Posts

Showing posts from 2015

पट्टीदारी की झगड़ा ऐसे ही सुलझता है

शहरों में बसते जा रहे भारत के नौजवानों को ये बात शायद ही समझ में आएगी। क्योंकि, शहरी इंडिया के पास तो पड़ोसी से झगड़ा करने की छोड़ो उससे जान-पहचान बढ़ाने के लिए भी शायद ही वक्त होता है। इसलिए गांव में पट्टीदारी के झगड़े में एक—दूसरे की जान लेने पर उतारू लोग और अचानक एक-दूसरे को भाई बताने वाली बात कम हो लोगों को समझ आएगी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को जन्मदिन की बधाई देते-देते अचानक उनके घर पहुंचने और फिर उनकी नातिन के निकाह में शामिल हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुझे वही गांव-घर वाली पट्टीदारी याद दिला दी है। पट्टीदारी मतलब की पीढ़ी पहले एक ही रहे लोगों के बढ़ते परिवार का गांव में एक साथ रहना। हिंदुस्तान-पाकिस्तान का हाल भी तो कुछ इसी तरह का है। गांव में ऐसे ही भाई-भाई के बीच बंटवारा होता है। पीढ़ियां बढ़ते बंटवारा भी बढ़ता जाता है। और इस बढ़ते बंटवारे के साथ घटता जाता है एक दूसरे से प्रेम। घटती जाती है संपत्ति। फिर बढ़ता है झगड़ा। और फिर एक दूसरे की जान लेने से भी नहीं चूकते हैं गांववाले। हिंदुस्तान-पाकिस्तान का हाल भी 1947 के बाद से कुछ ऐसा ही रहा है। जाहिर है हिंदुस्ता…

सम्वेदनहीन विपक्ष

Image
#JyotiSingh #JusticeForNirbhaya #JusticeJuvenileDebate लोकसभा टीवी पर चर्चा में शामिल हुआ। विषय था कि विपक्ष ने कांग्रेस की अगुवाई में राज्यसभा के बचे 3 दिन में जरूरी बिल की मंजूरी की इजाजत दे दी है। चर्चा में जाने से पहले जब इस पर पढ़ा, तो भौंचक रहा गया। सहमति के बिलों में कई महत्वपूर्ण बिल थे ही नहीं। सबसे दुखद सम्वेदनहीन रवैया रहा सांसदों का The Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Bill, 2014 पर। ये वो बिल है जो 16-18 साल के किसी युवक-युवती के अपराधी होने पर उनके खिलाफ भी वयस्कों के यानी देश के सामान्य कानून के लागू होने की बात करता है। लेकिन, सरकार की लगातार कोशिश के बावजूद कांग्रेस की अगुवाई वाला विपक्ष पता नहीं क्यों इस बिल को मंजूरी देने के बजाए इसे फिर से सेलेक्ट कमेटी को भेजना चाहता है। अगर ये बिल मंजूर हो जाता तो निर्भया का बलात्कारी/हत्यारा जेल से नहीं छूटता। ये देश के सांसदों की संवेदनहीनता है। उस पर दिल्ली पुलिस ने कमाल किया है कि बेटी के बलात्कारी/हत्यारे को छोड़ने के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे ज्योति सिंह के माता-पिता को गिरफ्तार कर लिया। दुर्भाग्य है देश का। ज…

सिर्फ दिखावे का न रह जाए कारों पर रोक का फैसला

Image
नए साल की नई सुबह दिल्लीवालों के लिए अजीब सी मुश्किल लेकर आएगी। अरविंद केजरीवाल की सरकार ने अभी एक फैसला लिया है। या यूं कहें कि फैसला लेते हुए दिखना चाहती है अरविंद केजरीवाल की दिल्ली सरकार। दिल्ली की सरकार ने एक जनवरी 2016 से दिल्ली की सड़कों पर कारों की संख्या घटाने के लए एक सबसे आसान तरीका लागू करने का फैसला किया है। वो फैसला है कि सम-विषम संख्या पर खत्म होने वाली कारों को अलग-अलग दिन चलने की इजाजत होगी। दिन भी तय हो गए हैं। शून्य, दो, चार, छे, आठ पर खत्म होने वाली कारें मंगलवार, गुरुवार और शनिवार को चलेंगी। जबकि, एक, तीन, पांच, सात और नौ पर खत्म होने वाली कारें सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को चल पाएंगी। रविवार को सभी को कार चलाने की इजाजत होगी। ये फैसला अरविंद केजरीवाल की सरकार ने दिल्ली के बेहद खतरनाक हो चुके प्रदूषण को कम करने के लिए किया है। फिर मैं क्यों कह रहा हूं कि केजरीवाल की सरकार सिर्फ अच्छा फैसला लेते हुए दिखना चाहती है। मैं क्यों अरविंद के इस फैसले के साथ पूरी मजबूती से खड़ा नहीं हो रहा। दरअसल, ये फैसला लागू हो ही नहीं सकता। ये समझ में आने की ही वजह से शायद अब केजरीवाल …

राजनीति में खेलिये, क्रिकेट में क्यों खेलते हैं नेताजी?

भाजपा सांसद युवा मोर्चा के अध्यक्ष और‪#‎BCCIसचिव @ianuragthakur बड़ी मासूमियत से भारत-पाक सीरीज के पक्ष में बोल रहे हैं। उनके कहे का लिंक भी लगा रहा हूं। जो उन्होंने बार-बार ट्वीट किया है। जो वो कह रहे हैं वो इतना सीधा मासूम नहीं हैं। वो सीधे एक पक्ष हैं। इसलिए उनकी बात को गंभीरता से उतना ही लिए जाने की जरूरत है जितना सरकार उद्योग संगठनों की सुनती है और जैसे सुनती है। क्रिकेट जैसा उद्योग चूंकि सारे दलों के नेता मिलकर चलाते हैं। इसलिए ये चलता रहे। फिर चाहे भारत के पाकिस्तान से मानवीय और औद्योगिक रिश्ते कितने ही खराब रहें। क्योंकि, उससे सीधे-सीधे नेताओं का कुछ बुरा नहीं हो रहा। अब अगर पाकिस्तान से हमारे राजनयिक कारोबारी संबंध बेहतर नहीं हो रहे, तो क्रिकेट खेलकर कौन सी डिप्लोमेसी हो जाएगी। मैं निजी तौर पर किसी भी प्रतिबंध का विरोधी हूं। लेेकिन, अनुराग ठाकुर की मासूमियत में मुझे सारी पार्टियों का क्रिकेट कनेक्शन पैसे के ढेर पर भारतीय जनमानस की खिल्ली उड़ाता दिखता है। इसीलिए जब अनुराग कहते हैं कि सोशल मीडिया से ही हर बात तय नहीं की जा सकती। तो मुझे लगता है कि ये उस पार्टी का नेता कह रहा है…

राज्य में नेता की कमी बीजेपी की सबसे बड़ी मुश्किल

ये नरेंद्र मोदी का प्रभाव है या कहें कि उनके प्रभाव का विरोधियों में डर है कि हर चुनाव के बाद ये चर्चा होने लगती है कि मोदी का प्रभाव घटा या नहीं। इससे भी आगे बढ़कर विरोधी कहते हैं कि नरेंद्र मोदी की लहर खत्म हो गई है। और समर्थक कहते हैं कि मोदी लहर जारी है। वैसे तो ये बहस कभी खत्म ही नहीं हुई। लेकिन, अब ये ताजा बहस शुरू हुई है नरेंद्र मोदी के गृह प्रदेश गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव नतीजे आने के बाद। हालांकि, जिस तरह से ठीक स्थानीय निकाय, जिला पंचायत चुनाव के पहले पटेलों ने आंदोलन शुरू किया था। उससे तो दिल्ली की मीडिया ने ये निष्कर्ष साफ तौर पर निकाल लिया था कि अब बीजेपी के गुजरात में साफ होने की शुरुआत हो जाएगी। ऐसा हो नहीं सका। गुजरातियों की पहली पसंद अभी भी बीजेपी ही है। गुजरात की सभी छे महानगरपालिका में कमल का ही कब्जा है। जिला पंचायतों में कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन किया है। इकतीस में से तेईस जिला पंचायतें हाथ की पकड़ में आ गई हैं। तालुका पंचायतों मे भी कांग्रेस बेहतर स्थिति में रही है। एक सौ तिरानबे में से एक सौ तेरह हाथ की पकड़ में हैं। लेकिन, बड़े शहरों की तरह नगर पालिकाओं म…

एक दिन मैं भी पीएम के साथ तस्वीर लूंगा

Image
टेलीग्राफ अखबार की ये सवाल-जवाब वाली शानदार तस्वीर वाली खबर नहीं देखी होती, तो इस विषय पर मैं शायद ही कुछ लिखता। लेकिन, इसके बाद मेरे मन में जो था। वो लिखना जरूरी लगा। प्रधानमंत्री के साथ तस्वीर होना किसी के लिए भी बड़ी खुशी की वजह हो सकती है। इसलिए#Selfie लेना कोई गुनाह नहीं है। लेकिन, सेल्फी दौड़ मेरी दिक्कत की वजह है। पिछले साल की सेल्फी भगदड़ पर भी मेरे यही विचार थे। लेकिन, उसके खारिज होने की एक वजह ये जायज रही कि मुझे आमंत्रण ही नहीं मिला था। इस बार ससम्मान मैं भी आमंत्रित था। औरसेल्फी दौड़ छोड़िए, सेल्फी भीड़ में भी शामिल नहीं हुआ। हां, तारीफ करनी चाहिए भारतीय जनता पार्टी के मीडिया विभाग की इतने सलीके वाले दीपावली मंगल मिलन समारोह को करने के लिए। जिसमें प्रधानमंत्री @narendramodi बीजेपी अध्यक्ष @AmitShah के अलावा ढेर सारे मंत्री भी पक्षकारों से सहज रूप से मिल रहे थे। थोड़ा बहुत बोलने के बाद प्रधानमंत्री, अमित शाह दोनों ही मंच से नीचे उतरकर पत्रकारों के बीच में आ गए। भाजपा के राष्ट्रीय सचिव और मीडिया प्रभारी श्रीकांत शर्मा @ptshrikant ने दो बार मंच से अपील की कि प्रधानमंत्री खुद …

इतनी असहिष्णुता देश में कभी नहीं रही

असहिष्णु भारत इस समय दुनिया में चर्चा का विषय है। भारत अचानक इतना असहिष्णु हो गया है कि देश के सबसे ज्यादा पसंदीदा कलाकारों में से एक आमिर खान की पत्नी उनसे कह देती हैं कि क्या उनको भारत छोड़ देना चाहिए। पत्रकारिता के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार रामनाथ गोयनका अवॉर्ड के मौके पर अभिनेता आमिर खान की इस बात ने देश में उस बहस को तेज कर दिया है कि क्या सचमुच भारत असहिष्णु हो गया है। खासकर अल्पसंख्यकों के खिलाफ, उसमें भी खासकर मुसलमानों के खिलाफ। सांप्रदायिक हिंसा पर गृह मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट इस बहस को और आगे बढ़ाती है। 2014 के पहले पांच महीने और 2015 के पहले पांच महीने की बहस साफ करती है कि मोदी सरकार में ज्यादा सांप्ररदायिक हिंसा बढ़ी है। मतलब असहिष्णुता बढ़ी है। हालांकि, भारतीय जनता पार्टी इस बात पर बहस करना बेहतर समझेगी जिसमें 2015 में 2014 से कम जानें सांप्रदायिक हिंसा में गई है। इसी बहस को थोड़ा और आगे बढ़ाने के लिए गृह मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट से पिछले पांच साल के आंकड़े देखते हैं। मोदी सरकार के इस साल यानी 2015 के पहले पांच महीने में सांप्रदायिक हिंसा के 287 मामले सामने आए हैं। इसमें…

बाजार बड़ा भला कर सकता है

Image
बाजार की बात करिए और एक सांस में कोई भी बाजार की बुराई ही बुराई गिना देगा। वो भी जो बाजार में सिर से पांव तक डूबा है। वो भी जो बाजार के बिना जी नहीं सकता। वो भी जो बाजार की हर सुविधा के लिए सारी जिंदगी कसरत करते रहते हैं। खैर, मैं तो आमतौर पर बाजार का समर्थक ही हूं। बाजार की सुविधाओं का भी। हां, ये भी उतना ही दृढ़ विश्वास है कि बाजार में भी दूसरी सारी व्यवस्थाओं की तरह ढेर सारी कमियां हैं। जिसे सुधारते रहना जरूरी है। इस रविवार को स्टार प्लस पर आने वाला आज की रात है जिंदगी शो देख रहा था। अमिताभ बच्चन हैं, तो आकर्षण बढ़ जाता है। और अमिताभ बच्चन की तराकी भी अद्भुत है। खैर, मैं जो शो देख रहा था। उसमें गीता प्रतियोगिता जीतने वाली मरियम सिद्दीकी थी। मरियम है तो सिर्फ 13 साल की लेकिन, मरियम का ज्ञान किसी बड़े विद्वान का आभास दे रहा था। 13 साल की उम्र में मरियम कह रही थी कि किसी को चोट लगे और हिंदू मुसलमान पूछकर उसका इलाज हुआ तो, इंसानियत मर जाएगी। 
और शो में जब अमिताभ बच्चन ने मरियम के पिता आरिफ सिद्दीकी से पूछा कि उन्हें क्यों लगा कि बेटी को इस तरह के धार्मिक ग्रंथों को पढ़ाना चाहिए। आरिफ का…

काहे का OccupyUGC

एक#OccupyUGC आंदोलन चल रहा है। ज्यादातर मैं छात्र आंदोलन के पक्ष में ही खड़ा रहता हूं। वजह कि ज्यादातर छात्र आंदोलन के मुद्दे सही होते हैं। लेकिन, ये मुद्दा पूरी तरह से राजनीतिक दिख रहा है। इसलिए इसके घोर विरोध में हूं। कई वामपंथी और इस मुद्दे के पक्षधर विद्वानों से मैंने पूछा कि भावनात्मक विरोध, साजिश की बात छोड़कर तथ्य बताइए कि इस नॉन नेट फेलोशिप को क्यों जारी रखना चाहिए। शोध करने के लिए कुछ तो न्यूनतम योग्यता होनी चाहिए और उसी आधार पर सरकारी सहायता भी। मेरा ज्ञान इस मामले में बहुत कम है। फिर भी बताइए कि ये आंदोलन सिवाय सरकार विरोध के एक और फ्रंट के क्या है। लेकिन, किसी ने भी जवाब नहीं दिया है। 5 से 8 हजार रुपये सरकार की सब्सिडी से घर चलाते रहो। उसी में शादी-ब्याह भी हो जाए। बच्चे भी पैदा कर लो। और फिर गरियाओ कि भारत में पढ़े-लिखे लोगों की अहमियत नहीं। जो JRF या फिर कम से कम NET की परीक्षा नहीं पास कर पा रहे हैं उन्हें क्यों शोध करने के लिए सरकार पैसे दे। सवाल बड़ा है पर कोई सरोकारी साथी बता नहीं पा रहा है Why #OccupyUGC

चुनाव के शोर में दब गई अर्थव्यवस्था की अच्छी खबरें

Image
भारत में कोई भी चुनाव हों, उत्सव की तरह होते हैं। ऐसा उत्सव जिसके उत्साह और शोर में सबकुछ दब जाता है। उस पर अगर बिहार जैसे राज्य का चुनाव हों, तो जाहिर है कि ये शोर और उत्साह ज्यादा तेज हो जाता है। यही वजह रही कि पांच चरणों में हुए इस चुनाव के दौरान देश के लोगों को दूसरी कोई बात ज्यादा अहम नहीं दिखी। खासकर तरक्की और इससे जुड़े आंकड़े तो चुनावी माहौल में पूरी तरह से नीरस ही होते हैं। दाल की महंगाई के आंकड़े भी सीधे चुनावी भाषण में तड़का दे सकते थे। इसीलिए दाल की महंगाई की चर्चा तो मीडिया से लेकर चुनावी रैलियों तक खूब रही। लेकिन, इसके अलावा पूरे अक्टूबर महीने और कोई भी खबर सुर्खियां नहीं बन सकीं। लेकिन, यही अक्टूबर महीना रहा जिसमें तेजी से भारत की अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ती दिखने लगी है। और सबसे अच्छी बात ये है कि इन तेजी के संकेतों में संतुलन भी है। यानी लोगों की जेब में पैसे आते दिख रहे हैं। साथ ही कल कारखाने फिर से रफ्तार में आ रहे हैं। उद्योगों के कुछ ऐसे आंकड़ें जिन पर ध्यान कम ही जाता है। लेकिन, उन आंकड़ों में ही दरअसल अर्थव्यवस्था की कमजोरी या मजबूती के लक्षण छिपे होते हैं। उन आं…

छद्म सरोकारी साहित्यकार बनाम पूर्ण बहुमत की सरकार

इतिहास ने कभी साहित्यकारों को इस तरह से दुनिया की किसी सरकार के खिलाफ लामबंद होते हुए शायद ही देखा होगा। सबसे ज्यादा चेतन, सृजन का जिम्मा रखने का दावा करने वाले साहित्यकारों के साथ हिंदुस्तान में ऐसा क्या हो गया। जो, उन्हें इस तरह से सरकार के पैसे से चलने वाली लेकिन, स्वायत्त संस्था साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटाने के लिए बाध्य करने लगा। क्या सचमुच हिंदुस्तान की सरकार ने साहित्य, कला या फिर एक शब्द में कहें, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली है। क्या सचमुच इस देश में ऐसा कुछ नरेंद्र मोदी की सरकार ने गलत कर दिया है, जो पहले किसी सरकार ने नहीं किया था। क्या सचमुच इस समय देश के हालात आपातकाल, सिख दंगे या फिर देश के अलग-अलग हिस्से में हुए दंगों के समय के हालात से भी ज्यादा खराब हैं। क्या सचमुच इस भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकार के समय में अल्पसंख्यक- ईसाई और मुसलमान ही पढ़ें- खतरे में है। इन सवालों का जवाब खोजना इसलिए जरूरी है कि यही सवाल उठाकर जवाब में कुछ साहित्यकारों ने अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस किए हैं।
अब ये भले ही सारे लोग कह रहे हैं कि उदय प्रकाश की शुरुआत को धार …

बिहार के भले की सरकार बननी जरूरी

Image
बिहार में किसी सरकार बनेगी, ये आठ नवंबर को तय होगा। लेकिन, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कह रहे हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद देश में बीजेपी विरोधी मंच और मजबूत होगा। साथ ही नीतीश ये भी दावा कर रहे हैं कि ये नतीजे बिहार का भी भाग्य बदल देंगे। पहली बात सही हो सकती है कि अगर महागठबंधन की सरकार बनती है, तो देश में भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी विरोधी ताकतें एकजुट होंगी और पहले से मजबूती से होंगी। लेकिन, क्या महागठबंधन की जीत बिहार के लोगों, खासकर नौजवानों का भला कर पाएगी। इस सवाल का जवाब आंकड़ों से समझें, तो ना में ही मिलता है। नीतीश कुमार की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी के साथ चला एनडीए का बिहार देश का सबसे तेजी से तरक्की करना वाला राज्य बन गया था। 2012-13 में बिहार की तरक्की की रफ्तार पंद्रह प्रतिशत थी। जो, देश के किसी भी राज्य से ज्यादा थी। गुजरात, महाराष्ट्र जैसे देश के विकसित राज्य भी बिहार से पीछे छूट गए थे। जून 2013 में नीतीश कुमार ने बिहार में भारतीय जनता पार्टी से अलग होने का फैसला कर लिया। वजह गुजरात के उस समय के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री …