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विकल्पहीनता में विकल्प खोजने की कोशिश हैं बिहार विधानसभा के चुनाव

  लोकतंत्र में जनता ही माई बाप होती है, यह जुमला अकसर सुनने को मिल जाता है, लेकिन कमाल की बात है कि लोकतंत्र में नेता हरसंभव कोशिश करके धीरे-धीरे जनता से उसका चुनने वाला अधिकार ही छीनने की कोशिश में लगे रहते हैं। भारत में बहुदलीय लोकतंत्र है और इसे अलग-अलग विचारों के स्वतंत्र तौर पर बढ़ते हुए लोकतंत्र को ज्यादा मजबूत करने के तौर पर देखा जाता है और काफी हद तक यह सही भी है, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि अगर अलग-अलग सोच रखने वाले अलग-अलग तरीके से राजनीतिक धारा को आगे बढ़ाने की बात करने वाले एक दूसरे के साथ आकर जनता के सामने सरकार का विकल्प देने की बात करने लगें तो क्या यह लोकतंत्र के मजबूत होने का प्रमाण है। इस जवाब आ सकता है कि राजनीतिक तौर पर इसमें बुराई क्या है। और, अलग-अलग विचार की पार्टियों के साथ आकर सत्ता के लिए विकल्प देने की इस प्रक्रिया को हमेशा साझा कार्यक्रम की सरकार के तौर पर पेश करने की कोशिश होती है। एक बड़ा राजनीतिक विद्वानों का समूह है, जिसे गठजोड़ की सरकारों में ज्यादा जीवंत लोकतंत्र नजर आता है। इसे ऐसे भी कहा जाता है कि जब लोकतंत्र में एक दल बहुमत के साथ सत्ता में होता

टीवी की टीआरपी नहीं, टीवी पत्रकारिता की साख के साथ छेड़खानी हुई है

  फर्जी तरीके से टीआरपी बढ़ाने के मामले में मुम्बई पुलिस ने कुल 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। फर्जी तरीके से टीआरपी बढ़ाने की जांच में 3 टीवी चैनलों के नाम सामने आए। मुम्बई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने रिपब्लिक टीवी पर सीधा हमला बोल दिया, हालांकि, रिपब्लिक के साथ फक्त मराठी और बॉक्स सिनेमा पर भी टीआरपी के फर्जीवाड़े का आरोप मुम्बई पुलिस ने लगाया था, लेकिन रिपब्लिक टीवी ने मुम्बई पुलिस की प्रेस कांफ्रेंस के कुछ घंटे बाद ही मुम्बई पुलिस की FIR में इंडिया टुडे का नाम होने और रिपब्लिक का नाम न होने का दावा करके फर्जी तरीके से टीआरपी हासिल करने की पूरी बहस का ही शीर्षासन करा दिया। स्पष्ट तौर पर यह बात दिख रही थी कि किस तरह से मुम्बई पुलिस रिपब्लिक टीवी के साथ निजी दुश्मनी जैसा व्यवहार करती दिख रही थी और यह व्यवहार इससे पहले तब दिखा था, जब सोनिया गांधी पर टिप्पणी करने के बाद मुम्बई पुलिस ने रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी से 12 घंटे से ज्यादा पूछताछ की थी। इसमें कतई संदेह नहीं है कि मुम्बई पुलिस रिपब्लिक के खिलाफ विद्वेष की भावना से काम कर रही है। अब मुम्बई उच्च न्यायालय में

इमरान खान की जगह बिलावल भुट्टो को सत्ता सौंपने की पाकिस्तानी फौज की तैयारी

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  सिंध पुलिस मुख्यालय में पुलिस को समर्थन देने पहुंचे बिलावल भुट्टो जरदारी पाकिस्तान में पिछले एक सप्ताह से जो कुछ हो रहा है, उससे पाकिस्तान में अवाम की बेचैनी बहुत स्पष्ट तौर पर नजर आ रही है। आतंकवाद और आर्थिक संकट से बुरी तरह से जूझ पाकिस्तान का सबसे बड़ा संकट यही है कि इस्लामिक मुल्क पाकिस्तान में कहने के लिए लोकतांत्रिक तौर पर चुनी हुई सरकार है, लेकिन सच यही है कि पाकिस्तानी फौज और वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई ही देश को नियंत्रित करती है। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने गुजरांवाला की रैली में वीडियो संदेश के जरिये पाकिस्तान की अवाम से बात करते हुए पाकिस्तानी फौज और खुफिया एजेंसी की हर कारगुजारी को खोलकर रख दिया। पाकिस्तान में आतंकवादियों पर कार्रवाई नहीं हो पा रही है तो इसकी बड़ी वजह यही है कि लोकतांत्रिक तौर पर चुने गए प्रधानमंत्री के पास कोई अधिकार ही नहीं है और इमरान खान अब तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री साबित हुए हैं। हालंकि, इमरान खान की कमजोरी इस तरह से सामने आने की बड़ी वजह यह भी है कि पाकिस्तानी फौज के दबाव के अलावा पाकिस्तान के बुरे आर्थिक हालात में चीन का दबाव

चीन के साथ भारत की विदेश नीति बदलने का यही सही वक्त है

  चीन के साथ भारत की समारिक नीति किस तरह से बदली है और प्रभावी है, इसका अहसास भारतीयों के साथ पूरे विश्व को हो रहा है, लेकिन सातवें दौर की कोर कमांडर स्तर की वार्ता के बीच चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के बयान ने एक बार फिर से इस पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है कि कब तक भारत का विदेश मंत्रालय चीन के मामले में कड़ा रुख अपनाने से बचता रहेगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि चीन के सामने भारत का इतना कड़ा रुख कभी देखने को नहीं मिला, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि हमारे 20 सैनिक भारत की सीमाओं की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए हैं। हमारे सैनिकों ने इस बार धोखेबाज चीन की हरकत का इंतजार किए बिना कम से कम 6 रणनीतिक चोटियों पर अपनी स्थिति मजबूत कर ली, जिससे सर्दियों में बर्फ बढ़ने पर भी चीन की सेना की अवैध घुसपैठ-कब्जे की कोशिश को नाकाम किया जा सके। पहली बार हुआ है कि रक्षा मंत्री सीधे तौर पर कह रहे हैं कि चीन और पाकिस्तान सैन्य रणनीति के तहत एक साथ भारत के खिलाफ मोर्चा खोल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से लेकर तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने भी चीन से युद्ध की स

सामाजिक मुद्दों को संभाल क्यों नहीं पाती भाजपा

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  हाथरस विधानसभा सीट पर पिछले चार विधानसभा चुनावों से बहुजन समाज पार्टी का कब्जा था। 13वीं, 14वीं और 15वीं विधानसभा में एक समय में मायावती के बेहद खास रहे ब्राह्मण नेता रामवीर उपाध्याय चुनकर पहुंचे थे और 2012 में सीट सुरक्षित होने के बाद 16वीं विधानसभा में भी बसपा प्रत्याशी के तौर पर गेंदा लाल चौधरी को ही हाथरस की जनता ने चुना था, लेकिन 17वीं विधानसभा के लिए वर्ष 2017 में हुए चुनाव में स्थिति बदल गई और यह स्थिति सिर्फ हाथरस नहीं पूरे प्रदेश की बदली थी, जब उत्तर प्रदेश में जातीय आधार पर लड़ने वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को जनता ने बुरी तरह नकार दिया था। अभी भी यह दोनों पार्टियां यादवों और और दलितों के मतों की ठेकेदारी की बात भले करें, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनावों में स्पष्ट हो गया कि अब जातीय मतों की उस ठेकेदारी से एक बड़ा हिस्सा बाहर निकल चुका है। हाथरस विधानसभा 2017 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के हरिशंकर महार ने बसपा के गेंदालाल चौधरी को हरा दिया। और, सिर्फ हाथरस विधानसभा ही नहीं, हाथरस लोकसभा की पांचों विधानसभा पर भारतीय जनता पार्टी के विधायक ही चुने गए हैं। हाथरस

उत्तर प्रदेश में बत्ती गुल होने के मायने समझना जरूरी है

  उत्तर प्रदेश में जिस दिन योगी आदित्यनाथ की सरकार ने न्यायालय में हाथरस मामले पर शपथपत्र पेश किया, उसी दिन राज्य के बड़े हिस्से में बत्ती गुल हो गई। इन दोनों घटनाओं का आपस में सीधा संबंध नहीं है, लेकिन राज्य सरकार की प्रशासनिक अक्षमता और योगी आदित्यनाथ के अलावा प्रदेश में भाजपा के मंत्रियों, चुने हुए जनप्रतिनिधियों का कोई महत्व न होने की बात दोनों में ही स्पष्ट नजर आती है। 5 अक्टूबर 2020 को विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के बीच समझौता हुआ कि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड या किसी भी विद्युत वितरण निगम लिमिटेड का निजीकरण या हस्तांतरण का प्रस्ताव वापस लिया जाता है। इस समझौते पर उत्तर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा की सहमति से विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के पदाधिकारी तैयार हुए और उन्होंने समझौते पर दस्तखत करके आन्दोलन वापस लेने का निर्णय कर लिया, लेकिन इसके बाद जो हुआ, उससे उत्तर प्रदेश में आए दिन होने वाली गड़बड़ियों की असली वजह सामने आ जाती है। ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा की सहमति के बावजू

गांधी के बाद जनजुड़ाव वाले सबसे बड़े नेता हैं नरेंद्र मोदी

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  मोहनदास करमचंद गांधी आधुनिक भारत में सबसे ज्यादा जनजुड़ाव वाले नेता के तौर पर जाने जाते हैं। उस समय कोई सर्वे या पोल नहीं होता था, लेकिन आज जैसे संचार माध्यमों के न होने के बावजूद अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर करने की ताकत गांधी जी को उसी जनजुड़ाव से मिली और इसीलिए गांधी जी हमेशा एक बात पर स्पष्ट रहते थे कि अपना समाज विभाजित रहेगा तो हम एकजुट होकर अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष नहीं कर सकते। छुआछूत के खिलाफ 1933 में गांधी जी ने स्वयं की शुद्धि के लिए 21 दिनों का उपवास किया था और हरिजन नामक एक साप्ताहिक पत्रिका भी निकाली थी। स्वच्छता पर गांधी जी का जोर इन्हीं सब वजहों से था। जनजुड़ाव की उस शैली को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आगे बढ़ाया है क्योंकि उन्हें पता था कि देश की समस्याओं का समाधान तक न पहुंच पाने की सबसे बड़ी वजह राजनेताओं पर जनता का भरोसा न होना है और, जनजुड़ाव की इस निरंतरता को प्रधानमंत्री बनने से पहले ही नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया था। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के तौर पर बीता उनका जीवन विशेष स्थान रखता है। राष्ट्रीय स्वयंसे