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Showing posts from July, 2015

हे टीवी मीडिया के असहाय मित्रों। अब नरक मत करो।

हे टीवी मीडिया के असहाय मित्रों। अब नरक मत करो। #YakoobMemon #YakoobHanged के बाद अब उसकी शवयात्रा मत दिखाने लगना। नरक के भागी इतना भी न बनो। देश के सर्वप्रिय सबके राष्ट्रपति और सिर्फ राष्ट्रपति ही नहीं सबके साथी, शिक्षक डॉक्टर अबुल पाकिर जैनुलआब्दीन का अंतिम संस्कार भी आज हो रहा है। टीवी के संपादक बार-बार ये बहस करते हैं कि टीवी पर हम वही दिखाते हैं। जो, जनता चाहती है। जनता के दबावके बहाने सारी गलतियों को छिपा लेने वाले संपादकों थोड़ा तो शर्म करो। कौन सी जनता का दबाव था कि याकूब की फांसी पर इतनी बहस हो ये तो अब पूरी तरह से साफ हो गया है। हा इतना जरूर हुआ है कि इस जनता के दबाव की आड़ में आप संपादकों ने पिछले एक हफ्ते से संपूर्ण विश्राम किया है। न किसी विचार पर काम करने की जरूरत रही। न ही सुबह की मीटिंग में ये तय करने की जरूरत कि आखिर चौबीस घंटे के टीवी न्यूज चैनल पर बारह घंटे की लाइव रिपोर्टिंग में क्या दिखाएंगे। वैसे भी याकूब मेमन के भावनात्मक पक्ष पर तो बहुतायत कहानियां पहले से ही मीडिया में थी हीं। बस उन्हें नई तारीख के साथ छापना, दिखाना था। सुबह से ही सारे संपादकों ने अपने रिपोर्ट…

खेल सिर्फ ब्राह्मण ही करता है

ये ब्राह्मण भी अजब प्रजाति है। जाति नहीं कह रहा हूं। क्योंकि, लोगों ने इसे जाति से ऊपर उठा दिया है। कई बार तर्क सुना है कि ब्राह्मण न होते तो समझ आता कि ब्राह्मण होना कितना लाभदायक है। हालांकि, मुझे तो कभी ब्राह्मण होने का कोई लाभ नहीं मिल पाया। इसलिए अज्ञानी ही रह गया। हां, नियमित तौर पर सर्वाधिक गालियां जरूर ब्राह्मणों को पाता देखता हूं। अब मुझे समझ आ रहा है कि ये ब्राह्मण जाति वाला नहीं, प्रजाति वाला है। सारी सृष्टि की हर बुराई के लिए ब्राह्मण जिम्मेदार हो गया है। कमाल तो ये कि मायावती की चरण रज से ही कुछ हासिल करने की चाह लिए लोग भी तर्क देते-देते कह जाते हैं कि मायावती भी मनुवादी हो गई है। मुसलिम, सिख, इसाई से लेकर हिंदू में हर जाति का राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और राज्यों के मुख्यमंत्रियों से लेकर सब कुछ हो चुके हैं। लेकिन, गाली खाने का संपूर्ण ठेका एकमुश्त तौर पर वही प्रजाति वाले ब्राह्मण को ही मिला हुआ है। अभी दफ्तर से लौटकर ट्विटर देखा तो, ब्राह्मण ट्रेंड कर रहा है। हमें लगा क्या हो गया। खंगाला तो समझ आया कि फिर ब्राह्मण ने एक मुसलमान को फंसाकर मार डाला है। 199…

नई विश्व संरचना का संगठन है ब्रिक्स

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ब्रिक्स देशों के बैंक ने विधिवत काम करना शुरू कर दिया है। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के संगठन ब्रिक्स के इस बैंक की अहमियत बहुत ज्यादा हो जाती है। न्यू डेवलपमेंट बैंक में एक रूस को छोड़ दें तो सभी देश विकासशील देश हैं। ये बैंक विश्व बैंक के मुकाबले में काम करेगा या यूं कहें कि विश्व बैंक की कमियों को भरने की कोशिश करेगा। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब दुनिया में सहयोग, संगठन, संतुलन बनाने की बात की गई तो, संयुक्त राष्ट्र संघ, अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक कोष और विश्व बैंक की भूमिका समझ में आई। और उम्मीद यही की गई थी कि इन संस्थाओं के जरिए दुनिया समानता लाने की कोशिश की जाएगी। कहने को तो ये संस्थाएं दुनिया भर में असमानता दूर करने के लिए बनीं। लेकिन, बाद के सालों में समझ में ये आया कि दरअसल ये संस्थाएं दुनिया की असमानता को दूर करने के बजाए उनकी ताकत बढ़ाने में ही मददगार हुईं जो, पहले से ही ताकतवर थीं। जिसका सीधा सा असर भी हुआ कि दुनिया लगभग एकध्रुवीय हो गई। अमेरिका के ही इर्द गिर्द पूरी दुनिया और ये संस्थाएं घूमने लगीं। रूस के बिखरने के बाद तो ये पूरी तरह से तय हो गया। चाहे अनचाहे…

कमजोर बुनियाद पर खड़ी भारत की उच्च शिक्षा

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आईआईटी रुड़की से तिहत्तर छात्रों को निकालने की खबर आई तो लगा कि कोई संस्थान ये कैसे कर सकता है। बीटेक के पहले साल में ही तिहत्तर बच्चों को निकालने की खबर के बाद हर किसी को छात्रों के साथ सहानुभूति हो गई। सोशल मीडिया से लेकर लोगों के बीच से दबाव बनने लगा कि छात्रों को मौका देना चाहिए। इस तरह से तो उनका भविष्य खराब हो जाएगा। लेकिन, इन तिहत्तर छात्रों का भविष्य बनाने की चिंता किस तरह से पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था की चिंता को और बढ़ाएगी, इस पर शायद ही किसी का ध्यान जा रहा हो। या फिर कोई बहस हो रही है। सबसे पहले तो ये कि आखिर इन तिहत्तर छात्रों को बीटेक पहले साल की परीक्षा की नौबत क्यों आई। उसका जवाब ये है कि इन छात्रों ने पहले साल पांच सीजीपीए से भी कम नंबर हासिल किए हैं। आईआईटी रुड़की ने इसी आधार पर छात्रों को बाहर करने का नोटिस भेज दिया। ऐसा नहीं है कि इससे पहले किसी आईआईटी में छात्रों को खराब प्रदर्शन की वजह से निकाला नहीं गया है। लेकिन, बाद में उन्हें वापस ले लिया गया। मुझे लगता है कि यही छात्रों को वापस लेना भारतीय शिक्षा व्यवस्था की चिंता की सबसे बड़ी वजह बनते हैं। कमाल की बात तो य…

ये बड़े कलाकार हैं!

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बहस अच्छी होती है। और गजेंद्र चौहान को एफटीआईआई का चेयरमैन बनाने के सरकार के फैसले पर हो रही बहस के बाद तो ये और भी साबित हो गया है। गजेंद्र चौहान को चेयरमैन बनाना चाहिआ या नहीं बनाना चाहिए। छात्रों के, फिल्म जगत के बड़े-बड़े लोगों के इतने विरोध के बाद गजेंद्र चौहान को पद पर बने रहना चाहिए या नहीं। ये सारी बहस होती रहे। लेकिन, इस बहस में एक बात जो निकलकर आई है। उस पर बात होनी बड़ी जरूरी है। बार-बार जब भी देश के प्रतिष्ठित संस्थानों की बात होती है। तो, साथ में ये बात जरूर होती है कि देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में मैनेजर, डॉक्टर, इंजीनियर बनाने के लिए सरकार कितनी रकम खर्च करती है। और क्या जनता के टैक्स की रकम में से खर्च की गई उस रकम से तैयार छात्र देश को कितना वापस दे पाते हैं। बहस ये भी होती है कि आईआईएम से निकले मैनेजर, देश के प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेजों से पढ़कर निकले डॉक्टर या फिर देश की प्रतिष्ठित आईआईटी से निकले इंजीनियर देश का कितना भला करते हैं। और वो लोगों की गाढ़ी कमाई से उनकी शिक्षा को दी गई सब्सिडी का कितना हिस्सा लोगों की सेवा करके फिर से उनको लौटाते हैं। बहस बार-बार ये होत…

संघ को बदनाम करने की साजिश

@RSSorg @PMOIndia @BJP4India इस रिपोर्ट को जरूर को देखें। ये फ्रांस के न्यूज चैनल @FRANCE24 पर शनिवार को आने वाली रिपोर्ट का प्रोमो है। ये रिपोर्ट दिल्ली, बेरुत, वॉशिंगटन और लंडन में भी दिखेगी। रिपोर्ट है Forced to pray in secret - Christians in India इस प्रोमो को ही देखकर लगता है कि संघ और बीजेपी हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए इसाइयों पर इतना दमन कर रहे हैं कि वो ईसामसीह को चर्च में याद करने के बजाए घर में ही याद करते हैं। प्रोमो में जब इतना कुछ है तो, पूरी रिपोर्ट के बारे में आसानी से समझा जा सकता है। जबकि, अभी तक किसी भी चर्च पर हुए हमले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बीजेपी या किसी दक्षिणपंथी संगठन का नाम दूर-दूर तक नहीं आया है। ऐसे में भारत चर्चों पर हुए हमले, चोरी की घटनाओं को संघ, बीजेपी से जोड़कर भारत की छवि खराब करने की ये बड़ी कोशिश है। ये एक घटना मेरी नजर में आई। ऐसी जाने कितनी कोशिशें, साजिशें चल रही होंगी।

धरातल पर उतरता मेक इन इंडिया

मेक इन इंडिया का बेहतर असर हो रहा है। मेक इन इंडिया अभियान की शुरुआत के बाद भारत में एफडीआई अड़तालीस प्रतिशत बढ़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल सितंबर में मेक इन इंडिया अभियान शुरू किया था। तब से अप्रैल तक के आंकड़े बता रहे हैं कि विदेशी निवेशकों को ये मेक इन इंडिया खूब लुभा रहा है। इसकी गवाही दे रहा है आजकल अखबारों और दूसरे जरिए से आ रहा बीएमडब्ल्यू का बड़ा सा विज्ञापन। ये विज्ञापन बीएमडब्ल्यू के मेक इन इंडिया अभियान में शामिल होने का खबर दे रहा है। इस खबर के साथ अच्छी खबर ये भी कि अब चेन्नई के नए प्लांट में बनेंगी बीएमडब्ल्यू कारें। कंपनी ने मेक इन इंडिया कारों की कीमत कम होने का विज्ञापन दिया है। विज्ञापन कह रहा है कि जर्मन तकनीक का नया घर भारत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मेक इन इंडिया असर करता दिख रहा है। सही समय पर ये अभियान प्रधानमंत्री ने शुरू किया है। ये समय है जब दुनिया भर में बड़ी-बड़ी कंपनियां खुद का मुनाफा बचाने के लिए जूझ रही हैं। यही वजह है कि जब ऐसे मौके पर दुनिया के सबसे ज्यादा संभावना वाले देश भारत के प्रधानमंत्री ने उनके लिए और मौके मेक इन इंडिया अभ…

दो तस्वीरों में दिखता धर्मनिरपेक्षता का सच

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@narendramodi @PMOIndia ध्यान दें। ये दो तस्वीरें हैं। पहली असली तस्वीर है। दूसरी आधुनिक तकनीक का कमाल है। सवाल ये बिल्कुल नहीं है कि इबादत के वक्त मोदी के हाथ बंधे थे या हथेलियां खुली हुईँ थीं। लेकिन, ये खतरनाक सवाल है कि किसको इस तरह के फर्जीवाड़े से फायदा हो रहा है। नरेंद्र मोदी का मैं प्रशंसक इसलिए हूं कि वो जैसे हैं, वैसे रहते, दिखते हैं। और उन्हें छवि में बांधने की कोशिश वो हर बार तोड़ते हैं। अंधभक्तों के लिए भी एक सलाह है कि जिसकी अंधभक्ति रखो, उस पर भरोसा तो रखो। दोनों पक्ष उबल रहे हैं। दरअसल बड़ा छद्म धर्मनिरपेक्ष वर्ग है जिसकी दुकान पुरी तरह से खत्म होती दिख रही है। बहुतायत खत्म हो भी गई है। लालू प्रसाद यादव जब कभी धर्मनिरपेक्षता के लिए जहर पीने, जान देने जैसी बातें करते हैं तो, दरअसल वो वही लक्षण हैं। बड़ा वर्ग है जिसको लगता है कि किसी तरह नरेंद्र मोदी के सिर पर टोपी पहना दो जिससे हिंदू मोदी को दुश्मन मान ले। जिससे फिर ये साबित हो जाए कि सत्ता के लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब यही होता है। जिससे ये साबित हो जाए कि मोदी हिंदू-हिंदू या विकास-विकास बस सत्ता तक के लिए ही चिल्ला रहे…

भारत-पाकिस्तान रिश्ता, उबले आलू जैसा

तेरह साल की अबीहा ने दिल्ली के एक अस्पताल में दम तोड़ दिया। बीमार अबीहा के इलाज के लिए उसके पिता हामिद इमरान उसे लेकर पाकिस्तान से भारत आए थे। अबीहा नहीं बची लेकिन, भारत-पाकिस्तान के बीच का दबा प्यार हामिद इमरान के लिए और बढ़ गया। इमरान को भारत में इलाज कराने का रास्ता भी उनके स्कूल के जरिए आया जो, सरदार चेत सिंह कोहली ने 1910 में पाकिस्तान के चकवाल में बनवाया था। इसी स्कूल से पढ़े एक भारतीय साथी की वजह से हामिद इमरान अपनी बच्ची अबीहा को भारत इलाज के लिए लेकर आए। अबीहा भारत से बहुत प्यार करती थी। उसने अपनी डायरी में भारत के बारे में काफी कुछ लिख छोड़ा है। और यही प्यार है कि भारत में बच्ची की मौत होने के बावजूद हामिद इमरान ने पाकिस्तान लौटकर वहां के अखबार डॉन में लिखा – मैं अपनी बच्ची की अचानक मौत का दर्द भूल नहीं सकता। लेकिन, उसी तरह भारत में मिले प्यार को भी मैं कभी नहीं भूल सकता। इंटरनेट पर ये कहानी खूब पढ़ी जा रही है। ये छोटी सी कहानी भारत-पाकिस्तान की जुड़ी गर्भनाल की कहानी कह देती है। ये गर्भनाल इस कदर जुड़ी हुई है कि जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो, उन्होंने सबको चौंकात…

बिहार में बदल गए हैं जाति के नेता

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बिहार विधान परिषद के चुनाव नतीजों ने राजनीतिक पंडितों के लिए पुनर्निरीक्षण की बुनियाद बना दी है। ज्यादातर राजनीतिक पंडितों, अनुमानों ने लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल और नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड के गठजोड़ के बाद बिहार में बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए की नैया डूबी ही मान ली है। बिहार में नीतीश का ही जनता दल यूनाइटेड है, भले इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव हों। सामान्य राजनीतिक समीकरण यही कह रहा है कि बिहार में जाति की राजनीति इस कदर हावी है कि अब  बीजेपी के लिए रामविलास का साथ होने के बावजूद चुनाव जीतना मुश्किल है। सामान्य राजनीतिक समीकरण कहता है कि यादव और दलित अगर जुड़ जाएं तो, फिर बिहार में किसी को भी सिंहासन पर बैठा सकता है। उस मुसलमान साथ आ जाएं तो, सोने पर सुहागा जैसा हो सकता है। और राजनीतिक विद्वान लालू-नीतीश के गठजोड़ से इसी सोने पर सुहागा जैसी स्थिति की कल्पना में हैं। लेकिन, ये सामान्य राजनीतिक समीकरण की बात थी। जबकि, अब बिहार का राजनीतिक समीकरण सामान्य नहीं रहा है। यादव पूरा का पूरा न लालू प्रसाद यादव के साथ है। और न ही मुसलमान। कुर्मी और दलितों में भी एनडीए ने …

शिमला यात्रा, ड्राइवर रमेश के श्रीमुख से

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यात्रा हमेशा सिखाती है। और यात्रा में मिलने वाले नए-नए लोग काफी कुछ नया सिखाते हैं। अकेले यात्रा करने वाले सबसे ज्यादा जानते सीखते हैं। उसकी वजह ये होती है कि हर नए से बोलने-बतियाने का अवसर रहता है। सीखने के लिहाज से ट्रेन की यात्रा सबसे कमाल की होती है। रेलगाड़ी के भीतर-बाहर काफी कुछ सीखने लायक मिलत-दिखता रहता है। लेकिन, आजकल एक और यात्रा होती है। टैक्सी की यात्रा। और टैक्सी की यात्रा में सिखाने का काम करता है टैक्सी का ड्राइवर। इस बार सपरिवार हम शिमला यात्रा पर खुद ही कार चलाकर गए। बढ़िया यात्रा रही। मजा आया। लेकिन, शिमला पहुंचकर हमने वहां घूमने के लिए एक टैक्स ले ली। वजह ये कि खुद कार चलाते रहे तो, पहाड़ का प्राकृतिक आनंद ले नहीं पाएंगे।
टैक्सी के साथ टैक्सी ड्राइवर रमेश आए। रमेश शिमला से थोड़ा आगे बिलासपुर का रहने वाला है। शिमला में टैक्सी चलाते हैं। इसी से आसानी से परिवार चल जाता है। मैंने पूछा हिमाचल प्रदेश के बाहर टैक्सी लेकर जाते हैं। रमेश बोले समय ही नहीं है। शिमला, मनाली और उससे ऊपर के पर्यटकों से ही फुर्सत नहीं मिलती। परिवार बिलासपुर में ही रहता है। खेती भी अच्छी हो जाती है।…