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काश! सरकार तानाशाह हो जाए

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नागरिक समाज की हर समय महत्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन पिछले कुछ समय में नागरिक समाज की ओछी हरकतों से लोकतंत्र में उनकी भूमिका कमतर होती जा रही है और यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान एक नारा सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ करता था। संघर्षों के साये में इतिहास हमारा पलता है, जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर जमाना चलता है। विश्वविद्यालय प्रशासन हो या फिर सरकार, छात्र हमेशा इसी नारे से ओतप्रोत होकर संघर्षों के लिए हमेशा तैयार रहते थे, लेकिन उस ओतप्रोत भावना के दौरान भी छात्र और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच अघोषित सहमति जरूर होती थी कि किसी भी हाल में उसमें अराजकता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। हालांकि, यह अघोषित सिद्धान्त बारंबार टूटता रहा और देश के ज्यादातर विश्वविद्यालयों में छात्र आन्दोलन सिर्फ अराजकता का पर्याय बनकर रह गये। अराजकता इस कदर बढ़ गयी कि कई विश्वविद्यालयों में प्रशासन को छात्रसंघ खत्म करने का मजबूत आधार मिल गया।कई बार तो विश्वविद्यालय के छात्रनेता सिर्फ इसलिए प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी या आन्दोलन करते थे कि छात्रों में माहौल बना रहे। छात्र संगठनों की ह…

हिन्दुओं का विरोध करके बुद्धिजीवी बनने की बीमारी

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हिन्दू महिलाएं वट सावित्री की पूजा करती हैं। इस पूजा का मूल उद्देश्य अपने पति की दीर्घायु की कामना होता है और इसमें पूजा भी उसी सावित्री की होती है, जिसने अपने पतिव्रत धर्म के पालन से उच्च आदर्शों वाले पति सत्यवान को यमराज से भी वापस ले लिया था। सावित्री के साथ उस बरगद वृक्ष की भी पूजा इस व्रत में हिन्दू महिलाएं करती हैं, जिसके नीचे सावित्री की गोद में बैठकर सत्यवान के प्राण निकल गये थे, लेकिन पतिव्रता सावित्री ने यमराज को भी विवश कर दिया की पति सत्यवान को उन्हें फिर से जीवन देना पड़ा। संयोग से इस वर्ष का यह व्रत कोरोना वायरस के बीच में हुआ जब चौथे चरण की देशबंदी के बीच देश गुजर रहा है। सामान्य गतिविधियां बंद हैं, ज्यादातर मंदिरों पर ताले पड़े हुए हैं। गांवों में तो महिलाओं को मंदिरों पर ताले पड़े होने या फिर सामान्य गतिविधि चलने न चलने से खास फर्क नहीं पड़ा क्योंकि लगभग हर गांव के अगल-बगल 2-4 बरगद के विशाल वृक्ष होते ही हैं, जहां हिन्दू महिलाओं ने जाकर अपने पति की दीर्घ आयु के साथ बरगद की परिक्रमा करते हुए अपना व्रत किया, लेकिन शहरों में संकट खड़ा हो गया। जहां ज्यादातर मंदिरों के दरव…

खोदा पहाड़, निकली चुहिया

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राहुल-रघुराम की बातचीत से निकला क्या ?दुनिया के प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने चाइनीज वायरस के संकट के दौर में शिकागो से दिल्ली में केरल के वायनाड से कांग्रेस सांसद राहुल गांधी से बातचीत की। बाकायदा कांग्रेस ने बड़ी तैयारी के साथ इस बातचीत को पहले से प्रचारित किया था। सबको इसकी प्रतीक्षा थी क्योंकि रघुराम राजन जैसे दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री इस तरह से सार्वजनिक तौर पर प्रचारित बातचीत में शामिल हो रहे थे तो सबको भरोसा था कि भारत और विश्व के लिए कुछ बेहतर आर्थिक सूत्र निकलकर आएंगे। केरल के वायनाड से कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने भी औपचारिक अभिवादन के बाद कुछ इसी अंदाज में बातचीत शुरू की थी कि उन्हें और उस चर्चा को देखने वालों को भारत अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों को समझने और उससे बाहर निकलने का मंत्र दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री रघुराम राजन देंगे। इतनी उम्मीद इसलिए नहीं थी कि राहुल गांधी, रघुराम राजन से बात कर रहे थे। उम्मीद की वजह थी उन रघुराम राजन की वजह से जो अभी शिकागो विश्वविद्यालय के शिकागो बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में केथरीन डुसाक मिलर विशिष्ट सेवा प्रोफेसर के तौर पर अर्थशास्त्र…

ऐतिहासिक अवसर है, चूकिए मत मोदी जी !

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चीन का डर, भारत का अवसर बनेगा ?चाइनीज वायरस को पूरी तरह से खत्म होने में वक्त लगेगा, लेकिन इस वायरस का प्रकोप खत्म होते पूरी विश्व संरचना बदल जाएगी। इसमें भारत की भूमिका भी बदल सकती है, बेहतर हो सकती है, लेकिन प्रश्न है कि क्या हमारी नीतियां और उन्हें लागू करने में तेजी भारत को पुन: विश्व गुरु का दर्जा दिला पाएंगी। 3 मई को जब देशबंदी का दूसरा चरण समाप्त होगा, उसके बाद भारत सरकार और राज्य सरकारें विश्व निवेशकों को क्या सकेंते देंगे, उसी से तय होगा कि भारत इस ऐतिहासिक अवसर का कितना लाभ उठा पाएगा। हालांकि, इस बात का अन्दाजा भारत सरकार को भी बहुत अच्छे से है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग मंत्री नितिन गडकरी कह रहे हैं कि वायरस के बाद चीन के प्रति दुनिया भर के अविश्वास का लाभ भारत को उठाना चाहिए। उन्होंने यह भी भरोसा जताया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में भारत सरकार इस अवसर का लाभ उठाने में कामयाब होगी। भारत सरकार में मंत्री होने के नाते नितिन गडकरी की यह सदिच्छा स्वाभाविक दिखती है और देश भी इसी तरह से देख रहा है कि चीन से कंपनियां जब बाहर नि…

चाइनीज वायरस के बाद के विश्व में भारत की भूमिका

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चाइनीज वायरस का प्रकोप खत्म होने के बाद विश्वनेता कौन सा देश होगा। यह प्रश्न अब तर्कों, तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर दुनिया में पूछा जाने लगा है। इसके उत्तर में ढेर सारे विकल्प सामने आते हैं, लेकिन एक विकल्प पर आश्चर्यजनक रूप से दुनिया सहमत होती जा रही है कि अमेरिका अब पहले जैसा दुनिया के किसी संकट में प्रभावी भूमिका में नहीं रहा है। डोनाल्ड ट्रम्प बड़बोले बयानों की वजह से चर्चा में रहते हैं, लेकिन जब किसी बड़े फैसले को अमेरिका के लिहाज से अपने पक्ष में करने की बात आती है तो हमेशा एक कदम पीछे जाते हुए दिखते हैं। उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन का मसला हो, ईरान के साथ युद्ध जैसी स्थिति में पहुंचने का या फिर हाल ही चीन के साथ कारोबारी युद्ध विराम का, हर मौके पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड, व्हाइट हाउस में विराजने वाले दुनिया के सर्वशक्तिमान व्यक्ति की तरह प्रभावी नहीं दिखे। इसमें कोढ़ में खाज चाइनीज वायरस से लड़ाई में दुनिया की अगुआई नही कर पाना हो गया है। चाइनीज वायरस के बारे में खुलकर बोलने भर से अमेरिकी राष्ट्रपति को दुनिया पहले की तरह नहीं देख रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने विश्व …

ऱाज सत्ता में धर्म का श्रेष्ठ उदाहरण योगी आदित्यनाथ ने प्रस्तुत किया

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किया है। योगी जी अपने पिता की अंत्येष्टि में शामिल नहीं हो रहे हैं, लेकिन इसकी वजह उनका योगी होना नहीं है। इसकी वजह है मुख्यमंत्री के तौर पर चाइनीज वायरस के समय लड़ाई को सेनापति के तौर पर लड़ना। योगी जी का यह शोक सन्देश उदाहरण के तौर पर पेश किया जाएगा। एक बार मैंने प्रशासनिक उलझनों में फंसे योगी आदित्यनाथ के लिए लिखा था कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ पर भारी पड़ रहे हैं योगी आदित्यनाथ। हाल में जिस तरह से देश के सबसे बड़े राज्य को उन्होंने चलाया है, उसने मेरे पुराने अन्देशे को खत्म कर दिया है। नागरिकता कानून विरोधी आन्दोलन का समय हो या फिर वैश्विक महामारी के समय, उत्तर प्रदेश ने देश में सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुत किया है और आज अपने पिता की अंत्येष्टि में न जाकर उन्होंने सेनापति की तरह आगे रहकर युद्ध में रहना प्रस्तुत किया है।


एकसाथ कोरोना और आर्थिक दुष्चक्र खत्म करने का मंत्र

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5 बजे, 5 मिनट की ताकत से दुरुस्त हो सकता है आर्थिक चक्र
22 मार्च 2020, रविवार को विश्व इतिहास में एक ऐसी तारीख के तौर पर याद किया जाएगा, जिस दिन दुनिया ने भारतीयों की सामूहिक शक्ति का नाद सुना। पूरा हिन्दुस्तान ताली, थाली और शंखनाद के लिए एक साथ शाम 5 बजे 5 मिनट के लिए इकट्ठा हो गया। सबसे अच्छी बात यह रही कि कुछ मानसिक विकृति के शिकार लोगों को छोड़कर मोदी विरोध करने वाले भी ताली, थाली और शंख बजाते अपने वीडियो सोशल मीडिया पर जारी कर रहे थे। यह देश के एक साथ खड़े हो जाने का 5 मिनट था जो 5 बजे से पहले शुरू हो गया था और 5 बजकर 5 मिनट से भी बहुत देर तक चलता रहा। यह वो स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा थी जिसमें साथ खड़े होकर भी हर कोई आगे रहने की कोशिश कर रहा था। यह सामान्य बात नहीं है। दरअसल, देश को इस तरह से एकजुट होने की जरूरत बहुत लम्बे समय से थी। 2010 में जब देश के शीर्ष 10 उद्योगपतियों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखकर सरकारी नीतियों में भरोसा न होने की बात लिखी थी, तभी से देश को एकजुट करने वाले एक मजबूत नेता की जरूरत थी। सोनियां गांधी ने सत्ता गांधी परिवार में इस तरह ब…