजबूरी में घर में पड़े 500 और 1000 के पुराने नोटों की वजह से वो बैंक की कतार में आ खड़ा हुआ। टीवी पत्रकार ऋषिकेश कुमार कहते हैं कि दरअसल इस फैसले से एक बड़ा वर्ग बैंकिंग सिस्टम के दायरे में आ जाएगा, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिहाज से बेहतर होगा।

सोना कारोबारियों ने भी बढ़ाईं कतारें
8 तारीख की रात से 9 नवंबर की सुबह तक 20-40% ज्यादा भाव पर पुराने नोट लेकर सोना बेचने वालों के लिए अपने नोट बदलने का मौका 30 दिसंबर तक का ही दिख रहा है। इसीलिए उन्होंने दिहाड़ी मजदूरों को दिन भर के लिए कतारों में खड़ा कर दिया। हालांकि, काले धन के बदले सोना देकर फिर उसे सफेद करने की कोशिश में लगे गहना कारोबारियों पर सरकार, आयकर विभाग की कड़ी नजर है। लगातार पड़े छापों के बाद तेजी से चढ़ा सोने का दाम उसी तेजी से गिर भी गया।

राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की कतार
उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहां आने वाले दिनों में चुनाव होने वाले हैं। वहां राजनीतिक पार्टियों से लेकर नेताओं ने चुनाव की तैयारी में बड़ी नकद रकम इकट्ठा कर रखी है। इस इकट्ठा रकम को ठिकाने लगाने के लिए रैली की शक्ल में बैंक और एटीएम में कतारें लग गईं। हर नेता इकट्ठा चंदे की रकम ज्यादा से ज्यादा बचा लेने की जुगत में लगा हुआ है। इतना ही नहीं विपक्ष के कई नेताओं के बयान जिस तरह से बार-बार कानून व्यवस्था बिगड़ने का हवाला दे रहे हैं। इससे ये भी आशंका बलवती होती है कि कहीं वो अपने कार्यकर्ताओं को संगठित तौर पर भीड़ बढ़ाने का संदेश तो नहीं दे रहे हैं। 

छोटे शहरों में बैंक अधिकारियों की गड़बड़
उत्तर प्रदेश के बलिया, आजमगढ़ जैसे जिलों से कुछ अलग तरह की ही खबरें आ रही हैं। बलिया के रहने वाले राजीव रंजन सिंह बताते हैं कि 10, 11 तारीख को बैंकों में लोगों को कम नकद होना बताकर 500 रुपये ही दिए गए। लेकिन, आशंका इस बात की है कि लोगों का पहचान पत्र लेकर उनके हिस्से के बचे 3500 रुपये उन लोगों को दे दिए गए, जो बैंकों के बड़े खातेदार थे। जिनके पास पुराने 500 और 1000 के नोट बड़ी मात्रा में थे।

काला-सफेद करने में जुटे बिल्डरों की लगाई कतार
ये लगभग घोषित तौर पर छिपी हुई बात है कि सबसे ज्यादा काला धन रियल एस्टेट क्षेत्र में ही लगा हुआ है। और यही वजह है कि जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद रियल एस्टेट में काले धन पर रोक लगानी शुरू की, तो इस क्षेत्र में मंदी देखने को मिली। अब पुराने 500 और 1000 के नोट बंद करने का मोदी सरकार का फैसला 100-200% मुनाफा कमाने के आदी रहे बिल्डरों के लिए ये जीवन-मरण जैसा प्रश्न हो गया है। इसलिए बिल्डरों ने इसी का फायदा उठाते हुए चुनाव वाले राज्यों की राजधानी लखनऊ और चंडीगढ़ में अपने प्रतिनिधि बिठा दिए। इनके जरिए आने वाले काले धन को वो अपने यहां काम करने वाले मजदूरों के जरिए नोट बदली कराकर सफेद कराने में जुट गए। 30-50% रकम लेकर बिल्डर काला धन सफेद करने में जुटे हैं। बिल्डरों के यहां छापे इस बात का सबूत देते हैं कि सरकार को भी इस बात की जानकारी मिल रही है।

जनधन खाते खरीदने का सिंडिकेट
मुंबई, दिल्ली से लेकर देश के छोटे-छोटे शहरों तक जनधन खातों के जरिए काला धान सफेद करने की कोशिश ने भी बैंकों और एटीएम में कतार बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। जनधन खातों में 2-2.5 लाख रुपये जमा कराए जा रहे हैं और अगले 2-3 महीने बाद वो रकम वापस लिए जाएंगे। पहले पुराने नोट जमा कराए जा रहे हैं। उसके 2-3 महीने बाद वो रकम धीरे-धीरे वापस कर दी जाएगी।

हवाला कारोबारियों ने बढ़ाई कतारें
मुंबई में 17% से शुरू हुआ पुराने नोटों को नए नोटों से बदलने का काम अब 40-50% पर हो रहा है। दरअसल सरकार ने शुरू में आम लोगों की परेशानी को ध्यान में रखकर जो कुछ रास्ते छोड़े थे, उन रास्तों से इस तरह के लोग घुस रहे थे। इन संगठित कारोबारियों में हवाला के जरिये पैसे उठाने वाला नेटवर्क शामिल था। जो एक शहर से रकम उठाकर दूसरे शहरों में नोटों की बदली संगठित तरीके से करा रहा था।

बेरोजगारों को मिला दिहाड़ी का काम, एटीएम-बैंकों में बढ़ी कतार
देश में बड़ी बेरोजगारी का फायदा उठाकर काला धन रखने वालों ने बाकायदा यही रोजगार दे दिया। 200-500 रुपये रोज पर लोगों को बैंकों और एटीएम की कतार में लगाया गया। ऐसे लोग दिन भर कतारों में खड़े होकर आम लोगों के हिस्से की रकम निकालते रहे।

महिलाओं का घर का पैसा बैंकों में पहुंचा
भारतीय परिवारों में ज्यादातर घरेलू महिलाओं ने बचाकर पैसे घर में रखे हैं। इसलिए जब अचानक सरकार ने 500 और 1000 के पुराने नोट बंद करने का एलान किया, तो महिलाओं के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई। वो जल्दी से जल्दी अपनी बचाई रकम जमा करने के लिए बैंक की कतार में खड़ी हो गईं। हालांकि, महिलाओं को डर भी है कि कहीं उन्हें नोटिस न भेज दी जाए। महिलाओं को आयकर विभाग की नोटिस भेजी गई, तो ये सरकार के खिलाफ जा सकता है। सरकार को ये व्यवस्था करनी होगी कि ऐसी नोटिस महिलाओं को न जाए। ऋषिकेश ने जनकपुरी की महिलाओं से बात की। उनका साफ कहना था कि हमारा पैसा तो सबके सामने आ गया। लेकिन, अब हमें इस बचत की सजा नहीं मिलनी चाहिए।

कतार में भी नाराज नहीं है आम आदमी
2 लाख एटीएम में से सिर्फ 1.20 लाख एटीएम ही सही हाल में हैं। इसलिए सचमुच लोगों को परेशानी तो हो रही है। लेकिन, इस सारी परेशानी के बावजूद ज्यादातर इलाके में घंटों कतार में खड़े होने के बावजूद आम आदमी इस फैसले में नरेंद्र मोदी के साथ खड़ा नजर आ रहा है। दिल्ली के महरौली, बदरपुर इलाके में लोगों से बातचीत में ये सामने आया कि आम आदमी का भरोसा मोदी पर मजबूत हुआ है। यहां तक कि रोज खाने कमाने वाले तबके के लोग भी संगम विहार और देवली जैसी जगहों पर घंटों कतार में लगने के बाद भी ये कह रहे हैं कि इससे उन्हें जो तकलीफ है, वो झेल लेंगे। बड़ी चोट तो अमीरों को लगी है। वो कैसे झेलेंगे। नरेंद्र मोदी कतार में खड़े हिन्दुस्तान के नायक जैसे नजर आ रहे हैं।


कुल मिलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ये फैसला विपक्षियों को भी विरोध का मौका नहीं दे रहा है। क्योंकि, देश की आम जनता को लग रहा है कि ये फैसला उन्हें अच्छे से जीने की जमीन तैयार करेगा। और बड़ी मुसीबत उन लोगों के लिए करेगा जिनके पास काला धन, भ्रष्टाचार का पैसा है। इसीलिए कतारों में खड़ा, फंसा होने के बाद भी हिन्दुस्तान नरेंद्र मोदी के साथ खड़ा है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि सरकार एटीएम नेटवर्क दुरुस्त करे और बैंकों में आने वाले आम आदमी को उसकी जरूरत भर का पैसा आसानी से उपलब्ध कराए। जिससे संगठित तौर पर कतार तैयार करके इस बड़े फैसले को ध्वस्त करने की कोशिशों पर करारी चोट की जा सके। 

Friday, December 02, 2016

बीजेपी संगठन में भला कोई क्यों काम करे?

भारतीय जनता पार्टी ने लम्बे समय से इंतजार कर रही दिल्ली और बिहार इकाई को उनका नया अध्यक्ष दे दिया है। मनोज तिवारी को दिल्ली का अध्यक्ष बना दिया गया है। साथ ही बिहार इकाई का अध्यक्ष नित्यानंद राय को बना दिया गया है। उत्तर पूर्वी दिल्ली से बीजेपी सांसद मनोज तिवारी गायक हैं, भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता हैं। संगठन में कोई खास काम नहीं किया है। लोकसभा चुनाव के ठीक पहले ही बीजेपी में आए हैं। नित्यानंद राय 4 बार विधायक रहे हैं और इस समय उजियारपुर संसदीय क्षेत्र से सांसद हैं। पहली नजर में तिवारी और राय के बीच कोई समानता नहीं नजर आती। लेकिन, इन दोनों के बीच एक ऐसी समानता है जिसने चुनाव वाले राज्य उत्तर प्रदेश के बीजेपी नेताओं की परेशानी बढ़ा दी है। दरअसल दोनों ही लोकसभा सांसद हैं। जनप्रतिनिधि हैं यानी चुनाव में इनको पहले टिकट मिला, फिर पदाधिकारी भी बना दिए गए। यही वो समानता है जिसने यूपी बीजेपी के नेताओं की परेशानी बढ़ा दी है। बीजेपी के टिकट की कतार में लगे नेता नई उलझन में हैं। दरअसल बीजेपी में एक अनकहा सा फरमान है कि किसी भी पार्टी पदाधिकारी को टिकट नहीं दिया जाएगा। इस चक्कर में कई लोगों को यूपी बीजेपी की नई टीम बनाते समय उसमें शामिल नहीं किया गया। उसके पीछे बड़ी सीधी सी वजह ये कि पार्टी पदाधिकारी चुनाव लड़ाने का काम करेंगे और ज्यादा से ज्यादा सीटों पर पार्टी प्रत्याशी को जिताने में जुटेंगे जबकि, खुद चुनाव लड़ने पर प्रत्याशी सिर्फ अपनी सीट के बारे में ही सोच सकेगा। इसी फॉर्मूले के तहत बहुत से लोगों को बीजेपी में पदाधिकारी नहीं बनाया गया। चुनावी रणनीति के लिहाज से ये काफी हद तक सही भी माना जा सकता है। लेकिन, उत्तर प्रदेश में हालिया पदाधिकारियों की नियुक्ति ने बीजेपी नेताओं को एक नई पहेली सुलझाने के लिए दे दी है। वो पहेली ये कि क्या अब बीजेपी में ज्यादातर पदाधिकारी सिर्फ जनप्रतिनिधि ही होंगे। कम से कम हाल में नियुक्त पदाधिकारियों के चयन से तो यही संदेश जाता दिखता है। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या बनाए गए। केशव इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से चुनकर आए हैं।

केशव के अलावा शिवप्रताप शुक्ला उत्तर प्रदेश बीजेपी के उपाध्यक्ष हैं और साथ ही उन्हें पार्टी ने राज्यसभा में भी भेज दिया है। दूसरे उपाध्यक्षों में धर्मपाल सिंह विधायक हैं, आशुतोष टंडन (गोपाल) विधायक हैं। गोपाल टंडन लालजी टंडन के बेटे हैं। कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह भी सांसद हैं और प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। सांसद सतपाल सिंह को भी प्रदेश का उपाध्यक्ष बनाया गया है। सुरेश राणा भी विधायक हैं, साथ ही प्रदेश उपाध्यक्ष भी। कानपुर से विधायक सलिल विश्नोई को भी पार्टी का महामंत्री बनाया गया है। जनप्रतिनिधियों का कब्जा सिर्फ अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महामंत्री की कुर्सी तक ही नहीं है। एक महिला मोर्चा को छोड़कर यूपी में बीजेपी के सभी मोर्चे के अध्यक्ष जनप्रतिनिधि ही हैं। पिछड़ा मोर्चा का अध्यक्ष राजेश वर्मा को बनाया गया है। राजेश वर्मा सीतापुर से सांसद हैं। युवा इकाई का अध्यक्ष सुब्रत पाठक को बनाया गया है। सुब्रत पाठक कन्नौज से डिम्पल यादव के खिलाफ चुनाव लड़े थे और करीब 15 हजार मतों से हार गए थे। यानी पार्टी ने पहले सुब्रत को टिकट दिया और अब उन्हें पदाधिकारी भी बना दिया। सुब्रत पाठक कन्नौज के मजबूत नेताओं में हैं। लेकिन, सवाल वही है कि क्या बीजेपी में राजनीति करने वाले सिर्फ वही नेता महत्व पाएंगे, जो टिकट पाकर चुनाव जीत सकेंगे या चुनाव जीतने की हैसियत रखते हैं। यहां तक कि यूपी में अनुसूचित मोर्चा के अध्यक्ष कौशल किशोर भी सांसद हैं और अनुसूचित जनजाति मोर्चा अध्यक्ष छोटेलाल खरवार सोनभद्र से सांसद हैं। राजेश वर्मा और कौशल किशोर दोनों ही लोकसभा चुनाव से ठीक पहले ही बीजेपी में आए हैं। जनप्रतिनिधि को ही पदाधिकारी बनाने और पदाधिकारी को ही जनप्रतिनिधि बना देने की ये नई परम्परा यहीं खत्म नहीं होती है। उत्तर प्रदेश को अपने काम के लिहाज से बीजेपी ने 8 क्षेत्रों में बांट रखा है। उन 8 क्षेत्रों में से 3 के अध्यक्ष जनप्रतिनिधि ही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाले काशी क्षेत्र के अध्यक्ष  लक्ष्मण आचार्य हैं और उन्हीं को पार्टी ने विधान परिषद सदस्य भी बनाया। पश्चिम क्षेत्र के अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह विधान परिषद के सदस्य हैं। अवध क्षेत्र के अध्यक्ष मुकुट बिहारी वर्मा भी विधायक हैं।


सामान्य तौर पर देखने पर इसमें कोई भी गड़बड़ी नजर नहीं आती। लेकिन, ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों का आधार मजबूत करने में बड़े आधार वाले नेताओं के साथ शानदार संगठन करने वाले नेताओं की भी बड़ी भूमिका रही है। भारतीय जनता पार्टी तो मूलत: संघ के पूर्णकालिक संगठन मंत्रियों के आधार पर संगठन तैयार करने वाली पार्टी रही है। जहां संगठन में अच्छा काम करने वालों को ही पदाधिकारी बनाए जाने की परम्परा रही है। अब सवाल ये है कि अगर जनप्रतिनिधियों को ही पदाधिकारी और पदाधिकारी को ही मनोनीत जनप्रतिनिधि बनाने की ये परम्परा मजबूत हो रही है, तो कौन संगठन का काम करेगा। भारतीय जनता पार्टी सत्ता में है, लगातार चुनाव जीत रही है। अभी हो सकता है कि इस गलत परम्परा के खतरे न दिख रहे हों। लेकिन, जब पार्टी का चुनावी आधार हल्का पड़ेगा, तो संगठन में काम करने वाले भी शायद ही मिलेंगे। संगठन हो या सरकार बीजेपी कुछ ही लोगों के हाथ में हर तरह की सत्ता जाने के बड़े खतरे की ओर बढ़ रही है। 
(ये लेख QUINTHINDI पर छपा है)

Thursday, December 01, 2016

आर्थिक फैसले पर राजनीतिक प्रतिक्रिया से देश का भरोसा खोता विपक्ष

2 दिसंबर को दैनिक जागरण के संपादकीय पृष्ठ पर
नोटबन्दी के फैसले ने देश की जनता को परेशान किया है। रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने में मुश्किल हो रही है। कई जगह पर तो लोगों को बेहद सामान्य जरूरत पूरा करने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ी है। ये सब सही है। लेकिन, आम जनता की परेशानी की असली वजह क्या है, इस पर पहले बात करनी चाहिए। दरअसल आम जनता को होने वाली इस सारी परेशानी की वजह नरेंद्र मोदी सरकार का वो फैसला है, जिसके बाद 500 और 1000 रुपये के नोट बंद करने की जरूरत आ पड़ी। इस वजह से देश की आम जनता परेशान है। वो कतारों में है। अपने पुराने नोट बदलने के लिए बैंकों की कतार में है। 2000 रुपये निकालने के लिए एटीएम की कतार में है। इस स्थिति को देखकर ये लगता है कि जैसे देश बड़ी मुश्किल में है। लेकिन, जनता के मन में एक भावना आसानी से देखी जा सकती है कि प्रधानमंत्री के इस फैसले को ज्यादातर जनता हर तरह की परेशानी के बाद भी काला धन रखने वालों, भ्रष्टाचारियों के खिलाफ देखी जा रही है। और जनता की इस भावना ने दरअसल देश के विपक्ष के लिए कतार में लगी जनता से ज्यादा परेशानी की जमात खड़ी कर दी है। परेशान विपक्ष इस कदर है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी परेशानी के इस समय में बंगाल की जनता को छोड़कर दिल्ली की आजादपुर मंडी में रैली कर रही हैं। रैली में उनके साथ आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हैं। केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं, इसलिए केजरीवाल का दिल्ली के आजादपुर में नोटबंदी से व्यापारियों को होने वाली मुश्किलों पर रैली करना सही राजनीति माना जा सकता है। लेकिन, ये कितनी सही राजनीति है या खराब राजनीति को सही साबित करने की कोशिश, ये इससे भी समझ में आता है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री के तौर पर अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की परेशान जनता की परेशानियों को कम करने की कोई कोशिश नहीं की। और ममता बनर्जी तो इस मामले में और भी खराब राजनेता साबित होती दिख रही हैं। जब मुख्यमंत्री के तौर पर ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल की जनता को नोटबंदी से होने वाले नफा-नुकसान के बारे में समझाना चाहिए था, उनके जीवन की मुश्किलों को आसान करने के रास्ते बताने चाहिए थे, उस समय ममता बनर्जी देश की राजधानी दिल्ली में आजादपुर में रैली कर रही थीं। ममता और केजरीवाल ये कह रहे थे कि कभी भी इसकी वजह से देश में दंगे हो सकते हैं। इतना ही नहीं उन्होंने एक संयुक्त विपक्ष जैसा माहौल बनाने की कोशिश की। मुद्दा सही हो तो ये कोशिश सराही जानी चाहिए। ममता बनर्जी की ये सफलता कही जा सकती है कि उन्होंने कम से कम इसी मुद्दे के बहाने एनडीए के दो सहयोगियों को सरकार के खिलाफ खड़ा करके दिखा दिया। हालांकि, इन दोनों सहयोगियों का सरकार के खिलाफ खड़ा होना लंबे समय से होता दिख रहा था। नोटबंदी के मुद्दे पर शिवसेना और अकाली दल का सरकार के खिलाफ खड़े होने की अपनी वजहें हैं और बिना बहस इसका नए नोट के लिए कतार में लगी जनता की परेशानी से कोई वास्ता नहीं है। पंजाब में चुनाव के लिए रकम जुटाकर रखने वाले अकाली दल की इस फैसले से परेशानी समझी जा सकती है। पंजाब में कार्यकर्ताओं की पक्का वाला नेटवर्क खड़ा हो गया होता, तो शायद ही पंजाब का चुनाव भाजपा-अकाली साथ लड़ते। एनडीए के दूसरे सहयोगी शिवसेना की मुश्किल यही है कि बालासाहब के समय तक राज्य में बड़े भाई से शिवसेना बीजेपी में अमित शाह के आते ही छोटे भाई की भूमिका में आ गई है। इससे साफ साबित होता है कि एनडीए के दोनों सहयोगियों की भी इस इतने बड़े आर्थिक फैसले पर नाराजगी की वजह घोर राजनीतिक है।
साफ है ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, अकाली दल, शिवसेना, समाजवादी पार्टी का ये राजनीतिक विरोध है। लेकिन, बड़ा सवाल है कि पूरी तरह से आर्थिक फैसले को क्या विपक्ष पूरी तरह से राजनीतिक विरोध की कसौटी पर कसकर जनता का विश्वास जीत सकता है। इसका जवाब देश के दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों के व्यवहार से आसानी से समझा सकता है। इन दो मुख्यमंत्रियों में से एक हैं विधानसभा चुनाव के ठीक पहले बीजेपी से अलग हुए नीतीश कुमार और दूसरे अभी बीजेपी के साथ खड़े चंद्रबाबू नायडू। नायडू दक्षिण भारत में भाजपा के मजबूत और महत्वपूर्ण सहयोगी हैं और नीतीश कुमार उत्तर भारत में मोदी विरोधी गठजोड़ के महत्वपूर्ण नेता। लेकिन, इन दोनों ही मुख्यमंत्रियों ने हिन्दुस्तान के इस सबसे बड़े आर्थिक फैसले पर आर्थिक नजरिये से प्रतिक्रिया देकर राजनीतिक बढ़त भी हासिल कर ली है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पूरी तरह से इस फैसले के साथ खड़े हैं। नीतीश कुमार ने कहाकि इससे काला धन, भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने तो पहले ही प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर बड़े नोटों को खत्म करने की मांग की थी, जिससे काले धन पर रोक लगाई जा सके। जैसे ही प्रधानमंत्री ने 500 और 1000 के पुराने नोटों को खत्म किया। उसी समय चंद्रबाबू नायडू हरकत में आ गए। आंध्र प्रदेश में सरकार ने बैंकों और डाकघरों में कतार में खड़े लोगों की परेशानी कम करने के लिए पीने के पानी और दूसरी सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय से महिलाओं, बुजर्गों और दिव्यांगों के लिए अलग काउंटर की व्यवस्था के निर्देश जारी किया गया। कहा जाता है कि कई बार बैंकों से पपहले मुख्यमंत्री कार्यालय के पास ये खबर होती है कि कहां कितनी नोट आने वाली है। नायडू ने वित्त मंत्रालय को चिट्ठी लिखकर विमुद्रीकरण से जनता खासकर छोटे कारोबारियों, सड़क के किनारे ठेला लगाने वालों की मुश्किलें आसान करने को कहा है।

नोटबंदी के सरकार के फैसले के खिलाफ विपक्ष को तर्कों के साथ आना चाहिए था। और अगर सरकार ने कोई गलत फैसला लिया, तो उसका जमकर विरोध विपक्ष को करना चाहिए। लेकिन, हुआ क्या? हुआ ये कि दरअसल विपक्ष के पास सरकार के नोटबंदी के फैसले के विपक्ष में कोई सटीक तर्क नहीं है। यहां तक कि कतार में लगी जनता ने भी जब अरविंद केजरीवाल जैसे आंदोलनप्रिय और आरोप उछालकर राजनीति करने वाले नेताओं को भगाना शुरू किया तो भी इन्हें समझ नहीं आया कि जनता क्या चाहती है? ये समझना इसलिए भी जरूरी है कि क्योंकि, राजनीति के अंतिम परिणाम के तौर पर नेता जनता को अपने पक्ष में चाहता है। ये बात विपक्ष के नेता नहीं समझ सके और कुतर्क की तरफ बढ़ चले। उससे भी बात नहीं बनी तो साजिश के सिद्धान्त पर बाखूबी काम किया गया। उदाहरण के तौर पर भारतीय जनता पार्टी की बंगाल इकाई के खाते में दो किस्तों में एक करोड़ रुपये जमा करने की बात प्रचारित की गई। जिससे साबित किया जा सके कि नोटबंदी की खबर पहले ही लीक कर दी गई थी। दूसरा साजिशी सिद्धान्त आया जिसमें भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य की बेटी को 2000 के नोटों की गड्डियों के साथ दिखाया गया। वो खबर पूरी तरह से गलत निकली। मौर्य ने बताया कि उनके कोई बेटी है ही नहीं। ये कुछ उदाहरण भर हैं। और ये उदाहरण साबित करते हैं कि दरअसल विपक्ष के पास इस मामले विरोध के लिए कोई सही तर्क, तथ्य हैं ही नहीं।
ऐसा नहीं है कि विपक्ष को राजनीति के लिए मौका नहीं मिल सकता था। सकारात्मक विरोध के लिए विपक्ष मानसिक तौर पर तैयार होता, तो बड़ी जमीन एटीएम और बैंक की कतारों में लगे लोग तैयार कर देते। लेकिन, दो बातें थीं। पहली ये कि कतारों में खड़े लोगों को नरेंद्र मोदी के किए पर भरोसा है। और दूसरा ये कि विपक्ष के नेताओं की विश्वसनीयता और मंशा संदेह के दायरे में आती रही। इस कदर कि दिल्ली के लक्ष्मीनगर इलाके में अरविंद केजरीवाल आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ लोगों का हाल जानने पहुंचे, तो लोगों ने उन्हीं के खिलाफ नारे लगाने शुरू कर दिए। ये सब उसके बावजूद हो रहा था, जब मीडिया के बड़े चेहरे ये साबित करने पर तुले हुए थे कि लोग बुरी तरह से परेशान हैं। किसी भी हाल में देश में 8 नवंबर के 8 बजे के बाद से हुए हर हादसे दुर्घटना को नोटबंदी से जोड़ने की कवायद में सिर्फ विपक्षी नेता ही शामिल नहीं थे। बड़े पत्रकार, लेखक के तौर पर समाज में पहचाने जाने वाले लोग सरकार के फैसले के खिलाफ कुछ भी करने को उतारू हैं। दरअसल ये कुछ भी करने पर उतारू जमात में बहुतायत लोग वही हैं, जो किसी भी हाल में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर देखने को तैयार नहीं थे। और नहीं थे, वाली मानसिकता अभी भी जड़ अवस्था में है। इसका अद्भुत उदाहरण देखने को मिलता है कि करीब 150 ऐसे ही बड़े बुद्धिजीवियों ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर इस फैसले को वापस लेने की मांग की है। बुद्धिजीवियों की चिट्ठी है इसलिए पूरी तरह से उसमें चिन्ता आम आदमी के कष्टों की ही की गई है। लेकिन, कमाल की बात ये भी है कि नोटबंदी से आम आदमी को होने वाले कष्टों की चिन्ता करने वाले ज्यादातर वही लोग हैं, जिन्होंने असहिष्णुता को इस देश का वर्तमान चरित्र बता देने की कोशिश की और देश से मिले सम्मानों को वापस कर दिया था। देश में बुद्धिजीवी, लेखक के तौर पर सम्मान पाने वाले ढेरों लोग भी जब इस आर्थिक फैसले पर राजनीतिक तरीके से प्रतिक्रिया देते हैं, तो संदेह होता है कि क्या मोदी विरोध के नाम पर सरकार के हर फैसले का विरोध करके जनता को गुमराह करने की कोशिश, उनका मानस बदलने की कोशिश कहां तक सही है। एक कोशिश हुई जब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के सात हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के कर्ज को बट्टे खाते में डालने की खबर को माल्या की कर्ज माफी के तौर पर प्रचारित किया गया। जबकि, सच ये है कि नरेंद्र मोदी की सरकार के ढाई साल के कार्यकाल में माल्या और दूसरे डिफॉल्टर से कर्ज वसूली की प्रक्रिया जितनी तेजी से पूरी करने की कोशिश हुई, वैसी कोशिश कभी नहीं हुई। बल्कि, पिछली सरकार के समय में ही ज्यादातर सरकारी बैंकों ने बड़े कर्ज दिए और कॉर्पोरेट से उनकी वसूली नहीं हो सकी। सच्चाई यही है कि आर्थिक मामलों पर नरेंद्र मोदी की सरकार बहुत ही चरणबद्ध तरीके से चल रही है। जिसमें सरकार आने के बाद सबसे पहले काला धन बनने से रोकने की कोशिश शुरू हुई। उसके बाद बेनामी संपत्ति पर रोक लगाने कोशिश, लोगों को अपना काला धन बताकर उसे बैंकिंग सिस्टम में वापस लाने की कोशिश। ये सब बहुत चरणबद्ध तरीके थे। इसी बीच में सरकार ने बैंकों का एनपीए खत्म करने और बैंकों की स्थिति मजबूत करने के लिए पूर्व सीएजी विनोद राय की अगुवाई में बैंक बोर्ड ब्यूरो बना दिया। सबसे बड़ी बात कि इन सारे कदमों के साथ नरेंद्र मोदी जनता को ये भरोसा दिलाने में कामयाब रहे हैं कि ये फैसला पूरी तरह से आम जनता के हित में है। 

Wednesday, November 30, 2016

बच्चों के लिए बड़ों का बहुत बड़ा आंदोलन

नोबल पुरस्कार के लिए जब कैलाश सत्यार्थी का नाम घोषित किया गया, तो हम जैसे लोगों के लिए सबसे बड़ी बात यही थी कि एक भारतीय को दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार दिया जा रहा है। ये पुरस्कार इसलिए भी अहम हो गया क्योंकि, भारत की गरीबी, मुश्किलें और असमानता को दूर करने के काम में जब भी कोई काम होता हुआ दिखता है या कहें कि अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जब ऐसे किसी काम की चर्चा होती है, तो वो ज्यादातर कोई विदेशी संस्था ही कर रही होती है। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि भारत की धरती पर भारतीय व्यक्ति और संस्थाओं के किए काम को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कम ही महत्व मिल पाता है। इसीलिए जब नोबल पुरस्कार के लिए कैलाश सत्यार्थी को चुना गया, तो भारत के लिए ये बड़ी उपलब्धि रही। कैलाश सत्यार्थी ने बच्चों का जीवनस्तर सुधारने के लिए जिस तरह का काम किया और जिस तरह से बिना किसी साधन, संसाधन के लम्बे समय तक उसे जिया, वो काबिले तारीफ है। लेकिन, ये सब शायद दूर से अहसास करने जैसा ही रह जाता, अगर एक दिन कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउन्डेशन के कन्टेंट एडिटर अनिल पांडे का बुलावा न आता। बुलावा भी बहुत खास था। उन्होंने कहाकि कैलाश जी पत्रकारों, वेब पर काम करने वाले लोगों से मिलना चाहते हैं। कैलाश सत्यार्थी से निजी तौर पर मिलने की इच्छा भर से मैं वहां चला गया। लेकिन, वहां जाना मेरे लिए कैलाश सत्यार्थी के जीवन भर चलाए गए आंदोलन का अहसास करने का शानदार मौका बन गया। कमाल की बात ये कि अभी भी कैलाश जी पहले जैसे ही सहज, सरल हैं। एक सवाल जो मेरे मन में था कि अब नोबल पुरस्कार तो मिल ही गया। किसी भी सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति के लिए इससे बड़ा क्या यानी अब कैलाश सत्यार्थी आगे क्या करेंगे?

ये सवाल मेरे मन में था। लेकिन, हम ये सवाल पूछते उससे पहले खुद कैलाश जी ने कहाकि नोबल पुरस्कार पाने के बाद इतनी रकम और प्रतिष्ठा मिल जाती है कि कुछ न भी करे तो जीवन चल जाएगी और लगने लगता है कि आगे क्या? लेकिन, मुझे लगता है कि बच्चों के लिए अभी बहुत काम करना बचा है। और इसी बहुत काम करना बचा है वाली कैलाश जी की ललक ने भारत की धरती से दुनिया के लिए एक अनोखी मुहिम शुरू की है। वो बच्चे जिन्हें जीवन में किसी तरह से सामान्य बच्चों की तरह जीवन जीने का अवसर नहीं मिल पा रहा है। वो बच्चे जो अभी भी किसी मजबूरीवश शोषित हो रहे हैं। ऐसे दुनिया के हर बच्चे को दूसरे बच्चों की तरह जीवन देने के लिए कैलाश सत्यार्थी एक बड़ी मुहिम शुरू कर रहे हैं। नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी की इस मुहिम को मजबूत करने के लिए दूसरे ढेर सारे नोबल पुरस्कार विजेता और दुनिया के बड़े नेता शामिल होंगे। इसके जरिये दुनिया भर के बच्चों के हक में आवाज बुलंद की जाएगी। साथ ही बच्चों की प्रति करुणा, सहृदयता की भावना बढ़ाने की अपील भी होगी।

 राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी इस अभियान को शुरू करेंगे। 10-11 दिसंबर, 2016 को राष्ट्रपति भवन में Laureates and leaders For Children Summit का आयोजन कर कैलाश सत्यार्थी जी बच्चों के हित में दुनियाभर के नोबेल पुरस्कार विजेताओं और विश्व के प्रमुख नेताओं का एक नैतिक मंच तैयार करने जा रहे हैं। 100 Million For 100 Million Campaign की शुरुआत यहीं से होगी। जैसा नाम से ही जाहिर है ये अभियान दुनिया के उन 10 करोड़ बच्चों के लिए है, जिनको वो सब नहीं मिल सका, जिसके वो हकदार हैं और उन्हें ये हक दिलाने के लिए दुनिया के 10 करोड़ नौजवानों ने मन बनाया है। 10 देशों से शुरू करके अगले 5 सालों में ये अभियान दुनिया के 60 देशों में चलाने की योजना है। कैलाश सत्यार्थी कहते हैं कि दुनिया के हर बच्चे को शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान का अधिकार दिलाने के लिए ये अभियान चलाया जा रहा है। हम सबको कैलाश जी की इस मुहिम का हिस्सा बनना चाहिए। मैं इस मुहिम में कैलाश जी के साथ हूं।

Tuesday, November 22, 2016

महंगाई पर काबू रखने के लिए जीएसटी की 5 दरें

आखिरकार लंबी जद्दोजहद के बाद केंद्र सरकार ने जीएसटी की दरों पर सहमति बनाने में कामयाबी हासिल कर ली। जीएसटी परिषद की बैठक में चार कर दरें लागू करने पर सहमति बनी है। जीएसटी को लेकर सबसे बड़ी आशंका इसी बात की जताई जा रही थी कि जीएसटी लागू होने के बाद उसके अच्छे परिणाम तो देर से दिखेंगे लेकिन, बुरे परिणाम पहले नजर आने लगेंगे। और उन बुरे परिणामों में सबसे बड़ा महंगाई का तुरंत बढ़ना था। अब अच्छी बात ये है कि जीएसटी परिषद की हुई बैठक ने जिस तरह से जीएसटी की दरों को 4 श्रेणी में बांटा है, उससे जरूरी सामानों की महंगाई तो कतई नहीं बढ़ने वाली। सेवाओं पर कर बढ़ेगा। जिससे सेवाएं महंगी होंगी। लेकिन, इसे लेकर सरकार बहुत ज्यादा चिंतित नहीं दिखती। क्योंकि, सरकार ने जरूरी कई सामानों को तो करमुक्त तक कर दिया है। इस लिहाज से जीएसटी परिषद ने 5 दरें तय की हैं। शून्य, 5, 12, 18 और 28 प्रतिशत की कर दरें समझने से साफ होता है कि सरकार की प्राथमिकता में महंगाई पर काबू रखना कितना ऊपर है। उसके पीछे सबसे बड़ी वजह संभवत: ये भी होगी कि बड़ी मुश्किल से कर्ज पर ब्याज दरें काफी नीचे आई हैं। और इस बात पर सरकार और रिजर्व बैंक के बीच सहमति सी बनती दिखी है कि ब्याज दरें कम रहनी चाहिए, जिससे लोगों और कॉर्पोरेट को आसानी से सस्ता कर्ज मिल सके। रघुराम राजन पर रिजर्व बैंक का गवर्नर रहते सबसे बड़ा आरोप यही लगता रहा कि महंगाई दर को लेकर वो इतने ज्यादा सशंकित रहे कि ब्याज दरों को उस अनुपात में नहीं घटाया जितना उसे घटाया जाना चाहिए था। इसीलिए केंद्र सरकार जीएसटी की दरों को तय करने में इस बात पर खास ध्यान दे रही है कि किसी भी तरह से महंगाई के बढ़ने के संकेत नहीं मिलने चाहिए। और जीएसटी परिषद के दरें तय करने के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली की बातों से इसकी गंभीरता आसानी से समझी जा सकती है।
वित्त मंत्री अरुण जेटली जीरो टैक्स रेट के बारे में बताते हैं कि जीरो टैक्स रेट उन सामानों पर रखा गया है, जिनकी कीमत बढ़ने-घटने से कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स बास्केट का पचास प्रतिशत तय होता है। जेटली जोर देकर कहते हैं कि हम इनके मुक्त कर वाले सामान नहीं कह रहे हैं। हम इनको जीरो टैक्स आइटम कह रहे हैं।
दरअसल सरकार की मल्टिपल जीएसटी रेट तय करने में अगर कोई एक सबसे बड़ी बात ध्यान में रही है, तो वो है महंगाई। अनाज और दूसरे आम लोगों पर सीधे असर डालने वाले सामानों की कीमतों पर जीरो टैक्स लगेगा। इतना ही नहीं लोगों की रोज की जरूरत चीजों पर 5 प्रतिशत टैक्स लगेगा। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने ये बताया कि प्रस्ताव 6 प्रतिशत का था। लेकिन, अंत में 5 प्रतिशत पर ही सहमति बनी। दरअसल जीरो और 5 प्रतिशत टैक्स रेट जिन सामानों पर लगने वाला है, वही सामान हैं, जिनसे महंगाई दर के घटने-बढ़ने पर सबसे ज्यादा असर होता है। यही वो सामान हैं जिससे सीधे रसोई से लेकर आम लोगों के घर का खर्च बढ़ता-घटता है। इसीलिए केंद्र सरकार ने देश के सबसे बड़े टैक्स सुधार को लागू करते वक्त दरें तय करने में इस बात का ध्यान रखा है कि गलती से भी इसका दुष्परिणाम महंगाई बढ़ाने के तौर पर न दिखे। सरकार ने इसके बाद दो स्टैंडर्ड रेट तय किए हैं। 12 प्रतिशत और 18 प्रतिशत। केंद्र सरकार ने दो स्टैंडर्ड दरें तय करके कांग्रेस की 18 प्रतिशत का स्टैंडर्ड रेट रखने की मांग को खारिज कर दिया है। इसके पीछे वित्त मंत्री अरुण जेटली का तर्क बड़ा साफ है। उनका कहना है कि कई अनाज और रोजमर्रा के जरूरी सामानों के अलावा के सामानों में कई सामान ऐसे हैं, जिस पर अभी 11 प्रतिशत का टैक्स लग रहा है। सीधे 18 प्रतिशत का कर उन सामानों पर लगाने पर महंगाई के बढ़ने का खतरा होगा। इसलिए ऐसे आइटम पर 12 प्रतिशत का कर लगेगा। और जिन सामानों पर पहले से ही 18 प्रतिशत के आसपास या उससे ऊपर का टैक्स लग रहा है, उन पर 18 प्रतिशत का टैक्स लगेगा। इस तरह 18 प्रतिशत के स्टैंडर्ड रेट की जगह 12-18 प्रतिशत का स्टैंडर्ड रेट तय हुआ है।      
रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन जैसे ज्यादातर होम अप्लायंसेज की श्रेणी में आने वाले सामानों पर कर की दरों को 28 प्रतिशत रखा गया है। उद्योग जगत कंज्यूमर ड्यूरेबल्स पर 28 प्रतिशत की टैक्स दरों से खुश नहीं है। उद्योग को उम्मीद है कि ऐसे कंज्यूमर ड्यूरेबल्स जो लोगों की रोज की जरूरत का हिस्सा बन गए हैं, उन्हें 18 प्रतिशत कर की श्रेणी में रखा जाएगा। 4 श्रेणियां तय होने के बाद भी अभी सामान विशेष पर लगने वाले टैक्स को लेकर सफाई नहीं आ पाई है। वो श्रेणियों के लिहाज से सामानों की सूची आने के बाद ही पक्का हो पाएगा। लेकिन, इतना तो तय दिख रहा है कि सरकार हर हाल में ऐसे सामानों पर ज्यादा कर लगाने के पक्ष में नहीं है, जिससे महंगाई दर बढ़े। खासकर आम लोगों के रोज के इस्तेमाल में आने वाले सामानों पर महंगाई। यही वजह रही कि राज्यों को उनके राजस्व की भरपाई के लिए दी जाने वाली रकम का इंतजाम करने के लिए जीएसटी परिषद ने सेस लगाने को मंजूरी दी है। हालांकि, जानकार कह रहे हैं कि सेस लगने से जीएसटी पर टैक्स के ऊपर टैक्स लगता ही रहेगा। इस पर सरकार का साफ कहना है कि सेस जीएसटी लागू होने के बाद से 5 साल तक के लिए ही है। महंगी लग्जरी कारों और तंबाकू-पान मसाला जैसे उत्पादों पर ही सेस लगाने की बात है। इससे इन उत्पादों पर कर की दर 40 प्रतिशत 65 प्रतिशत तक होगी।
वित्त मंत्री अरुण जेटली की मानें, तो किसी भी उत्पाद पर पहले से ज्यादा कर या सेस नहीं लगने वाला है। उन्होंने कहाकि राज्यों को राजस्व नुकसान की भरपाई के लिए 50 हजार करोड़ रुपये की जरूरत पहले साल होगी, जो सेस के जरिए वसूला जाएगा। कुल मिलाकर सरकार तेजी से अप्रैल 2017 की समयसीमा तक जीएसटी लागू करने के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रही है। शायद यही वजह है कि सरकार ज्यादातर मसलों पर आम सहमति बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन, अभी भारत जैसे विशाल देश में जीएसटी लागू होने के बाद सामानों पर अलग-अलग राज्य में किस सामान पर कितना कर लगेगा, इसे बता पाना बेहद मुश्किल है। इसके पीछे सिर्फ कर की 4 श्रेणियां होना ही नहीं है। बल्कि, सबसे बड़ी बात ये भी है कि कहां, कौन सा सामान बिक रहा है। साथ ही अभी जीएसटी परिषद को सामान विशेष के लिहाज से श्रेणी तय करके सूची बनानी होगी। इसके बाद ही पूरी तरह से समझा जा सकेगा कि देश के इस सबसे बड़े सुधार से कर ढांचे में कितना सुधार होने वाला है। और इससे आम लोगों से लेकर उद्योगों तक को कितनी सहूलियत मिलने वाली है। लेकिन, प्रथम दृष्टया जीरो टैक्स और 4 टैक्स स्लैब को देखकर ये पक्की टिप्पणी है कि सरकार किसी भी हाल में महंगाई दर बढ़ाने वाली दरों को नहीं लागू करेगी, खासकर आम लोगों के रोज के सामान की महंगाई।

अभी भी आशंकित है उद्योग जगत
जीएसटी लागू करने में सरकार जिस तेजी से आगे बढ़ रही है, उस पर उद्योग जगत खुश नजर आ रहा है। हालांकि, मल्टिपल जीएसटी दरों को लेकर उद्योग जगत थोड़ा आशंकित दिखता है। लेकिन, ज्यादातर लोग जीएसटी लागू करने के सरकार के तरीके की तारीफ करते नजर आ रहे हैं। हां, ये सलाह जरूर है कि ज्यादातर कंज्यूमर गुड्स पर 18 प्रतिशत का ही कर लगना चाहिए।
उद्योग संगठन फिक्की के प्रेसिडेंट हर्षवर्धन नेवतिया ने जीएसटी की 4 दरों पर सहमति बनाने के लिए जीएसटी परिषद की तारीफ की है।
सीआईआई अध्यक्ष नौशाद फोर्ब्स का कहना है कि मॉडल जीएसटी कानून हर राज्य में सामान और सेवाओं की आपूर्ति पर अलग-अलग कर की बात कर रहा है, इससे कर संरचना के और कठिन होने की आशंका है। फोर्ब्स का सुझाव है कि सरकार को अधिकतम 2 दरें रखनी चाहिए। 


Friday, November 11, 2016

जीएसटी लागू करने में दुनिया की मुश्किलों से भारत के लिए सबक

दुनिया में 193 देश हैं, जो संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य हैं। और दुनिया के 160 देश हैं, जो कर कानून के तौर पर जीएसटी लागू कर चुके हैं। 160 में से 8 देश ऐसे भी हैं, जो भले ही संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य नहीं हैं। लेकिन, उन्होंने भी अपने देश में कर सुधारों के तौर पर जीएसटी कानून को लागू किया है। दरअसल इस जानकारी से शुरुआत करने से ये आसानी से समझ आ जाता है कि जीएसटी कर सुधार के तौर पर कितना बड़ा और जरूरी है। और साथ ही ये भी हिन्दुस्तान के राजनीतिक दलों ने सारी सहमति होने के बाद भी सिर्फ श्रेय दूसरे को न मिल जाए, इस लड़ाई में जरूरी कर सुधार लागू करने में कितना पीछे कर दिया। ये कहना सही होगा कि दुनिया भर में जीएसटी आसान कर प्रक्रिया के तौर पर लागू किया जा चुका है। फ्रांस ने सबसे पहले 1954 में जीएसटी लागू किया था। इसकी सबसे बड़ी वजह यही थी कि अलग-अलग स्तरों पर लगने वाले कर की वजह से ज्यादातर लोग करों से बचने की कोशिश करते थे। एक विकसित अर्थव्यवस्था होने की वजह से फ्रांस के लिए कर वसूली में आने वाली मुश्किलों को खत्म करने के लिए जीएसटी की जरूरत हुई। जिससे हर स्तर पर किसी सामान या सेवा को लेने वाले को उसी आधार पर कर देना होता है। इसीलिए इसे दुनिया भर में सबसे बड़े कर सुधारों के तौर पर देखा जाता है। जिन देशों में कर वसूली का दायरा बढ़ाने की कोशिश हुई और औद्योगीकरण तेजी से बढ़ा, उन सभी देशों ने एक-एक करके जीएसटी को अपनाया है। यही वजह है कि आज दुनिया के 160 देशों में जीएसटी कर सुधार के तौर पर देखा जाता है। हालांकि, कई देशों में संघीय ढांचे में असंतुलन की भी स्थिति बनी है। भारत में जीएसटी के सर्वसहमति से लागे होने के बावजूद राज्यों को अपने अधिकार और राजस्व में हिस्सेदारी को लेकर आशंका बनी हुई है।
जीएसटी कर प्रक्रिया में सुधार कैसे है?
जीएसटी यानी गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स वसूलने की प्रक्रिया पारदर्शी है। और सबसे बड़ी बात ये कि कर किसी भी सामान या सेवा पर होने वाले वैल्यू एडिशन या मूल्य संवर्धन के आधार पर ही लिया जाता है। वैल्यू एडिशन या मूल्य संवर्धन पर लगने वाले कर की ही वजह से दुनिया के कई देशों में इसे वैट यानी वैल्यू ऐडेड टैक्स के तौर पर भी जाना जाता है। यानी इसका सीधा सा मतलब हुआ कि किसी भी सामान या सेवा में हर स्तर पर जैसे ही उसमें कोई मूल्यवर्धन होता है, उस पर कर लग जाता है। इससे आसानी से कर वसलूने वाले अधिकारियों के साथ ही कारोबारियों को भी पता होता है कि कहां, कब और कितना कर लगना है या वसूला जाना है। जीएसटी को अंतिम पड़ाव पर लगने वाले रिटेल टैक्स के तौर पर भी समझा जा सकता है। ग्राहक जब कोई सामान या सेवा लेता है, तो उसी आधार पर उसे कर देना होता है।

भारत में जीएसटी कैसे काम करेगा?
दुनिया के ज्यादातर देशों में जीएसटी एक कर के तौर पर लागू है। लेकिन, कई देशों में संघीय ढांचे में असंतुलन को रोकने के लिए दोहरी जीएसटी प्रणाली लागू की गई है। इससे राज्यों के पास भी कर वसूलने का अधिकार बना रहता है। कनाडा और ब्राजील जैसे देशों ने डुअल जीएसटी ही लागू किया है। भारत जैसे बड़े देश में जटिल लोकतांत्रिक प्रक्रिया और केंद्र और राज्य सरकार के बीच राजस्व और अधिकारों की जटिलता की वजह से दोहरी जीएटी पर ही सहमति बनी है। दोहरी जीएसटी में मूल रूप से सीजीएसटी यानी सेन्ट्रल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स और एसजीएसटी यानी स्टेट गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स है। सामान या सेवा पर केंद्रीय सरकार के हिस्से के वसूले जाने वाले कर को सीजीएसटी कहा जाएगा। और जब सम्बन्धित राज्य सरकारें अपने राज्य में किसी सेवा या सामान पर कर वसूलेंगी, तो वो एसजीएसटी होगा। लेकिन, इस व्यवस्था में ही एक और कर व्यवस्था की गई है। जिसे आईजीएसटी यानी इंटर स्टेट गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स कहा गया है। ये कर केंद्र सरकार वसूलेगी जहां कर वसूली में दो राज्यों के बीच कारोबार हुआ है। केंद्र सरकार द्वारा वसूले गए आईजीएसटी को जीएसटी परिषद की तय व्यवस्था के आधार पर दोनों या जितने भी राज्यों के बीच वो कारोबार हुआ है, उनके बीच बांटा जाएगा।
दुनिया के दूसरे देशों से भारत के लिए जीएसटी के सबक
भारतीय संविधान के 122वें संशोधन के साथ ही भारत भी गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स लागू करने के लिए पूरी तरह से तैयार हो गया है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद अब जीएसटी काउंसिल इस सबसे बड़े कर सुधार की बारीकियों के नियम तैयार कर रही है। ढेर सारे कर अब भारत में इतिहास की बात हो जाएंगे। सरकार हरसंभव कोशिश कर रही है कि जीएसटी 1 अप्रैल 2017 से लागू कर दिया जाए। दुनिया के जिन देशों में पहले से जीएसटी लागू हैं, उनको भी ध्यान में रखा जा रहा है। अभी हाल में मलेशिया ने जीएसटी लागू किया है। 2009 में मलेशिया ने जीएसटी लागू करने की बात कही थी। लेकिन, इसे मलेशिया में पिछले साल यानी 2015 में लागू किया जा सका है। ताजा जीएसटी लागू करने वाले देश मलेशिया का उदाहरण भारत के लिए एक पक्का सबक हो सकता है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ये कि इतने बड़े कर सुधार को लागू करने के लिए लोगों में जानकारी और सरकारी मशीनरी के पूरी तरह से तैयार न होने से मलेशिया में कारोबारियों को बड़ी मुश्किलें हुईं और इसकी वजह से कारोबारियों और सरकारी अधिकारियों के बीच बड़े विवाद हुए। मलेशिया की सरकार को छोटे कारोबारियों के बड़े विरोध का सामना करना पड़ा था। क्योंकि, छोटे कारोबारियों को जीएसटी की बारीकियां समझने में जबर्दस्त मुश्किलें हुई थीं। खासकर कौन कर वसूलने का अधिकारी होगा। किस स्तर पर किस तरह से जीएसटी लगेगा। इसकी वजह से किसी भी सेवा या सामान पर लगने वाले कर की गणना सबसे कठिन काम हो गया था। साथ ही कारोबारियों को रिफंड में बहुत सी मुश्किलें हुईं थीं। उस पर मलेशिया में विपक्षी दलों ने भी इस मौके पर आग में घी डालने का काम किया था। अच्छी बात ये है कि ढेर सारी मुश्किलों के बाद हिन्दुस्तान में अब कम से कम सभी राजनीतिक दलों के बीच पूरी तरह से सहमति बनी है। राज्यों की विधानसभा में रिकॉर्ड समय में जीएसटी बिल पारित हुआ। लेकिन, इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि अगर केंद्र सरकार, जीएसटी परिषद जीएसटी की बारीकियों को कारोबारियों खासकर, छोटे कारोबारियों को समझा न सकी, तो यहां भी ढेर सारे विवाद की स्थिति बन सकती है। ताजा-ताजा जीएसटी लागू करने वाले देश मलेशिया का सबक भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि, लगभग मलेशिया जैसा ही मल्टिपल जीएसटी भारत भी लागू करने जा रहा है। हालांकि, मलेशिया में दुनिया का सबसे कम जीएसटी रेट 6% लगाया गया है।
मलेशिया से सबक लेते हुए सरकार को जीएसटी लागू करने में हड़बड़ी दिखाने से बचना ठीक रहेगा। क्योंकि, राजस्व सचिव हसमुख अधिया के मुताबिक, इसके लागू करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार के 60000 से ज्यादा अधिकारियों को प्रशिक्षित करने की जरूरत है। दरअसल जीएसटी पूरी तरह से कर वसूलने और देने की प्रक्रिया में एक ऐतिहासिक बदलाव है, जिसमें कर उत्पादक की बजाए ग्राहक के स्तर पर लगेगा। इसके अलावा देशभर में तकनीकी तौर पर भी कर वसूली का तंत्र पूरी तरह से दुरुस्त करने की जरूरत है। क्योंकि, इतना बड़ा कर सुधार बिना मजबूत तकनीकी जमीन तैयार किए सलीके से लागू करना संभव नहीं होगा। मलेशिया के उदाहरण से भारत को एक और जरूरी सबक ये मिलता है कि जीएसटी परिषद को अलग-अलग कारोबार के लिए बाकायदा अलग गाइडेंस पेपर तैयार करना होगा। जिससे हर अलग-अलग क्षेत्रों के कारोबारियों की मुश्किलों को उनके लिहाज से समझा जा सके और उसी आधार पर कर वसूलने की व्यवस्था तैयार की जा सके। पहले से अलग-अलग क्षेत्रों के कारोबारियों की समस्या के लिहाज से समाधान तैयार न कर पाने की वजह से जीएसटी लागू होने के 2 साल तक मलेशिया सरकार को कारोबारियों को होने वाली अलग-अलग तरह की समस्या का समाधान लगातार खोजने में जूझना पडा। भारत में ये समस्या इसलिए भी हो सकती है क्योंकि, भारत एक विशाल देश है। नए-नए कारोबार बन रहे हैं, खड़े हो रहे हैं। साथ ही केंद्र सरकार ने 1 अप्रैल 2017 से जीएसटी लागू करने का मन बनाया है। इससे काफी कम समय में केंद्र और राज्य सरकारों के कर वसूलने वाले अधिकारियों को तैयार करना होगा।
भारत के लिए सिंगापुर का सबक भी महत्वपूर्ण हो सकता है। क्योंकि, सिंगापुर का उदाहरण दिखाता है कि जीएसटी लागू करने के बाद वहां शुरुआती सालों में तेजी से महंगाई बढ़ी थी। हालांकि, सिंगापुर पूरी तरह से शहरी देश हैं। इसलिए वहां महंगाई उतना बड़ा मुद्दा नहीं बन सकी। साथ ही कुछ वर्षों में धीरे-धीरे महंगाई पर काबू भी पा लिया गया। लेकिन, भारत जैसे देश में महंगाई को लेकर सरकार को खास सतर्क रहना होगा। उसकी सबसे बड़ी वजह ये कि भारत में खेती के उत्पादों पर कर है नहीं या ना के बराबर है। इसलिए जीएसटी लागू होने से कई खेती के उत्पाद मूल्यवर्धन के बाद महंगे होंगे। और खाने-पीने की सामानों की महंगाई भारत में बेहद संवेदनशील मुद्दा है। हालांकि, अच्छी बात ये है कि भारत में अभी तक टैक्स रेट बहुत ज्यादा है। माना जा रहा है कि 18-19 प्रतिशत के जीएसटी के बाद ढेर सारे सामान और सेवा पर कर घटेगा। इससे कई सेवा, सामान सस्ते भी हो सकते हैं। कुल मिलाकर इस मोर्चे पर केंद्र सरकार को राज्यों के साथ बेहतर समन्वय करके महंगाई असंतुलन को रोकना होगा। सिंगापुर के अनुभव से भारत ये भी सबक ले सकता है कि खुदरा बाजार में कारोबारियों को बहुत ज्यादा लाभ लेने से हतोत्साहित किया जाए, जिससे ग्राहकों पर महंगाई का ज्यादा असर न पड़े। सिंगापुर ने एक और काम किया, जिससे भारत सबक ले सकता है। सिंगापुर ने जीएसटी दर 1994 में 3% से धीरे-धीरे 7% तक कर दी है। लेकिन, साथ ही साथ सरकार ने आयकर में कटौती भी की। आम करदाता और कॉर्पोरेट को सीधे आयकर में बड़ी छूट दी गई। भारत सरकार को इसके साथ कम आमदनी वाले वर्ग और पेंशन पर आश्रित लोगों के लिए भी एक बेहतर व्यवस्था बनाने की तरफ गंभीरता से सोचना होगा।
भारत जिस तरह की जीएसटी कर व्यवस्था लागू करने जा रहा है। लगभग वैसी ही जीएसटी कर व्यवस्था कनाडा में भी लागू है। कनाडा ने 1991 में ही इस सबसे बड़े कर सुधार को लागू कर दिया था। जब भारत, दुनिया के लिए अपनी अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोल ही रहा था। कनाडा में उस समय जीएसटी का काफी विरोध हुआ था। और इसकी सबसे बड़ी वजह राज्यों के राजस्व को होने वाला नुकसान था। भारत में भी इसी मसले पर ढेर सारा विरोध हुआ है। तमिलनाडु तो अंतिम समय तक इस कर सुधार के विरोध में रहा। और सिर्फ तमिलनाडु ही नहीं ज्यादातर ऐसे राज्य जहां मैन्युफैक्चरिंग होती है, उनको जहां बिक रहा है, वहां कर लगने वाली इस व्यवस्था से नुकसान उठाना पड़ रहा है। हालांकि, केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को अगले 5 सालों तक होने वाले राजस्व नुकसान की भरपाई का आश्वासन दिया है।

इसीलिए जरूरी है कि जीएसटी परिषद राज्यों के हितों का ख्याल रखे। कनाडा में तो तीन राज्य- अलबर्टा, ओन्टारियो और ब्रिटिश कोलंबिया- संवैधानिक अधिकारों के हनन के खिलाफ कनाडा की संघीय सरकार के खिलाफ अदालत में चले गए थे। लेकिन, समय के साथ कनाडा ने कई तरह की जीएसटी व्यवस्था को लागू किया। इसमें राज्यों को संघीय जीएसटी के साथ अपना भी मूल्यवर्धन कर वसूलने का अधिकार दिया गया। साथ ही राज्य के अधिकारियों को ढेर सारे अधिकार भी दिए गए। जिसमें अपना कर वसूलने के साथ संघीय जीएसटी वसूलने के लिए एक निश्चित फीस का भी प्रावधान किया गया। 

Sunday, November 06, 2016

मीडिया के लिए सवाल पूछने के अधिकार से ज्यादा साख की चिन्ता का वक्त

प्रधानमंत्री @narendramodi के फ़ीडबैक तंत्र पर मुझे बड़ा भरोसा है। इसीलिए लिख रहा हूँ। हालाँकि जरूरी नहीं है मेरी ये बात भी उन तक पहुँचे। लेकिन मुझे लगता है कि @ndtvindia पर प्रतिबंध का फ़ैसला वापस लेना चाहिए और NBSA को इस मसले पर पूछा जाना चाहिए कि स्वनियंत्रण के तहत इस पर आप लोग क्या कार्रवाई करेंगे। ये जरूरी इसलिए भी है कि किसी भी सरकार पर मीडिया की स्वतंत्रता पर लगी रोक- कई बार बेहद जायज़ वजहों से भी लगी हो तो भी- सीधे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला और तानाशाही की ओर बढ़ते क़दम की तरह देखी जाती है/जाएगी। इसीलिए प्रधानमंत्री जी एनडीटीवी पर लगाए गए प्रतिबंध की वजहों को देश के सामने रखिए और स्वनियंत्रण में बुरी तरह से फ़ेल रहे सम्पादकों की संस्था के ही ज़िम्मे इसे कर दीजिए। ये देश को पता चलना जरूरी है कि आखिर किस खबर को दिखाने की वजह से देश में सरोकारी चैनल की छवि रखने वाले एनडीटीवी को एक दिन के बंद करने का कड़वा सरकारी आदेश जारी करना पड़ा। वरना भला सरकार को क्या पड़ी थी कि ढेर सारी छद्मधर्मनिरपेक्ष जमात के सरकार के हर अच्छे काम को भी बुरा बताने के दौर में एक नई आफत मोल लेते। लेकिन, ये खतरनाक था, जो हुआ। जो एनडीटीवी ने दिखाया। अच्छा हुआ कि आतंकवादी को इस खबर से उस तरह की मदद नहीं मिल सकी, जैसी मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के दौरान टीवी चैनलों- खासकर एनडीटीवी- पर दिखाई खबर से मिली थी। मुंबई के ताज होटल में बैठे आतंकवादी और पड़ोसी देश में बैठे उनके हैंडलर भारतीय टीवी चैनलों पर खबर देखकर निर्देश जारी कर रहे थे और उसी के लिहाज से हरकत कर रहे थे। यही वजह थी कि इतना लंबा ऑपरेशन चलाना पड़ा, सेना/कमांडो को मुश्किलें आईं। वैसा ही खतरा पठानकोट के समय भी था। खतरा कितना बड़ा था। इसका अंदाजा पठानकोट हमले के समय एनडीटीवी पर चली खबरों से लगाया जा सकता है।
अपनी लाइव रिपोर्ट में एनडीटीवी बता रहा था कि आतंकवादी आयुध भंडार के बेहद नजदीक हैं और एनएसजी कमांडो के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यही है कि अगर दोनों जिन्दा आतंकवादी आयुध भंडार तक पहुंचे गए, तो उनको खत्म करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। इतना ही नहीं रिपोर्ट में कहा गया कि आतंकवादी आयुध भंडार से 100 मीटर की दूरी पर पहुंच चुके हैं, जहां से दक्षिण में मिसाइल और रॉकेट रखे हुए हैं। वायुसेना का हेलीकॉप्टर उड़ान भर चुका है और किसी भी आतंकवादियों के छिपे हुए स्थान पर गोलियां बरसा सकता है। एनडीटीवी पर एक दिन के प्रतिबंध की सिफारिश करने वाले सरकारी पैनल के मुताबिक, रिपोर्ट में ये भी बताया गया कि तीन तरफ से एनएसजी कमांडो आतंकवादियों को घेर चुके हैं और दक्षिण का एरिया जंगल का है शायद इस वजह से उस तरफ घेराबंदी नहीं की गई है।
अब इन खबरों को देखकर कोई भी ये समझ सकता है कि 26/11 का तरह ये कितना बड़ा खतरा बन सकती थीं। केबल टेलीविजन नेटवर्क नियंत्रण अधिनियम का नियम 6(1)(P) ये साफ कहता है कि किसी भी भारतीय समाचार चैनल को आतंकवादियों के साथ चल रही मुठभेड़ की लाइव कवरेज की इजाजत नहीं है। ये पूरी तरह से गैरकानूनी है। साथ ही इसमें साफ लिखा है कि सिर्फ सेना के अधिकारिक प्रवक्ता का ही बयान इस्तेमाल किया जाएगा। लेकिन, इसके बावजूद कई बार इस तरह की गलतियां भारतीय चैनलों ने की हैं। और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इतने संवेदनशील मुद्दे पर भी सरकारों ने सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ दिया है। ज्यादातर समाचार चैनलों के मुद्दे पर स्वनियंत्रण का कवच काम आता रहा है। और एनडीटीवी ने चैनल के तौर पर एनडीटीवी के पत्रकारों ने लगातार ये भी साबित करने की कोशिश की कि सिर्फ वही हैं, जो पत्रकारिता कर रहे हैं। इसीलिए बड़े सलीके से एक बेहद गम्भीर मसले पर हुई एक कार्रवाई को पूरी पत्रकारिता पर बंदिश जैसा बताने की कोशिश हो रही है। जबकि, सच्चाई ये भी है कि एनडीटीवी पर कोई हमेशा वाला प्रतिबंध नहीं लगा है। ये देश की सुरक्षा से संबंधित संवेदनशील जानकारी पहुंचाने वाली रिपोर्टिंग पर की गई दंडात्मक कार्रवाई है। लेकिन, इसे आपातकाल जैसा बताने की कोशिश हो रही है। आपातकाल में तो हर खबर सरकार के अधिकारी से मंजूर हुए बिना न छप सकती थी, न सुनाई जा सकती थी। अभी जब 9 तारीख के एक दिन के बंद के पहले एनडीटीवी प्रतिबंध के विरोध की खबरों को ही अपनी टॉप 10 की दसों खबरों में शामिल करता है, तो समझा जा सकता है कि सरकारी प्रतिबंध एक दिन की दंडात्मक कार्रवाई है या फिर आपातकाल। सिर्फ एनडीटीवी ही नहीं, उसके बहाने सब जमकर सवाल पूछ रहे हैं। उससे पहले भी पूछ रहे थे और आगे भी पूछेंगे ही। हिन्दुस्तान में किसी सरकार की औकात नहीं है कि वो सवाल पूछने से रोक सके। किसी ने रोकने की कोशिश भी की, तो वो बहुत छोटा दौर होगा। ऐसे में इस बात को स्थापित करने की कोशिश करना कि देश में सवाल पूछने का अधिकार ही किसी को नहीं रहा, दरअसल असली गलती से ध्यान भटकाने की कोशिश है।  

सवाल पूछने का अधिकार मांगने वाले रवीश कुमार की बड़ी चर्चा है। सच्चाई ये है कि पक्षपात रवीश की रिपोर्टिंग का मूल आधार रहा है। पक्षपाती सवाल और पक्षपाती जवाब। मोदी और मोदीराज से रवीश कुमार की खुन्नस पुरानी है। 2007 में मैं सीएनबीसी आवाज के लिए और रवीश कुमार एनडीटीवी के लिए गुजरात चुनाव की रिपोर्टिंग कर रहे थे। दोनों लगभग एक ही दिन राजकोट में थे। मैंने कारोबारी चैनल के लिए रिपोर्ट तैयार की और मेरी रिपोर्ट राजकोट का एक मुस्लिम सब ब्रोकर बता रहा था कि मोदी राज में मौके सबके लिए बराबर हैं। रवीश ने टीवी की रिपोर्ट में तो क्या बोला होगा, ये मुझे ध्यान में नहीं है। ब्लॉग पर लिखा गुजरात में कारोबार करना मुसलमानों के लिए आसान नहीं। इसलिए रवीश कुमार वही सवाल पूछने के महारथी हैं, जिसका उन्हें मनमाफिक जवाब मिलता है। इसलिए सवाल पूछते जाना है, वाली बात सिवाय मनमाफिक सवाल-जवाब की तय कड़ी के कुछ नहीं है। ये सवाल पूछते जाना है वाली बात इस कदर मनमाफिक सवाल वाली है कि एनडीटीवी ने अपने प्राइम टाइम में खुद ही स्क्रीन काली कर ली थी। और उसमें बार-बार यही दोहराया गया था कि हमें अंत-अंत तक सवाल पूछते जाना है। दरअसल उसमें साफ ध्वनि थी कि सवाल पूछने का प्रमाणपत्र सिर्फ हमारे पास है। ये दंभ इस कदर कि स्क्रीन काली करके रवीश कुमार ने दूसरे चैनलों के एंकरों को ये जताने की कोशिश की कि पत्रकारिता सिर्फ हमारी वाली है। और जो हमारे जैसी पत्रकारिता नहीं कर रहा वो, दरअसल पत्रकार ही नहीं। और इसीलिए ये बड़ा जरूरी हो जाता है कि सरकार एक दिन के प्रतिबंध की पूरी वजह को देश के सामने रखे। एक पत्रकार होने के नाते मैं किसी भी हाल में पत्रकार स्वतंत्रता पर रंचमात्र भी बंदिश के विरोध में खड़ा हूं। लेकिन, हमारा ये पत्रकारिता के साथ खड़ा होना किसी भी हाल में देश के विरोध में और एनडीटीवी के साथ खड़ा होना नहीं है। इसीलिए जरूरी है कि सरकार इसे साफ करे। सिर्फ साफ न करे, टीवी चैनलों पर स्वनियंत्रण के ठेकेदार सम्पादकों की संस्थाओं से जवाब मांगे कि आपके स्वनियंत्रण के पैमाने क्या हैं और उस पैमाने पर खरा न उतरने पर आपने क्या-क्या कार्रवाई की है। ये दरअसल सरकार की साख के साथ मीडिया की साख के लिए भी जरूरी है। गोवा में हुए इंडिया आइडिया कॉन्क्लेव 2016 में फिल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री ने बड़ी समझने वाली बात कही है। उन्होंने कहाकि आज के दौर में मीडिया सत्ता-सरकार हो गई है और सोशल मीडिया विद्रोही। ये बहुत बड़ी बात है। इसलिए सवाल पूछने के अधिकार पर हमले के बहकावे में आने से मीडिया को बचना चाहिए। मीडिया को सवाल पूछने के अधिकार की साख की चिन्ता करनी चाहिए। 

टाटा का “मॉडल” बदलने के चक्कर में लगे “मिस्त्री” बदल दिए गए

टाटा समूह के बारे में आम धारणा ये है कि टाटा हिन्दुस्तान की सबसे प्रतिष्ठित कंपनी है और रतन टाटा इस देश के सबसे प्रतिष्ठित कारोबारी। इसकी पक्की बुनियाद भी रही है। कंपनी के इतिहास में मुनाफे से ज्यादा साख कमाने पर जोर रहा। इसीलिए भले ही मुकेश अंबानी देश के सबसे अमीर उद्योगपति हों, लेकिन जब साख की बात आती है, तो रतन टाटा के आसपास देश का कोई भी कारोबारी नहीं नजर आता। समूह की साख और समूह का संस्कार ही टाटा समूह में ऐसे तख्तापलट की वजह बन गया, जो कंपनी की साख पर भारी पड़ता नजर आ रहा है। दुनिया के कारोबारी जगत में इस तरह का तख्तापलट कभी नहीं हुआ। हां, इस तख्तापलट की बुनियाद बड़ी उल्टी है। तख्तापलट आमतौर पर सैन्य या राजनीतिक स्थिति में नीचे के कमांडर करते हैं। लेकिन, टाटा समूह में समूह में 4 साल पहले मार्गदर्शक की भूमिका में आ गए रतन टाटा ने खुद सेनापति को ही हटा दिया। ये सेनापति ऐसा था जिस पर न सिर्फ रतन टाटा को बल्कि पूरे टाटा ट्रस्ट को भरोसा था। वो रतन टाटा और दोराबजी टाटा ट्रस्ट जो दरअसल टाटा समूह का असल मालिक है। 66% से ज्यादा हिस्सेदारी के साथ। और इस भरोसे की कई बड़ी वजहें थीं। ये सही बात थी कि टाटा समूह किसी गैर टाटा को पूरे समूह का चेयरमैन बनाने का इतना बड़ा भरोसा कैसे कर सकता था। लेकिन, टाटा और मिस्त्री परिवार के नजदीकी रिश्ते, इसकी बड़ी वजह थे ही। साथ ही रतन टाटा का साइरस मिस्त्री पर भरोसा टाटा समूह में हर कोई जानता था। इसीलिए जब रतन टाटा ने 2011 में इस बात का एलान किया कि साइरस मिस्त्री अगले साल से टाटा समूह के चेयरमैन होंगे, तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। फिर सिर्फ 4 साल में ऐसा क्या हो गया कि टाटा समूह के चेयरमैन से खुद इस्तीफा देकर साइरस को कमान सौंपने वाले रतन टाटा ड्राइविंग सीट पर आ गए। ऐसा नहीं है कि 24 अक्टूबर को अचानक टाटा संस के बोर्ड ने साइरस मिस्त्री को हटाने का फैसला कर लिया। दरअसल साइरस मिस्त्री की कार्यप्रणाली से रतन टाटा और टाटा संस की नाराजगी लगातार बढ़ रही थी। कुछ समय पहले ही टाटा संस के बोर्ड में टीवीएस चेयरमैन वेणु श्रीनिवासन और बेन कैपिटल के मैनेजिंग डायरेक्टर अमित चंद्रा के आने को इस फैसले तक पहुंचने की प्रक्रिया के तौर पर ही देखा जा रहा है। इन दोनों लोगों के बोर्ड में शामिल होने की जानकारी तक मिस्त्री को नहीं थी। इसीलिए जब साइरस मिस्त्री को हटाने का फैसला टाटा संस के बोर्ड ने लिया, तो इसकी खबर टाटा समूह के बड़े अधिकारियों को भी टीवी चैनलों के जरिये ही मिली। टाटा संस के 9 में से 6 डायरेक्टरों ने मिस्त्री को हटाने के पक्ष में वोट किया। जबकि, दो डायरेक्टर बैठक से बाहर रहे। खुद मिस्त्री इस बैठक में नहीं थे।

साइरस मिस्त्री को हटाए जाने के पीछे की वजहों की ढेर सारी कहानियां बांबे हाउस के इर्द गिर्द घूम रही हैं। लेकिन, सबसे बड़ी वजह यही कि साइरस मिस्त्री लंबे समय टाटा समूह में काम करने के बाद भी शायद टाटा समूह को आत्मसात नहीं कर सके थे। और इसीलिए टाटा समूह को साइरस टाटा समूह के बजाए दूसरे समूहों के मुकाबले चलाने की कोशिश करने लगे। टाटा समूह का कारोबारी मॉडल बदल देने की यही कोशिश साइरस मिस्त्री पर भारी पड़ गई और टाटा ट्रस्ट ने बहुमत के फैसले से मिस्त्री को ही बदल दिया। संदेश साफ है कि फिलहाल टाटा समूह अपने उसूलों को बदलने वाला नहीं। टाटा समूह के पारंपरिक संस्कार और साइरस मिस्त्री के संस्कारों को फर्क समझने के लिए दो बड़े समझौते देखने की जरूरत है। रतन टाटा ने रतन टाटा ने चेयरमैन रहते कोरस का अधिग्रहण किया था और चेयरमैन साइरस मिस्त्री ने डोकोमो के साथ हाथ मिलाया था। दरअसल यही दोनों कारोबारी समझौते टाटा समूह के संस्कार के साथ साइरस मिस्त्री के टा-टा कर दिए जाने की कहानी बयां कर देते हैं। कॉर्पोरेट गलियारे में ये कहानी आम हो चुकी है कि टाटा ने उस समय कोरस को खरीदने के लिए क्रेडिट सुइस के साथ समझौता किया था। क्रेडिट सुइस ने टाटा को एक फाइनेंशियल पैकेज का प्रस्ताव दिया था। टाटा ने उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और इसी बीच दो और अंतर्राष्ट्रीय बैंकों ने टाटा स्टील को 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर बचाने वाले फाइनेंशियल पैकेज का प्रस्ताव दे दिया। टाटा स्टील को ये प्रस्ताव बेहतर लगा और उन्होंने क्रेडिट सुइस के बजाए नए प्रस्ताव स्वीकार कर लिए। इस पर क्रेडिट सुइस ने टाटा स्टील को चिट्ठी लिखकर 120 मिलियन डॉलर देने को कहा। इसके साथ वो समझौता भी था, जिसमें साफ लिखा था कि टाटा स्टील फाइनेंस ले या न ले, उसे ये रकम देनी होगी। टाटा स्टील के अधिकारी क्रेडिट सुइस को इतनी बड़ी रकम बेवजह देने को तैयार नहीं थे। लेकिन, जब ये मामला टाटा समूह के चेयरमैन रतन टाटा के पास पहुंचा, तो उन्होंने कहाकि अगर हमने एक बार किसी को कोई वादा किया, तो उसे पूरा करेंगे। टाटा स्टील ने क्रेडिट सुइस को 120 मिलियन डॉलर दिया और दूसरे बैंक से सस्ते कर्ज का समझौता किया। ये टाटा समूह का संस्कार था। जिसे आगे बढ़ाने में नए चेयरमैन साइरस मिस्त्री नाकाम रहे। मूलत: विशुद्ध ठेकेदारी कारोबारी घराने से आए साइरस मिस्त्री हर लगाई रकम पर मुनाफा कमाने की रणनीति बनाने लगे। और इसी रणनीति की वजह से टाटा का जापानी कंपनी के साथ समझौता टूट गया। डोकोमो के साथ समझौता भर नहीं टूटा, टाटा समूह के स्थापित संस्कारों पर भी चोट पहुंची। जापानी कंपनी ने लड़ाई जीती और टाटा समूह पर जानबूझकर शर्तों को तोड़ने का आरोप लगाया। ये टाटा समूह से साइरस मिस्त्री के जाने की सबसे पक्की बुनियाद थी।

डोकोमो के साथ हुए समझौते के गलत तरीके से टूटने और इसकी वजह से टाटा समूह की छवि को ठेस पहुंचना सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है। साइरस मिस्त्री के चेयरमैन रहते समूह कानूनी झगड़ों में उलझती जा रही थी। डोकोमो से कानूनी लड़ाई हारे। साथ ही समूह की चमकदार कंपनियों में से एक टीसीएस भी अमेरिका में एक बड़े कानूनी झगड़े में फंस गई। सिर्फ 4 साल के ही साइरस के कार्यकाल में टाटा समूह ढेर सारे बड़े कानूनी झगड़ों मं फंस गया। लेकिन, साइरस मिस्त्री के जाने की और भी दूसरी वजहें इसके साथ थीं। साइरस मिस्त्री ने टाटा समूह की उन कंपनियों को भी बेचना शुरू कर दिया था, जो रतन टाटा ने खुद कंपनी की साख बढ़ाने के लिए खरीदी थीं। लंदन में स्टील कारोबार को बेचने का साइरस मिस्त्री का फैसला टाटा संस के निदेशकों के गले नहीं उतरा। 2007 में कोरस खरीदकर रतन टाटा ने टाटा समूह के साथ भारत की इज्जत दुनिया में बढ़ाई थी। कोरस और जैगुआर-लैंड रोवर की खरीद ने टाटा समूह का नाम दुनिया में ऊंचा किया था। इसलिए यूनाइटेड किंगडम में स्टील कारोबार बेचने के फैसले को टाटा संस स्वीकार नहीं कर सका। मिस्त्री ने इसके अलावा समूह का परंपरागत खाद कारोबार भी बेच दिया।
साइरस मिस्त्री पूरी तरह से टाटा समूह को अपनी शैली में चलाना चाह रहे थे। ये बात भी सही है कि मिस्त्री ने टाटा समूह की कंपनियों के सीईओ को खुली छूट दी थी कि वो नए-नए तरीके खोजें और कंपनी को आगे बढ़ाएं। लेकिन, इस खुली छूट में जोर कंपनी का मुनाफा बढ़ाने को लेकर ज्यादा था। समूह के कंपनियों के सीईओ की हैसियत उसी आधार पर तय होने लगी थी। इस बात का साफ अंदाजा टाटा संस के निदेशक वी आर मेहता की बातों से लग जाता है। मेहता ने टीवी चैनल से बातचीत में कहाकि साइरस मिस्त्री के काम करने का तरीका सही नहीं थी। और कई बार बोर्ड ने मिस्त्री को चेताया भी। लेकिन, मिस्त्री समझने को तैयार नहीं थे। मेहता ने कहाकि, टाटा समूह की कंपनियों के कारोबार पर इसका असर पड़ रहा था। टाटा संसस का पूरा मुनाफा सिर्फ टीसीएस और जेएलआर पर ही निर्भर होता जा रहा है। दरअसल टाटा संस बोर्ड, समूह की दूसरी कंपनियों के साथ समन्वय की जिम्मा जिस ग्रुप एक्जिक्यूटिव काउंसिल पर था। उस काउंसिल के सदस्यों का बोर्ड और सीईओ के साथ बेहतर सम्बन्ध नहीं बन रहा था। टाटा समूह के फैसलों में अपनी पूरी छाप छोड़ने की गरज से साइरस मिस्त्री ने ग्रुप एक्जिक्यूटिव काउंसिल का गठन किया, जिसमें पूरी तरह से मिस्त्री के ही लोग थे। जीईसी सदस्यों- मधु कन्नन, निर्मल्य कुमार और एन एस राजन- की नियुक्ति को लेकर भी टाटा संस बोर्ड असहज था। माना जाता है कि जीईसी सदस्यों ने साइरस को इस बात के लिए तैयार किया कि ये सही समय है कि जब मिस्त्री अपने तरीकों से टाटा समूह को आगे बढ़ाने का फैसला ले सकते हैं। इन लोगों की ही सलाह पर मिस्त्री ने राजनीतिक गलियारों में अपनी आमदरफ्त बढ़ा दी। मिस्त्री ने अपनी कार्यशैली के बारे में खुलकर ताजा साक्षात्कार में बताया है। समूह का चेयरमैन बनने के बाद मिस्त्री का ये पहला साक्षात्कार है, जो समूह की पत्रिका में छपा है। इसमें मिस्त्री ने साफ कहा है कि वो कंपनी के पोर्टफोलियों में कटाई-छंटाई में जरा भी नहीं हिचकेंगे। साथ ही मिस्त्री ने कहा कि हर कंपनी को बढ़ने का अधिकार खुद हासिल करना होगा। टाटा रिव्यू पत्रिका में सितंबर महीने में छपे इस साक्षात्कार के बाद ही मिस्त्री का जाना तय हो गया था। ये जल्दी में लिया गया फैसला कतई नहीं है। टाटा समूह की साख और संस्कारों के साथ खिलवाड़ की कीमत मिस्त्री को चुकानी पड़ी है। अगर सिर्फ कंपनी की बढ़ती ताकत के लिहाज से देखें, तो साइरस मिस्त्री की अगुवाई में टाटा समूह ठीकठाक आगे बढ़ रहा था। चेयरमैन बनते समय साइरस मिस्त्री को 5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की कंपनी मिली थी। जिसे साइरस ने साढ़े 8 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की कंपनी बना दिया है। इस वैश्विक मंदी के दौर में किसी कंपनी का ये प्रदर्शन अच्छा ही कहा जाएगा। लेकिन, साइरस भूल गए कि टाटा साख के लिए जाना जाता है, संपत्ति के लिए नहीं।

कौन होगा टाटा समूह का नया चेयरमैन
टाटा समूह के नए चेयरमैन का चुनाव 4 महीने के भीतर होना है। इसके लिए बाकायदा एक पैनल बनाया गया है। अंतरिम चेयरमैन रतन टाटा खुद भी इस पैनल के सदस्य हैं। रतन टाटा के अलावा इस पैनल में रोनेन सेन, वेणु श्रीनिवासन और अमित चंद्रा शामिल हैं। ये सभी टाटा संस के बोर्ड में हैं। रतन टाटा ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी भेजकर भी इस बदलाव की जानकारी दी है। और कर्मचारियों को भेजी चिट्ठी में कहा है कि उन्होंने समूह में स्थिरता बनाने के लिए अंतरिम चेयरमैन बनना स्वीकार किया है। अब टाटा समूह का नया चेयरमैन कौन होगा, इसका अनुमान हर कोई लगाने की कोशिश कर रहा है। गोयनका समूह के हर्ष गोयनका ने अपने ट्विटर खाते पर कुछ नामों में से ही नया चेयरमैन होने का अनुमान लगाया है। वो नाम हैं- एन चंद्रशेखरन, रवि वेंकटेशन, संजय कुमार झा, शांतनु नारायण और नंदन नीलेकणि। टीसीएस के सीईओ नटराजन चंद्रशेखरन मेरी नजर में सबसे प्रबल दावेदार हैं। टीसीएस टाटा समूह की सबसे महत्वपूर्ण कंपनियों में से एक हैं। रवि वेंकटेशन बैंक ऑफ बड़ौदा के नॉन एक्जिक्यूटिव चेयरमैन हैं। संजय कुमार झा ग्लोबल फाउंड्रीज के सीईओ हैं। शांतनु नारायण अभी एडोबी सिस्टम के सीईओ हैं और नंदन नीलेकणि इंफोसिस के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं। लेकिन, जिस तरह से टाटा संस के बोर्ड में टीसीएस के सीईओ नटराजन चंद्रशेखरन और जेएलआर के सीईओ राल्फ स्पेथ को शामिल किया गया है, वो पक्का संकेत देता है। और इसीलिए टीसीएस के सीईओ नटराजन चंद्रशेखरन के टाटा समूह का नया चेयरमैन होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

टाटा सन्स में किसका कितना मालिकाना हक
टाटा ट्रस्ट- 66%
शापूरजी पालूनजी मिस्त्री समूह- 18.5%
टाटा समूह की कंपनियां, टाटा समूह के बड़े अधिकारी - 15.5%

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