कांग्रेस के नेता राहुल गांधी, बीजेपी में नेता कौन?

कांग्रेस अभी से 2009 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में लग गई है। सारे मीडिया सर्वेक्षण बता रहे हैं कि अगर अभी लोकसभा चुनाव होते हैं तो, इसका सबसे ज्यादा फायदा कांग्रेस को और सबसे ज्यादा नुकसान लेफ्ट को होगा। इसमें बीजेपी की तस्वीर कुछ साफ नहीं दिखती। अंटकी हुई सी है। जैसे बीजेपी में नेता कौन का सवाल अंटका हुआ है। बीजेपी की भोपाल की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में अटल बिहारी बाजपेयी नहीं गए तो, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी से लेकर दूसरी पांत के नेता भी अपनी दावेदारी का अपनी तरह से हल्ला करने लगे। तब तक बुढ़ऊ अटल बिहारी ने फिर बोल दिया- हम लौटेंगे।

वैसे आज बीजेपी की तरफ से ये बात रही है कि नेता तो अटल बिहारी ही हैं। लेकिन, आज जो दिन की सबसे बड़ी खबर रही वो थी, राहुल गांधी को कांग्रेस का महासचिव बनाने की। वैसे इस खबर का ऐलान भर होना था। लेकिन, आज ऐलान के बाद ये तय हो गया कि अब इसमें कुछ दबा छिपा नहीं है कि कांग्रेस की चौथी पीढ़ी से कौन देश की अगुवाई करने वाला है। अब राहुल न तो विदेशी मूल के हैं और न ही अभी तक कोई ऐसा कृत्य किया है, जिससे किसी को उंगली उठाने का मौका मिले। वैसे सोनिया ने राहुल को कांग्रेस की सबसे बड़ी समितियों में जगह दिया तो, उससे पहले पूरी तैयारी की।

राहुल के साथ ही पूरी कांग्रेस बदल दी गई है। इस बदलाव में ज्यादातर नाम ऐसे ही हैं जो, एक जगह से दूसरी जगह रखे गए हैं। रखे गए इसलिए कह रहा हूं कि ये सब दस जनपथ के दरबारी लोग हैं। लेकिन, सोनिया ने कई बदलाव बहुत ही समझदारी वाले किए हैं। कम से कम अभी तो यही दिख रहा है।
राहुल के साथ ही प्रिया दत्त और जतिन प्रसाद को कांग्रेस का सचिव बना दिया गया है। कई समितियों में भी राहुल के साथ युवा सांसदों को शामिल किया गया है। वैसे ज्यादातर युवा नेता अपने बाप-दादाओं की विरासत ही संभालते हुए कांग्रेस में आगे बढ़ रहे हैं लेकिन, जिस देश में आधी से ज्यादा आबादी 35 साल से कम की हो। वहां ये संदेश भी जाए कि युवाओं को कोई पार्टी तवज्जो दे रही है तो, राजनीतिक फायदा ही देती है। वोटबैंक कितना बढ़ेगा ये तो, चुनाव ही बताएगा।

कांग्रेस में ये बदलाव ऐसे समय में और भी मायने रखता है जब, कांग्रेस के बराबर की अकेली पार्टी अपने बुढ़ाते नेताओं की ही महत्वाकांक्षा की लड़ाई देख रही हो। और, उनके पीछे के नेता सिर्फ ये मौका ताड़ रहे हों कि कैसे आगे वाले को लंगड़ी लगे और हमें मौका मिल जाए। वैसे तो, कई बदलाव कांग्रेस में आज हुआ। लेकिन, राहुल के साथ ही कांग्रेस का एक और समझदारी वाला बदलाव उत्तर प्रदेश में दिखता है। रीता बहुगुणा जोशी को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बना दिया गया है। अध्यक्ष सलमान खुर्शीद, विधानमंडल दल के नेता प्रमोद तिवारी या फिर प्रदेश प्रभारी अशोक गहलोत ऐसे नेता हैं जो, अब चुक से गए हैं। प्रमोद तिवारी का जनाधार उनकी अपनी विधानसभा सीट जीतने से आगे नहीं दिखता।

ऐसे में ब्राह्मण रीता जोशी को प्रदेश अध्यक्ष और सोनिया कैंप के भरोसे के आदमी ठाकुर दिग्विजय सिंह को प्रदेश प्रभारी बनाने से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की रणनीति आसानी से समझी जा सकती है। रीता बहुगुणा जोशी को अब तक कांग्रेस में भले ही कितनी भी तवज्जो मिलती रही हो। उनके अपने शहर इलाहाबाद में कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष अशोक बाजपेयी के चलते कोई तवज्जो नहीं मिल पाती थी। विधानसभा चुनाव में टिकट न मिलने से अशोक बाजपेयी बेटे के लिए बसपा से टिकट लेकर आए और खुद भी वहीं चले गए।कांग्रेस को पता है कि बसपा के चुनाव जीतने के बाद सबसे ज्यादा मेहनत उसे उत्तर प्रदेश में ही करनी है। इसीलिए सोनिया ने राहुल को युवा कांग्रेस और छात्र संगठन की भी जिम्मेदारी दे डाली है।
अब कांग्रेस ने तो ये साफ कर दिया कि राहुल गांधी की अगुवाई में वो लोकसभा चुनाव लड़ने जा रही है। सबसे बड़ा लक्ष्य उत्तर प्रदेश की सबसे ज्यादा सीटें जीतने की है। अब बीजेपी बताए कि वो किसके सहारे चुनावी नैया पार करेगी। या फिर वो राम भरोसे ही रहेगी।