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Showing posts from September, 2015

संघ को सांप्रदायिक, पिछड़ा साबित करने की साजिश

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत को पीछे ले जाने की हरसंभव कोशिश की है। प्रगतिशील समाज के तथाकथित नुमाइंदों ने इस बात को पिछले सत्तर सालों में बड़े सलीके से साबित करने की कोशिश की है। इसका जवाब खुद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन राव भागवत ने अभी एक पंक्ति में ही बिना इस साजिश के उल्लेख के दे दिया है। उन्होंने जयपुर में एक कार्यक्रम में साफ कहा कि हिंदू समाज को उन सारी परंपराओं को खत्म करना होगा, जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर खरी नहीं उतरती हैं। दरअसल यही संघ करता भी रहा है। हां, संघ समाज तोड़कर बनाने के बजाए, बने समाज की कुरीतियों को खत्म करके उसे बेहतर समाज में बदलने की धारणा पर यकीन करता है। लेकिन, वामपंथ और तथाकथित प्रगतिशील समाज ने सत्ताधारी कांग्रेस के साथ मिलकर ये साजिश बड़े सलीके से पूरी कर ली कि संघ सांप्रदायिक है और पिछड़ेपन को ही जारी रखना चाहती है। ये कोशिश कितनी कारगर रही कि ज्यादातर विद्वत स्थिति को हासिल करने वाले पहली बात यहीं से शुरू करते हैं कि संघ तो सांप्रदायिक है और हिंदू समाज को परंपरा और कुरीतियों की बेड़ी में जकड़कर रखना चाहता है। हालांकि, भारत में विद्वा…

बाबा रे बाबा

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चौदह सितंबर को जंतर मंतर पर गजब की भीड़ थी। रामपाल के समर्थन में। पता नहीं आपमें से कितने लोगों को रामपाल याद होगा। हालांकि, ये मुझे थोड़ा अजीब लग रहा है कि किसी के लिए ऐसे अपमानजनक तरीके से लिखा जाए। लेकिन, मुझे लगता है ये जरूरी है। जरूरी है कि रामपाल जैसे लोगों को अपमान ही मिले। अब मुझे ये नहीं पता कि ऐसे लोगों का सम्मान करने वाले लोग किस मानसिकता से जीते हैं। या फिर ऐसे लोगों को रामपाल जैसे लोग क्या दे देते हैं जिसके चक्कर में ये उमस भरी गर्मी में सरकार को चेताने जंतर-मंतर तक चले आते हैं। और ये लोग देश के अलग-अलग हिस्से से आए हैं। जैसा इनके हाथों में बैनर-तख्ती देखकर समझ में आता है। रामपाल के समर्थन में आए लोगों की भीड़ में हर उम्र के लोग हैं। अब पता नहीं समाज के किस वर्ग की भागीदारी इसमें ज्यादा है। ये सरकार को खुली चुनौती दे रहे हैं। अब तो आपको इस रामपाल का ध्यान अच्छे से आ गया होगा। ये रामपाल वही है, जो खुद को संत कहता है। ये वही रामपाल है, जो लंबे समय से संत के लबादे में अपना गुंडों का साम्राज्य चला रहा है। जिस रामपाल को पकड़ने में पुलिस और अर्धसैनिक बलों को हरियाणा में किसी आत…

OROP किसका हक?

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बकरीद की छुट्टी के दिन दिल्ली की सड़कों पर सरसराता हुआ मैं दफ्तर पहुंच गया। संसद मार्ग तक का रास्ता इतना आसान आमतौर पर कहां होता है। प्रेस क्लब की बजाए आज नेशनल मीडिया सेंटर में गाड़ी खड़ी की। और पैदल दफ्तर के लिए चल पड़ा। जंतर-मंतर रास्ते में है। जंतर-मंतर पर हर रोज की तरह मारामारी तो नहीं थी। प्रदर्शनकारियों का एक नया मंच लग गया है। अगर सोमवार तक ये प्रदर्शन जारी रहा तो, उनकी बात करूंगा। लेकिन, आज बात उन सैनिकों की। जिनको अभी भी लग रहा है कि उनको देशसेवा के बदले में जो मिलना चाहिए वो नहीं मिल रहा है। पिछले कई दशकों से चली आई रही वन रैंक वन पेंशन की बहाली नरेंद्र मोदी की सरकार ने कर दी। उसके बाद भी पूर्व सैनिकों को लग रहा है कि हिस्सेदारी और ली जा सकती है। कम मिली है। थोड़ी देर रुककर मैंने उन लोगों को सुना। सुनने के बाद लगा कि अच्छा है यहां लोग कम ही हैं। या ये कहें कि जिनकी पेंशन बढ़नी है। वही कुछ पचास-सौ लोग हैं। क्योंकि, अगर रुककर आम लोग उनकी बातें सुन लें, तो सेना और सैनिकों की देश सेवा शब्द से चिढ़ होने लगे। जब मैंने सुना, तो दहाड़ रहे पूर्व सैनिक बता रहे थे कि कैसे वो तो वीर बह…

योग्य चपरासी और अयोग्य अध्यापक

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उत्तर प्रदेश से दो खबरें इस समय जबर्दस्त चर्चा में हैं। इन दोनों खबरों की वजह से एक बहस, भावनाओं का उबाल देखने को मिल रहा है। दोनों खबरों में दुख है, संवेदना है, योग्य-अयोग्य की बहस है। पहली खबर ये कि उत्तर प्रदेश सरकार के एक फैसले को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पलट दिया है। वो खबर है शिक्षा मित्रों की सहायक अध्यापक के तौर पर नियुक्ति के फैसले की और उसे उच्च न्यायालय द्वारा पलट देने के फैसले की। दूसरी खबर है कि उत्तर प्रदेश में चपरासी का पद हासिल करने के लिए करीब तेईस लाख उम्मीदवारों ने आवेदन डाला है। और इसमें से ढाई सौ से ज्यादा पीएचडी की उपाधि वाले यानी डॉक्टरेट हैं। ये दोनों खबरें सिर्फ उत्तर प्रदेश का ही नहीं देश की शिक्षा व्यवस्था से लेकर देश में नौजवानों की क्या कद्र है। इसे साफ करती है। इसलिए बड़ा जरूरी है कि इन दोनों खबरों पर बहस वहां तक पहुंचे जहां से इन खबरों के दोबारा बनने की गुंजाइश न बचे।
पहले बात शिक्षा मित्रों को सहायक अध्यापक बनाने के उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले की। और इस फैसले को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा पलटने के फैसले की। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शिक्षा मित्रों क…

फर्जी सरकारी संस्थान!

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सरकारी नीतियों को बनाने वाले पता नहीं कैसे सोचते-करते हैं। अकसर यूजीसी की सूची निकलती है, जिसके आधार पर देश में चल रहे फर्जी विश्वविद्यालयों या दूसरे शिक्षा के केंद्रों के बारे में लोगों को पता चलता है। लेकिन, सेना की भर्ती की तरह भगदड़ वाली भीड़ इस देश में शिक्षा के लिए भी नियति बन गई है। छात्र पढ़ना चाहते हैं। लेकिन, उनकी मजबूरी ये कि जिस संस्थान में वो दाखिला ले रहे हैं। वो संस्थान सरकार, यूजीसी के मानकों पर सही भी है या नहीं। इसका अंदाजा पाठ्यक्रम में दाखिला लेने के बाद और कभी-कभी तो पाठ्यक्रम पूरा कर लेने के कई साल बाद पता लगता है। फर्जी डिग्री देने वाले निजी कॉलेजों, विश्वविद्यालयों को लानत भी हम भेजते रहते हैं। जबकि, सच्चाई ये है कि फर्जी कुछ भी है, तो उसके लिए सिर्फ और सिर्फ जिम्मेदार सरकार ही है। अब एक और अनोखा उदाहरण देखिए। केंद्र सरकार के ही अंतर्गत चल रहे एक संस्थान की डिग्री को केंद्र सरकार के मानव संसाधन विभाग के अंतर्गत आने वाला यूजीसी यानी यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन मान्यता ही नहीं देता है। दिल्ली से सटे नोएडा में वाणिज्य मंत्रालय FDDI संस्थान चलाता है। इस संस्थान से रिट…

लाल बत्ती की जरूरत क्या है

देश में किसी भी समस्या के लिए सबसे आसानी से अगर किसी एक बात को दोषी ठहराया जाता है, तो वो है लालफीताशाही। देश के अंदर भी और देश के बाहर भी ये सामान्य धारणा है कि भारत में लालफीताशाही की वजह से चीजें अपनी रफ्तार में नहीं चल पाती हैं। हर सरकार लालफीताशाही खत्म करने की बात भी कहती है। लेकिन, देश में उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू हुए करीब ढाई दशक होने के बाद भी लालफीताशाही अपनी जगह बनी हुई है। नरेंद्र मोदी की सरकार जब बनी थी, तो नरेंद्र मोदी ने बार-बार ये कहा कि लालफीताशाही खत्म करना उनकी प्राथमिकता है। इसे और आगे ले जाते हुए उन्होंने कहा कि हम हर दिन एक गैरजरूरी कानून खत्म करेंगे। नरेंद्र मोदी ने धीरे-धीरे वो किया भी है। और अब नितिन गडकरी ने एक ऐसा प्रस्ताव आगे बढ़ाया है, जो लागू हुआ तो शायद लालफीताशाही को सही मायने में खत्म करने वाला सबसे बड़ा फैसला होगा। लालफीताशाही दरअसल किसी फाइल पर लाल निशान लगाने, काम को रोकने से संबंध रखती है। लेकिन, लालफीताशाही ये भी है कि देश में अंबैसडर कारों, आज के संदर्भ में दूसरी कंपनियों की कारों, एसयूवी पर चमकती लाल बत्तियां सड़कों पर एक खास प्रभुत्व के दर्शन…