बाजार से बदलता गांव में दुराव और प्यार का समीकरण

(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। जैसे शहर वाले होते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। मैं पहले एक पोस्ट में समेटने वाला था। अब कोशिश करता हूं कि भले पोस्ट कई हो जाएं, कुछ ज्यादा बड़ा चित्र खींच सकूं।)

तो, मैं 5 साल बाद गांव गया लेकिन, घर की चाभी खो जाने की वजह से करीब दो साल से बंद पड़े घर में नहीं जा पाया। दादा (पिताजी के बड़े भाई) के यहां ही बैठना होता है। दादाजी साल डेढ़ साल पहले प्राइमरी के प्रिंसिपल से रिटायर हुए हैं। गांव में जिसे राजनीति कहा जाता है वो, करना उन्हें खूब आता है। हमारे बाबा स्वर्गीय श्री श्रीकांत त्रिपाठी शास्त्री रेलवे सर्विस कमीशन में थे और पिताजी बैंक में हैं। इसलिए दोनों भाइयों में बंटवारे के पहले तक दादाजी को किसी तरह की कोई चिंता नहीं थी। खेती में लगने वाला खर्च पिताजी देते थे और बदले में खाने भर का राशन शहर (इलाहाबाद) आ जाता था। गांव में एक अजीब से रुतबे की प्रतीक एक बंदूक (वही बंदूक जिसको निकालने की धमकी देने पर हमारा गांव घेरे दूसरे गांव के लोग भाग खड़े हुए और इसके अलावा तो, तीस साल से ज्यादा के समय में मुझे भी उसका इस्तेमाल याद नहीं है) भी दादा के नाम है। गांव की पहली और क्षेत्र में शायद तब गिनी-चुनी बंदूकें रहीं होंगी।

इस बंदूक का कोई इस्तेमाल नहीं होता सिवाय शादी-तिलक में द्वारचार में कुछेक गोलियां दागने के। मैंने भी एकाध बार तिलक में उससे गोली दागी है। अब तो हाल ये है कि शादी-तिलक में गोलियां किसी ने चलाईं तो, सबसे पहले मेरे ही गुस्से का शिकार होता है(गांव में रुतबा बढ़ाने वाली गोलियां अब शहरी जीवन जीते मुझे बुरी लगने लगी हैं)। खैर, दादाजी प्राइमरी में मास्टर थे। ब्राह्मण थे। और, क्षेत्र में अच्छी प्रतिष्ठा होने से हमारी ग्रामसभा में जीतने वाले प्रधान के लिए उनका आशीर्वाद जरूरी होता था। हमारे ट्रैक्टर पर बैठकर कई प्रधानों ने विजय जुलूस निकाला और सबसे पहले दादा का ही आशीर्वाद लेने आए। ये अलग बात है कि पिछले करीब डेढ़ दशक में लगातार उनके आशीर्वाद का मतलब बस कुछ वोटों तक सिमट गया और अब शायद वो अपने परिवार भर का वोट ही रह गया है।

अब हमारे भैया (दादाजी के बड़े लड़के) दादा से कह रहे हैं कि अब आप चुनाव लड़ जाइए। करीब चालीस सालों से सबको चुनाव हराने-जिताने का दम भरने वाले मेरे दादा डर रहे हैं। कहेन चुनावै लड़ै क होई तो, फिर कम से कम जिला पंचायत क लड़ब। प्रधानी लड़के इज्जत थोड़ो न गंवावै क बा। वैसेओ जब तक राजा (कुंडा के विधायक रघुराज प्रताप सिंह) उधरान अहैं इज्जत इही म बा कि चुप मारके बैठा रहा। न जीता तो, समाज में इज्जत जाई औ जीत गया तो, राजा के दरबार में हाजिरी दैके इज्जत गंवावा। इलाहाबाद-लखनऊ के रास्ते पर कुंडा के पहले लालगोपालगंज बाजार से हमारे गांव के लिए मुड़ना होता है। बाजार में सीमेंटेड सड़क बन रही थी। पूछने पर मेरे मौसी के लड़के लवकुश ने बताया कि ये सड़क लालगोपालगंज की स्थानीय परिषद का अध्यक्ष बनवा रहा है। और, ये बस बाजार और उससे थोड़ा आगे तक ही बनेगी। साथ ही खबर ये भी सुनने को मिली कि लालगोपालगंज बाजार से प्रतापगढ़ की डबललेन सड़क राजा ने रुकवा दी। अब ये पता नहीं कितनी सच है लेकिन, हर दूसरे कदम पर एक रजवाड़े वाले प्रतापगढ़ में उन्हीं राजाओं के चुनाव जीतने के बाद बदहाल सड़कें इस खबर पर यकीन करने को कहती हैं। क्योंकि, विकास ऐसे स्वयंभू राजाओं के लिए तो, मुश्किल ही बनता है ना।

और, ये गांव के समाज में इज्जत का मसला भी अजब है। शहर में पैसा, पोस्ट इज्जत दिलाने में मदद करती है। लेकिन, गांव में जाति और जाति के बाद जुड़ा पैसा और विद्वता (पता नहीं आज के संदर्भ में कितनी बची रह गई है) इज्जत दिलाती है। हमारे ही एक चचेरे दादा हैं जो, इलाहाबाद के एक इंटर कॉलज में लेक्चरर हैं। खुद भी अकेले थे, उनके बेटा भी अकेला है। इस वजह से आर्थिक स्थिति भी ठीक-ठाक है। शहर में हिंदी के अध्यापक हैं लेकिन, गांव में पुलिस थाने में उनका बहुत जुगाड़ होता था। जुगाड़ की वजह ये कि वो किसी न किसी अखबार के बिहार संवाददाता बने रहते थे। और, छठहें छमासी अखबार में छपी अपनी एक खबर दिखाकर बाघराय (हमारा पुलिस थाना) में आने वाले हर दरोगा को काबू में किए रहते थे। खैर, गांवों में आए बदलाव की वजह से अब ये हथकंडा थोड़ा काफी कमजोर पड़ गया है।

इस बार मैं गांव गया तो, हमारी नजदीकी सियारामगंज बाजार में ग्रामीण पत्रकार दादा की जमीन पर एयरटेल का टावर खड़ा था। पता चला किराए पर दिया है। आज ये जमीन उनको कमाकर दे रही है लेकिन, इसी जमीन ने उन्हें समाज में हंसी का पात्र बना दिया था। हंस तो सभी जातियां रही थीं। सारे बाभनों और कुछ ठाकुरों ने तो उनको न्यौतना भी बंद कर दिया। दरअसल, दादा को किसी ने कहा कि सुअर पालन से अच्छी कमाई हो सकती है। गांव के बगल के एक पासी को उन्होंने सुअर पालने के लिए रखा और उसे वही जमीन दे दी थी। पता नहीं कमाई कितनी हुई लेकिन, समाज निकाला का दबाव ऐसा बनाकि उन्हें परंपरा से हटकर अपनी कमाई का नुस्खा बंद डब्बे में डालना पड़ा। अब बेटा उसी बाजार में सरिया, सीमेंट, बालू बेच रहा है, अच्छी कमाई कर रहा है।

हमारी नजदीकी बाजार सियारामगंज भी गांवों के सामाजिक बदलाव की गजब की मिसाल है। पंद्रह साल पहले तक एक ठाकुर साहब की तीन दुकानें थीं। जिसमें सीमेंट, सरिया से लेकर घर का हर जरूरी सामान, रस्सी, राशन का तेल सब मिलता था। ठाकुर साहब सेना में सिपाही रहे थे। इसके अलावा बाजार में बस गिनी-चुनी दुकानें थीं। कुछ चाय-समोसा टाइप की। फिर धीरे-धीरे ठाकुर-बाभनों के बेरोजगार लड़कों के लिए उनके घर के लोगों ने, खासकर शहरों में कमा रहे लोगों ने बाजार में ही दुकानें बनवाकर दे दीं। अब एक ही लाइन में बाभन, ठाकुर, बनिया, अहिर, चमार, पासी (इन जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किसी को कमतर या ज्यादा दिखाने के लिए नहीं बल्कि, गांव की सामाजिक स्थिति को शीशे में दिखाने की कोशिश के लिए है) सबकी दुकानें हैं। दुकानों में भी कोई बंटवारा नही। बाभन ठाकुर भी चाय-पान-कपड़ा बेच रहे हैं और दूसरे भी। जाति नहीं काम पैमाना बन रहा है। ऐसा नहीं है कि जाति की ठसक पूरी तरह से खत्म हो गई है लेकिन, काम की जरूरत उसे दबा रही है। अब उसी आधार पर दोस्ती-यारी और दुराव के मापदंड भी बदल रहे हैं।