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क्या साहस दिखाएंगे सचिन पायलट

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सचिन पायलट ने कहा है कि वह भारतीय जनता पार्टी में शामिल नहीं होने जा रहे हैं, लेकिन सचिन पायलट करेंगे क्या? आज होने वाली उनकी प्रेस कांफ्रेंस फिर से टल गई है। इसका मतलब सचिन पायलट कुछ तय नहीं कर पा रहे हैं। सच बात यही है कि भारतीय जनता पार्टी में उनका जाना बहुत समझदारी भरा फैसला नहीं होगा और शायद इसी वजह से सचिन पायलट इस बात से इनकार भी कर रहे हैं। अब सचिन पायलट को साहस दिखाना चाहिए और राजस्थान में कांग्रेस का विकल्प बनने के साथ देश में कांग्रेस का विकल्प बनने की इच्छा रखने वालों को जुटाने पर काम करना चाहिए।  मेरी पूरी टिप्पणी मेरे यूट्यूब पर 

मरा विकास दुबे और सड़ांध सामने आ गई, राजनीति और समाज की

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बिकरू गांव का विकास दुबे आज के सन्दर्भों में राक्षस था और उसका अंत तो ऐसे ही होना था। किसी दूसरे अपराधी की गोली से या फिर पुलिस की गोली से, लेकिन जिस तरह से उत्तर प्रदेश पुलिस उसे पकड़ने में नाकाम रहने के बाद उज्जैन से लेकर आ रही थी और रास्ते में एनकाउंटर कर दिया, उससे सवाल उठना स्वाभाविक है। अब उन सवालों पर बहुत बात हो चुकी है, इसलिए उन सवालों से आगे बढ़कर मूल सवालों की तरफ बढ़ते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जातीय दंभ और उसके आधार पर अपराधिक राजनीति को कौन बढ़ावा देता है। इस बड़े सवाल का जवाब कुकर्मी विकास दुबे के खात्मे के साथ ही सामने आ गया है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और योगी आदित्यनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, इसलिए यही सवाल उठाया जा रहा है कि किसे बचाने के लिए विकास दुबे का एनकाउंटर पुलिस ने कर दिया। इसका जवाब जानने के लिए पहले इस घटनाक्रम को ध्यान में रखिए। इसे भले ही अब कोई मानेगा नहीं, लेकिन सच तो यही है कि 2-3 जुलाई की रात उत्तर प्रदेश पुलिस विकास दुबे का एनकाउंटर करने ही गई थी। विकास दुबे और उसके साथियों की पूछताछ में सामने आई …

नागरिक आंदोलन या राष्ट्रविरोधी साजिश

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संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार समिति दिल्ली दंगों की साजिश के आरोपियों को छोड़ने का दबाव बना रही है। यूएनएचआरसी की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि दिल्ली पुलिस ने छात्रों और नागरिक समाज के लोगों को नागरिकता कानून का विरोध करने की वजह से गिरफ्तार किया है और यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। कमाल की बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति के बयान में दिल्ली में हुए दंगों का कोई जिक्र नहीं है। दिल्ली में हुए दंगों में 59 लोगों की जानें चली गईं और जाने कितने लोगों के जानमाल का नुकसान हुआ। और, अब दिल्ली पुलिस एक-एक करके दिल्ली दंगों की साजिश करने वालों को गिरफ्तार कर रही है और उनके खिलाफ अभियोग पत्र दाखिल कर रही है। दिल्ली पुलिस ने देवांगना कलीता और नताशा नरवाल को नागरिकता कानून विरोधी आन्दोलन में शामिल होने की वजह से नहीं गिरफ्तार किया है। दिल्ली पुलिस के अभियोग पत्र से स्पष्ट है कि दिल्ली दंगे स्वत:स्फूर्त घटना नहीं थे बल्कि नागरिकता कानून विरोधी आन्दोलन की बुनियाद पर योजनाबद्ध तरीके से इसकी साजिश की गई थी और इसकी साजिश के तार छात्र संगठन के नाम पर काम करने वाले पिंजरा तोड़ ज…

दलित राजनीति का एक और चक्र पूरा हो चुका है

बसपा प्रमुख मायावती ने आजमगढ़ में दलितों की बेटियों से उत्पीड़न के मामले में किंतु परंतु के साथ ही सही, लेकिन उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की प्रशंसा की है। उन्होंने कहाकि दलित बहन बेटियों के साथ हुए उत्पीड़न का मामला हो या अन्य किसी भी जाति व धर्म की बहन बेटी के साथ हुए उत्पीड़न का मामला हो, उसकी जितनी निंदी की जाए, कम है। मायावती का यह बयान सामान्य दिखता है, लेकिन मायावती बदलती दलित राजनीति की उस नब्ज को पकड़ने की कोशिश कर रही हैं जो उनके पारंपरिक दलित-मुस्लिम गठजोड़ से थोड़ा हटकर है। कमाल की बात यह है कि भारतीय राजनीति में दलितों की ठेकेदारी का दावा करने वाले दूसरे राजनीतिक दल, समूह या दलित बुद्धिजीवी के नाम पर प्रतिष्ठा पाने वाले भी इसे समझने को तैयार नहीं हैं। अभी भी दलित राजनीति को मुसलमान के साथ और हिन्दू विरोध में करने की कोशिश उन्हें स्पष्ट तौर पर भारी पड़ रही है और इस राजनीति के चक्कर में उन्हें गुजरात में कई बरस पहले दलित पर हुआ अत्याचार याद रहता है, लेकिन उत्तर प्रदेश के जौनपुर और आजमगढ़ में दलितों का घर फूंकने और दलित बेटियों के साथ उत्पीड़न पर जुबान बंद हो जाती ह…

पिंजरा या भारत तोड़ने की कोशिश ?

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मुख्य परिसर से सटा हुआ या यूं कह लें कि मुख्य परिसर में ही महिला छात्रावास है। और, विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली छात्राएं, महिला छात्रावास से निकलकर सीधे परिसर में आ जातीं थीं, लेकिन यह रास्ता पूरी तरह से उन्हीं छात्राओं के लिए था जो महिला छात्रावास में रहती थीं। महिला छात्रावास में छात्रों या किसी को भी जाने के लिए मुख्य द्वार से ही जाना होता था और इसके लिए बाकायदा सुरक्षा में लगे जवानों के पास नाम वगैरह दर्ज कराकर ही जाया जा सकता था। 90 के दशक तक 3 महिला छात्रावास हुआ करते थे और उन तीनों के पहले छात्रावास अधीक्षिका का कक्ष, छात्रावास कार्यालय होता था, वहीं तक जाकर छात्राओं से मुलाकात होती थी। वर्ष में एक बार विश्वविद्यालय के छात्रों को महिला छात्रावास के अंदर जाने का अवसर मिलता था और वह अवसर होता था छात्रसंघ चुनाव के दौरान इलाहाबाद विश्वविद्यालय की बेहद अनोखे मशाल जुलूस वाले दिन। हर प्रत्याशी अपने जुलूस के साथ महिला छात्रावास में जाता था, जहां छात्राएं, छात्रसंघ प्रत्याशियों के ऊपर फूल फेंकती थीं और जिस नेता के ऊपर ज्यादा गुलाब गिरे, उसकी जीत पक्की मान ली ज…

काश! सरकार तानाशाह हो जाए

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नागरिक समाज की हर समय महत्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन पिछले कुछ समय में नागरिक समाज की ओछी हरकतों से लोकतंत्र में उनकी भूमिका कमतर होती जा रही है और यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान एक नारा सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ करता था। संघर्षों के साये में इतिहास हमारा पलता है, जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर जमाना चलता है। विश्वविद्यालय प्रशासन हो या फिर सरकार, छात्र हमेशा इसी नारे से ओतप्रोत होकर संघर्षों के लिए हमेशा तैयार रहते थे, लेकिन उस ओतप्रोत भावना के दौरान भी छात्र और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच अघोषित सहमति जरूर होती थी कि किसी भी हाल में उसमें अराजकता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। हालांकि, यह अघोषित सिद्धान्त बारंबार टूटता रहा और देश के ज्यादातर विश्वविद्यालयों में छात्र आन्दोलन सिर्फ अराजकता का पर्याय बनकर रह गये। अराजकता इस कदर बढ़ गयी कि कई विश्वविद्यालयों में प्रशासन को छात्रसंघ खत्म करने का मजबूत आधार मिल गया।कई बार तो विश्वविद्यालय के छात्रनेता सिर्फ इसलिए प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी या आन्दोलन करते थे कि छात्रों में माहौल बना रहे। छात्र संगठनों की ह…

हिन्दुओं का विरोध करके बुद्धिजीवी बनने की बीमारी

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हिन्दू महिलाएं वट सावित्री की पूजा करती हैं। इस पूजा का मूल उद्देश्य अपने पति की दीर्घायु की कामना होता है और इसमें पूजा भी उसी सावित्री की होती है, जिसने अपने पतिव्रत धर्म के पालन से उच्च आदर्शों वाले पति सत्यवान को यमराज से भी वापस ले लिया था। सावित्री के साथ उस बरगद वृक्ष की भी पूजा इस व्रत में हिन्दू महिलाएं करती हैं, जिसके नीचे सावित्री की गोद में बैठकर सत्यवान के प्राण निकल गये थे, लेकिन पतिव्रता सावित्री ने यमराज को भी विवश कर दिया की पति सत्यवान को उन्हें फिर से जीवन देना पड़ा। संयोग से इस वर्ष का यह व्रत कोरोना वायरस के बीच में हुआ जब चौथे चरण की देशबंदी के बीच देश गुजर रहा है। सामान्य गतिविधियां बंद हैं, ज्यादातर मंदिरों पर ताले पड़े हुए हैं। गांवों में तो महिलाओं को मंदिरों पर ताले पड़े होने या फिर सामान्य गतिविधि चलने न चलने से खास फर्क नहीं पड़ा क्योंकि लगभग हर गांव के अगल-बगल 2-4 बरगद के विशाल वृक्ष होते ही हैं, जहां हिन्दू महिलाओं ने जाकर अपने पति की दीर्घ आयु के साथ बरगद की परिक्रमा करते हुए अपना व्रत किया, लेकिन शहरों में संकट खड़ा हो गया। जहां ज्यादातर मंदिरों के दरव…