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Saturday, February 25, 2017

रज्जू भइया, जोशी,सिंघल के घर में फिर ताकतवर होती भाजपा

चौथे चरण का मतदान कई तरह से खास रहा है। चौथे चरण में इलाहाबाद जिले में भी मतदान हुआ, जो पूर्वांचल का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। इलाहाबाद कांग्रेस की पैदाइश वाली जमीन है और यही वो जमीन है, जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक प्रोफेसर राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भइया का घर है। इतना ही नहीं, इसी शहर में विश्व हिंदू परिषद के संस्थापक अशोक सिंघल का घर है और यही वो शहर है जहां से बीजेपी के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी अकेले ऐसा नेता रहे, जो लगातार 3 बार इस सीट से सांसद चुने गए। कांग्रेस की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी भले ही लखनऊ की कैंट विधानसभा से चुनाव लड़ रही हों लेकिन, उनका घर भी इलाहाबाद में ही है। फूलपूर से सांसद और उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य का भी घर यहीं है। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी भी इसी शहर में रहते हैं। कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रमोद तिवारी भी इसी शहर में रहते हैं। देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में शामिल इलाहाबाद विश्वविद्यालय भी यहीं है। इस जिले का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि चौथे चरण के प्रचार का समय खत्म होते समय भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह अपना रोड शो खत्म कर रहे थे। और उसी समय यूपी के दोनों लड़के (अखिलेश यादव और राहुल गांधी) भी इलाहाबाद में ही थे। चौथे चरण का प्रचार 21 तारीख को शाम 5 बजे बंद हुआ, उसके एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इलाहाबाद में रैली करके जा चुके थे। इलाहाबाद में सभी दलों की इतनी जोर आजमाइश की वजह बड़ी साफ है। इस जिले में प्रदेश की सबसे ज्यादा विधानसभा सीटें हैं। अभी भी इलाहाबाद में 12 विधानसभा सीटें हैं और अगर इस जिले का हिस्सा रहे कौशांबी को जोड़ लिया जाए, तो कुल 15 सीटों का फैसला यहां से होना है। चौथे चरण में 23 फरवरी को कुल 53 सीटों पर मतदान होना है। इसलिए भी इलाहाबाद की 12 सीटें अतिमहत्वपूर्ण हो जाती हैं। और सबसे बड़ी बात कि इन सीटों से निकाल संदेश पूरब की ओर प्रभावी भी होता है।
चौथे चरण की 53 सीटों की 2012 के परिणाम के लिहाज से बात करें, तो 24 सीटें समाजवादी पार्टी के खाते में, 15 सीटें बहुजन समाज पार्टी के खाते में, 6 सीटें कांग्रेस के खाते में, 5 सीटें भाजपा के खाते में और 3 सीटें पीस पार्टी के खाते में गई थीं। इस लिहाज से सीधे तौर पर सपा-बसपा ही 2012 के विधानसभा चुनाव में यहां मुख्य खिलाड़ी रहीं। यहां तक कि सीट के लिहाज से कांग्रेस बीजेपी से आगे रही और पीस पार्टी भी एकदम नजदीक खड़ी दिखी। इलाहाबाद जिले की बात करें, तो 12 में से 8 सीटें सपा ने जीत लीं। 1 सीट कांग्रेस के पास है और 3 सीटें बीएसपी के पास। बीजेपी का 2012 में यहां से खाता भी नहीं खुला। यहां तक बीजेपी की परम्परागत मानी जाने वाली शहर उत्तरी और दक्षिणी की सीट पर भी उसे हार का स्वाद चखना पड़ा। लेकिन, 2017 में स्थिति बदली दिख रही है। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ की परम्परागत सीट दक्षिणी से बीजेपी ने बीएसपी से कांग्रेस के रास्ते बीजेपी में आए नंद गोपाल गुप्ता नंदी को टिकट दिया है। नंदी ने ही 2007 में केशरीनाथ त्रिपाठी को हराया था। नंदी का मुकाबला सपा विधायक हाजी परवेज अहमद से है। यहां बसपा से माशूक खान और सीपीआई से आमिर हबीब के होने से बीजेपी की राह आसान दिख रही है। शहर उत्तरी भी 1991 के बाद बीजेपी की पक्की सीट हो गई थी। लेकिन, 2007 और 12 में कांग्रेस के अनुग्रह नारायण सिंह ने ये सीट जीत ली। 2012 में बीएसपी के टिकट पर दूसरे स्थान पर रहे हर्षवर्धन बाजपेयी को बीजेपी ने इस बार प्रत्याशी बनाया है। हर्षवर्धन बाजपेयी का पारिवारिक वोट और बीजेपी का मत मिलाकर लड़ाई रोचक बना रहा है। हालांकि, कांग्रेस विधायक अनुग्रह नारायण सिंह की स्थिति यहां काफी मजबूत रहती है। मुकाबला इन्ही दोनों के बीच रहने वाला है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रसंघ अध्यक्ष रही ऋचा सिंह को सपा ने शहर की तीसरी पश्चिमी विधानसभा सीट से प्रत्याशी बनाया है। विश्वविद्यालय की पहली महिला अध्यक्ष होने के नाते ऋचा को छात्रों का जबर्दस्त समर्थन है। ऋचा के पक्ष में माहौल भी अच्छा है। लेकिन, मुश्किल ये कि ऋचा को शहर उत्तरी के बजाय पश्चिमी से टिकट दे दिया गया। ज्यादातर छात्र शहर उत्तरी में ही हैं। पश्चिमी सपा के बाहुबली अतीक अहमद की सीट है। हालांकि, समाजवादी पार्टी ने अतीक को टिकट नहीं दिया है। लेकिन, चुनाव में सीधे नहीं होने के बावजूद इस सीट पर अतीक का असर देखा जा सकता है। बसपा ने विधायक पूजा पाल पर फिर से भरोसा जताया है। पूजा पाल के पति राजू पाल का हत्या के मामले में अतीक और उसके भाई अशरफ पर मुकदमा चल रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने यहां से राष्ट्रीय प्रवक्त सिद्धार्थनाथ सिंह को टिकट दिया है। सिद्धार्थनाथ अपने नाना लालबहादुर शास्त्री और राष्ट्रीय नेतृत्व के खास होने के नाम पर मैदान में हैं। यहां मामला त्रिकोणीय है।
इलाहाबाद में यमुनापार की मेजा विधानसभा में भी मुकाबला रोचक हो गया है। बीजेपी के पूर्व विधायक उदयभान करवरिया की पत्नी नीलम करवरिया यहां से चुनाव लड़ रही हैं। सपा विधायक विजमा यादव के पति जवाहर यादव की हत्या के आरोप में करवरिया बंधु जेल में हैं। 20 साल पुराने मामले के फिर से खुलने और करीब 2 साल से जेल में होने को सत्ता की प्रताड़ना बताने में नीलम करवरिया कामयाब दिख रही हैं। महिला होने से उन्हें सहानुभूति भी मिल रही है। मेजा से सपा से रामसेवक सिंह मैदान में हैं और बसपा ने भूमिहार ब्राह्मण एस के मिश्रा को मैदान में उतारा है। 1967 से 2007 तक मेजा विधानसभा सुरक्षित थी। 2012 में सामान्य हुई तो सपा से गामा पांडेय विधायक बने लेकिन, रेवती रमण सिंह ने अपने नजदीकी गामा पांडेय का टिकट कटवा दिया। 2012 में दूसरे स्थान पर रहे बसपा के आनंद पांडेय भाजपा में आ गए हैं। इसकी वजह से ब्राह्मण बहुल मेजा विधानसभा में ब्राह्मण बीजेपी के साथ गोलबंद होते दिख रहे हैं। शहर उत्तरी की ही तरह यमुनापार की बारा सुरक्षित सीट भी सपा-कांग्रेस गठजोड़ में कांग्रेस के पास गई है। कांग्रेस से यहां से सुरेश कुमार मैदान में हैं। ये सीट भी समाजवादी पार्टी के पास थी। लेकिन, सपा विधायक डॉक्टर अजय कुमार भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं। बसपा से अशोक गौतम मैदान में हैं। यमुनापार की करछना विधानसभा से दिग्गज सपा नेता रेवती रमण सिंह के बेटे उज्ज्वल रमण मैदान में है। पिछले चुनाव में उज्ज्वल रमण बसपा के दीपक पटेल से हार गए थे। इस बार फिर से ये दोनों आमने-सामने हैं। भाजपा से पीयूष रंजन इस मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश में लगे हैं। यमुनापार की कोरांव सुरक्षित 2012 में बसपा के कब्जे में थी और इस बार बसपा विधायक राजबली जैसल को सीपीएम से कांग्रेस में गए रामकृपाल कड़ी चुनौती दे रहे हैं। यहां से भाजपा ने राजमणि और सपा ने रामदेव को टिकट दिया है।
इलाहाबाद के गंगापार में 5 विधानसभा सीटें हैं। गंगापार की फूलपुर विधानसभा से बीजेपी ने प्रवीण सिंह पटेल को टिकट दिया है। प्रवीण पटेल पिछले चुनाव में बसपा से लड़े थे और दूसरे स्थान पर थे। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के विरोध के बावजूद प्रवीण पटेल ने अमित शाह की अपने विधानसभा में सभा कराई और उसी में बीजेपी में शामिल हुए। यहां से सपा के सईद अहमद विधायक थे। लेकिन, सपा से मन्सूर आलम और बसपा से मोहम्मद मसरूर शेख को टिकट मिला है। फूलपूर सीट पर मुसलमान मतदाता काफी संख्या में है लेकिन, सपा-बसपा दोनों से मुस्लिम प्रत्याशी होने से बीजेपी को फायदा मिल सकता है।

फाफामऊ सीट पर सीट पर सबसे ज्यादा मौर्य मतदाता हैं और उसके बाद ब्राह्मण और मुसलमान हैं। समाजवादी पार्टी ने यहां से विधायक अन्सार अहमद को फिर से उतार दिया है। बसपा के परम्परागत मतों के साथ मनोज पांडेय ने ब्राह्मण मतों में सेंधमारी की अच्छी कोशिश की है। हालांकि, इलाहाबाद की हर सीट पर ब्राह्मण और सवर्ण मतदाताओं के बीजेपी के साथ जाने को मनोज यहां कितना रोक पाएंगे ये बड़ा सवाल है। बीजेपी ने यहां से विक्रमजीत मौर्य को टिकट दिया है। विक्रमाजीत को मौर्य के साथ सवर्ण मतों के सहारे जीत का भरोसा है। प्रतापपुर सीट से समाजवादी पार्टी ने विधायक विजमा यादव को फिर से मैदान में उतारा है। यहां से बसपा ने मुज्तबा सिद्दीकी को टिकट दिया है। भाजपा ने ये सीट अपना दल को दी है। अपना दल से करन सिंह प्रत्याशी हैं। यहां सभी प्रत्याशी सपा की विजमा यादव से ही लड़ेंगे। हंडिया सीट भी अपना दल के खाते में गई है। यहां से पूर्व मंत्री राकेशधर त्रिपाठी की पत्नी  प्रमिलाधर त्रिपाठी चुनाव लड़ रही हैं। राकेशधर पर लोकायुक्त ने भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया है। राकेशधर के परम्परागत मत, सवर्ण और अपना दल के मतों से प्रमिलाधर की स्थिति मजबूत है। सपा से निधि यादव और बसपा से हकीम लाल यहां मुकाबले में हैं। सोरांव सीट पर अंतिम समय तक भाजपा और अपना दल में सहमति नहीं बन सकी थी। हालांकि, बाद में ये सीट अपना दल के खाते में चली गई है। अपना दल से जमुना प्रसाद सरोज लड़ रहे हैं। लेकिन, बीजेपी से सुरेंद्र चौधरी को भी चुनाव चिन्ह मिल गया है। इसी तरह समाजवादी और कांग्रेस दोनों के ही प्रत्याशी मैदान में हैं। ऐसे में सोरांव सीट पर बसपा की गीता देवी की संभावना बेहतर दिखती है। हर पार्टी इलाहाबाद में अच्छे माहौल के भरोसे उत्तर प्रदेश का पूर्वी दुर्ग जीत लेने की मंशा रखती है। 2012 में पूरी तरह से साफ हो गई भाजपा के पक्ष में 2017 में कम से कम 5 सीटें आती दिख रही हैं। समाजवादी पार्टी 3 सीटों पर पहले स्थान की लड़ाई में है और कांग्रेस के लिए अपनी एक सीट बचाना बड़ी चुनाती साबित हो रहा है। 2 सीटों पर बसपा का हाथी सबसे मजबूत दिख रहा है। 

Friday, August 19, 2016

650 किलोमीटर बाद भी एक जैसा अहसास!

कोस कोस पर पानी बदले चार कोस पर बानी। ये हिन्दुस्तान की विविधता को लेकर कहा जाता है। लेकिन, मुझे लगता है कि हिंदुस्तान में चार कोस तो क्या कितना भी लंबा सफर तय कर लिया जाए, एक जैसा ही है। और ये एक जैसा पानी या बानी नहीं, उससे भी बढ़कर हर हिन्दुस्तानी की वीआईपी बनने की ललक है। और ये वीआईपी या वीवीआईपी बनने की ललक बेवजह नहीं है। इसकी बड़ी पक्की टाइप की वजह है। क्योंकि, बिना वीआईपी या वीवीआईपी बने धौंस नहीं जमती। यहां तक चौराहे पर खड़े ट्रैफिक वाला शायद नियम कानून से चलने वाले पर तो फटकार लगा देगा। लेकिन, अगर वीआईपी, वीवीआईपी टाइप का कोई बिल्ला, पट्टा स्टिकर की शक्ल में कार, SUV पर चिपका है, तो फिर कहां किसी की मजाल। यही वो अहसास है जिसने पूरे हिन्दुस्तान को एक सूत्र में बांध रखा है और इसी मसले पर देश की सारी विविधता, एकता में अद्भुत तरीके से बदल जाती है। रक्षाबंधन पर घर जाना था। 17 की रात प्रयागराज एक्सप्रेस से जाना और 18 की रात प्रयागराज एक्सप्रेस से आना। 16 तारीख दफ्तर से लौटते बोटैनिकल गार्डन वाले चौराहे के पहले एक स्कॉर्पियो में Press के साथ VIP का स्टिकर लगा देखा। लेकिन, जब उसी के नीचे VVIP का भी स्टिकर लगा देखा, तो मुझे लगा कि ये तो अतिमहत्वपूर्ण होने के अहसास से जितना लदे हैं, इनके इस अहसास की तस्वीर तो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचनी चाहिए। आखिर 48 घंटे से भी कम समय में ऐसा राष्ट्रव्यापी वीआईपी अहसास मिला रहा है।


18 की सुबह इलाहाबाद पहुंचे। छोटे भाई के साथ स्टेशन से घर के रास्ते में थे कि सिविललाइंस वाले हनुमान मंदिर चौराहे के आगे एक साहब की कार दिखी। पहली नजर में भारतीय जनता पार्टी के किसी विधानसभा टिकट के इच्छुक टाइप की कार लगी। थोड़ा नजदीक से देखने पर समझ आया कि कोई जनकल्याण पार्टी के महासचिव हैं। नंबर प्लेट पर नजर पड़ी, तो समझ में आया कि ये तो वकील भी हैं। हाईकोर्ट का स्टिकर जो चस्पा था। मतलब डिग्री है। साथ ही ये भी मतलब कि वकालत अच्छी चल रही होती, तो ऐसे जन कल्याण पार्टी में क्यों जाना पड़ता और असली झटका मुझे तब लगा, जब मैंने देखा कि वो कार तो OLACabs के साथ जुड़ी हुई है। वाह रे वीआईपी हिन्दुस्तान। 

Wednesday, July 13, 2016

इलाहाबादी प्रदेश अध्यक्ष की टीम से इलाहाबाद गायब

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष घोषित होने के तीन महीने से ज्यादा समय के बाद भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश पदाधिकारियों का एलान हो गया। तीन दिन में घोषित होने वाली टीम को बनने में तीन महीने लग गए। आठ अप्रैल को केशव प्रसाद मौर्या प्रदेश अध्यक्ष बने थे और 12 जुलाई को भाजपा की टीम घोषित हुई है। इलाहाबाद से प्रदेश अध्यक्ष चुनने के बाद जब इलाहाबाद में राष्ट्रीय कार्यसमिति हुई तो, संदेश साफ था। कांग्रेस की बुनियाद की जमीन को आधार बनाकर भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में अपना 14 साल का वनवास खत्म करना चाह रही है। लेकिन, प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या की नई टीम से दो बातें साफ हैं। पहली इसमें केशव के गृह जिले इलाहाबाद को और केशव के नजदीकियों को जगह नहीं मिल सकी है। पूरे इलाहाबाद मंडल से किसी को भी प्रदेश की टीम में जगह नहीं मिल सकी है। प्रदेश मंत्री बने अमरपाल मौर्य को छोड़ दें तो, ऐसा नाम खोजना मुश्किल है, जिस पर केशव की छाप हो। मजबूत नेता की केशव की छवि कमजोर पड़ रही है। दूसरी ये टीम भले कहने को प्रदेश अध्यक्ष की है। लेकिन, उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का मतलब सुनील बंसल है, ये और मजबूती से साबित हुआ है। सुनील बंसल उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश महामंत्री संगठन हैं। सुनील बंसल राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बेहद नजदीकी माने जाते हैं। विद्यार्थी परिषद के रास्ते भारतीय जनता पार्टी में आए सुनील बंसल की छाप नई टीम पर साफ दिखती है। जेपीएस राठौर, अशोक कटारिया, संतोष सिंह, कामेश्वर सिंह, दयाशंकर सिंह, कौशलेंद्र सिंह पटेल विद्यार्थी परिषद से ही भाजपा में आए हैं। लक्ष्मीकांत बाजपेयी की टीम में प्रवक्ता रहे विजय बहादुर पाठक को महामंत्री बनाना साफ दिखाता है कि बंसल ने जिसे जहां चाहा, वहां बैठाया। माना जा रहा है कि पाठक ही मीडिया भी देखेंगे। इस बार बीजेपी की प्रदेश की टीम बड़ी हो गई है। 15 उपाध्यक्ष और मंत्री बनाए गए हैं। साथ ही 8 महामंत्री बनाए गए हैं। प्रदेश उपाध्यक्ष में राज्यसभा सांसद बने शिवप्रताप शुक्ला का नाम अपेक्षित था। पहले भी शिवप्रताप शुक्ला उपाध्यक्ष रहे हैं। पार्टी शिवप्रताप को ब्राह्मण चेहरे के तौर पर आगे बढ़ा रही है। कलराज मिश्र के 75 पार करने के साथ मंत्री पद से हटने की खबरों के बीच ब्राह्मणों को रिझाने के लिए शिवप्रताप शुक्ला और हालिया बदलाव में मंत्री बने महेंद्र पांडेय बेहतर विकल्प के तौर पर देखे जा रहे हैं।


नई टीम में बड़े नेताओं के बेटों को पूरा सम्मान दिया गया है। कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह राजू एटा से सांसद हैं और नई समिति में उपाध्यक्ष बने हैं। लालजी टंडन के बेटे गोपाल टंडन लखनऊ से विधायक हैं और नई समिति में उपाध्यक्ष बन गए हैं। गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह को फिर से महामंत्री बनाया गया है। अब सवाल ये भी उठता है कि क्या पदाधिकारी को टिकट न देने को बीजेपी लागू कर सकेगी। प्रदेश अध्यक्ष के दावेदार रहे विधायक धर्मपाल सिंह को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है। बागपत से सांसद सतपाल सिंह को भी प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है। केंद्र में मंत्री बनने की आस रखने वाले सतपाल को प्रदेश में पद देकर संभालने की कोशिश है। शामली के विधायक सुरेश राणा को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाने से साफ है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी के लिए कैराना जैसे मुद्दे रहेंगे ही रहेंगे। बरेली से विधायक राजेश अग्रवाल को कोषाध्यक्ष का भी जिम्मा दे दिया गया है। हालांकि, रणनीति के लिहाज से इतने सांसदों और विधायकों को ही प्रदेश में पद देना बहुत बेहतर तो नहीं कहा जा सकता। भारतीय जनता पार्टी का नया जातीय समीकरण इस टीम में भी साफ दिखता है। दलित और पिछड़ों को भरपूर जगह मिली है। कौशांबी के सांसद विनोद सोनकर को उपाध्यक्ष से हटाया गया तो, सैदपुर सुरक्षित से पूर्व सांसद रहे विद्यासागर सोनकर को वही पद दे दिया गया। इससे भी समझ में आता है कि पार्टी जातीय संतुलन को लेकर कितनी सजग है। फिलहाल मीडिया टीम और प्रवक्ताओं का एलान अभी भी बाकी है। टीम के एलान में एक बात जो सबसे ज्यादा खटकती है कि आखिर पार्टी अगले दस साल बाद प्रदेश में किन नेताओं को अगली कतार में देखना चाह रही है। 

Tuesday, June 14, 2016

इलाहाबाद में भाजपा कार्यसमिति से संदेश

उत्तर प्रदेश चुनाव के लिहाज से संदेश देने के लिए भाजपा ने इलाहाबाद अच्छी जगह चुनी। मुझे लग रहा था कि राष्ट्रीय कार्यसमिति इलाहाबाद में करने के बावजूद जो संदेश इलाहाबाद से भारतीय जनता पार्टी दे सकती थी। वो नहीं दे पा रही है। ये मुझे लगा, जब मैंने देखा कि कार्यसमिति से आ रही मंच की तस्वीरों में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के अलावा लालकृष्ण आडवाणी और अरुण जेटली दिखे। इलाहाबाद ने भले डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी को चुनाव हरा दिया था और वो बनारस से होते कानपुर चले गए। लेकिन, ये भी सच है कि इलाहाबाद डॉक्टर जोशी का शहर है। एक अजीब सा प्यार-नफरत का रिश्ता यहां के लोगों का डॉक्टर जोशी के साथ है। इसलिए अच्छा होता कि इस शहर में जोशी जी को पूरा सम्मान मिलता दिखता। इसीलिए मैंने लिखा कि उम्मीद है रैली स्थल पर डॉक्टर जोशी को सही जगह मिलेगी। और मंच पर डॉक्टर जोशी को अपना प्रेरणास्रोत बताकर नरेंद्र मोदी ने ये दिखा दिया कि उनकी फीडबैक मशीनरी कितनी दुरुस्त और स्वतंत्र है। इतना ही नहीं इलाहाबाद की इस रैली ने लक्ष्मीकांत बाजपेयी के तौर पर भारतीय जनता पार्टी को एक मजबूत ताकतवर ब्राह्मण नेता दे दिया है। ये बात मोदी और अमित शाह समझते हैं कि डॉक्टर जोशी और कलराज मिश्र अब ज्यादा उम्र के हो चले हैं। जबकि, लक्ष्मीकांत बाजपेयी अगले एक दशक तो भारतीय जनता पार्टी के अगुवा बने रह सकते हैं।

इसीलिए मुझे लग रहा है कि इलाहाबाद में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति से बीजेपी जो संदेश देना चाहती थी। वो काफी हद तक सफल रही है। ब्राह्मण यूपी में वोटबैंक बन रहा है। उसमें काफी बेचैनी है। मंच का संचालन पूर्व यूपी बीजेपी अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी से कराकर और जोशी जी के अलावा कलराज मिश्र को भी सम्मान देकर मोदी ने उस बेचैनी को कम करने की कोशिश की है। बेहद सादगी वाले नेता लेकिन, दबंग अध्यक्ष रहे बाजपेयी के लिए मोदी-शाह की जोड़ी बड़ी भूमिका देख रही है। जबकि, उत्तर प्रदेश में कुछ भाजपा नेता बाजपेयी को चुका हुआ बताने का कोई मौका छोड़ नहीं रहे थे। यही वजह रही कि बाजपेयी अध्यक्ष पद से हटने के बाद थोड़ा किनारे-किनारे ही चल रहे थे। लेकिन, फिर से इतने बड़े मंच के संचालन से बाजपेयी फिर से प्रदेश की राजनीति के अगुवा नेता हो गए हैं। मंच पर एक घटना से समझा जा सकता है कि बाजपेयी का कद अभी बीजेपी में बढ़ना ही है। मंच पर मौजूद और मंच देख रहे भाजपा के नेताओं, कार्यकर्ताओं के लिए ये बड़ी घटना थी कि केंद्रीय नेतृत्व के कहने से लक्ष्मीकांत बाजपेयी की कुर्सी दूसरी पंक्ति से पहली पंक्ति में आ गई। यूपी भाजपा के एक बड़े पदाधिकारी खुद कुर्सी आगे लेकर आए। इसी से समझा जा सकता है कि पार्टी प्रदेश में ब्राह्मण नेतृत्व अब बाजपेयी को ही बनाना चाह रही है।

इलाहाबाद की भाजपा राष्ट्रीय कार्यसमिति से कई संदेश साफ हैं। भाजपा नेता स्थानीय स्तर पर सांप्रदायिकता की बात करेंगे। लड़ेंगे। @AmitShah कैराना की बात कर सकते हैं। लेकिन, @narendramodi सबका साथ सबका विकास के अपने नारे पर कायम रहेंगे। यूपी चुनाव में भी भाजपा कतई हिंदुत्व को मुख्य मुद्दा नहीं बनाएगी। संदेश देने के मामले में प्रधानमंत्री के मुकाबले का कोई नेता नहीं है। इसका अंदाजा उससे भी लगा जब वो कार्यक्रम से इतर इलाहाबाद के कंपनी बाग में शहीद क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद को श्रद्धासुमन अर्पित करने पहुंच गए। आजाद के सामने झुके मोदी की ये तस्वीर बहुत कुछ कह देती है। कहते हैं कि एक तस्वीर हजार शब्दों से ज्यादा बोल देती है। राजनीति में एक श्रद्धांजलि लाखों वोट दिला सकती है। तस्वीर तो बोल ही रही है।

इलाहाबाद की भाजपा कार्यसमिति से ये बात भी लगभग तय है कि उत्तर प्रदेश में पार्टी किसी चेहरे को आगे नहीं करेगी और कम से कम उस चेहरे को तो कतई नहीं, जो दबाव बनाकर सीएम का दावेदार बन जाना चाहता है। और यही बेहतर होगा, ये बात मैंने उत्तर प्रदेश कानया प्रदेश अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद कही थी। क्योंकि, मायावती, अखिलेश के मुकाबले चेहरा नहीं लड़ सकता। हां, बीजेपी जरूर सपा, बसपा से लड़ सकती है।

Wednesday, January 21, 2015

पिताजी की बीमारी के बहाने



ये कठिन था। बेहद कठिन। पिता के किसी भी उम्र में हाथ छोड़ने की स्थिति की कल्पना भी असहज कर जाती है। इस बार जब इलाहाबाद जाना हुआ तो कुछ इसी स्थिति से मैं गुजरा। अच्छी बात ये रही कि पिताजी अब पूरी तरह स्वस्थ हैं। दिमाग में खून की बूंदों के जमने का सफलतापूर्वक ऑपरेशन हो गया। लेकिन, इस बहाने से मैंने अपने जीवन की सबसे लंबी यात्रा कर ली। वो यात्रा गिनने को तो 200 किलोमीटर की ही थी। रास्ता भी बेहद जाना-पहचाना था। इलाहाबाद से लखनऊ का रास्ता। लेकिन, जब यात्रा एंबुलेंस से हो रही हो और एंबुलेंस में बीमारी की अवस्था में पिता हो तो रास्ते से पुरानी पहचान भी जरा सा भी ढांढस नहीं बंधा पाती। इलाहाबाद के अस्पताल से जब लखनऊ के लिए निकलना हुआ तो सिर्फ दो ठिकाने बताए गए। ये था लखनऊ का पीजीआई या फिर सहारा का अस्पताल। दिमाग में खून की बूंदें जमने के ऑपरेशन के लिए वैसे तो इलाहाबाद में भी कई अच्छ डॉक्टर हैं। लेकिन, मुश्किल वही कि उसके साथ लगी सुविधाओं की कमी साफ नजर आती है। उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हर तरह से राजधानी लखनऊ के बाद सबसे बेहतर मौके वाला शहर है। वहां की ये स्थिति है। सवाल ये कि कोई भी सरकार खुद से या निजी उद्यमियों के सहयोग ये क्या ऐसा नहीं कर सकती कि अधिकतम 100 किलोमीटर की दूरी पर स्वास्थ्य लगभग सारी सुविधाओं वाला अस्पताल मिल सके।

इलाहाबाद में डॉक्टर थे। लेकिन, अच्छा अस्पताल न होने से हम लोग लखनऊ के लिए निकल पड़े। इलाहाबाद शहर से बाहर निकलते ही गंगा पुल के बाद ही लंबे जाम में हम फंस गए। करीब डेढ़ किलोमीटर लंबा जाम। कोई खास वजह नहीं। बस मामला इतना था कि दो तरफ से आने वाला यातायात वहां जुड़ रहा था। और इतना संभालने की सरकारी व्यवस्था और निजी समझ अब तक नहीं बन पाई है। एंबुलेंस को रास्ता न मिलने के ढेर सारे मौके देखे हैं। उस पर गुस्सा भी आया है। लेकिन, खुद एंबुलेंस में फंसे जब एंबुलेंस बंद करने की स्थिति आई तो गुस्से का वो अहसास भीतर तक सालने लगा कि हम खुद को सभ्य कह सकते हैं क्या। हालांकि, बात ये भी सच ही थी कि एंबुलेंस के आगे वाला बेहद संवेदनशील भी होता तो भी वो अपनी गाड़ी हटा नहीं सकता था।

इलाहाबाद से लखनऊ को जोड़ने वाली सड़क कम से कम हम लोगों के पढ़ने के वक्त तक राज्य की सबसे बेहतर सड़कों में मानी जाती थी। पिताजी को एंबुलेंस में लेकर जब हम निकले तब समझ में आया कि उत्तर प्रदेश में सड़कों का कितना बुरा हाल है। बड़े-बड़े गड्ढे हो गए हैं इलाहाबाद को लखनऊ से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण सड़क पर। उम्मीद की किरण बस यही है कि अब वो राष्ट्रीय राजमार्ग में शामिल हो गया है। इसलिए रायबरेली से लखनऊ की सड़क बेहतर हो गई है।

Monday, April 07, 2014

छोटे हित, छोटी चिंता, छोटे लालच, बड़े सुख

गजब था। मस्त एकदम। अपने में और साथी पंडे की पन्नी में। पन्नी- मतलब मोटी पॉलिथिन जिससे पंडाजी ने धूप, बारिश से बचने का इंतजाम कर रखा था। हवा अच्छी चल रही थी। तेज, तेज। मोटी पॉलिथिन बार-बार तेज-तेज उड़कर फिर बांस के खोंच में लग रही थी। खोंच- मतलब सलीके से बांस जो लगाने से रह गया और ऊपर निकला हुआ था। मुंह पान, गुटका टाइप की एकदम देसी दारागंजी सामग्री से भरा था। कुछ सामग्री तो कई दिनों तक मुंह में रह जाती थी। ऐसी अहसास पंडाजी का मुंह दे रहा था। वही पंडाजी बोले। बचाए लेओ नै तो पन्नी गै तुम्हार। वा देखो दर बनाइ लिहिस। अब ऊंही से फटी औ तुम्हार ग पैसा पानी। जिस पंडे की पन्नी थी उसने ऊपर हाथ लगाकर देखा और जहां दर (निशान) गया था। वहां फटा कपड़ा लपेटा दिया। मस्त पंडे के गुटके टाइप सामग्री से भरे मुंह से फिर आवाज निकली। देखो ई कपड़ा से न रुख पाई। उतार देओ एका। निकालके धै देओ। फिर काम आई। नै तो एत्ती हवा म ग समझो। केत्ते में लिहे रहेओ। जवाब आवा। 750 क रही। औ अब निकालब न। फाट जाए तो फाट जाए। एकै कई गुना दै गइन गंगा माई। माघ म। और का चाही। फाट जाई तो अगले माघ म फिर खरीदी जाई। अब पन्नी की समस्या खत्म। तो गुटके की सुगंध के साथ फिर से नई छोटी चिंता हाजिर थी। ई का किहे हो। हमरी सइकिलिया पे ई केकर केकर सइकिल लगवाए दियेओ। खाली पंडाजी ने सारी साइकिलें और एक हीरो पुक अलग करके सलीके से खड़ा किया। हम भी नहाकर लौटे थे। कपड़े भी बदल लिए। लौट आए।

(इलाहाबाद गए थे तो एक दिन संगम नहाने चले गए। वहीं दो पंडों की बातचीत थी ये। लगा कितनी छोटी चिता, लालच, हित हैं लेकिन, इनके सुख कितने बड़े हैं। पंडाजी लोगों की तस्वीर इसलिए नहीं ले पाया क्योंकि, गंगा नहाने मोबाइल लेकर नहीं गए। )

Tuesday, April 01, 2014

अपनी लेडीज के बहाने दूसरे की लेडीज के साथ

इलाहाबाद के अलोपी देवी मंदिर में नवरात्रि के पहले दिन की कतार
इलाहाबाद के अलोपशंकरी मंदिर में नवरात्रि दर्शन के लिए अच्छी व्यवस्था थी। हमारे लिए भी ये सुखद अनुभव था कि इलाहाबाद के अलोपीदेवी मंदिर में इतने व्यवस्थित तरीके से दर्शन हो रहे हैं। महिला, पुरुष की अलग कतार थी और कतार धीरे-धीरे ही सही लेकिन, लगातार बढ़ रही थी। इसी व्यवस्था की तारीफ करते हुए 2 पुरुष महिलाओं वाली कतार के सबसे पीछे लग लिए थे। और महिलाओं की कतार में पुरुष होने का भय, लज्जा छिपाने के लिए तेजी से बात करते हुए दिख रहे थे कि एकदम गेट पर रोक देगा तो रुक जाएंगे। मुझे लगा कि शायद ये अपने से धार्मिक जगह पर सद्बुद्धि का इस्तेमाल करेंगे और पुरुषों की कतार में आ जाएंगे। लेकिन, वो तो अपनी लेडीज का साथ छोड़ने को तैयार ही नहीं था। दोनों पुरुष अपनी पत्नी के पीछे महिला कतार में ही लगे रहे। आखिरकार मुझे बोलना पड़ गया। बोला तो दोनों एक साथ बोल पड़े हमारी लेडीज साथ में हैं। तो मैंने तुरंत कहाकि मेरी भी लेडीज महिला कतार में आगे हैं। और ये भी बोला मैं कि क्या आप चाहते हैं कि आपकी लेडीज के पीछे भी कतार में कोई और लग जाए। मैंने फिर जोर देकर कहाकि आप लोग व्यवस्था न बिगाड़िए पुरुष कतार में आ जाइए। इतना कहने पर भय, लज्जा के दबाव में सद्बुद्धि एक पुरुष को आई और वो अपनी लेडीज का साथ छोड़कर पुरुष कतार में लग गए। लेकिन, दूसरे वाले सज्जन पर भय, लज्जा का दबाव कम काम कर रहा था। क्योंकि, उनकी लेडीज का उनको गजब साथ मिल रहा था। इसलिए दूसरे सज्जन थोड़ा और आगे जाकर फिर वही प्रयास करने लगे। और इसमें उनकी लेडीज प्रेरक भूमिका में थी। जब मैंने जाने नहीं दिया तो देवी दर्शन को आए पुरुष कहे बहरै से माई क दरसन कई लेब कउनौ बात नाहीं।असल समस्या यही है। अच्छी खासी व्यवस्था को पहले हम खराब करते हैं। फिर अपनी लेडीज के साथ दुर्व्यवहार पर व्यवस्था को गरियाते हैं। और हम धार्मिक हैं।

Monday, February 11, 2013

हम हादसे को हराना कब सीखेंगे ?


कुंभ में इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर हुई भगदड़ ने कुंभ के सारे इंतजामों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। लेकिन, यहां सच यही है कि कुंभ क्षेत्र यानी गंगा की रेती पर बसा अस्थाई शहर पूरी तरह से इंतजाम से दुरुस्त था। असल गड़बड़ी रेलवे की है। और, इस एक गड़बड़ी ने दुनिया भर से इस नायाब मेले को देखने-समझने आए और इससे अभिभूत लोगों के सामने भारतीय सरकार की बदइंतजामी जाहिर कर दी। इसे बेहतर करने की जरूरत है। कम से कम इसी बहाने अगर रेलवे के देश में कम से कम एक दोहरे ट्रैक की जरूरत पूरी की जा सके। रेल बजट और बजट के महीने का भी संयोग बन रहा है।

Wednesday, December 12, 2012

12 साल में कितना बदल गया हिंदू!

विश्व हिंदू परिषद याद है ना। अरे, वही इलाहाबाद वाले अशोक सिंघल जी जिसके अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे। अपना घर भी एक शोध संस्थान को दे दिया है। गजब के समर्पित व्यक्ति हैं। सिंघल  साहब के बाद गुजरात के एक डॉक्टर प्रणीण तोगड़िया उसकी कमान संभाल रहे थे। जरूरत से ज्यादा उग्रता लिए तोगड़िया साहब की अगुवाई में विहिप सबसे पहले तो, गुजरात से ही गायब हो गया। कहा जाता है कि गुजरात में हुए दंगों में मोदी सरकार से ज्यादा भूमिका विश्व हिंदू परिषद की थी। खैर, ये नरेंद्र मोदी का कमाल था। मोदी ने सिर्फ विपक्षी राजनीतिक दलों को ही नहीं। अपने विचार से जुड़े संगठनों को भी सत्ता के रास्ते में रोड़ा बनने पर उखाड़ना शुरू कर दिया। लेकिन, ये अचानक मैं क्यों याद कर रहा हूं। दरअसल एक समय में राम मंदिर आंदोलन या देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीतिक हावी हुई तो, विहिप, बजरंग दल में काम करने वाले बीजेपी से भी ज्यादा उसकी राजनीति में प्रभावी दिखने लगे। कई भगवाधारी बाबा विहिप के प्रभाव से लोकसभा, विधानसभा का टिकट पाकर वहां भी धर्म ध्वजा फहराने लगे।


महाकुंभ 2013 का प्रतीक चिन्ह
दरअसल ये अचानक मुझे याद इसलिए आया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद महाकुंभ 2013 का लोगो जारी किया है। हालांकि, इसमें महाकुंभ होने जैसा कहीं से भी दिख नहीं रहा है। क्योंकि, कुंभ तो, हर साल होता है। जबकि, महाकुंभ हर 12 साल पर होता है। प्रयाग के 2001 वाले महाकुंभ से मैं शुरुआती दिनों  वाले पत्रकार के तौर पर जुड़ा था। और, मुझे याद है कि सुबह के स्नान से रात की लीला के कवरेज करने के अलावा एक बेहद महत्वपूर्ण स्थान हुआ करता था। विश्व हिंदू परिषद का पंडाल। उसी पंडाल में 2001 के महाकुंभ में धर्म संसद हुई थी। बड़ी महत्वपूर्ण धर्म संसद थी। मुझे याद है कि मैंने धर्म संसद पर दूसरे पत्रकारों की तरह नजर गड़ा कर रखी थी। महत्वपूर्ण साधु-संतों महंतों का जमावड़ा विश्व हिंदू परिषद के पंडाल में लगा रहता था। लेकिन, 2013 के महाकुंभ में शायद ही किसी को विहिप के पंडाल की उतनी फिक्र बने। शायद ही कोई धर्म संसद हो और अगर हो भी तो, शायद ही उसका कुछ असर प्रदेश, देश की राजनीति पर बन पाए। वजह क्या हो सकती है। 12 साल में इतनी जबरदस्त अप्रासंगिकता। कहा जाता है कि समय के साथ सबको चलना ही होता है अगर, समय के साथ याद रहना है तो। नरेंद्र मोदी से बेहतर उदाहरण शायद ही इस बात का कोई हो। नरेंद्र मोदी हिंदू हृदय सम्राट थे। 11-12 सालों में मोदी विकास के प्रतीक बन गए। इसका चुनावी परिणाम तो, 20 दिसंबर को ही पता चलेगा। लेकिन, सर्वे-संकेत तो, मोदी की शानदार जीत की बात कह रहे हैं। और, इलाहाबाद के अखबारों में विहिप की खबर कहीं नहीं हैं। हां, नए महामंडलेश्वरों के अलग नगर बसाने की खबर जरूर है। सही है गंगा, यमुना, सरस्वती में 12 साल में बड़ा पानी बह गया।

Tuesday, October 30, 2012

चरित्र निर्माण की शाखा नए सिरे से लगानी होगी


ये बात हमेशा सच साबित होती है कि और एक बार फिर तथ्यों के साथ साबित हो रही है कि किसी भी घटना का बीज कभी न कभी पड़ता है तभी आगे जाकर वो बड़ा पौधा बन जाता है। पार्टी विद् डिफ्रेंस का दावा करती रही भारतीय जनता पार्टी आजकल अजीब स्थिति में है। सबसे ज्यादा ईमानदारी, चरित्र, शुचिता के दावे वाली इस पार्टी की मुश्किल ये हो रही है कि जब देश में लंबे अर्से के बाद आंदोलन का माहौल है और सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम ताकतवर हो रही है तो, इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे हैं। बड़ी मुश्किल की बात ये है कि ये राष्ट्रीय अध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी को शुचिता, चरित्र, त्याग और ईमानदारी की शिक्षा देने वाले मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रिय होने की वजह से पद पर आसीन हुआ माना जाता है।

जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बागडोर संघ के पहले सरसंघचालक डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार की तरह दिखने वाले मोहनराव भागवत ने संभाली थी तो, लगा था कि पार्टी नई उर्जा से पुराने आदर्शों को फिर से लौटा पाएगी। पार्टी बुजुर्ग हो चुकी भारत मां की तीन धरोहर अटल-आडवाणी-मुरली मनोहर की तिकड़ी के सहारे आगे बढ़ती नहीं दिख रही थी। अटल बिहारी बाजपेयी बीमार थे, मुरली मनोहर संगठन में अलग-थलग थे क्योंकि, आडवाणी बुजुर्गियत के बावजूद अपनी तैयार की हुई पौध के जरिए पार्टी चला रहे थे। उस समय पहली बार किसी सरसंघचालक ने बीजेपी से जुड़े मुद्दों पर मीडिया में उतने खुले तौर पर अपनी बात रखी थी। बीजेपी को हम निर्देश नहीं देते हैं ये कहने के बावजूद बार-बार मोहन भागवत पार्टी को ये बताते रहे कि बीजेपी अब बुजुर्ग हो चुके आडवाणी के भरोसे नहीं चलने वाली। जिन्ना पर बयान देकर आडवाणी संघ की अच्छी सूची से ऐसे ही बाहर हो चुके थे। ऐसे में उम्र और ऊर्जा का हवाला देकर उन्हें अभिभावक की भूमिका में लाकर संघ के निर्देशों के आधार पर काम करने वाले अध्यक्ष की तलाश संघ की महाराष्ट्र के रोड, फ्लाईओवरमैन टाइप कहे जाने वाले नितिन गडकरी पर जाकर खत्म हुई। शुरू में लगा संघ का काम पूरा हो गया है। गडकरी की एक कमी उनकी काया की थी तो, वो गडकरी ने ऑपरेशन के जरिए ठीक कराने की कोशिश भी कर ली जो, काफी हद तक सफल भी रही। लेकिन, कारोबारी गडकरी पार्टी को भी कारोबार की तरह चलाने लगे जिसके दुष्परिणाम अब साफ-साफ दिखने लगे हैं।

गडकरी के पहले भी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को रिश्वत लेते कैमरे पर देश ने देखा लेकिन, पार्टी के खिलाफ कोई माहौल नहीं बना। बंगारू लक्ष्मण की एक लाख रुपए की रिश्वत की रकम और बंगारू को पार्टी ने अध्यक्ष पद से हटाकर उसे काफी हद तक मुक्ति पा ली। और, बंगारू सिर्फ नागपुर के आशीर्वाद से अध्यक्ष पद पर नहीं थे। लेकिन, इस बार मामला जरा अलग है। नितिन गडकरी सिर्फ नागपुर के ही आशीर्वाद से अध्यक्ष हैं इसमें अब जरा सा भी बहस की गुंजाइश नहीं दिखती। और, इसमें कोई संदेह भी नहीं है कि बीजेपी में उसके मूल संगठन संघ के आशीर्वाद के बिना किसी का खड़े, लड़े रह पाना संभव भी नहीं है और शायद होना भी नहीं चाहिए। अटल-आडवाणी की ताकत भी संघ ही था। और, ये ताकतवर आशीर्वाद बना रहे इसके लिए नितिन गडकरी ने हरसंभव कोशिश भी की। दिल्ली में पार्टी कार्यालय नए सिरे से संवर रहा है। आडवाणी की दिल्ली दरबार की मंडली को काफी हद तक किनारे कर दिया। जो, शायद जरूरी भी हो गया था। लेकिन, इस मंडली के मुख्य प्रभावी भूमिका से हटने के बाद जो, नई ऊर्जा, कार्यकर्ताओं को मुख्य प्रभावी भूमिका में आना था वो, भी नहीं आ पाए। नितिन गडकरी ने संघ के प्रचारक और मोदी विरोध की वजह से हाशिए पर पड़े अच्छे संगठनकर्ता संजय जोशी को मुख्य भूमिका में लाकर संघ को और खुश कर दिया। उत्तर प्रदेश में उमा भारती की वापसी और बड़ी-बड़ी बातों से ये माहौल पैदा कर दिया कि अब यूपी में संघ/बीजेपी कैडर वापस आ रहा है। उमा की वापसी तो, कराई लेकिन, उमा को अधिकार नहीं दिए। गडकरी खुश थे कि उत्तर प्रदेश के सारे बड़े नेता अपनी सीटों के चुनाव में फंस गए। और, हुआ भी यही इन सारे नेताओं ने येनकेन बस अपनी सीट जीतने तक ही अपने कर्तव्य की इतश्री समझ ली। और, नितिन गडकरी ने इन बातों के बीच यूपी में चुनाव जीतने की रणनीति ठेकेदारों जैसी बना ली। यूपी को कई हिस्सों में बांटा और छोटे-छोटे ठेके सीट जिताने का भरोसा लेकर बांट दिए। फिर क्या अपराधी, क्या भ्रष्टाचारी सब ठेका हासिल कर चुके थे। यहीं आकर समझ में आ गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नितिन गडकरी पर लगाया दांव सही नहीं है। उत्तर प्रदेश के नतीजों ने इस पर मुहर लगा दी। भारतीय जनता पार्टी को मतदाताओं ने लड़ाई में कहीं देखा ही नहीं। अलग होने का दावा तो, पहले से ही भोथरा हो चुका था। सीटों का अर्धशतक तक नहीं लग पाया।

यही उत्तर प्रदेश था जहां से पार्टी केंद्र की राजनीति साधने का भरोसा पा चुकी थी। यही उत्तर प्रदेश था जहां से अटल बिहारी बाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी केंद्रीय राजनीति में कद्दावर थे। इसी उत्तर प्रदेश से बीजेपी के उत्थान के बीज पड़े थे। और, इसी उत्तर प्रदेश की एक घटना याद करने पर मुझे आज की बीजेपी की समस्या की जड़ समझ में आ जाती है। मुझे कुछ लोगों ने नब्बे के दशक की ये घटना बताई थी। ये कितनी सच है पता नहीं लेकिन, इसके बहाने इस मूल समस्या की समझ भले आ जाती है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ भवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर प्रमोद महाजन आए हुए थे। प्रमोद महाजन उस समय भारतीय जनता पार्टी के तेजस्वी नेताओं में थे। जाहिर है ऐसे तेजस्वी नेता से जल्द से जल्द हर कोई संबंध बना लेना चाहेगा। बीजेपी की एक महिला पदाधिकारी ने प्रमोद महाजन से अपना परिचय दिया। उन्होंने पूछा आप क्या करती हैं। महिला पदाधिकारी ने कहा- पार्टी में इस दायित्व पर हूं। प्रमोद महाजन ने फिर से पूछा- वही जवाब। तो, उन्होंने पूछा राजनीति के अलावा क्या कारोबार करती हैं। उन्होंने कहा फुलटाइम पार्टी की सेवा करती हूं। तो, प्रमोद महाजन ने कहा- अगर खाने-कमाने का अलग से इंतजाम नहीं है तो, आप पार्टी से ही खाएंगी। उस समय प्रमोद महाजन का ये उद्बोधन असर कर गया था। लगता था कि इसीलिए ये नेता इतना ऊपर है। लेकिन, ये सच है कि प्रमोद महाजन जैसे नेताओं ने एक ऐसी पौध तैयार की जिसमें संसाधन के जरिए जनता को साधने की रणनीति तैयार की गई। और, संसाधन के जरिए जनता को साधने की ये रणनीति तो, बीजेपी को शाइन नहीं दे पाई है ये सबने देखा है।

प्रमोद महाजन दुनिया में नहीं हैं इसलिए उनकी आलोचना करने की कोई वजह नहीं है। लेकिन, प्रमोद महाजन जैसे नेता तभी तेजस्वी थे जब मुख्य भूमिका में घोर राजनीतिक तपस्या वाले स्वयंसेवक थे। अगर कारोबारी स्वयंसेवक सत्ता के केंद्र में आए तो, समाज सुधारने का संकट खड़ा हो जाएगा। बीजेपी में दरअसल ज्यादातर लोगों को करीने से सजे प्रमोद महाजन और उनकी फंड के जरिए पार्टी चलाने की कला इतनी पसंद आई कि वो, प्रमोद महाजन के दूसरे राजनीतिक संघर्षों, कार्यों को भूल गए। हर कोई प्रमोद महाजन बनने चला और प्रमोद महाजन नीचे से नीचे वाला संस्करण तैयार होता रहा। राजनीतिक प्रमोद महाजन तो, कोई तैयार ही नहीं हो पाया। और, अटल-आडवाणी-जोशी तो, भला कहां से तैयार हो पाते। जाहिर है ऐसे में पार्टी तो, बहुत पीछे छूट जाएगी।

आडवाणी जी बुजुर्ग हो गए हैं लेकिन, सत्ता मोह नहीं छूट रहा। आडवाणी जी खुद प्रधानमंत्री बनने के लिए अपनी डी 4 मंडली के आगे अच्छे कार्यकर्ताओं की जायज मांग, इच्छा को भी पीछे कर देते हैं। आडवाणी जी बहुत कुछ किए लेकिन, अब पार्टी का नुकसान कर रहे हैं। यही सब तो, वजह थी न जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नितिन गडकरी को राज्य से उठाकर राष्ट्रीय नेता बना दिया था। तो, आखिर जब पार्टी ही गलत राजनीतिक रास्ते पर चल पड़ी है तो, किसी ऐसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक को संघ क्यों नहीं बढ़ा पा रहा। जो, पार्टी ठीक कर सके। जरूरी ये है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नए सिरे से चरित्र निर्माण की शाखा लगाना शुरू करे। 2012-14 जैसे सालों की समयसीमा रखकर लक्ष्य न बनाए।

Wednesday, November 18, 2009

ये सोचकर करना-होना जरा मुश्किल था

कुछ बदलाव ऐसे होते हैं जिन्हें बहुत पहले से सोचकर करना शायद ही संभव हो। यहां तक कि कई बार जो बुराई दिख रही होती है उसी में छिपे बदलाव कुछ मायनों में बड़े सुखद होते हैं। मैं ये बदलाव महसूस तो पहले भी कर रहा था। लेकिन, अभी जब बिटिया के साथ इलाहाबाद में था तो, उत्तर प्रदेश के राज्य-शहर के लिए इस अच्छे बदलाव को समझा। पहले भी मैं इलाहाबाद के रिक्शा बैंक की कहानी बता चुका हूं।



अल्लापुर के साकेत हॉस्पिटल में हमारी बिटिया हुई। रोज शाम को मैं हॉस्पिटल के सामने से शानदार पीली बसें गुजरते हुए देखता था। शंभूनाथ इंस्टिट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी। शानदार पीली बसों पर ऐसे ही यूनाइटेड, वाचस्पति, पुणे, एलडीसी, मदर टेरेसा और जाने कितने नामों का बैनर लगाए बच्चों को उनके घर छोड़ने ये बसें आती हैं। ये बच्चे इंजीनियरिंग, मेडिकल, पैरामेडिकल, फार्मेसी, मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहे हैं। और, वो भी अपने शहर में रहकर। इन्हें अब दक्षिण भारत या देश से बाहर नहीं जाना है।


वैसे तो, शिक्षा के निजीकरण की बुराई का हल्ला ही इस पर होता है। और, ये सही भी है कि कॉलेज, इंस्टिट्यूट खोलना बाकायदा कमाई के दूसरे धंधे जैसा ही हो गया है। मायावती की सरकार हो या फिर उसके पहले की मुलायम सरकार बाकायदा रेट तय हैं कि बीएड, MBA, MBBS, BDS, BHMS, इजीनियरिंग, पैरामेडिकल कॉलेज के लिए कितना घूस खिलाना होगा। लेकिन, इस भ्रष्टाचार के बीच अच्छी बात जो निकलकर आई वो, ये कि इलाहाबाद शहर में ही करीब 19 इंजीनियरिंग कॉलेज हो गए हैं। और, दक्षिण भारत के इंजीनियरिंग, मेडिकल कॉलेजों में दाखिले जैसा डोनेशन भी नहीं देना पड़ रहा है।


और, चूंकि इलाहाबाद के बच्चों को उनकी मनचाही शिक्षा उनके शहर में ही मिल रही है तो, उनका खर्च बचने के साथ उन्हें शहर भी नहीं छोड़ना पड़ रहा है। सरकारी राजस्व भी बढ़ रहा है। बच्चे पढ़ अपने शहर में रहे हैं तो, विस्थापन (MIGRATION) के खतरनाक दुष्परिणाम से भी वे बचेंगे। राज ठाकरे जैसों को लुच्चई का कम मौका मिलेगा। पढ़ाई पुणे या बुंगलुरू में होती है तो, बच्चा भी उसी के आसपास नौकरी खोजने लगता है। इलाहाबाद में परिवार में कुछ प्रयोजन पर ही साथ रह पाता है। अब यहां आसपास थोड़े कम पैसे की नौकरी भी वो कर सकेगा। इतना स्किल्ड वर्कर जब इलाहाबाद में ही मिलेगा तो, शायद यहां लगी कंपनियां बाहर से लोगों को नहीं बुलाना चाहेंगी और कुछ नई कंपनियां भी इधर का रुख करें।


80 के दशक में देश के विश्वविद्यालयों और सरकार संस्थानों के बाद बचे लोग रूस डॉक्टर, इंजीनियर बनने चले जाते थे। इस मौके को दक्षिण भारत और फिर महाराष्ट्र ने अच्छे से समझा। थोक के भाव में वहां इंजीनियरिंग, मेडिकल कॉलेज खुल गए। और, जनसंख्या बहुल उत्तर भारत के ही राज्यों  के बच्चे वहां मोटी फीस देकर पढ़ते थे। माता-पिता की गाढ़ी कमाई का पैसा वहां चला जाता था। विस्थापन के चलते यहां के घरों में रहने वाले लोग कम बचते थे और बच्चा दक्षिण भारत, महाराष्ट्र में जाकर वहां की प्रॉपर्टी के रेट भी बढ़ाता था।


अब बस जरूरत इस बात की है कि जहां ये प्रतिभा तैयार हो रही है। वहीं पर उसे कमाने के मौके मिल जाएं। वैसे, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार से ऐसी कोई लगाना बेवकूफी हो होगी। लेकिन, कई बार बदलाव बिना किसी सरकार और लोगों की मंशा के हो जाते हैं। वो अपने निजी लालच में समाज का कुछ भला कर जाते हैं। इसका उदाहरण ऊपर मैं दे ही चुका हूं। उम्मीद करता हूं ये बदलाव होगा और तेजी से होगा। ये बीमारू राज्य में शामिल उत्तर प्रदेश को बेहतर कर सकता है। क्षेत्रीयता की राजनीति करने वाले लोगों को सार्थक जवाब भी यही होगा।

Saturday, November 14, 2009

ढोंगी बाबाओं के अमीर भक्त

सत्यसाईं बाबा के चरणों में गिरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण की तस्वीरें ज्यादा दिन नहीं हुआ जब मीडिया में लगातार छाई हुईं थीं। मेरे मन में इसे लेकर कुछ सवाल उठे थे। वैसे सत्यसाईं के चरणों में गिरने वालों में अशोक चव्हाण ही नहीं थे। ICICI बैंक के चेयरमैन के वी कामत, रिलायंस के पी एम एस प्रसाद और जाने कितने बड़े-बड़े लोग थे।



फिर जब मैंने थोड़ा जोर देकर सोचने की कोशिश की तो, मुझे दिखा कि इस साईं बाबा के तो कोई कम पैसे वाले भक्त मुझे दिखते ही नहीं। अभी इलाहाबाद में हूं तो, ऐसे ही घूमते शहर के सबसे पॉश सिविल लाइंस की बाजार में शहर की सबसे ऊंची इमारत इंदिरा भवन से भी बड़े सत्यसाईं दिख गए। 9 मंजिले इंदिरा भवन से भी ऊंचे साईं का कटआउट भी चमत्कार जैसा ही दिख रहा था। वैसा ही ढोंगी चमत्कार जिस चमत्कार का जाने कितनी बार अंधनिर्मूलन संस्था और टीवी चैनलों ने पर्दाफाश किया है।



थोड़ा आगे बड़े तो, सिविल लाइंस वाले हनुमान मंदिर वाले चौराहे पर ही सत्यसाई के कार्यक्रम का पूरा विवरण मिला तो, पता चला कि सत्यसाईं 84 साल के हो रहे हैं। उसी होर्डिंग से ये भी पता चला कि सत्यसाईं के जन्मदिन का कार्यक्रम 23 नवंबर के शहर के महंगे रिहायशी इलाकों में  से एक अशोक नगर में है। जाहिर है इन बाबा को शायद इलाहाबाद के सिविल लाइंस और अशोक नगर से बाहर के भक्त चाहिए भी नहीं। क्योंकि, इन भक्तों को बाबा चमत्कार से सोने की चेन निकालकर आशीर्वाद देते हैं तो, ये बड़े वाले भक्ते हुंडियां बाबा के चरणों में डाल देते हैं। अब बेचारे असर साईं के भक्त तो शिरडी में उनके दर्शन से ही चमत्कार की उम्मीद में रहते हैं। मैं भी शिरडी गया हूं। किसी तस्वीर में शिरडी वाले साईं बाबा तो बहुत अच्छे कपड़ों में नहीं दिखे। हां, उनके चमत्कार दूसरे बताते अब भी मिल जाते हैं। ये पुट्टापरथी वाले सत्यसाईं लकदक कपड़ों में रहते हैं अपने चमत्कार किसी जादूगर की तरह खुद दिखाते हैं। अब यहां तो मीडिया इनकी तारीफ भी नहीं करता बल्कि, कपड़े उतारता रहता है फिर भी जाने क्यों ...

Friday, November 13, 2009

इलाहाबाद का रिक्शा बैंक


उत्तर भारत से तरक्की के विचार, आइडियाज हमेशा देश की तरक्की के काम आते रहे हैं। लेकिन, इसने एक बुरा काम ये किया कि उत्तर भारत के राज्य खासकर उत्तर प्रदेश-बिहार बस विचार भर के ही रह गए। और, यहां के लोग विचार और श्रम के साथ तालमेल नहीं बिठा सके। लेकिन, अब धीरे-धीरे यहां से निकलकर बाहर विचार का प्रयोग करने के बजाए लोग यहीं प्रयोग कर रहे हैं। और, इस पर तो शायद ही किसी को संदेह हो कि उत्तर भारत की तरक्की के बिना देश की तरक्की संभव नहीं है। बिटिया की वजह से मैं भी इलाहाबाद में हूं। जिस हॉस्पिटल में बिटिया हुई है उसी के सामने किसी को छोड़ने के लिए खड़ा था कि एक नए किस्म का रिक्शा देखकर उसे समझने की जिज्ञासा मन में जोर मार गई। ये रिक्शा थोड़ा ज्यादा सुविधाजनक है दूसरे रिक्शों से ऊंचा है और इसमें जगह भी ज्यादा है।



मैंने उस रिक्शे वाले को रोका और, पहले तो, आगे-पीछे से उस रिक्शे की तस्वीरें अपने मोबाइल कैमरे से उतार लीं। फिर मैंने उससे पूछा तो, चौंकाने वाली बात पता चली। सिर्फ 25 रुपए रोज पर वो रिक्शे का मालिक बन गया था। जबकि, रिक्शे की कीमत थी करीब तेरह हजार रुपए।


इलाहाबाद के जारी गांव के मोहित कुमार ने मुस्कुराते हुए बताया कि सिर्फ फोटो और 500 रुपए जमाकर रिक्शा बैंक से उन्हें ये रिक्शा मिल गया है। मैंने कहा 25 रुपए रोज। तो, मोहित ने तुरंत बताया कि 25 रुपए रोज में हम इस रिक्शे के मालिक बन रहे हैं जबकि, बगल में खड़ा साधारण रिक्शा जो, दस हजार रुपए का आता है इसके लिए 35 रुपए रोज का किराया देना पड़ता है। जैसा आप भी देख सकते हैं इस रिक्शे में मोहित को सर्दी-गर्मी-बारिश से भी बचत होती है। आर्थिक अनुसंधान रिक्शा बैंक की ओर से मोहित को दिया गया रिक्शा नंबर 135 है और, कई रिक्शे के मालिक इसी तरह तैयार हो रहे हैं सिर्फ 25 रुपए रोज पर।



दिन में घूमते-घूमते 259 नंबर का रिक्शा भी मिल गया। उसी रिक्शे वाले ने बताया करीब 500 ऐसे रिक्शे शहर में चल रहे हैं। पता ये भी चला कि पंजाब नेशनल बैंक और इलाहाबाद बैंक आर्थिक अनुसंधान रिक्शा बैंक के जरिए जरूरतमंदों को रिक्शा मालिक बनने में मदद कर रहा है। रोज के रिक्शे के किराएदार से किराए से भी कम पैसे में करीब डेढ़ साल में रिक्शे के मालिक बन रहे हैं।



सिर्फ रिक्शा ही नहीं ट्रॉली भी मिल रही है। बढ़िया लाल-पीले रंग में रंगी। विचारों की धरती पर रंगीन विचार के साथ रंगीन रिक्शे-ट्रॉली भी कम कमाने वालों की जिंदगी रंगीन कर रहे हैं।

Sunday, October 25, 2009

इलाहाबाद से बदलाव के संकेत

हिंदी ब्लॉगिंग पर 2 दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी में शामिल होने के लिए इलाहाबाद आया हूं। ब्लॉगिंग पर कुछ खट्टा-कुछ मीठा टाइप की चर्चा हुई। कुछ खुश हुए कुछ खुन्नसियाए। सबकी अपनी जायज वजह थी। लेकिन, हमको तो भई बड़ा मजा आया। अपने शहर में 2 दिन रहने का भी मौका मिला। और, शहर से कुछ संकेत भी मिले कि भई काफी कुछ बदल रहा है वैसे मेरे गांव की तरह कभी-कभी ठहराव का खतरा भी दिखता है।

इलाहाबाद दैनिक जागरण अखबार के पहले पेज पर खबर है- “वाह ताज नहीं अब बोलिए वाह संगम!”। वाह ताज तो दुनिया कह रही है खबर के जरिए समझने की कोशिश की वाह संगम क्यों। तो, पता चला कि घरेलू पर्यटकों की अगर बात करें तो, 2008 में दो करोड़ सैंतीस लाख से ज्यादा लोग संगम में एक डुबकी लगाने चले आए। बयासी हजा से ज्यादा विदेशी पर्यटकों को भी संगम का आकर्षण खींच लाया।


आगरा करीब साढ़े सात लाख विदेशी पर्यटकों के साथ विदेशियों का तो पसंदीदा अभी भी है लेकिन, देश से सिर्फ इकतीस लाख लोगों को ही ताज का आकर्षण खींच पाया। मथुरा 63 लाख से ज्यादा, अयोध्या 59 लाख से ज्यादा देसी पर्यटक पहुंचे। आगरा के साथ अगर इन स्थानों का टूरिस्ट मैप पर थोड़ा असर बढ़े तो, इस प्रदेश के लिए कुछ बेहतरी की उम्मीद हो सकती है।


जागरण में ही एक और खबर है कि “यहां से भी कटेगा टिकट टू बॉलीवुड”। खबर ये है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में थिएटर का स्थाई सेंटर मंजूर हो गया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इंदिरा गांधी सामाजिक विज्ञान संस्थान भवन में थिएटर एंड फिल्म इंस्टिट्यूट विभाग खुल रहा है। विश्वविद्यालय में अत्याधुनिक थिएटर सेंटर शुरू होगा और यहां से छात्रों को थिएटर में डिप्लोमा और डिग्री मिल सकेगी। विश्वविद्यालय के कुलपित प्रोफेसर राजेन हर्षे के निजी प्रयास से ये थिएटर यहां शुरू हो पा रहा है। गुलजार की इसमें अहम भूमिका होगी।


ये खबरें बदलाव का संकेत तो हैं ही मीडिया कितना आतुर होता है ऐसी खबरों के लिए ये भी दिखता है। दरअसल अगर अच्छी खबरें मिलती रहें और उन्हें पढ़ने सुनने का लोगों के पास समय हो तो, मीडिया अच्छी खबरें दिखाने से क्यों गुरेज करेगा। इस समय हिंदुस्तान अखबार उत्तर प्रदेश 10 साल बाद कैसे बेहतर हो सकता है। इसकी बहस चला रहा है। हिंदुस्तान समागम के नाम से हर दिन हिंदुस्तान अखबार के दफ्तरों में शहर के लोगों को बुलाकर उनसे इस पर चर्चा की जा रही है। ब्लॉगर सेमिनार के नाते इलाहाबाद में था इसी बहाने मुझे भी मित्रों ने इस परिचर्चा में बुला लिया। अच्छा पहलू ये था कि इस बहाने शहर के लोग बैठकर बेहतरी की चर्चा कर रहे थे। बुरा ये था कि चर्चा में राजनीति के भरोसे ही सारी समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश कर रहे थे। खुद से निराश लोगों की जमात कितनी बड़ी हो गई है यहां इसका अंदाजा साफ लग रहा था। आगे के लिहाज से मेरे तैयार होने की बात से बूढ़े साहित्यकार टाइप के लोग इसलिए नाराज हो रहे थे। आगे की दुनिया कुछ लोगों की दुनिया है। नेट का नाम सुनकर वो बिदक रहे थे। वो 20 साल पुरानी चीजों को लेकर ही जी रहे थे।


कुल मिलाकर साहित्यिक-सांस्कृतिक नगरी होने की वजह से धीरे-धीरे ही बदलाव आ रहा है। और, हर चीज में थोड़ी बहुत मठाधीशी भी बचाए रखने की कोशिश जारी है। और, जो मठाधीश बन गए हैं वो, चाहते ही नहीं कि नई पीढ़ी उनसे आगे निकलकर कुछ सोच पाए। बुद्धिप्रधान समाज है ये अच्छाई है लेकिन, मुश्किल भी है किसी चीज पर इतने तर्क-कुतर्क शुरू हो जाते हैं कि बात ही आगे नहीं बढ़ पाती। लेकिन, नई पीढ़ी है तो, वो मान नहीं रही है। धकियाते, उल्टाते बढ़ती जा रही है। इलाहाबाद से संकेत अच्छे लेकर लौट रहा हूं। हां, ये जरूर है कि एक जोर के धक्के की जरूरत है। और, जरा ये पुराने गुमानों को संग्रहालय में रख दें तो, बेहतरी पक्की है।

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  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...