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Monday, September 26, 2016

यूपी का सबसे हिट चुनावी नारा- “पंडित जी पांवलागी”

भ्रष्टाचार के आरोपी गायत्री प्रजापति फिर से अखिलेश यादव मंत्रिमंडल में शामिल हो गए हैं। लेकिन, ये अब खबर नहीं है। इस पर तो जितना बोला-लिखा जाना था, हो चुका। खबर ये है कि गायत्री के साथ प्रतापगढ़ की रानीगंज विधानसभा से चुनकर आए शिवाकांत ओझा फिर से कैबिनेट मंत्री बनाए गए हैं। शिवाकांत ओझा इसी सरकार में मंत्री बने और हटाए गए थे। अब फिर से बना दिए गए हैं। शिवाकांत ओझा का अखिलेश मंत्रिमंडल में शामिल होना इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि अभी हफ्ते भर पहले ही बीजेपी के एक कार्यक्रम में ओझा का स्वागत किया गया था। प्रतापगढ़ जिले में बीजेपी के संभावित प्रत्याशियों में शिवाकांत ओझा का भी नाम चल रहा है। शिवाकांत भाजपाई रास्ते से ही राजनीतिक सफलता हासिल करने के बाद समाजवादी हुए थे। अगर आपको इसमें कोई बड़ी खबर नहीं नजर आ रही है। तो उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार के दूसरे कुछ नए मंत्रियों के नाम सुनिए। मनोज पांडेय को भी कैबिनेट में ले लिया गया है। अखिलेश यादव के बेहद करीबी अभिषेक मिश्रा कैबिनेट मंत्री बनाए गए हैं। ये अखिलेश की कैबिनेट के नए नाम नहीं हैं। ये दरअसल इस समय हर रोज बदलती उत्तर प्रदेश की राजनीतिक स्थिति में एक नया, काम वाला सूत्र है। इस पर अभी तक भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस ही लगे थे। अब इस सूत्र को आखिरी दौर में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने भी थाम लिया है। ये सूत्र उत्तर प्रदेश में इस समय सबसे हिट चुनावी नारा है। और ये नारा है पंडित जी पांवलागी। और अखिलेश यादव ने मंत्रिमंडल विस्तार में 3 ब्राह्मणों को जगह देकर इसी नारे को बुलंद करने की कोशिश की है।

मुलायम सिंह यादव के साथ भी लंबे समय तक जनेश्वर मिश्रा जैसा बड़ा ब्राह्मण नेता रहा है। और जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने, तो उनके साथ भी अभिषेक मिश्रा थे। लेकिन, इसके बावजूद समाजवादी पार्टी की छवि ब्राह्मणों को कम ही लुभाती रही। इसकी बड़ी वजह यादवों के वर्चस्व वाली पार्टी में ब्राह्मणों को कम मिलता सम्मान रहा। साथ ही ये भी एक वजह थी कि ब्राह्मण खुद को कांग्रेस से हटने के बाद पिछले 2 दशकों से भारतीय जनता पार्टी को अपनी स्वाभाविक पार्टी मानने लगा। अब जब 2007 में मायावती ने सतीश मिश्रा के जरिए समाजिक बदलाव का नया समीकरण स्थापित करके दिखा दिया, तो ये तय हो गया कि उत्तर प्रदेश में अब कोई भी जाति किसी पार्टी की बपौती नहीं रही। इस चुनाव में तो ये बात कुछ ज्यादा ही मजबूती से साबित हो रही है। करीब 14% ब्राह्मण उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने-गिराने में अहम भूमिका रखता है। और अब जब ब्राह्मण वोट बीजेपी के खूंटे से बंधने के बजाए हवा में उड़ने लगा, तो हर कोई इस उड़ते वोट को लपक लेना चाहता है। यहां तक कि कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में अपने राजनीतिक पुनर्जन्म में ब्राह्मण मत ही संजीवनी बूटी की तरह दिख रहा है। दिल्ली में राजनीतिक तौर पर निष्क्रिय होने के बाद शीला दीक्षित को ब्राह्मण चेहरे के तौर पर मैदान में उतार दिया है। यहां तक कि इलाहाबाद में राहुल गांधी की यात्रा के दौरान कई पोस्टर-बैनरों में पंडित राहुल गांधी लिखा हुआ था। शीला दीक्षित लगभग हर सभा में कहती हैं कि वो अब यूपी की हैं और ब्राह्मण हैं। कांग्रेस के लिए एक अच्छी बात ये है कि लगभग हर जिले में बचे हुए बड़े कांग्रेसी नेता ब्राह्मण ही हैं। जिलों के अस्तित्वहीन हो चुके ब्राह्मण कांग्रेसी नेता फिर से चमकने लगे हैं।

मायावती ने ब्राह्मणों के बीजेपी की तरफ रुझान दिखने के चलते मुसलमानों को ज्यादा तरजीह दी। लेकिन, अब जिस तरह से उत्तर प्रदेश में राजनीतिक समीकरण हर घंटे के साथ बदल रहे हैं, उसमें ब्राह्मणों को छोड़ देने जैसा संदेश जाने का खतरा बहन जी को भी सताने लगा हैं। इसीलिए विश्वस्त ब्राह्मण नेता सतीश चंद्र मिश्रा फिर से मैदान में हैं। अब सतीश मिश्रा और रामवीर उपाध्याय फिर से पूरे प्रदेश में ब्राह्मणों का सम्मान जगाने में जुट गए हैं। पूरब का जिम्मा सतीश मिश्रा के पास और पश्चिम का जिम्मा रामवीर उपाध्याय के पास। 30 से ज्यादा ब्राह्मण सभाएं सतीश मिश्रा करने जा रहे हैं। सतीश मिश्रा ने गोरखपुर जिले की खजनी विधानसभा से इसकी शुरूआत की है। सतीश मिश्रा कह रहे हैं कि ब्राह्मण और दलित मिलकर इस बार बीएसपी की सरकार बनाने जा रहे हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि ब्राह्मणों को ज्यादा उन विधानसभा में पकड़ने की कोशिश बीएसपी कर रही है, जो अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटें हैं। दरअसल इन सीटों पर सभी प्रत्याशी अनुसूचित जाति के होने से और ब्राह्मणों का एकमुश्त मत मिल जाने से बीजेपी ऐसी सीटों पर बेहतर प्रदर्शन करती रही है। अब बीएसपी इसी चक्र को तोड़ने के लिए ब्राह्मणों को लुभाने में लगी है। बीजेपी का हाल ये है कि ब्राह्मण-बनिया की पार्टी का ठप्पा लगा होने के बावजूद उसे भी ब्राह्मण वोटों के छिटकने का डर सता रहा है। मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्रा से लेकर निवर्तमान अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी तक बड़े ब्राह्मण नेता उसके पास हैं। लेकिन, फिर भी तीन चुनाव हारने वाले बीएसपी में सतीश मिश्रा के डिप्टी रहे ब्रजेश पाठक तक को राष्ट्रीय परिषद में शामिल कर लिया है। कुल मिलाकर इस चुनाव में 2 राष्ट्रीय और 2 क्षेत्रीय पार्टियों के बीच 14% ब्राह्मण वोटों के लिए जबरदस्त मारकाट होती दिख रही है। 
(ये लेख QUINTHINDI पर छपा है।)

Wednesday, September 21, 2016

89 का गणित जो सुलझा पाएगा, वही यूपी में सरकार बनाएगा

उत्तर प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी। ये सवाल किसी से भी पूछने पर वो यही कहेगा कि जिस रफ्तार में उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने का खेल बन-बिगड़ रहा है, उसमें अभी से ये बता पाना असंभव है कि किसकी सरकार बनने वाली है। ये काफी हद तक ठीक भी लगता है क्योंकि, 2007 विधानसभा में मायावती को पूर्ण बहुमत, 2012 में अखिलेश यादव को उससे भी ज्यादा सीटें और 2014 के लोकसभा चुनाव में उसी उत्तर प्रदेश ने बीजेपी के लिए राजनीतिक चमत्कार वाला जनादेश दिया। इसलिए सही बात यही है कि यूपी की जनता के मन की बात समझना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर है। लेकिन, इसी मुश्किल को समझने में 89 का एक आंकड़ा मिला जो, साफ-साफ बता देता है कि किसकी सरकार उत्तर प्रदेश में बनने जा रही है। 2007 में ये आंकड़ा 149 का था। लेकिन, 7 चरणों में हुए 2012 के विधानसभा चुनाव में रिकॉर्ड 60% मतदान ने 149 के आंकड़े को 89 का कर दिया।

अब इस 89 के गणित को समझते हैं। दरअसल ये वो 89 सीटें हैं जहां हार-जीत का अंतर 5000 से भी कम रहा है। अगर मत प्रतिशत के लिहाज से समझें, तो ये 3-4% के बीच कहीं बैठता है। 2012 में बुआ जी से भतीजे के हाथ में आई सत्ता में इसी 4% मत का पूरा मसला है। समाजवादी पार्टी को करीब 4% ज्यादा मत मिले और बहुजन समाज पार्टी के 4.5% कम। 2007 में 149 विधानसभा सीटें ऐसी थीं जहां हार-जीत का अंतर 5000 मतों से भी कम था। इन 149 सीटों में बीएसपी 64, एसपी 68, बीजेपी 20, कांग्रेस 6 और राष्ट्रीय लोकदल 3 सीटों पर जीती थी। यानी इन सीटों पर जीतने वाली पार्टी को दूसरे स्थान पर रहने वाली पार्टी से करीब 3-4% मत ही ज्यादा मिले थे। और यही 149 सीटें दरअसल मायावती से अखिलेश की सफलता का असली सूत्र हैं। समाजवादी पार्टी को 2012 में करीब 4% ही ज्यादा मत मिले और बीएसपी को करीब 4.5% मतों का नुकसान हुआ। इसी का असर ये रहा कि बीएसपी के हाथ से वो सारी 64 सीटें निकल गईं, जहां अंतर 5000 मतों से भी कम का था। 2007 में बीजेपी को 51 सीटें मिलीं थीं और जब 2012 में 2% मत घटा, तो सीधे-सीधे 4 सीटें कम हो गईं। हां, कांग्रेस को जरूर 2007 के मुकाबले 3% मत और इसी वजह से 6 सीटों का फायदा हो गया था।

इसीलिए इतना तो तय है कि अब 2017 के विधानसभा चुनाव में भी वो 89 सीटें बड़ी महत्वपूर्ण होंगी, जहां हार-जीत का अंतर 3-4% ही रहा है। हालांकि, 2007 के मुकाबले 2012 में ऐसी विधानसभा सीटें घटी हैं। इसकी बड़ी वजह ये रही कि 2012 में उत्तर प्रदेश में रिकॉर्ड मतदान हुआ था। सीधे-सीधे 2007 से 14% ज्यादा मतदाताओं ने अपनी सरकार चुनी। 2012 में 60% लोगों ने मत दिए थे। इसलिए 2007 के मुकाबले 2012 में 5000 मतों से कम हार-जीत के अंतर वाली सीटें बहुत घट गईं। 5000 कम मतों से विधायक बनाने वाली सीटें सीधें 149 से घटकर 89 रह गईं।

भले ही 2012 में 5000 से कम अंतर से हार-जीत वाली 89 सीटें ही हों। लेकिन, इनका महत्व 2007 की 149 सीटों से ज्यादा का है। इसकी सबसे बड़ी वजह तो यही है कि 2012 में पूरी तरह से यूपी के मतदाता के सामने सरकार के लिए एसपी और बीएसपी के बीच ही चुनाव करने का मन बन पाया था। लेकिन, अब 2017 में लंबे समय बाद दोनों राष्ट्रीय पार्टियां भी उत्तर प्रदेश के चुनाव में बेहतर करती दिख रही है। लोकसभा चुनाव में चमत्कारी प्रदर्शन से बीजेपी तो पहले से ही सरकार बनाने का दावा ठोंक रही हैं। नई रणनीति के सहारे राहुल गांधी भी कांग्रेस का दावा बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं। साथ ही समाजवादी पार्टी के भीतर अखिलेश-शिवपाल का खुला झगड़ा भी अब खेल को ज्यादा रोचक बना रहा है। इसलिए 2012 में 5000 मतों से कम हार-जीत वाली सीटों का महत्व बहुत ज्यादा है। अब सबसे बड़ा सवाल तो यही होगा कि क्या पिछले चुनाव के रिकॉर्ड से ज्यादा मतदान इस साल होगा। अब अगर 60% से ज्यादा लोग उत्तर प्रदेश के चुनाव में मत डालते हैं, तो जाहिर है कि इन 89 सीटों पर सबसे पहले उलटफेर की गुंजाइश बन जाएगी। 2012 में एक और महत्वपूर्ण बात थी कि कल्याण सिंह बीजेपी से अलग अपनी जनक्रांति पार्टी के बैनर पर चुनाव लड़ रहे थे। इसकी वजह से अलीगढ़, बुलंदशहर, एटा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, फर्रुखाबाद और बदायूं में करीब एक दर्जन सीटें ऐसी थीं, जहां बीजेपी और जनक्रांति पार्टी के प्रत्याशी एक दूसरे की वजह से हारे। डिबाई, अतरौली, भोजपुर, अमृतपुर, अनूपशहर, बुलंदशहर, कासगंज, अमनपुर, कायमगंज और फर्रुखाबाद ऐसी ही सीटें थीं, जहां बीजेपी और जनक्रांति पार्टी के प्रत्याशी के मत मिलकर जीते प्रत्याशी के मतों से ज्यादा थे। इसका एक उदाहरण देखिए बीजेपी के दिग्गज नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी के बेटे बीजेपी नेता सुनील द्विवेदी फर्रुखाबाद सीट से निर्दलीय प्रत्याशी विजय सिंह से सिर्फ 147 मतों से हार गए। जबकि, इसी सीट पर जनक्रांति पार्टी के प्रत्याशी मोहन अग्रवाल को 9405 मत मिले थे। इसी तरह बुलंदशहर की सीट पर बीजेपी के वीरेंद्र सिंह सिरोही बीएसपी के मोहम्मद अलीम खान से 7000 मतों से हारे थे। जबकि, इसी सीट पर जनक्रांति पार्टी के संजीव राम को 20000 मत मिले थे। ऐसे ढेरों उदाहरण हैं। लेकिन, सबका लब्बोलुआब यही है कि 89 सीटें ही तय करेंगी कि कौन सरकार बनाएगा।
(ये लेख QUINTHINDI पर छपा है।)

Monday, September 19, 2016

हिन्दी दिवस के बाद हिन्दी की बात

मेरी आदत है कि मैं हर वक्त समाज समझने की कोशिश करता रहता हूं। और ये अनायास है। इसके लिए मुझे कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता। एक दशक पहले शुरू हुई ब्लॉगिंग ने मुझे मंच भी दे दिया। अभी मैं तिरुपति दर्शन के लिए गया था, चेन्नई होकर। संयोग से वो समय सरकारी हिन्दी पखवाड़े के समय का था। हिन्दी दिवस के पहले नोएडा वापस आ गया। छोटी-छोटी कई बातें मेरे ध्यान में आईं। कुछ टुकड़ों में फेसबुक, ट्विटर पर लिखा। अब उसे समेटकर ब्लॉग पर डाल रहा हूं। जिससे ये आसानी से सब पढ़ सकें।

भीमराव अंबेडकर की दक्षिण भारत की बड़ी प्रतिष्ठा है। चेन्नई शहर से लेकर ग्रामीण इलाके तक में चमकीले, पीले रंग के बाबा साहेब नजर आ जाएंगे। अंबेडकर भी हिन्दुस्तान जोड़ सकते हैं। हालांकि, एक गड़बड़ हो गई है। अंबेडकर ने दलितों को उस समय के #EliteClassके बराबर लाने के लिए जो अंग्रेजी सीखने की सलाह दी थी। दक्षिण भारत ने उसे हिन्दी विरोध के तौर पर शायद ले लिया।

ये चेन्नई में स्कूलों से पढ़कर लौट रहे बच्चे हैं। लेकिन, ये इतना पढ़े-लिखे नहीं हैं कि मेरा लिखा, समझ सकें। ये अच्छा पढ़ रहे हैं। लेकिन, जैसे हम हिन्दीभाषी अपने बच्चों को हिन्दी के साथ स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाते हैं। वैसे ही ये भी तमिल के साथ अंग्रेजी पढ़ाते हैं। इसलिए हम उत्तर भारतीयों के पढ़े-लिखे बच्चे और दक्षिण भारतीयों के पढ़े-लिखे बच्चे जब खूब पढ़-लिख जाएंगे, तो एक दूसरे से अंग्रेजी में बात करेंगे। किसी भारतीय भाषा में नहीं। इतनी छोटी सी बात समझने के लिए नासा का वैज्ञानिक होने की जरूरत थोड़े ना है। हो सकता है दिल्ली के हमारे नेता ये समझते हों। और इसलिए चाहते हों कि उत्तर भारत का हर नेता दक्षिण भारत के हर नेता से अच्छे से बात न कर सके।


Dr MGR के नाम से प्रसिद्ध मरुधर गोपालन रामचंद्रन 3 बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे। 1988 में भारत रत्न की उपाधि दी गई। लेकिन, भारत रत्न MGR की मरीना बीच पर बनी समाधि में हिन्दी में कुछ नहीं लिखा है। वो उत्तर भारतीय जो अंग्रेजी नहीं जानते, उन्हें नहीं समझ आएगा कि ये रामचंद्रन की समाधि है। ऐसे ही चेन्नई के कई चौराहों पर वहां के बड़े नेताओं की मूर्तियां लगी हैं, जिनके बारे में हर भारतीय को जानना चाहिए। लेकिन, कई चौराहों पर तो सिर्फ तमिल में लिखा है। कम से कम हिन्दी में नाम और थोड़ी जानकारी लिखी रहे, तो हिन्दीभाषी भी ऐसे महान लोगों के बारे में जान समझ सकेंगे। और ये वकालत हिन्दी की नहीं है। ये वकालत देश के हर हिस्से के लोगों के बारे में एक दूसरे को जानने की है। और इसमें कोई संदेह नहीं है कि हिन्दी देश की सभी भाषाओं के बीच संवाद की भाषा बन सकती है। वैसे एमजीआर के बारे में एक और जानने वाली बात, उनका जन्म श्रीलंका में हुआ था।

Sunday, September 18, 2016

मम्मी-पापा, उसकी गाड़ी हमारी गाड़ी से बड़ी क्यों है?

तस्वीर-JEEP
कार, एसयूवी खरीदने की इच्छा रखने वाले भारतीयों के लिए अगले दस हफ्ते बेहद रोमांचित करने वाले हैं। भारतीयों के लिए दो दर्जन से ज्यादा नई कारें, एसयूवी आ रही हैं। दरअसल नए वाले भारत में कारों की बिक्री के लिहाज से तो लगातार अच्छे दिन दिख रहे हैं। और उसमें भी बड़ी कार कंपनियों के अच्छे दिन तो और भी अच्छे हुए हैं। निसान, ह्युंदई, होंडा, टोयोटा, टाटा, फॉक्सवैगन, जैगुआर और दूसरी ढेर सारी कंपनियां 10 लाख से लेकर एक करोड़ रुपये तक की गाड़ियां भारतीय बाजार में लाने के लिए तैयार हैं। इससे पहले मशहूर अमेरिकी जीप भारत में आ गई। ये असली जीप है। अभी तक आम भारतीय की नजर में जीप का मतलब महिंद्रा की जीप होती थी। लेकिन, ये जो नया भारत तैयार हुआ है। आई लव माई इंडिया वाला। इस इंडिया को असली जीप का बेसब्री से इंतजार था। आखिरकार वो इंतजार खत्म हुआ। लेकिन, जीप अभी जिस कीमत के साथ आई है। उसकी वजह से असली जीप का इंतजार करने वाले भारतीयों का उत्साह थोड़ा को हुआ है। 75 लाख की शुरुआती कीमत के साथ जीप खरीदने के दीवाने कम ही है। लेकिन, कंपनी को भारत में बड़ा बाजार नजर आ रहा है। और इस बाजार को पकड़ने के लिए अहमदाबाद में पहले शोरूम के साथ देश में 10 शोरूम खोलने पर कंपनी काम कर रही है। नए लॉन्च के भरोसे की सबसे बड़ी वजह ये है कि दरअसल इस नए वाले भारत को बड़ी गाड़ी पसंद है। समझते हैं कि वो और कौन सी वजहें हैं जिससे इंडिया बड़ी गाड़ी पर चढ़ने को बेताब है।

कॉम्पैक्ट एसयूवी मतलब शान का सवारी
इस समय अगर आप मारुति की विटारा ब्रीजा लेने का मन बना रहे हों, तो पहले शोरूम पर जाकर पता कर लीजिए। क्योंकि, 3 महीने से पहले आपको ये सस्ती वाली एसयूवी नहीं मिलने वाली। इसकी एक वजह ये है कि मारुति के उत्पादन पर असर पड़ा है। लेकिन, ज्यादा बड़ी वजह ये है कि इसे खरीदने वालों की कतार बहुत लंबी है। और ये कतार सिर्फ ब्रीजा पर नहीं है। इस सबसे ज्यादा बिकने वाली कॉम्पैक्ट एसयूवी ह्युंदई क्रेटा लॉन्च के बाद से 1 लाख से ज्यादा बिक चुकी है। सितंबर 2015 से जुलाई 2016 के आंकड़े बता रहे हैं कि औसत 7000 क्रेटा हर महीने बिक रही है। क्रेटा की कीमत दस लाख के ऊपर शुरू होती है। सिर्फ क्रेटा ही नहीं, ज्यादातर कॉम्पैक्ट एसयूवी ही बिक रही है। रेनो कंपनी की पूरी साख ही डस्टर ने बचा रखी है।


भारतीयों की जेब में पैसा बोल रहा है
हर भारतीय की औसत आमदनी पिछले साल के मुकाबले इस साल करीब 7.5% बढ़ गई है। 2014-15 में 86,879 से 2015-16 में 93,293 रुपये हो गई है। ये हर भारतीय की औसत आमदनी के बढ़ने का आंकड़ा है। लेकिन, वो मध्यम वर्ग को जो बड़ी कारों और एसयूवी का दीवाना हुआ जाता है, उसकी आदमनी बढ़ने की रफ्तार बहुत तेज रही है।

सस्ती ब्याज दरें
पिछले दो साल में घर कर्ज और कार कर्ज पर ब्याज दरें 1.5-2% तक घटी हैं। और इसका सीधा फायदा कार कंपनियों को हो रहा है।

देश में अच्छी सड़कों का जाल
नरेंद्र मोदी की सरकार के सबसे बेहतर काम करने वाले मंत्रियों का जिक्र होता है, तो नितिन गडकरी का चुनौती देने वाला अंदाज सबसे पहले दिख जाता है। सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी अपने लगभग हर कार्यक्रम में ये बताना नहीं भूलते कि कैसे उन्होंने प्रतिदिन सड़कों का निर्माण यूपीए के आखिरी साल के 4-5 किलोमीटर से बढ़ाकर 22 किलोमीटर प्रतिदिन तक पहुंचा दिया है। इसकी वजह से सड़क परिवहन कई गुना बढ़ा है।

घुमंतू होता भारतीय
रेलवे ने अभी अपनी प्रीमियम ट्रेनों में किराया फ्लेक्सी सर्ज प्राइसिंग के आधार पर तय कर दिया है। और खबरें ये हैं कि इसके बाद भी आरक्षण कराने वाले बढ़े ही हैं। इसके बाद भी तय समय पर टिकट मिलना मुश्किल होता है। यही वजह है कि नया मध्यवर्ग अपनी गाड़ी उठाकर घूमने निकल लेने के अंदाज में आ गया है। इसीलिए छोटी गाड़ियों की बजाय ज्यादा जगह वाली बड़ी कार या एसयूवी शहरी भारतीय को ज्यादा पसंद आ रही है।

टीवी से बच्चों के दिमाग में घुसी CAAAAAR
टेलीविजन ने जैसे हम भारतीयों के रहने-खाने-कपड़े पहनने का तरीका बदल दिया है। वैसे ही अब हमारी कार प्रैक्टिस को भी वो बदल रहा है। और गाड़ी खरीदने के फैसले में बच्चों का मासूम सवाल, मम्मी-पापा, हमारी कार उसकी कार से बड़ी क्यों नहीं है?, काफी अहम भूमिका निभा रहा है।

अर्थव्यवस्था के अच्छे दिन

कुल मिलाकर मोदी सरकार के राज में धीरे-धीरे ही सही लेकिन, अर्थव्यवस्था के अच्छे दिन आते दिख रहे हैं। दुनिया भर की एजेंसियां भारत को दुनिया के अंधेरे में रोशनी की किरण बता रही हैं। इसी भरोसे भारतीय बचाए पैसे को खर्च करने का साहस जुटा पा रहा है। दरअसल ये भरोसा जगा है कि बचाया खर्च करने से मुश्किल नहीं होगी। क्योंकि, आगे इससे भी ज्यादा कमाने की उम्मीद बनी हुई है।  
(ये लेख QUINTHINDI पर छपा है।)

Thursday, September 15, 2016

छोटे किसानों का बड़ा भला कर सकता है GST

GST को देश के सबसे बड़े आर्थिक सुधार के तौर पर देखा जा रहा है। करों में पारदर्शिता से कर घटने और ज्यादा कर वसूली का भी अनुमान है। लेकिन, एक बड़ा खतरा बार-बार बताया जा रहा है कि इससे महंगाई शुरुआती दौर में बढ़ सकती है और उससे भी बड़ी खतरनाक स्थिति ये बताई जा रही है कि इससे किसानों की मुश्किल बढ़ सकती है। उसके पीछे भारतीय किसान संघ तर्क दे रहा है कि किसान को हर तरफ से घाटा होगा। क्योंकि, किसान अपनी उपज के लिए कम कीमत हासिल कर पाएगा। जबकि, उसे बाजार में जरूरी चीजों के लिए ज्यादा कीमत देनी होगी। भारतीय किसान संघ के इस तर्क के पीछे तथ्य ये है कि अभी कृषि जिंस से बने खाद्य उत्पादों पर कम कर है। लेकिन, जीएसटी के बाद लगभग एक जैसा कर ही लगेगा और इसकी वजह से किसानों की मुश्किल बढ़ सकती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अनुषांगिक संगठन होने के नाते कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह भी भारतीय किसान संघ की बात को गंभीरता से ले रहे हैं। लेकिन, कृषि मंत्री का ये मानना है कि जीएसटी सभी के भले के लिए है। भारतीय किसान संघ ये भी चाहता है कि संसद के शीतकालीन सत्र में इस पर चर्चा हो और अगर सरकार ये कर सके तो सरकार एक पंथ दो काज कर सकती है। इस चर्चा से सरकार राज्यों को और देश के लोगों को दरअसल जीएसटी के बहाने होने वाली सहूलियत से राष्ट्रीय कृषि बाजार की बात भी ठीक से कर सकती है। राष्ट्रीय कृषि बाजार ही वो योजना है, जिसके भरोसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों की आमदनी दोगुना करने का दावा करते दिखते हैं। लेकिन, ये भी एक कड़वी सच्चाई है कि राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना के राह की सबसे बड़ी बाधा दो राज्यों के बीच करों को लेकर होने वाली उलझन है। इसीलिए अगर सरकार जल्दी से जल्दी जीएसटी लागू कर सके, तो इसी बहाने राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना भी उतनी ही तेजी से लागू कर सकेगी।


गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स के लागू होने से किसी भी तरह के उत्पाद पर कर के ऊपर कर लगने की अभी तक चली आ रही परंपरा खत्म होगी। इससे कर लगने में होने वाली पारदर्शिता से खेती-किसानी का बड़ा भला हो सकता है। खासकर अगर जीएसटी के साथ-साथ राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना भी लागू हो सके। दोनों को लागू करने में सबसे बड़ी मुश्किल राज्यों के बीच के सम्बंध, केंद्र और राज्य के सम्बंध और उससे भी आगे आसानी शब्दों में कहें, तो सम्वैधानिक संघीय ढांचे की उलझन है। अब अच्छी बात ये है कि सैद्धांतिक तौर पर संसद ने इसे कानून बनाने के लिए आगे बढ़ा दिया है। अब राज्यों में इसे मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। अच्छी बात ये है कि असम ने इसकी शुरुआत कर दी है और तेजी से दूसरे राज्य भी इसे अपनी विधानसभा में मंजूर करते दिख रहे हैं। यहीं से किसानों के भले वाली राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना का भी आसानी से लागू होना दिखने लगेगा। दरअसल जब केंद्र सरकार बार-बार ये कह रही है कि राष्ट्रीय कृषि बाजार का सीधा सा उद्देश्य देश के हर किसान को देशभर का बाजार एक साथ देना है। इसमें भी समझने की बात ये है कि छोटे किसान को राष्ट्रीय कृषि बाजार की ज्यादा जरूरत है। क्योंकि, बड़ा किसान तो पहले से ही देश के हर बाजार तक पारंपरिक तरीकों से पहुंच बनाए हुए है। लेकिन, छोटे किसान की पहुंच अपनी नजदीकी मंडी तक भी बमुश्किल हो पाती है। इसीलिए राष्ट्रीय कृषि बाजार के जीएसटी के साथ-साथ लागू होने से छोटे किसान का बड़ा होता दिख रहा है। किसानों को या खती से जुड़े उत्पादों का कारोबार करने वालों के लिए सबसे बड़ी मुश्किल चुंगी, एंट्री-एग्जिट टैक्स, मंडी टैक्स हैं। और, जीएसटी इन सभी करों को खत्म करेगा। खेती के उत्पाद के खेती उद्योग में पहुंचने तक चूंकि वैल्यू एडेड टैक्स ही देना होगा। इससे कर के ऊपर कर वाली स्थिति भी नहीं बनेगी। और, खाद्य उत्पादों के मामले में ये बहुत जरूरी है। इसके लाभ लंबे समय में महंगाई की असल स्थिति पता लगाने में दिखेंगे। किसी भी अनाज, खाद्य सामग्री के किसान के खेत से मंडी तक पहुंचने तक किस तरह का कितना कर लगा और उससे उस अनाज या खाद्य सामग्री का भाव कितना हुआ, ये भी पारदर्शी तरीके से पता चलेगा। खेत से मंडी तक की मुनाफाखोरी का पता भी सरकार ज्यादा आसानी से कर सकेगी। इससे किसान से सही कीमत पर खरीदने और ग्राहक को भी सही कीमत पर बेचने की व्यवस्था भी बनाई जा सकेगी। जीएसटी लागू होने से कृषि क्षेत्र को कई फायदे होंगे और उसमें सबसे बड़ा फायदा यही है कि देश भर में अलग-अलग करों का एक हो जाना देश में एक राष्ट्रीय कृषि बाजार का निर्माण करेगा। इससे देश भर में एक राज्य से दूसरे राज्य में कृषि उत्पाद आसानी से आ जा सकेंगे। चेक पोस्ट, बैरियर जैसी व्यवस्था खत्म होगी। राज्यों के बिना किसी बाधा के कृषि उत्पादों के परिवहन से कृषि बाजार में निजी क्षेत्रों की रुचि बढ़ेगी। इससे आधुनिक गोदाम सुविधा से लेकर आधुनिक बाजार के लागू होने में तेजी आएगी। जीएसटी और राष्ट्रीय कृषि बाजार का साझा मंच किसानों के लिए गजब फायदे का साबित हो सकता है। उसकी वजह है कि कृषि और उससे सम्बंधित उत्पादों के ही सबसे तेजी से खराब होने का खतरा होता है और अभी तक का अनुभव, शोध ये साफ बताता है कि भारत में तरह-तरह के करों और एक मंडी से दूसरी मंडी के बीच की बाधाओं की वजह से फल, सब्जियां और दूसरे अनाज खराब होकर देश के सकल घरेलू उत्पाद का सीधे तौर पर नुकसान करते हैं। इससे राज्यों के बीच खेती के उत्पादों का कारोबार भी बेहतर होने की उम्मीद है। कुल मिलाकर राष्ट्रीय कृषि बाजार के साथ जीएसटी का मंजूर होना देश के किसानों की आमदनी दोगुना करने के लक्ष्य को पूरा करने का साधन बनता दिख रहा है।  

Wednesday, September 14, 2016

हिन्दी दिवस पर चेन्नई की एक सड़क के बहाने

#हिन्दीदिवस
ये चेन्नई की एक सड़क का नाम भर नहीं है। ये पूरे दक्षिण भारत का मानस है। जो हिन्दी पर अंग्रेजी को वरीयता दे रहा है। दोष उनका नहीं है। क्योंकि, हम हिन्दी वाले भी तो अंग्रेजी को वरीयता देते हैं। और #EnglishElite तो उत्तर भारत और उनके नेताओं ने ही तैयार किया। कांग्रेस की इसमें बड़ी भूमिका है। वरना ऐसे क्यों होता कि इंदिरा इज इंडिया इंडिया इज इंदिरा का नारा देने वाले के कामराज के राज्य में हिन्दी इतनी अछूत हो जाती है। अपनी सहूलियत की राजनीति में कांग्रेस ने ऐसे छत्रपों को तैयार किया जो दूसरे राज्य में अछूत से हो जाते। हां, इंदिरा, राजीव हर जगह देश के बड़े नेता रहे। हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं की लड़ाई में शातिर अंग्रेजी ने ऐसे जगह बनाई है कि वही हिन्दुस्तानी भाषाओं के बीच संवाद की भाषा बन गई है। टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलकर हिन्दी वाले तमिल, तेलुगू, कन्नड़ वालों से और वो लोग हम हिन्दी वालों से बात करते हैं। अंग्रेजी न उनको स्वाभाविक तौर पर आती है, न हमको। मैं तमिल की पुस्तक देख रहा था तो कई शब्द हैं जो हिन्दी से मिलते-जुलते हैं। लेकिन, हमें एकदम भिन्न अंग्रेजी सीखने में अपने जीवन की महत्वपूर्ण ऊर्जा खपा देने में ज्यादा बेहतर लगता है।


मेरे नए फेसबुक तमिल दोस्त तिरुनावकर

ये Thiru Thirunavukkarsau हैं। मेरे नए फेसबुक दोस्त हैं। फेसबुक दोस्ती से पहले ये मेरी टैक्सी के ड्राइवर हैं, जिसने मुझे 3 दिनों तक चेन्नई एयरपोर्ट से तिरुपति-तिरुमला, महाबलीपुरम की शानदार यात्रा कराकर फिर से चेन्नई एयरपोर्ट पर छोड़ा। तिरुनावकर संभवत: मैं सही नाम का उच्चारण कर रहा हूं। 3 दिनों तक जमकर तमिल संगीत सुनाया। सिवाय एकाध घंटे के हिंदी गानों के विविध भारती पर कार्यक्रम को छोड़कर। तिरू ने बताया वो 12वीं तक पढ़े हैं लेकिन, हिन्दी उन्होंने तब सीखा जब एक हिन्दी वाली कम्पनी में काम किया। शानदार यात्रा कराने के लिए धन्यवाद। उम्मीद करता हूं अब आप थोड़ी और हिन्दी सीख लेंगे। और अगली बार उत्तर भारतीय पर्यटकों के लिए एकाध अच्छी हिन्दी गानों की सीडी या पेन ड्राइव रखेंगे। एयरपोर्ट पर साथ ली ये तस्वीर। तिरू ने बताया कि वो फेसबुक पर हैं। मैंने कहा मैं भी। अब हम दोनों दोस्त हैं। अगली बार जब भी चेन्नई जाना हुआ, तिरू को ही पहले खोजूंगा। #हिन्दी_दिवस

Tuesday, September 13, 2016

हिन्दी दिवस पर तमिल, तेलुगू सीखने की किताब


हिन्दी दिवस पर मेरी वापसी दक्षिण भारत से हो रही है। यकीन मानिए पिछले 3 दिनों से हिन्दी पढ़ने, सुनने को तरस गया। लेकिन, ये एकतरफा विलाप होगा कि दक्षिण भारतीय हिन्दी को नापसंद करते हैं। दोतरफा संवाद बनाने का तरीका ये हम उत्तर भारतीय ये बता पाएं कि दक्षिण भारतीय भाषाओं के लिए हमारे मन में कितना सम्मान है। दूसरी भाषा/बोली सीख पाने की मेरी क्षमता बहुत ज्यादा नहीं है। देहरादून रहकर गढ़वाली और मुंबई रहकर मराठी नहीं सीख सका। सामाजिक व्यवसायिक दबाव की वजह से अंग्रेजी समझता/जानता हूं। लेकिन, बहुत अच्छी नहीं है। लेकिन, किसी भी दक्षिण भारतीय भाषा को जरा सा समझना भी कठिन है। इसीलिए हिन्दी दिवस पर 30 दिन में सीखें तमिल, तेलुगू अब मेरी दूसरी किताबों का हिस्सा हैं। कल #चेन्नई के मरीना बीच से ये दोनों किताबें खरीदी हैं। मैं इन भाषाओं को अच्छे से जान समझ सकूंगा, ये तो कह पाना मुश्किल है। लेकिन, कोशिश ये होगी कि खुद कुछ समझने लायक हो सकूं। और सबसे जरूरी दोनों बेटियों को तो तमिल, तेलुगू के जरूरी शब्दों से परिचित करा ही दूं। मेरे पिताजी ने भी इलाहाबाद में इसका एक प्रमाणपत्र हासिल किया था। लेकिन, बस अपना नाम लिखने भर का और 10 तक की गिनती ही याद रह पाई। इतना तो कम से कम मैं भी कर ही लूंगा। और बेटियां हो सकता है इससे काफी ज्यादा कर लें।

Saturday, September 10, 2016

शहाबुद्दीन से नीतीश कुमार डरे तो होंगे ही?

@narendramodi से अहं की लड़ाई में @laluprasadrjd से हर लड़ाई खत्म करके @NitishKumar ने दोस्ती पक्की कर ली है। आप क्या सोच रहे हैं, सिर्फ बिहार के आम लोग, बीजेपी कार्यकर्ता डर रहे हैं। #Shahabuddin के जेल से छूटने के बाद नीतीश भी डर रहे हैं। मेरी बात मत मानिए। शहाबुद्दीन ने कहा है कि नीतीश परिस्थितियों के मुख्यमंत्री हैं। इसका मतलब जो भी समझेगा, वो ये भी समझ रहा होगा कि नीतीश डर तो बहुतै रहे होंगे। मुख्यमंत्री हैं, कैसे और किससे कहें। अब तो बीजेपी भी साथ नहीं है। और बड़े भाई लालू से क्या कहेंगे। लालू से फिर राजनीति में मार खा गए, नीतीश कुमार। अब बिहार पर बड़ी मार पड़ेगी।

टीवी चैनलों पर जेल से छूटे #Shahabuddin का 1500 बड़ी-बड़ी गाड़ियों का काफिला देखकर लग रहा है कि #Bihar बहुत गरीब है। #दुर्भाग्य_देश_का #दुर्भाग्य_बिहार_का


#Shahabuddin के जेल से बाहर आने के बाद क्या होगा? ये सवाल सब पूछ रहे थे। जवाब मोहम्मद शहाबुद्दीन ने जेल से बाहर निकलते ही दे दिया है। शहाबुद्दीन ने कहा लोगों ने 26 सालों से इसी छवि के साथ स्वीकारा है। अब इसका मतलब बिहार के लोगों को समझाने की जरूरत है क्या? एक मत कितना महत्वपूर्ण हो सकता है, इसका अंदाजा उन सभी लोगों को लग जाएगा कि "बिहार में बहार हो नीतीशे कुमार हो" नारे का असल मतलब क्या है। इतनी खराब सुबह हाल के समय में कभी नहीं हुई।

Wednesday, September 07, 2016

सरपट भागते सेंसेक्स की बुनियाद

भारतीय शेयर बाजार को जैसे अचानक कोई संजीवनी सी मिल गई हो। इस साल अब तक सेंसेक्स 10.5% से ज्यादा चढ़ चुका है। 29000 को छूने के बाद सेंसेक्स थोड़ा सुस्ताता नजर आ रहा है। सेंसेक्स को 29000 छूने में करीब डेढ़ साल लग गए। दरअसल ये पिछले डेढ़ साल सरकार के लिए भी ढेर सारी मुश्किलों वाले रहे हैं। लेकिन, अब सरकार भी मजबूतत नजर आ रही है और शेयर बाजार में निवेशकों का भरोसा भी पक्का नजर आ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब अर्थव्यवस्था को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त नजर आ रहे हैं। इसकी ढेर सारी वजहें हैं और शेयर बाजार की मजबूती में दिल्ली से लेकर वॉशिंगटन तक की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। मौसम से लेकर महंगाई ने बाजार को मारक रफ्तार दे दी है। उन ढेर सारी वजहों में से सबसे अहम 5 वजहें ये रहीं।

GST कानून बनने की ओर
भारत में कर सुधारों का सबसे बड़ा कानून बनने जा रहा है। मोदी सरकार के दो साल होने के बाद संसद ने GST बिल को पास कर दिया। संसद से मंजूर होने के बाद तेजी से GST कानून बनने की तरफ बढ़ रहा है। 17 राज्यों की विधानसभा ने GST को मंजूर कर लिया है। जिस तेजी से राज्यों ने इसे मंजूर किया है। उससे सरकार के 1 अप्रैल 2017 से इसे कानून बनाने की राह आसान होती दिख रही है। सरकार ने GST काउंसिल की मदद के लिए GST सचिवालय बनाने पर चर्चा शुरू कर दी है। हालांकि, अभी भी कानून बनाने के लिए इसे लंबा सफर तय करना है।

काबू में आती महंगाई
इस साल रिकॉर्ड दाल की पैदावार का अनुमान है। अच्छे मॉनसून की वजह से कुल अनाज भी बेहतर होने का अनुमान है। इसकी वजह से भी महंगाई काबू में आती दिख रही है। इसका असर भी दिखने लगा है। 140 रुपये किलो बिक रही अरहर दाल 100 रुपये किलो के आसपास बिकने लगी है। हालांकि, महंगाई दर 6% प्रतिशत के ऊपर है जो, रिजर्व बैंक के 5% के लक्ष्य से ऊपर है। लेकिन, बेहतर मॉनसून से कम से कम खाने-पीने के सामानों की महंगाई और कम होने की उम्मीद दिख रही है। ग्रामीण क्षेत्र में अच्छी मांग होने से कंपनियों – खासकर कंज्यूमर ड्यूरेबल, मशीनरी- की बिक्री बढ़ने की उम्मीद है। इससे कंपनियों की बैलेंसशीट बेहतर होने के आसार हैं।  

उर्जित पटेल से मिली ऊर्जा
भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन को हटाने को लेकर दुनिया भर की एजेंसियां और आर्थिक विश्लेषक भारतीय मौद्रिक नीति को लेकर आशंका में थे। लेकिन, उर्जित पटेल का रिजर्व बैंक का गवर्नर बनना सभी आशंकाओं को खारिज करता है। रिजर्व बैंक गवर्नर उर्जित पटेल का अभी तक का रिकॉर्ड आश्वस्त करता है कि भारत की मौद्रिक नीति बदलने वाली नहीं हैं। साथ ही ये भी पटेल और मोदी सरकार के बीच विवाद भी नहीं होने वाला। शेयर बाजार का नए गवर्नर में भरोसा इसी बात से समझा जा सकता है कि उदारीकरण के बाद शेयर बाजार ने रघुराम राजन के बाद अब उर्जित पटेल का भी स्वागत इतने शानदार तरीके से किया है। 4 सितंबर को सेंसेक्स 1.6% चढ़ा है।

मैन्युफैक्चरिंग में जबर्दस्त तेजी
मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में जबर्दस्त तेजी देखने को मिल रही है। प्रधानमंत्री क मेक इन इंडिया का असर साफ नजर आ रहा है। ढेर सारी कंपनियां जो अभी तक असेंबलिंग करती थीं। अब भारत में ही मैन्युफैक्चरिंग कर रही है। मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर इंडेक्स 13 महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर है। मैन्युफैक्चरिंग की जीडीपी में हिस्सेदारी 25% है।

अमेरिका से मिले संकेत
अमेरिकी रिजर्व बैंक इस महीने के आखिर में ब्याज दरें नहीं बढ़ाएगा। रोजगार के ताजा आंकड़े आने के बाद ज्यादातर विश्लेषकों का ये मानना है। इसकी वजह से दुनिया भर के निवेशक विकासशील बाजारों में निवेश करने को लेकर उत्साहित हैं और भारत उसमें सबसे ऊपर है।

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