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Tuesday, January 10, 2017

उत्तर प्रदेश में "परिवर्तन" का क्या होगा?

प्रख्यात समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि जिन्दा कौमें 5 साल तक इंतजार नहीं करती हैं। लेकिन, देश के सबसे बड़े सूबे में समाजवादी सरकार के मुखिया अखिलेश यादव 5 साल के बाद भी उत्तर प्रदेश की जनता को परिवर्तन की आहट ही सुना पा रहे हैं। और इसी परिवर्तन की आहट के जरिये वो उत्तर प्रदेश की जनता को संदेश देना चाह रहे हैं कि प्रदेश के लोगों की भलाई दोबारा समाजवादी पार्टी की सरकार लाने में ही है। और इसे बौद्धिक तौर पर मजबूती देने के लिए अखिलेश यादव के इस कार्यकाल पर एक किताब आई है। इस किताब में परिवर्तन की आहट बताता अखिलेश के भाषणों का संकलन है। कमाल की बात ये है कि आमतौर पर परिवर्तन की बात विपक्ष सत्ता हासिल करने के लिए करता है। लेकिन, उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य बनने जा रहा है, जहां चुनावी लड़ाई परिवर्तन के ही इर्द गिर्द हो रही है। फिर चाहे वो सत्ता पक्ष हो या विपक्ष। सरकार में आने के लिए विपक्ष सत्ता परिवर्तन की लड़ाई लड़ता है। इसीलिए भारतीय जनता पार्टी का परिवर्तन पर खास जोर देना आश्चर्यजनक नहीं लगता। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष विशेषकर परिवर्तन पर जोर देते हैं। भारतीय जनता पार्टी की पूरी चुनावी रणनीति इसी एक शब्द के इर्दगिर्द बुनी हुई दिखती है। परिवर्तन रथयात्रा और परिवर्तन महारैली ये भारतीय जनता पार्टी के दो सबसे बड़े चुनावी अस्त्र नजर आ रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी अपनी यात्रा और रैली के जरिये ये बताने की कोशिश कर रही है कि उत्तर प्रदेश की जनता को अगर देश के सबसे बड़े सूबे का खोया हुआ सम्मान हासिल करना है, तो उसे परिवर्तन करना होगा। और वो परिवर्तन भारतीय जनता पार्टी की सरकार के आने से होगा।

बीजेपी राजनीतिक तौर पर उत्तर प्रदेश सरकार की नाकामियों, कानून व्यवस्था और परिवारिक झगड़े को मुद्दा बनाए हुए है। साथ ही केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की उन योजनाओं का भी जिक्र परिवर्तन के साथ किया जा रहा है जिससे देश के साथ उत्तर प्रदेश के लोगों को भी सीधे लाभ मिलता दिखे। और इसीलिए अमित शाह हों या बीजेपी की परिवर्तन रथयात्रा के नेता, मोदी सरकार की हर योजना को एक सांस में लोगों को बताना नहीं भूलते। राजनीतिक लड़ाई के साथ बौद्धिक लड़ाई में भी भारतीय जनता पार्टी अब परिवर्तन की ही बात कर रही है। और इस बौद्धिक लड़ाई में परिवर्तन की ब्रांडिंग का जिम्मा बीजेपी के थिंक टैंक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध संस्थान ने ले लिया है। संस्थान के निदेशक अनिर्बान गांगुली की मूल भाषा अंग्रेजी है। लेकिन, पिछले कुछ समय में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध संस्थान ने हिन्दी को लेकर ढेर सारे शोध पत्र, पुस्तकें प्रकाशित की हैं। और अब परिवर्तन की ओर नाम से एक पुस्तक संस्थान लेकर आया है। अनिर्बान गांगुली कहते हैं कि ये कहना गलत होगा कि बीजेपी ने ये पुस्तक लिखी या लिखवाई है। निश्चित तौर पर इस पुस्तक में नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद देश में अलग-अलग क्षेत्रों में हुए परिवर्तन की चर्चा है। लेकिन, इसे लिखने वाले कहीं से भी बीजेपी से सम्बद्ध नहीं हैं। ये स्वतंत्र लेखकों की ओर से स्वतंत्र तौर पर केंद्र सरकार की नीतियों की समीक्षा है। वैसे तो ये किताब केंद्र सरकार की नीतियों के असर पर है। लेकिन, बीजेपी इसका फायदा उत्तर प्रदेश के चुनावों में लेना चाहती है।
बीजेपी परिवर्तन की ओर ले जाने की बात कर रही है, तो समाजवादी पार्टी या कहें कि अखिलेश यादव प्रदेश की जनता को परिवर्तन की आहट सुनाना चाह रहे हैं। डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध संस्थान की ये किताब 168 पन्ने की जिसमें कुल 28 लेखकों ने लिखा है। जबकि, अखिलेश यादव की किताब परिवर्तन की आहट पूरी तरह से अखिलेश यादव के दिए गए भाषणों का संग्रह है। करीब सवा दो सौ पृष्ठ की इस किताब में 34 शीर्षकों से प्रदेश में समाजवादी सरकार के कामों का ब्यौरा दिया गया है। साथ ही अखिलेश यादव ने इस किताब के जरिये भावनात्मक तौर पर भी यूपी की जनता से जुड़ने की कोशिश की है। बीजेपी सरकार बदलने के लिए परिवर्तन की ओर जाने की बात कर रही है तो अखिलेश यादव परिवर्तन की आहट के जरिये प्रदेश की जनता को ये समझाना चाह रहे हैं कि परिवर्तन की आहट पिछले 5 सालों में सुनाई देने लगी है लेकिन, परिवर्तन के लिए जनता को उन्हें एक मौका और देना चाहिए। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश की जनता के सामने दो बड़ी पार्टियां परिवर्तन की दुहाई दे रही हैं। अब देखना है कि उत्तर प्रदेश की जनता को परिवर्तन की आहट सुनाई देती है या वो परिवर्तन की ओर चल देती है। 

Monday, January 09, 2017

कांग्रेस को एक पूर्णकालिक राजनेता की जरूरत

स्वराज भवन, इलाहाबाद में राहुल, प्रियंका गांधी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल के आखिरी दिन जो बोला, उस पर टिप्पणी के लिए कांग्रेस की तरफ से दूसरी, तीसरा कतार के नेता ही मिल पाए। उसकी वजह ये कि उनके अभी के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी छुट्टी पर हैं। ये पहली बार नहीं है, जब राहुल गांधी छुट्टी पर गए हैं। संसद सत्र का समय हो या बिहार चुनाव राहुल गांधी ने ऐसा कई बार किया है। यहां तक कि देश में रहते भी राहुल गांधी अपनी सुविधानुसार ही राजनीतिक सक्रियता रखते हैं। 90 के दशक में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्रसंघ की राजनीति करते/कराते और संगठन का काम करते/कराते दो बातें जो सबसे ध्यान में रहती थीं। पहली ये कि दूसरा नेता/संगठन क्या कर रहा है और उससे बेहतर हम क्या कर सकते हैं। दूसरी बात ये कि कल सुबह आने वाले अखबार में हमारा किया कैसे छपेगा। हालांकि, छात्रसंघ या छात्र संगठन की राजनीति करते कुछ लोग ऐसे भी होते थे जो सिर्फ इस बात कि चिन्ता करते थे कि कैसे छप जाया जाए। अच्छा, बुरा कुछ भी, कैसे भी। पहली दोनों बातें ध्यान में रखने वाले राजनीति में धीरे-धीरे तपे-तपाए नेता के तौर पर स्थापित होते जाते। और इस प्रक्रिया में वो पूर्णकालिक राजनेता बन जाते हैं। छपास रोगी नेता लम्बे समय तक नहीं चल पाते हैं और अगर चल भी गए तो गम्भीर नेता की उनकी छवि कभी नहीं बन पाती। यहां तक कि राजनीति में ज्यादा समय देने के बावजूद सिर्फ छपासी नेता पूर्णकालिक राजनेता नहीं बन पाते। देश की राजनीति में और राज्यों की राजनीति में मजबूत ज्यादातर नेता पहली दो बातों का ठीक से ध्यान रखते हैं। और उसी को ध्यान में रखते वो राजनीति में आगे बढ़ रहे हैं। अब सवाल ये है कि फिर राहुल गांधी का राजनीतिक विकास क्यों नहीं हो पा रहा है। लम्बे समय से राहुल गांधी लोकसभा में हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं, लगभग अध्यक्ष ही हैं। और कई बार तो मुझे ये भी लगता है कि ईमानदारी से लोगों की तकलीफों को समझना चाहते हैं। फिर ऐसा क्या है जो उन्हें गम्भीर, पूर्णकालिक राजनेता नहीं बनने दे रहा है। अब उसके कारण ढेर सारे हैं। लेकिन, इतना तय है कि कांग्रेस को इस समय एक गम्भीर पूर्णकालिक राजनेता की सख्त जरूरत है। बिना पूर्णकालिक राजनेता के कांग्रेस का विकास क्रम सही नहीं होने वाला। पूर्णकालिक वैसे तो संघ का कॉपीराइट लगता है लेकिन, आज कांग्रेस की ये सबसे बड़ी जरूरत दिखती है।

कांग्रेस के बारे में आम राय यही रही है कि सत्ता की स्वाभाविक दावेदार यही पार्टी है। नरेंद्र मोदी की सरकार के पूर्ण बहुमत में आने के बाद भी कई लोगों इस तरह की बात करते दिख जाते हैं। इस स्वाभाविक दावेदारी के पीछे ढेरों तर्क हो सकते हैं। लेकिन, मेरी नजर में सबसे बड़ा तर्क यही है कि कांग्रेस पूर्णकालिक राजनेताओं की पार्टी रही है। यानी ऐसे नेता जिनके लिए राजनीति उनका ओढ़ना, बिछाना, खाना-पीना, सोना सब था। पूर्णकालिक राजनेता के तौर पर राजीव गांधी कमजोर साबित हुए थे। और उस कमजोरी का नुकसान ये कि अचानक बोफोर्स से भ्रष्टाचार का गोला छूटा और वो जनता में अपनी छवि बचा नहीं सके। लेकिन, राजीव गांधी को सीधे प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला जिसकी वजह से सत्ता ने लम्बे समय तक राजीव गांधी को नेता बनाए रखा। राजीव के जाने के बाद पी वी नरसिंहाराव गजब के पूर्णकालिक राजनेता के तौर पर सामने आए। यही वजह रही कि अल्पमत की सरकार को भी उन्होंने सलीके से चला लिया और भारतीय राजनीति के ढेर सारे चमत्कारी फैसले ले लिए। विदेशी मूल का आरोप झेल रही सोनिया गांधी ने इस पूर्णकालिक राजनेता होने के मंत्र को जान लिया और यही वजह रही कि उन्होंने सबसे बड़ा राजनीतिक फैसला लिया, प्रधानमंत्री न बनने का। सबसे लम्बे समय तक वो कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं। बिना प्रधानमंत्री रहे आजाद भारत में शायद ही कोई इतना ताकतवर रहा हो, जितनी सोनिया गांधी रहीं। उस सबकी वजह थी उनका पूर्णकालिक राजनेता होना। लेकिन, ये कांग्रेस का दुर्भाग्य कहा जाएगा कि इलाहाबाद में कांग्रेस के मूल स्थान वाले शहर में राजनीति करने वालों की तुलना में राहुल गांधी पासंग भी राजनेता न बन सके हैं। पूर्णकालिक राजनेता होना तो शायद राहुल के मूल स्वभाव के ही विपरीत है। राहुल गांधी अंशकालिक राजनेता हैं। वो अंशकाल भी राहुल का तय नहीं होता है। इतने अनिश्चित राजनेता को जनता कैसे स्वीकारे। पूर्णकालिक राजनेता होने का लाभ नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल को किस कदर मिला, ये सबके सामने है। ढेर सारी गलतियों के बाद भी इन दोनों नेताओं का एक पक्का वाला समर्थक वर्ग है। वो समर्थक वर्ग जानता है कि सबके बाद हमारा नेता भागने वाला, गायब होने वाला नहीं है। सर्जिकल स्ट्राइक हो या फिर नोटबंदी- किसी भी मुद्दे पर अपने बयान और व्यवहार से राहुल गांधी एक पूर्णकालिक राजनेता जैसा नहीं दिखे। इसलिए, मुश्किल ये कि कांग्रेस के कार्यकर्ता की छोड़िए, नेता तक को राहुल गांधी के किसी मुद्दे पर निश्चित व्यवहार की उम्मीद नहीं है। इसीलिए उत्तर प्रदेश में ढेर सारे प्रयोगों, कार्यक्रमों को चलाने के बाद भी राज्य में कांग्रेस का चुनावी भविष्य अब पूरी तरह से समाजवादी पार्टी से समझौते में कुछ सीटें मिलने की आस पर ही टिका हुआ है। और ये भी आस इसलिए बनी है कि पूर्णकालिक राजनेता के तौर पर विकसित हो गए अखिलेश यादव को लग रहा है कि सत्ता रहने से और परिवारी मारापीटी के दुष्प्रभाव से बचने में कांग्रेस का साथ कुछ मददगार हो सकता है। लेकिन, यहां भी पूर्णकालिक राजनेता जैसा व्यवहार राहुल गांधी नहीं कर पा रहे हैं। हो ये रहा है कि रणनीतिकार के तौर पर स्थापित हो गए प्रशांत किशोर थकने लगे हैं और इस बुरे हाल में भी पार्टी का झंडा बुलंद करने वाले कांग्रेस नेता खीझने लगे हैं।

पहले से ही खीझे कांग्रेसी नेताओं की खीझ राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बिना आधार के आरोप लगाकर और फिर संसद सत्र के आखिरी दिन जाकर प्रधानमंत्री से मिलकर बढ़ा दी है। अंशकालिक राजनेता होने का ही नुकसान था कि विमुद्रीकरण पर ढेर सारे विपक्षी दलों का समर्थन पा रही कांग्रेस अचानक फिर अकेले हो गई। भूकम्प लाने का दावा करने वाले राहुल गांधी प्रधानमंत्री को हिला देने वाला भूकम्प तो नहीं ला सके। हां, इतना जरूर है कि कांग्रेस की अपनी छत भी गिरती दिख रही है। इसीलिए कांग्रेस को सख्त जरूरत है एक पूर्णकालिक राजनेता की। वो प्रियंका गांधी भी हो सकती हैं या कोई और। कांग्रेस के साथ स्वस्थ लोकतंत्र के लिए भी ये जरूरी है। 

Friday, December 16, 2016

चिटफंडियों के मारे लोगों की चिन्ता करो सरकार

देखिए चिटफंडियों के कुतर्क किसको किसको प्रभावित करते हैं। ई हमारा खेत अधिया पर करते हैं। घर में शादी है तो गाँव से आए हैं। अचानक किसी चर्चा पर बोल पड़े अरे ऊ जो बहुत पैसा जमा करवाया। हम लोग नोटबंदी से लेकर सहारा तक अंदाज़ा लगाते रहे। ग़लत जवाब साबित हुआ। अंत में सही जवाब आया पर्ल्स वाला। बताए कि 30000 रु जमा कराए हैं। पूछ रहे हैं भइया अब मिली कि नाहीं। इनको भी जानकारी है ऊ पकड़ा गया है। लेकिन इनका पैसा कैसे मिलेगा न इन्हें पता है, न मैं बता पा रहा हूँ। इन्हें क्या बताऊँ कि कितनी लड़ाई के बाद पर्ल्स समूह के पी७ चैनल से हमने अपनी बक़ाया रक़म वसूली थी। इस तरह के गोरखधंधे पर शुरुआती अंकुश न लगा, तो मोदी सुप्रीमकोर्ट का कर लेंगे। सुब्रत राय और निर्मल सिंह भंगू जेल आ जा रहा है। पर जिन बेचारों का पैसा गया वो कैसे वापस आयेगा। ऐसी वसूली का कोई तानाशाही तरीक़ा होना चाहिए। ई चाहते हैं राजकुमार यादव उर्फ तितिल्ले वाया चंदई का पुरवा, सिया ग्रामसभा, बिहार विकास खंड, तहसील कुण्डा, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश।

Thursday, December 15, 2016

खेती पर नोटबंदी का कितना असर बता रहे हैं राजकुमार यादव

राजकुमार यादव (तितिल्ले) की बात सुननी जरूरी है। हमारा खेत यही जोतते-बोते हैं। हमने पूछा नोटबंदी होने से खेती क बर्बाद होइ ग होए। तितिल्ले कहेन काहे भइया। हम कहे अरे बीज, खाद सिंचाई क पैसा कहाँ रहा। तितिल्ले कहेन भइया बिया (बीज), खाद पहिले से धरा रहा औ के पैसा दइके तुरंतै ख़रीदथ। खेती प थोड़ बहुत असर परै त परै। वैसे केहूक खेत एकरे ताईं ख़ाली न रहे। एतना गाँव म सब एक दूसरे बरे खड़ा रहथि। राजकुमार यादव वाया चंदई का पुरवा, सिया ग्रामसभा, विकासखंड बिहार, तहसील कुंडा, जिला प्रतापगढ़

Monday, December 05, 2016

1 अप्रैल 2017 से विमुद्रीकरण का सार्थक आर्थिक परिणाम दिखने लगेगा

बैंकों में लंबी कतारें और खाली एटीएम डराने लगे हैं। लेकिन, लालू प्रसाद यादव भी सरकार के बड़ी नोटों को बंद करके नई नोटों को लाने के फैसले के विरोध में नहीं हैं। ये सबसे बड़ी खबर है। और ये खबर इसके बाद बनी जब नीतीश कुमार के बीजेपी से नजदीकी बनाने की खबरों के बीच नीतीश ने लालू प्रसाद यादव से मुलाकात की। इसी से समझ में आ जाता है कि देश के जनमानस को समझने वाला कोई भी नेता या राजनीतिक दल इस फैसले का विरोध करने का साहस क्यों नहीं जुटा पा रही है। दरअसल सच भी यही है कि इस फैसले के विरोध की पुख्ता वजह भी नहीं है। विमुद्रीकरण के सरकार के फैसले ने एक नई बहस खड़ी कर दी है। कमाल की बात ये है कि विशुद्ध आर्थिक फैसले पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया राजनीतिक नजरिये से आ रही है। और इससे भी कमाल की बात ये कि राजनीतिक नजरिये से आ रही प्रतिक्रिया के दबाव में आर्थिक नजरिये से आ रही प्रतिक्रिया की चर्चा तक नहीं हो रही है। सबसे बड़ी आलोचना सरकार के इस फैसले की 2 मूल वजहों से हो रही है। पहली, देश कतार में खड़ा है, आम लोगों को बहुत परेशानी हो रही है। सरकार को पहले से बेहतर इंतजाम करना चाहिए था। दूसरी वजह ये कि काला धन रखने वालों पर सिर्फ पुराने नोट बंद कर देने से बहुत फर्क नहीं पड़ने वाला है। सरकार काला धन रखने वालों पर और कड़ाई क्यों नहीं कर रही है। विशुद्ध राजनीतिक नजरिये से इसकी समीक्षा करना, समझना देश के इतने बड़े फैसले के समय और ज्यादा जरूरी हो जाता है। अब इसमें तो किसी को भी एतराज नहीं है कि बड़े नोटों को बंद करने का फैसला समय की जरूरत के लिहाज से बेहद जरूरी था। क्योंकि, भारत में काले धन की अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी हो गई है। कितनी बड़ी इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि भारत की पूरी अर्थव्यवस्था 2 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की है। और एक सामान्य अनुमान के मुताबिक, कम से कम 20 प्रतिशत भारत की समानांतर काले धन की अर्थव्यवस्था चल रही है। विश्व बैंक का अनुमान है कि भारत में काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था जीडीपी के 27 प्रतिशत से ज्यादा है। और कई लोग ये भी मानते हैं कि भारत में पिछले एक डेढ़ दशक में काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था जीडीपी के करीब 50 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यानी करीब 1 ट्रिलियन डॉलर की। इसका आधार भी है कि यूपीए सरकार के समय 12 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के घोटाले सामने आए। जाहिर है घोटाले की रकम अर्थव्यवस्था में पूरी तरह से सफेद धन के तौर पर तो आने से रही। इस आधार पर भारतीय अर्थव्यवस्था में जीडीपी का 50 प्रतिशत की एक काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही है। लेकिन, सबसे कम यानी 20 प्रतिशत के आंकड़े को ही लेते हैं। इस आधार पर भी भारतीय अर्थव्यवस्था में 460 बिलियन डॉलर यानी 30 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की काले धन की अर्थव्यवस्था है। भारत में काले धन की अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है, इसे समझने के लिए ये थाईलैंड और अर्जेंटीना जैसे देशों की पूरी अर्थव्यवस्था से ज्यादा है। इतना ही नहीं भारत सरकार का कुल बजट यानी साल भर खर्च करने की रकम 16 लाख करोड़ रुपये की ही है। इस पर एक तर्क बार-बार आता है कि अर्थव्यवस्था में नकद के रूप में काला धन बहुत कम है। ज्यादातर काला धन सोना, रियल एस्टेट और विदेशों में लगा हुआ है। लेकिन, इस तर्क को रखते समय जानकार इस बात का जिक्र करना भूल जाते हैं कि दरअसल सोना, रियल एस्टेट या विदेशों में जाकर काला धन होने वाली रकम पहले नकद के रूप में ही सफेद से काला धन बनती है। इसको और बेहतर तरीके से समझें तो अकाउंटेड से अनअकाउंटेड मनी हो जाती है। यानी सरकार की रकम लोग इस्तेमाल तो कर रहे होते हैं लेकिन, उस रकम पर किसी तरह की उत्पादकता नहीं होती है। और इसका उससे भी बुरा असर ये होता है कि ईमानदारी से कमाई करने वाले पीछे छूटते जाते हैं। हर साल भारतीय अर्थव्यवस्था के बढ़ने की खबर के साथ एक और खबर आती है कि भारत में अमीर-गरीब के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। उसकी सबसे बड़ी वजह यही काला धन है। इन तथ्यों के बाद इसक कदम की जरूरत पर सवाल खड़ा करना बेहद कठिन हो जाता है।
इतना तो तय है कि इससे सबसे ज्यादा फायदा गरीब और मध्यमवर्ग के लोगों को ही होने जा रहा है। वित्त मंत्री अरुण जेटली जब ये कहते हैं कि इससे अमीर-गरीब के बीच की खाई कम होगी, तो ये तथ्यों के साथ जुड़ता है। लेकिन, इस पर विरोध में एक बड़ा तर्क आता है कि काला धन रखने वाले नकद से आगे दूसरे तरीके खोज रहे हैं या चुके हैं, जिससे कि काले धन को खपाया जा सके। साथ ही ये भी सरकार सिर्फ इसी फैसले से काला धन खत्म नहीं कर सकती। इस विरोध को तो खुद प्रधानमंत्री भी मान रहे हैं। विमुद्रीकरण पर बीजेपी संसदीय समिति की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ किया है कि बड़े नोटों को खत्म करने का फैसला काला धन को खत्म करने के लिए शुरुआत भर है। और ये काला धन खत्म करने की सरकार की प्रतिबद्धता के लिए उठाए गए दूसरे कदमों के साथ एक बड़ा कदम है। अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है। इसलिए ये विरोध भी सिर्फ विरोध के लिए ही किया गया लगता है। एक बात और जो कतार में लगे लोगों को देखते हुए कही जाती है कि सरकार की सही तैयारी न होने से ये कतार अभी अगले कम से कम 6 महीने खत्म नहीं होने वाली है। इसकी वजह बताई जाती है कि 14 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के 500 और 1000 के नोट बंद हुए हैं। इनकी जगह नए नोट लाए जाने हैं। क्योंकि, सरकार की महीने की नोट छापने की क्षमता 2 लाख करोड़ रुपये से कुछ ज्यादा ही नोट छापने की है। इस लिहाज से 14 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के नोट छापने में कम से कम 6 महीने लगेंगे, वो भी पूरी क्षमता के साथ भारत सरकार के छापेखाने काम करेंगे तब। लेकिन, इस तर्क में भी काफी गड़बड़ है। गड़बड़ कहां है मैं बताता हूं भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड, जो अब तक 1000 के नोट छापता रहा है, अभी 2000 के नोट छाप रहा है। 2 शिफ्ट में काम होने पर 133 करोड़ नोट छापा जा सकता है। और अगर 3 शिफ्ट में ये काम करे, तो 200 करोड़ नोट छापे जा सकते हैं। यानी करीब साढ़े छे लाख करोड़ रुपये के 2000 के नोट 2 महीने में छापे जा सकते हैं। सरकार ये काम इसलिए कर सकती है क्योंकि, सरकार ने नोट बैंक तक पहुंचाने का पहले का 21 दिन का समय घटाकर 6 दिन कर दिया है। इससे इस सरकार के किसी काम को करने की तेजी आसानी से समझा जा सकता है। यहां एक तथ्य ये भी समझना जरूरी है कि 2000 के नोट इस फैसले को लागू करने की तारीख यानी 8 नवंबर से भी पहले से छापे जा रहे थे। इसलिए प्रधानमंत्री के बार-बार 50 दिन मांगने के पीछे सरकार की तैयारी साफ नजर आती है। हां, ये जरूर है कि 500 के नोट बाद में छापना शुरू करने की वजह से 500 मूल्य की नकदी में थोड़ा ज्यादा समय लग सकता है। इन तथ्यों से इतना तो तय है कि प्रधानमंत्री ने देश के इतिहास का ये सबसे बड़ा फैसला पूरी तैयारी के साथ लिया है। हां, इसकी वजह से आम जनता को होने वाली दिक्कतों से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन, जनता इसीलिए सरकार के फैसले के साथ खड़ी दिखती है क्योंकि, उसे लम्बे समय में अपना ज्यादा फायदा दिख रहा है।
इतनी परेशानी भरा फैसला सरकार ने क्यों लिया, इसकी वजहें हमनें समझने की कोशिश की है। अब ये समझते हैं कि आखिर इससे आम लोगों को, अर्थव्यवस्था को और सरकार को किस तरह से फायदा होने वाला है। मोटे तौर पर 3 बड़े फायदे साफ दिख रहे हैं। काला धन बाहर आएगा या पूरी तरह से अर्थव्यवस्था से ही बाहर हो जाएगा। जिससे असल अर्थव्यवस्था की मजबूती होगी। दूसरा काला धन बनने पर तत्काल प्रभाव से बड़ी रोक लगेगी। हालांकि, इसका रुकना पूरी तरह से सरकार के इस फैसले को लागू करने के तरीके से तय होगा। तीसरी बड़ी बात ये होगी कि सरकार के पास कर के रूप में बड़ी रकम आएगी। इसे विस्तार में समझें तो कर चोरी करके कमाई गई बड़ी रकम फिर से अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनेगी और इस पर लोगों को कर देना होगा। जिससे सरकारी खाते में रकम बढ़ेगी और इसी कर की रकम से ही देश के सारे तरक्की के काम होते हैं। और इसी आधार पर जीडीपी में भी बढ़त होगी। आधुनिक अर्थव्यवस्था के मानकों पर एक देश के आगे बढ़ने की सबसे जरूरी शर्तों में यही है कि देश के लोग बेहतर कमा सकें और उस पर ईमानदारी से कर दें। जिससे उस कर को सरकार फिर से देश की तरक्की में लगाए और लोगों को नया रोजगार मिले। इस प्रक्रिया में ही देश की संपत्ति बनती है और इस पूरी प्रक्रिया से जीडीपी तय होता है। माना जा रहा है कि विमुद्रीकरण की इस प्रक्रिया से एक राष्ट्र के तौर पर भारत के मजबूत होने की कहानी एक जनवरी से काफी हद तक नजर आने लगेगी। सरकार का पूरा जोर ज्यादा से ज्यादा लोगों को बैंकिंग के दायरे में लाना है। जनधन योजना और हर तरह की सब्सिडी सीधे खाते में देने के पीछे भी यही मूल विचार है। उसे आधार से जोड़कर ज्यादातर रकम को नकदी हस्तांतरण से बाहर निकालने की कोशिश है। ये होता भी दिख रहा है। तेजी से लोग इंटरनेट बैंकिंग और डिजिटल वॉलेट की तरफ बढ़ रहे हैं। एसोचैम के मुताबिक, 2022 तक भारत में 30 हजार करोड़ रुपये का कारोबार मोबाइल वॉलेट के जरिये होगा। ये अगर हुआ तो आने वाले दिनों में सरकार को कम नकदी छापने की जरूरत पड़ेगी। लम्बे समय में ये भी एक बड़ी सफलता होगी। एक और लक्षण साफ दिख रहा है कि आने वाले समय में ब्याज दरें घटने वाली हैं। लोगों को और उद्योगपतियों को आसानी से सस्ता कर्ज देने के लिए बैंकों के पास ढेर सारी रकम आ गई है। साथ ही काले धन की अर्थव्यवस्था पर चोट पड़ने से जरूरी सामानों के दाम की कीमत भी सही स्तर पर आएगी। यानी महंगाई में भी कमी देखने को मिलेगी। महंगाई सिर्फ खाने-पीने के सामानों में ही नहीं कम होगी। आम लोगों का घर खरीदने का सपना भी पूरा हो सकता है। सबसे ज्यादा काला धन रियल एस्टेट क्षेत्र में ही लगा हुआ है। वो काला धन कम होगा तो इससे घरों का सस्ता होना तय है। बैंकिंग और रियल एस्टेट पर देश के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति दीपक पारेख का कहना है कि ये बहुत ही शानदार फैसला है। इससे कम से कम आधा से एक प्रतिशत ब्याज दरें घटेंगी। पारेख का ये भी कहना है कि भारत ऐसी मजबूत स्थिति में कभी नहीं रहा है। महंगाई कम होने और आसानी से कर्ज मिलने से उद्योगों को भी नए प्रोजेक्ट शुरू करने में आसानी होगी। और इसका सीधा असर लोगों को मिलने वाले नए रोजगार के तौर पर होगा। भ्रष्टाचार में बड़ी कमी तुरंत आती दिख रही है और अगर आगे सरकार ने इस मामले में कड़ाई बरती तो भ्रष्टाचार करने वालों को डर लगेगा। भ्रष्टाचार में आई कमी से विदेशी कंपनियां भी भारत में निवेश के लिए तैयार होंगी। साथ ही सरकारी दफ्तरों से चलने वाली फाइलों की रफ्तार में तेजी आएगी। कुल मिलाकर भारत में कारोबार करना आसान हो जाएगा। एक बहुत बड़ा फायदा नकली नोट पर रोक लगाने और आतंकवादियों को इसका इस्तेमाल करने से रोकने में होगा।

नरेंद्र मोदी पर सबसे बड़ा आरोप यही लग रहा है कि बिना तैयारी के इतना बड़ा, जनता को परेशानी में डालने वाला फैसला थोप दिया गया। सरकार की किसी तरह की तैयारी नहीं थी। एटीएम मशीनों को पूरी तरह से दुरुस्त न करने और अब इतने दिन बीतने के बाद भी एटीएम में रकम न होने से इस आरोप को मजबूत किया जा सकता है। लेकिन, नोटों को ले जाने में लगने वाला समय घटाने, हर कुछ दिन में फैसले में लगातार होने वाले संशोधन को इस नजरिये से देखा जा सकता है कि सरकार जनता की परेशानी कम करने के साथ ही काले धन को सफेद बनाने की नई व्यवस्था पर रोक लगाने की भी हर सम्भव कोशिश कर रही है। फिर वो कर कानून में संशोधन हो या फिर जनधन खाते से 10 हजार रुपये से ज्यादा रकम निकालने पर रोक लगाना हो। देश की आर्थिक नीति, नजरिये के साथ सामाजिक नीति, नजरिये में भी बदलाव की ये पक्की बुनियाद है। जिसके बेहतर आर्थिक परिणाम 1 अप्रैल 2017 से शुरू होने वाली तिमाही से दिखने लगेंगे। संयोगवश यही वो तारीख है जब सरकार अब तक का सबसे बड़ा कर सुधार जीएसटी लागू करने जा रही है।


Sunday, December 04, 2016

सम्पादक, किताब, विमुद्रीकरण और मोदी सरकार

 जब मैं 2008 दिसंबर में सीएनबीसी आवाज़ मुंबई से दिल्ली भेजा गया, तो सबने ढेर सारी नसीहतें, अनुभव, हिदायत दिया। आलोक जी ने ये किताब दी। किताब पर आलोक जी का लिखा मेरे लिए बड़ी ताक़त है। आधार का आधार स्तम्भ नंदन नीलेकनि की लिखी #ImaginingIndia आलोक जोशी अब आवाज़ के सम्पादक हैं और उन्होंने सम्पादक बनने के बाद जो पहला काम किया वो था हर हफ़्ते २ किताबें की टीवी पर बात। बेहद जरूरी है टीवी देखने वाले समझें कि किताब क्यों जरूरी है। और ये भी कि टीवी सिर्फ़ तमाशा नहीं है। सम्पादकों को दरअसल अपने साथ रिपोर्टर को, डेस्क पर काम करने वाले को ज्यादा से ज्यादा किताब पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। अच्छी पीटीसी भी रिपोर्टर बिना अच्छा और खूब पढ़े नहीं लिख सकता। और यही हाल डेस्क पर बैठे पत्रकार का भी होता है, जब वो अलग से पढ़ता नहीं है। आजकल के भला कितने सम्पादक हैं, जो पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। देश के अतिप्रतिष्ठित पत्रकार रामबहादुर राय ने एक बार मुझे बताया कि रात में सोने से पहले 2 घंटे वो पढ़ते जरूर हैं। मैंने भी उस दिन के बाद कई दिन पढ़ा, फिर छूट जाता है। लेकिन, बीच-बीच में क्रम चला लेता हूं।


अख़बार में नंदन के मोदी सरकार के विमुद्रीकरण पैनल में शामिल होने की ख़बर पढ़ी तो इसी बहाने ये लिख रहा हूँ। उस किताब को पढ़ते समझ में आता है कि बदलते भारत को किस तरह से झेलना पड़ा कुछ काम समय से न कर पाने की वजह से। ये भी एक ऐसा ही काम है। हालाँकि, नंदन अपनी किताब में बदलते भारत का मज़बूत पक्ष अंग्रेज़ ज्ञान वाले बढ़ते भारतीयों को बताते हैं। यहीं हमारा मतैक्य नहीं है। नंदन बेंगलुरू दक्षिण से कांग्रेस से २०१४ का लोकसभा चुनाव लड़े थे। फिर भी मोदी सरकार ने उन्हें अपने साथ लिया है। इस विषय पर उनकी विशेषज्ञता को देखते बेहद अच्छा फैसला। फिर कह रहा हूँ सरकार सही रास्ते पर है।

Saturday, December 03, 2016

नोटबंदी की मुश्किल और मोदी सरकार के खिलाफ खड़ी बड़ी आफत की पड़ताल

दृष्य 1-
8 नवंबर को 8 बजे जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को अब तक के सबसे बड़े फैसले की जानकारी दी, तो देश के हर हिस्से में हाहाकार मच गया। देश में काला धन रखने वालों, रिश्वतखोरों के लिए ये भूकंप आने जैसा था।
दृष्य 2-
दिल्ली के चांदनी चौक, करोलबाग इलाके में गहनों की दुकान पर रात आठ बजे आए भूकंप का असर अगली सुबह तक दिखता रहा। नोटों को बोरों में और बिस्तर के नीचे दबाकर रखकर सोने वालों की बड़ी-बड़ी कारें जल्दी से जल्दी सोना खरीदकर अपना पुराना काला धन पीले सोने की शक्ल में सफेद कर लेना चाहती थीं। और ये सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, देश के लगभग हर शहर में हुआ। पीला सोना काले धन को सफेद करने का जरिया बन गया।
दृष्य 3-
उत्तर प्रदेश और पंजाब इन दो राज्यों में स्थिति कुछ ज्यादा ही खराब हो गई। दोनों ही राज्यों में चुनाव नजदीक होने की वजह से राजनीतिक दलों से लेकर चंदा देने वालों के पास ढेर सारी नकद रकम जमा थी। इस रकम को ठिकाने लगाने की मुश्किल साफ नजर आ रही थी। जाहिर है जिन राजनेताओं के पास बड़ी रकम पुराने नोट के तौर पर आ गई थी, उनके लिए मोदी सरकार का ये फैसला जहर पी लेने के समान दिख रहा था।  
दृष्य 4-
मुंबई, दिल्ली से लेकर देश के छोटे बड़े शहरों में अब तक बैंकिंग की सेवाओं से काफी हद तक बाहर रहने वाला समुदाय इसे अपने खिलाफ मोदी सरकार की साजिश मान बैठा। लेकिन, विदेशों से आने वाले चंदे की रकम अब पूरी तरह से मिट्टी होती दिख रही थी।
दृष्य 5-
काले धन के बल पर चल रहा रियल एस्टेट क्षेत्र के बड़े खिलाड़ी पहले ही दिवालिया होने के हाल में पहुंच रहे थे। अचानक काले धन पर इतनी बड़ी चोट से बौखलाए रियल एस्टेट कारोबारियों ने इसमें भी रकम बनाने का रास्ता निकालने की कोशिश शुरू कर दी।

हिन्दुस्तान के लोकतांत्रिक इतिहास में किसी राजनेता के इतना बड़ा फैसला लेने की ये पहली घटना थी। और इस घटना के बाद देश में ऊपर जैसे ही नजारे आम हो गए। जिस देश में काला धन और भ्रष्टाचार को एक कभी न खत्म होने वाली सच्चाई के तौर पर स्वीकार कर लिया गया हो, वहां ऐसे किसी फैसले की कल्पना भी नहीं की जा रही थी। यही वजह थी पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखराम से शुरू हुआ नोटों के बिस्तर पर सोने का सिलसिला भारतीय समाज में कोढ़ की तरह फैल गया। इसीलिए जब इस कोढ़ के इलाज की कोशिश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू की तो इस कोढ़ में आनंद खोजने के आदती समाज के एक बड़े हिस्से ने इसे ध्वस्त करने का बड़ा अभियान शुरू कर दिया।

संगठित तरीके से समूह में पुराने नोट बदलने की कोशिश
9 तारीख को बैंक और एटीएम बंद रहे। लेकिन, जैसे ही 10 तारीख को बैंक खुले। काले धन के कुबेरों ने अपना काम शुरू कर दिया। सरकार की तरफ से साफ किया गया था कि जिसका पैसा जायज है, उसे किसी तरह की कोई मुश्किल नहीं आने वाली। लेकिन, जिनके पास काला धन अब भी है, वो किसी भी कीमत पर बख्शे नहीं जाएंगे। काले धन के कुबेर डरे लेकिन, उन्होंने बैंकों में 500, 1000 के पुराने नोटों के बदले नए नोट लेने के लिए संगठित तरीके से लोगों को कतारों में खड़ा कर दिया। नोटबंदी के सरकार के फैसले पर सबसे बड़ी चोट इसी जरिये से की गई। काले धन के कुबेरों ने बाकायदा समूह में लोगों को एक ही शहर की अलग-अलग बैंकों की शाखाओं में और कई बार तो दूसरे इलाकों में भी समूह में लोगों को भेजकर नोट बदली कराई। आम लोगों को परेशानी न हो इसके लिए 4000 रुपये के नोटों की बदली के सरकार के फैसले को काले धन के कुबेरों ने अपना बड़ा अस्त्र बना लिया था। इससे उनका काला धन धीरे-धीरे ही सही सफेद हो रहा था। साथ ही बैंकों और बाद में एटीएम के सामने लगी लंबी कतारें सरकार के इस फैसले के खिलाफ जनमानस बनान की कोशिश कर रही थीं। हालांकि, आम जनता के इस फैसले के पक्ष में होने से ये कोशिश परवान नहीं चढ़ सकी।

मीडिया की पहुंच वाले इलाके में भीड़ बढ़ाने की कोशिश
संसद मार्ग के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में लंबी कतारें लग गईं थीं। और सिर्फ संसद मार्ग के स्टेट बैंक में ही नहीं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से लेकर लुटियन दिल्ली के हर इलाके में लंबी-लंबी कतारें थीं। और ऐसी ही कतार मुंबई के भी प्रमुख इलाके में लगनी शुरू हो गई थी। शास्त्री भवन के एटीएम की कतार में तो मेवात तक से आए लोग मिल गए। कमाल की बात ये कि ज्यादातर लोग किसी समूह में आए थे। पूछने पर उन लोगों का कहना था कि हमारे मेवात में एटीएम मशीन नहीं है। इसलिए हमे यहां आना पड़ा। लेकिन, बड़ा सवाल ये कि मेवात से चलकर दिल्ली के शास्त्री भवन में लगे एटीएम से पैसे निकालने के लिए कतार में ही क्यों लगे। दरअसल एक बड़ा ट्रेंड इस पूरे मामले में ये भी दिखा कि बड़ी भीड़ उन इलाकों में ही लग रही थी, जो ज्यादातर मीडिया की पहुंच के इलाके थे। नोटबंदी के फैसले के एक हफ्ता बीत जाने के बाद भी मीडिया में किसी गांव के या छोटे शहरों के इलाके से ऐसी कोई खबर नहीं आई, जिसमें ये दिखता हो कि लोगों को नकद रकम की इतनी बड़ी दिक्कत हो गई हो कि नेताओं को इसे आर्थिक आपातकाल बोलना पड़ जाए। हां, दिल्ली-मुंबई के हर इलाके में जरूर एटीएम पर लंबी कतारें देखने को मिलीं। इसके पीछे बड़ी वजह वही कि कैमरे के सामने ये कतारें नजर आएं।

बैंकिंग सेवाओं के दायरे से बाहर का बड़ा वर्ग कतार में खड़ा हो गया
लोगों तक बैंकिंग सेवा पहुंचाने की सबसे बड़ी मुहिम जनधन के खाते खोलने के अतिसफल अभियान के बाद भी देश के करोड़ो लोग ऐसे हैं, जिनकी पहुंच बैंकिंग सेवाओं तक है ही नहीं। बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो बैंकिंग सेवा में शामिल भी नहीं होना चाहता। यहां तक कि बैंक खाता खुला भी तो उसका इस्तेमाल सिर्फ रकम जमा करने तक ही सीमित रहा। ऐसा वर्ग दरअसल ज्यादातर नकद पूंजी के जरिये ही जीवनयापन कर रहा था। अब मजबूरी में घर में पड़े 500 और 1000 के पुराने नोटों की वजह से वो बैंक की कतार में आ खड़ा हुआ। टीवी पत्रकार ऋषिकेश कुमार कहते हैं कि दरअसल इस फैसले से एक बड़ा वर्ग बैंकिंग सिस्टम के दायरे में आ जाएगा, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिहाज से बेहतर होगा।

सोना कारोबारियों ने भी बढ़ाईं कतारें
8 तारीख की रात से 9 नवंबर की सुबह तक 20-40% ज्यादा भाव पर पुराने नोट लेकर सोना बेचने वालों के लिए अपने नोट बदलने का मौका 30 दिसंबर तक का ही दिख रहा है। इसीलिए उन्होंने दिहाड़ी मजदूरों को दिन भर के लिए कतारों में खड़ा कर दिया। हालांकि, काले धन के बदले सोना देकर फिर उसे सफेद करने की कोशिश में लगे गहना कारोबारियों पर सरकार, आयकर विभाग की कड़ी नजर है। लगातार पड़े छापों के बाद तेजी से चढ़ा सोने का दाम उसी तेजी से गिर भी गया।

राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की कतार
उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहां आने वाले दिनों में चुनाव होने वाले हैं। वहां राजनीतिक पार्टियों से लेकर नेताओं ने चुनाव की तैयारी में बड़ी नकद रकम इकट्ठा कर रखी है। इस इकट्ठा रकम को ठिकाने लगाने के लिए रैली की शक्ल में बैंक और एटीएम में कतारें लग गईं। हर नेता इकट्ठा चंदे की रकम ज्यादा से ज्यादा बचा लेने की जुगत में लगा हुआ है। इतना ही नहीं विपक्ष के कई नेताओं के बयान जिस तरह से बार-बार कानून व्यवस्था बिगड़ने का हवाला दे रहे हैं। इससे ये भी आशंका बलवती होती है कि कहीं वो अपने कार्यकर्ताओं को संगठित तौर पर भीड़ बढ़ाने का संदेश तो नहीं दे रहे हैं। 

छोटे शहरों में बैंक अधिकारियों की गड़बड़
उत्तर प्रदेश के बलिया, आजमगढ़ जैसे जिलों से कुछ अलग तरह की ही खबरें आ रही हैं। बलिया के रहने वाले राजीव रंजन सिंह बताते हैं कि 10, 11 तारीख को बैंकों में लोगों को कम नकद होना बताकर 500 रुपये ही दिए गए। लेकिन, आशंका इस बात की है कि लोगों का पहचान पत्र लेकर उनके हिस्से के बचे 3500 रुपये उन लोगों को दे दिए गए, जो बैंकों के बड़े खातेदार थे। जिनके पास पुराने 500 और 1000 के नोट बड़ी मात्रा में थे।

काला-सफेद करने में जुटे बिल्डरों की लगाई कतार
ये लगभग घोषित तौर पर छिपी हुई बात है कि सबसे ज्यादा काला धन रियल एस्टेट क्षेत्र में ही लगा हुआ है। और यही वजह है कि जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद रियल एस्टेट में काले धन पर रोक लगानी शुरू की, तो इस क्षेत्र में मंदी देखने को मिली। अब पुराने 500 और 1000 के नोट बंद करने का मोदी सरकार का फैसला 100-200% मुनाफा कमाने के आदी रहे बिल्डरों के लिए ये जीवन-मरण जैसा प्रश्न हो गया है। इसलिए बिल्डरों ने इसी का फायदा उठाते हुए चुनाव वाले राज्यों की राजधानी लखनऊ और चंडीगढ़ में अपने प्रतिनिधि बिठा दिए। इनके जरिए आने वाले काले धन को वो अपने यहां काम करने वाले मजदूरों के जरिए नोट बदली कराकर सफेद कराने में जुट गए। 30-50% रकम लेकर बिल्डर काला धन सफेद करने में जुटे हैं। बिल्डरों के यहां छापे इस बात का सबूत देते हैं कि सरकार को भी इस बात की जानकारी मिल रही है।

जनधन खाते खरीदने का सिंडिकेट
मुंबई, दिल्ली से लेकर देश के छोटे-छोटे शहरों तक जनधन खातों के जरिए काला धान सफेद करने की कोशिश ने भी बैंकों और एटीएम में कतार बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। जनधन खातों में 2-2.5 लाख रुपये जमा कराए जा रहे हैं और अगले 2-3 महीने बाद वो रकम वापस लिए जाएंगे। पहले पुराने नोट जमा कराए जा रहे हैं। उसके 2-3 महीने बाद वो रकम धीरे-धीरे वापस कर दी जाएगी।

हवाला कारोबारियों ने बढ़ाई कतारें
मुंबई में 17% से शुरू हुआ पुराने नोटों को नए नोटों से बदलने का काम अब 40-50% पर हो रहा है। दरअसल सरकार ने शुरू में आम लोगों की परेशानी को ध्यान में रखकर जो कुछ रास्ते छोड़े थे, उन रास्तों से इस तरह के लोग घुस रहे थे। इन संगठित कारोबारियों में हवाला के जरिये पैसे उठाने वाला नेटवर्क शामिल था। जो एक शहर से रकम उठाकर दूसरे शहरों में नोटों की बदली संगठित तरीके से करा रहा था।

बेरोजगारों को मिला दिहाड़ी का काम, एटीएम-बैंकों में बढ़ी कतार
देश में बड़ी बेरोजगारी का फायदा उठाकर काला धन रखने वालों ने बाकायदा यही रोजगार दे दिया। 200-500 रुपये रोज पर लोगों को बैंकों और एटीएम की कतार में लगाया गया। ऐसे लोग दिन भर कतारों में खड़े होकर आम लोगों के हिस्से की रकम निकालते रहे।

महिलाओं का घर का पैसा बैंकों में पहुंचा
भारतीय परिवारों में ज्यादातर घरेलू महिलाओं ने बचाकर पैसे घर में रखे हैं। इसलिए जब अचानक सरकार ने 500 और 1000 के पुराने नोट बंद करने का एलान किया, तो महिलाओं के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई। वो जल्दी से जल्दी अपनी बचाई रकम जमा करने के लिए बैंक की कतार में खड़ी हो गईं। हालांकि, महिलाओं को डर भी है कि कहीं उन्हें नोटिस न भेज दी जाए। महिलाओं को आयकर विभाग की नोटिस भेजी गई, तो ये सरकार के खिलाफ जा सकता है। सरकार को ये व्यवस्था करनी होगी कि ऐसी नोटिस महिलाओं को न जाए। ऋषिकेश ने जनकपुरी की महिलाओं से बात की। उनका साफ कहना था कि हमारा पैसा तो सबके सामने आ गया। लेकिन, अब हमें इस बचत की सजा नहीं मिलनी चाहिए।

कतार में भी नाराज नहीं है आम आदमी
2 लाख एटीएम में से सिर्फ 1.20 लाख एटीएम ही सही हाल में हैं। इसलिए सचमुच लोगों को परेशानी तो हो रही है। लेकिन, इस सारी परेशानी के बावजूद ज्यादातर इलाके में घंटों कतार में खड़े होने के बावजूद आम आदमी इस फैसले में नरेंद्र मोदी के साथ खड़ा नजर आ रहा है। दिल्ली के महरौली, बदरपुर इलाके में लोगों से बातचीत में ये सामने आया कि आम आदमी का भरोसा मोदी पर मजबूत हुआ है। यहां तक कि रोज खाने कमाने वाले तबके के लोग भी संगम विहार और देवली जैसी जगहों पर घंटों कतार में लगने के बाद भी ये कह रहे हैं कि इससे उन्हें जो तकलीफ है, वो झेल लेंगे। बड़ी चोट तो अमीरों को लगी है। वो कैसे झेलेंगे। नरेंद्र मोदी कतार में खड़े हिन्दुस्तान के नायक जैसे नजर आ रहे हैं।


कुल मिलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ये फैसला विपक्षियों को भी विरोध का मौका नहीं दे रहा है। क्योंकि, देश की आम जनता को लग रहा है कि ये फैसला उन्हें अच्छे से जीने की जमीन तैयार करेगा। और बड़ी मुसीबत उन लोगों के लिए करेगा जिनके पास काला धन, भ्रष्टाचार का पैसा है। इसीलिए कतारों में खड़ा, फंसा होने के बाद भी हिन्दुस्तान नरेंद्र मोदी के साथ खड़ा है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि सरकार एटीएम नेटवर्क दुरुस्त करे और बैंकों में आने वाले आम आदमी को उसकी जरूरत भर का पैसा आसानी से उपलब्ध कराए। जिससे संगठित तौर पर कतार तैयार करके इस बड़े फैसले को ध्वस्त करने की कोशिशों पर करारी चोट की जा सके। 

Friday, December 02, 2016

बीजेपी संगठन में भला कोई क्यों काम करे?

भारतीय जनता पार्टी ने लम्बे समय से इंतजार कर रही दिल्ली और बिहार इकाई को उनका नया अध्यक्ष दे दिया है। मनोज तिवारी को दिल्ली का अध्यक्ष बना दिया गया है। साथ ही बिहार इकाई का अध्यक्ष नित्यानंद राय को बना दिया गया है। उत्तर पूर्वी दिल्ली से बीजेपी सांसद मनोज तिवारी गायक हैं, भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता हैं। संगठन में कोई खास काम नहीं किया है। लोकसभा चुनाव के ठीक पहले ही बीजेपी में आए हैं। नित्यानंद राय 4 बार विधायक रहे हैं और इस समय उजियारपुर संसदीय क्षेत्र से सांसद हैं। पहली नजर में तिवारी और राय के बीच कोई समानता नहीं नजर आती। लेकिन, इन दोनों के बीच एक ऐसी समानता है जिसने चुनाव वाले राज्य उत्तर प्रदेश के बीजेपी नेताओं की परेशानी बढ़ा दी है। दरअसल दोनों ही लोकसभा सांसद हैं। जनप्रतिनिधि हैं यानी चुनाव में इनको पहले टिकट मिला, फिर पदाधिकारी भी बना दिए गए। यही वो समानता है जिसने यूपी बीजेपी के नेताओं की परेशानी बढ़ा दी है। बीजेपी के टिकट की कतार में लगे नेता नई उलझन में हैं। दरअसल बीजेपी में एक अनकहा सा फरमान है कि किसी भी पार्टी पदाधिकारी को टिकट नहीं दिया जाएगा। इस चक्कर में कई लोगों को यूपी बीजेपी की नई टीम बनाते समय उसमें शामिल नहीं किया गया। उसके पीछे बड़ी सीधी सी वजह ये कि पार्टी पदाधिकारी चुनाव लड़ाने का काम करेंगे और ज्यादा से ज्यादा सीटों पर पार्टी प्रत्याशी को जिताने में जुटेंगे जबकि, खुद चुनाव लड़ने पर प्रत्याशी सिर्फ अपनी सीट के बारे में ही सोच सकेगा। इसी फॉर्मूले के तहत बहुत से लोगों को बीजेपी में पदाधिकारी नहीं बनाया गया। चुनावी रणनीति के लिहाज से ये काफी हद तक सही भी माना जा सकता है। लेकिन, उत्तर प्रदेश में हालिया पदाधिकारियों की नियुक्ति ने बीजेपी नेताओं को एक नई पहेली सुलझाने के लिए दे दी है। वो पहेली ये कि क्या अब बीजेपी में ज्यादातर पदाधिकारी सिर्फ जनप्रतिनिधि ही होंगे। कम से कम हाल में नियुक्त पदाधिकारियों के चयन से तो यही संदेश जाता दिखता है। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या बनाए गए। केशव इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से चुनकर आए हैं।

केशव के अलावा शिवप्रताप शुक्ला उत्तर प्रदेश बीजेपी के उपाध्यक्ष हैं और साथ ही उन्हें पार्टी ने राज्यसभा में भी भेज दिया है। दूसरे उपाध्यक्षों में धर्मपाल सिंह विधायक हैं, आशुतोष टंडन (गोपाल) विधायक हैं। गोपाल टंडन लालजी टंडन के बेटे हैं। कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह भी सांसद हैं और प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। सांसद सतपाल सिंह को भी प्रदेश का उपाध्यक्ष बनाया गया है। सुरेश राणा भी विधायक हैं, साथ ही प्रदेश उपाध्यक्ष भी। कानपुर से विधायक सलिल विश्नोई को भी पार्टी का महामंत्री बनाया गया है। जनप्रतिनिधियों का कब्जा सिर्फ अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महामंत्री की कुर्सी तक ही नहीं है। एक महिला मोर्चा को छोड़कर यूपी में बीजेपी के सभी मोर्चे के अध्यक्ष जनप्रतिनिधि ही हैं। पिछड़ा मोर्चा का अध्यक्ष राजेश वर्मा को बनाया गया है। राजेश वर्मा सीतापुर से सांसद हैं। युवा इकाई का अध्यक्ष सुब्रत पाठक को बनाया गया है। सुब्रत पाठक कन्नौज से डिम्पल यादव के खिलाफ चुनाव लड़े थे और करीब 15 हजार मतों से हार गए थे। यानी पार्टी ने पहले सुब्रत को टिकट दिया और अब उन्हें पदाधिकारी भी बना दिया। सुब्रत पाठक कन्नौज के मजबूत नेताओं में हैं। लेकिन, सवाल वही है कि क्या बीजेपी में राजनीति करने वाले सिर्फ वही नेता महत्व पाएंगे, जो टिकट पाकर चुनाव जीत सकेंगे या चुनाव जीतने की हैसियत रखते हैं। यहां तक कि यूपी में अनुसूचित मोर्चा के अध्यक्ष कौशल किशोर भी सांसद हैं और अनुसूचित जनजाति मोर्चा अध्यक्ष छोटेलाल खरवार सोनभद्र से सांसद हैं। राजेश वर्मा और कौशल किशोर दोनों ही लोकसभा चुनाव से ठीक पहले ही बीजेपी में आए हैं। जनप्रतिनिधि को ही पदाधिकारी बनाने और पदाधिकारी को ही जनप्रतिनिधि बना देने की ये नई परम्परा यहीं खत्म नहीं होती है। उत्तर प्रदेश को अपने काम के लिहाज से बीजेपी ने 8 क्षेत्रों में बांट रखा है। उन 8 क्षेत्रों में से 3 के अध्यक्ष जनप्रतिनिधि ही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाले काशी क्षेत्र के अध्यक्ष  लक्ष्मण आचार्य हैं और उन्हीं को पार्टी ने विधान परिषद सदस्य भी बनाया। पश्चिम क्षेत्र के अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह विधान परिषद के सदस्य हैं। अवध क्षेत्र के अध्यक्ष मुकुट बिहारी वर्मा भी विधायक हैं।


सामान्य तौर पर देखने पर इसमें कोई भी गड़बड़ी नजर नहीं आती। लेकिन, ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों का आधार मजबूत करने में बड़े आधार वाले नेताओं के साथ शानदार संगठन करने वाले नेताओं की भी बड़ी भूमिका रही है। भारतीय जनता पार्टी तो मूलत: संघ के पूर्णकालिक संगठन मंत्रियों के आधार पर संगठन तैयार करने वाली पार्टी रही है। जहां संगठन में अच्छा काम करने वालों को ही पदाधिकारी बनाए जाने की परम्परा रही है। अब सवाल ये है कि अगर जनप्रतिनिधियों को ही पदाधिकारी और पदाधिकारी को ही मनोनीत जनप्रतिनिधि बनाने की ये परम्परा मजबूत हो रही है, तो कौन संगठन का काम करेगा। भारतीय जनता पार्टी सत्ता में है, लगातार चुनाव जीत रही है। अभी हो सकता है कि इस गलत परम्परा के खतरे न दिख रहे हों। लेकिन, जब पार्टी का चुनावी आधार हल्का पड़ेगा, तो संगठन में काम करने वाले भी शायद ही मिलेंगे। संगठन हो या सरकार बीजेपी कुछ ही लोगों के हाथ में हर तरह की सत्ता जाने के बड़े खतरे की ओर बढ़ रही है। 
(ये लेख QUINTHINDI पर छपा है)

Thursday, December 01, 2016

आर्थिक फैसले पर राजनीतिक प्रतिक्रिया से देश का भरोसा खोता विपक्ष

2 दिसंबर को दैनिक जागरण के संपादकीय पृष्ठ पर
नोटबन्दी के फैसले ने देश की जनता को परेशान किया है। रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने में मुश्किल हो रही है। कई जगह पर तो लोगों को बेहद सामान्य जरूरत पूरा करने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ी है। ये सब सही है। लेकिन, आम जनता की परेशानी की असली वजह क्या है, इस पर पहले बात करनी चाहिए। दरअसल आम जनता को होने वाली इस सारी परेशानी की वजह नरेंद्र मोदी सरकार का वो फैसला है, जिसके बाद 500 और 1000 रुपये के नोट बंद करने की जरूरत आ पड़ी। इस वजह से देश की आम जनता परेशान है। वो कतारों में है। अपने पुराने नोट बदलने के लिए बैंकों की कतार में है। 2000 रुपये निकालने के लिए एटीएम की कतार में है। इस स्थिति को देखकर ये लगता है कि जैसे देश बड़ी मुश्किल में है। लेकिन, जनता के मन में एक भावना आसानी से देखी जा सकती है कि प्रधानमंत्री के इस फैसले को ज्यादातर जनता हर तरह की परेशानी के बाद भी काला धन रखने वालों, भ्रष्टाचारियों के खिलाफ देखी जा रही है। और जनता की इस भावना ने दरअसल देश के विपक्ष के लिए कतार में लगी जनता से ज्यादा परेशानी की जमात खड़ी कर दी है। परेशान विपक्ष इस कदर है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी परेशानी के इस समय में बंगाल की जनता को छोड़कर दिल्ली की आजादपुर मंडी में रैली कर रही हैं। रैली में उनके साथ आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हैं। केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं, इसलिए केजरीवाल का दिल्ली के आजादपुर में नोटबंदी से व्यापारियों को होने वाली मुश्किलों पर रैली करना सही राजनीति माना जा सकता है। लेकिन, ये कितनी सही राजनीति है या खराब राजनीति को सही साबित करने की कोशिश, ये इससे भी समझ में आता है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री के तौर पर अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की परेशान जनता की परेशानियों को कम करने की कोई कोशिश नहीं की। और ममता बनर्जी तो इस मामले में और भी खराब राजनेता साबित होती दिख रही हैं। जब मुख्यमंत्री के तौर पर ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल की जनता को नोटबंदी से होने वाले नफा-नुकसान के बारे में समझाना चाहिए था, उनके जीवन की मुश्किलों को आसान करने के रास्ते बताने चाहिए थे, उस समय ममता बनर्जी देश की राजधानी दिल्ली में आजादपुर में रैली कर रही थीं। ममता और केजरीवाल ये कह रहे थे कि कभी भी इसकी वजह से देश में दंगे हो सकते हैं। इतना ही नहीं उन्होंने एक संयुक्त विपक्ष जैसा माहौल बनाने की कोशिश की। मुद्दा सही हो तो ये कोशिश सराही जानी चाहिए। ममता बनर्जी की ये सफलता कही जा सकती है कि उन्होंने कम से कम इसी मुद्दे के बहाने एनडीए के दो सहयोगियों को सरकार के खिलाफ खड़ा करके दिखा दिया। हालांकि, इन दोनों सहयोगियों का सरकार के खिलाफ खड़ा होना लंबे समय से होता दिख रहा था। नोटबंदी के मुद्दे पर शिवसेना और अकाली दल का सरकार के खिलाफ खड़े होने की अपनी वजहें हैं और बिना बहस इसका नए नोट के लिए कतार में लगी जनता की परेशानी से कोई वास्ता नहीं है। पंजाब में चुनाव के लिए रकम जुटाकर रखने वाले अकाली दल की इस फैसले से परेशानी समझी जा सकती है। पंजाब में कार्यकर्ताओं की पक्का वाला नेटवर्क खड़ा हो गया होता, तो शायद ही पंजाब का चुनाव भाजपा-अकाली साथ लड़ते। एनडीए के दूसरे सहयोगी शिवसेना की मुश्किल यही है कि बालासाहब के समय तक राज्य में बड़े भाई से शिवसेना बीजेपी में अमित शाह के आते ही छोटे भाई की भूमिका में आ गई है। इससे साफ साबित होता है कि एनडीए के दोनों सहयोगियों की भी इस इतने बड़े आर्थिक फैसले पर नाराजगी की वजह घोर राजनीतिक है।
साफ है ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, अकाली दल, शिवसेना, समाजवादी पार्टी का ये राजनीतिक विरोध है। लेकिन, बड़ा सवाल है कि पूरी तरह से आर्थिक फैसले को क्या विपक्ष पूरी तरह से राजनीतिक विरोध की कसौटी पर कसकर जनता का विश्वास जीत सकता है। इसका जवाब देश के दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों के व्यवहार से आसानी से समझा सकता है। इन दो मुख्यमंत्रियों में से एक हैं विधानसभा चुनाव के ठीक पहले बीजेपी से अलग हुए नीतीश कुमार और दूसरे अभी बीजेपी के साथ खड़े चंद्रबाबू नायडू। नायडू दक्षिण भारत में भाजपा के मजबूत और महत्वपूर्ण सहयोगी हैं और नीतीश कुमार उत्तर भारत में मोदी विरोधी गठजोड़ के महत्वपूर्ण नेता। लेकिन, इन दोनों ही मुख्यमंत्रियों ने हिन्दुस्तान के इस सबसे बड़े आर्थिक फैसले पर आर्थिक नजरिये से प्रतिक्रिया देकर राजनीतिक बढ़त भी हासिल कर ली है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पूरी तरह से इस फैसले के साथ खड़े हैं। नीतीश कुमार ने कहाकि इससे काला धन, भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने तो पहले ही प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर बड़े नोटों को खत्म करने की मांग की थी, जिससे काले धन पर रोक लगाई जा सके। जैसे ही प्रधानमंत्री ने 500 और 1000 के पुराने नोटों को खत्म किया। उसी समय चंद्रबाबू नायडू हरकत में आ गए। आंध्र प्रदेश में सरकार ने बैंकों और डाकघरों में कतार में खड़े लोगों की परेशानी कम करने के लिए पीने के पानी और दूसरी सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय से महिलाओं, बुजर्गों और दिव्यांगों के लिए अलग काउंटर की व्यवस्था के निर्देश जारी किया गया। कहा जाता है कि कई बार बैंकों से पपहले मुख्यमंत्री कार्यालय के पास ये खबर होती है कि कहां कितनी नोट आने वाली है। नायडू ने वित्त मंत्रालय को चिट्ठी लिखकर विमुद्रीकरण से जनता खासकर छोटे कारोबारियों, सड़क के किनारे ठेला लगाने वालों की मुश्किलें आसान करने को कहा है।

नोटबंदी के सरकार के फैसले के खिलाफ विपक्ष को तर्कों के साथ आना चाहिए था। और अगर सरकार ने कोई गलत फैसला लिया, तो उसका जमकर विरोध विपक्ष को करना चाहिए। लेकिन, हुआ क्या? हुआ ये कि दरअसल विपक्ष के पास सरकार के नोटबंदी के फैसले के विपक्ष में कोई सटीक तर्क नहीं है। यहां तक कि कतार में लगी जनता ने भी जब अरविंद केजरीवाल जैसे आंदोलनप्रिय और आरोप उछालकर राजनीति करने वाले नेताओं को भगाना शुरू किया तो भी इन्हें समझ नहीं आया कि जनता क्या चाहती है? ये समझना इसलिए भी जरूरी है कि क्योंकि, राजनीति के अंतिम परिणाम के तौर पर नेता जनता को अपने पक्ष में चाहता है। ये बात विपक्ष के नेता नहीं समझ सके और कुतर्क की तरफ बढ़ चले। उससे भी बात नहीं बनी तो साजिश के सिद्धान्त पर बाखूबी काम किया गया। उदाहरण के तौर पर भारतीय जनता पार्टी की बंगाल इकाई के खाते में दो किस्तों में एक करोड़ रुपये जमा करने की बात प्रचारित की गई। जिससे साबित किया जा सके कि नोटबंदी की खबर पहले ही लीक कर दी गई थी। दूसरा साजिशी सिद्धान्त आया जिसमें भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य की बेटी को 2000 के नोटों की गड्डियों के साथ दिखाया गया। वो खबर पूरी तरह से गलत निकली। मौर्य ने बताया कि उनके कोई बेटी है ही नहीं। ये कुछ उदाहरण भर हैं। और ये उदाहरण साबित करते हैं कि दरअसल विपक्ष के पास इस मामले विरोध के लिए कोई सही तर्क, तथ्य हैं ही नहीं।
ऐसा नहीं है कि विपक्ष को राजनीति के लिए मौका नहीं मिल सकता था। सकारात्मक विरोध के लिए विपक्ष मानसिक तौर पर तैयार होता, तो बड़ी जमीन एटीएम और बैंक की कतारों में लगे लोग तैयार कर देते। लेकिन, दो बातें थीं। पहली ये कि कतारों में खड़े लोगों को नरेंद्र मोदी के किए पर भरोसा है। और दूसरा ये कि विपक्ष के नेताओं की विश्वसनीयता और मंशा संदेह के दायरे में आती रही। इस कदर कि दिल्ली के लक्ष्मीनगर इलाके में अरविंद केजरीवाल आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ लोगों का हाल जानने पहुंचे, तो लोगों ने उन्हीं के खिलाफ नारे लगाने शुरू कर दिए। ये सब उसके बावजूद हो रहा था, जब मीडिया के बड़े चेहरे ये साबित करने पर तुले हुए थे कि लोग बुरी तरह से परेशान हैं। किसी भी हाल में देश में 8 नवंबर के 8 बजे के बाद से हुए हर हादसे दुर्घटना को नोटबंदी से जोड़ने की कवायद में सिर्फ विपक्षी नेता ही शामिल नहीं थे। बड़े पत्रकार, लेखक के तौर पर समाज में पहचाने जाने वाले लोग सरकार के फैसले के खिलाफ कुछ भी करने को उतारू हैं। दरअसल ये कुछ भी करने पर उतारू जमात में बहुतायत लोग वही हैं, जो किसी भी हाल में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर देखने को तैयार नहीं थे। और नहीं थे, वाली मानसिकता अभी भी जड़ अवस्था में है। इसका अद्भुत उदाहरण देखने को मिलता है कि करीब 150 ऐसे ही बड़े बुद्धिजीवियों ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर इस फैसले को वापस लेने की मांग की है। बुद्धिजीवियों की चिट्ठी है इसलिए पूरी तरह से उसमें चिन्ता आम आदमी के कष्टों की ही की गई है। लेकिन, कमाल की बात ये भी है कि नोटबंदी से आम आदमी को होने वाले कष्टों की चिन्ता करने वाले ज्यादातर वही लोग हैं, जिन्होंने असहिष्णुता को इस देश का वर्तमान चरित्र बता देने की कोशिश की और देश से मिले सम्मानों को वापस कर दिया था। देश में बुद्धिजीवी, लेखक के तौर पर सम्मान पाने वाले ढेरों लोग भी जब इस आर्थिक फैसले पर राजनीतिक तरीके से प्रतिक्रिया देते हैं, तो संदेह होता है कि क्या मोदी विरोध के नाम पर सरकार के हर फैसले का विरोध करके जनता को गुमराह करने की कोशिश, उनका मानस बदलने की कोशिश कहां तक सही है। एक कोशिश हुई जब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के सात हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के कर्ज को बट्टे खाते में डालने की खबर को माल्या की कर्ज माफी के तौर पर प्रचारित किया गया। जबकि, सच ये है कि नरेंद्र मोदी की सरकार के ढाई साल के कार्यकाल में माल्या और दूसरे डिफॉल्टर से कर्ज वसूली की प्रक्रिया जितनी तेजी से पूरी करने की कोशिश हुई, वैसी कोशिश कभी नहीं हुई। बल्कि, पिछली सरकार के समय में ही ज्यादातर सरकारी बैंकों ने बड़े कर्ज दिए और कॉर्पोरेट से उनकी वसूली नहीं हो सकी। सच्चाई यही है कि आर्थिक मामलों पर नरेंद्र मोदी की सरकार बहुत ही चरणबद्ध तरीके से चल रही है। जिसमें सरकार आने के बाद सबसे पहले काला धन बनने से रोकने की कोशिश शुरू हुई। उसके बाद बेनामी संपत्ति पर रोक लगाने कोशिश, लोगों को अपना काला धन बताकर उसे बैंकिंग सिस्टम में वापस लाने की कोशिश। ये सब बहुत चरणबद्ध तरीके थे। इसी बीच में सरकार ने बैंकों का एनपीए खत्म करने और बैंकों की स्थिति मजबूत करने के लिए पूर्व सीएजी विनोद राय की अगुवाई में बैंक बोर्ड ब्यूरो बना दिया। सबसे बड़ी बात कि इन सारे कदमों के साथ नरेंद्र मोदी जनता को ये भरोसा दिलाने में कामयाब रहे हैं कि ये फैसला पूरी तरह से आम जनता के हित में है। 

Wednesday, November 30, 2016

बच्चों के लिए बड़ों का बहुत बड़ा आंदोलन

नोबल पुरस्कार के लिए जब कैलाश सत्यार्थी का नाम घोषित किया गया, तो हम जैसे लोगों के लिए सबसे बड़ी बात यही थी कि एक भारतीय को दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार दिया जा रहा है। ये पुरस्कार इसलिए भी अहम हो गया क्योंकि, भारत की गरीबी, मुश्किलें और असमानता को दूर करने के काम में जब भी कोई काम होता हुआ दिखता है या कहें कि अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जब ऐसे किसी काम की चर्चा होती है, तो वो ज्यादातर कोई विदेशी संस्था ही कर रही होती है। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि भारत की धरती पर भारतीय व्यक्ति और संस्थाओं के किए काम को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कम ही महत्व मिल पाता है। इसीलिए जब नोबल पुरस्कार के लिए कैलाश सत्यार्थी को चुना गया, तो भारत के लिए ये बड़ी उपलब्धि रही। कैलाश सत्यार्थी ने बच्चों का जीवनस्तर सुधारने के लिए जिस तरह का काम किया और जिस तरह से बिना किसी साधन, संसाधन के लम्बे समय तक उसे जिया, वो काबिले तारीफ है। लेकिन, ये सब शायद दूर से अहसास करने जैसा ही रह जाता, अगर एक दिन कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउन्डेशन के कन्टेंट एडिटर अनिल पांडे का बुलावा न आता। बुलावा भी बहुत खास था। उन्होंने कहाकि कैलाश जी पत्रकारों, वेब पर काम करने वाले लोगों से मिलना चाहते हैं। कैलाश सत्यार्थी से निजी तौर पर मिलने की इच्छा भर से मैं वहां चला गया। लेकिन, वहां जाना मेरे लिए कैलाश सत्यार्थी के जीवन भर चलाए गए आंदोलन का अहसास करने का शानदार मौका बन गया। कमाल की बात ये कि अभी भी कैलाश जी पहले जैसे ही सहज, सरल हैं। एक सवाल जो मेरे मन में था कि अब नोबल पुरस्कार तो मिल ही गया। किसी भी सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति के लिए इससे बड़ा क्या यानी अब कैलाश सत्यार्थी आगे क्या करेंगे?

ये सवाल मेरे मन में था। लेकिन, हम ये सवाल पूछते उससे पहले खुद कैलाश जी ने कहाकि नोबल पुरस्कार पाने के बाद इतनी रकम और प्रतिष्ठा मिल जाती है कि कुछ न भी करे तो जीवन चल जाएगी और लगने लगता है कि आगे क्या? लेकिन, मुझे लगता है कि बच्चों के लिए अभी बहुत काम करना बचा है। और इसी बहुत काम करना बचा है वाली कैलाश जी की ललक ने भारत की धरती से दुनिया के लिए एक अनोखी मुहिम शुरू की है। वो बच्चे जिन्हें जीवन में किसी तरह से सामान्य बच्चों की तरह जीवन जीने का अवसर नहीं मिल पा रहा है। वो बच्चे जो अभी भी किसी मजबूरीवश शोषित हो रहे हैं। ऐसे दुनिया के हर बच्चे को दूसरे बच्चों की तरह जीवन देने के लिए कैलाश सत्यार्थी एक बड़ी मुहिम शुरू कर रहे हैं। नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी की इस मुहिम को मजबूत करने के लिए दूसरे ढेर सारे नोबल पुरस्कार विजेता और दुनिया के बड़े नेता शामिल होंगे। इसके जरिये दुनिया भर के बच्चों के हक में आवाज बुलंद की जाएगी। साथ ही बच्चों की प्रति करुणा, सहृदयता की भावना बढ़ाने की अपील भी होगी।

 राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी इस अभियान को शुरू करेंगे। 10-11 दिसंबर, 2016 को राष्ट्रपति भवन में Laureates and leaders For Children Summit का आयोजन कर कैलाश सत्यार्थी जी बच्चों के हित में दुनियाभर के नोबेल पुरस्कार विजेताओं और विश्व के प्रमुख नेताओं का एक नैतिक मंच तैयार करने जा रहे हैं। 100 Million For 100 Million Campaign की शुरुआत यहीं से होगी। जैसा नाम से ही जाहिर है ये अभियान दुनिया के उन 10 करोड़ बच्चों के लिए है, जिनको वो सब नहीं मिल सका, जिसके वो हकदार हैं और उन्हें ये हक दिलाने के लिए दुनिया के 10 करोड़ नौजवानों ने मन बनाया है। 10 देशों से शुरू करके अगले 5 सालों में ये अभियान दुनिया के 60 देशों में चलाने की योजना है। कैलाश सत्यार्थी कहते हैं कि दुनिया के हर बच्चे को शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान का अधिकार दिलाने के लिए ये अभियान चलाया जा रहा है। हम सबको कैलाश जी की इस मुहिम का हिस्सा बनना चाहिए। मैं इस मुहिम में कैलाश जी के साथ हूं।

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