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Showing posts from 2017

मेरे ब्लॉग का नया पता

‘कृष्णा’ के दौर में भी ‘कृष्ण’ बने रहना मामूली बात नहीं

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रामनाथ कोविंद देश के 14वें राष्ट्रपति हो गए। आज ‘राम’नाथ की ही चर्चा का समय है। लेकिन, इस समय मैं ‘कृष्ण’ की बात कर रहा हूं। हालांकि, मैं कृष्ण भगवान की चर्चा मैं कतई नहीं करने जा रहा हूं कि कैसे कृष्ण इस्कॉन और अग्रेजों की संगत में पहुंचकर कृष्णा हो गए हैं। भारत में अभी हाल तक बहुतायत नाम में राम और कृष्ण जरूर लगता था। हालांकि, अब शायद ही कोई बच्चों का नाम राम, कृष्ण के नाम पर रखता हो। लेकिन, बीजेपी के दिग्गज नेता, बुनियाद की सबसे मजबूत ईंटों में से एक लालकृष्ण आडवाणी की पैदाइश उसी दौर की है, जब राम, कृष्ण लगभग हर हिन्दुस्तानी के नाम में लगा रहता था। संयोगवश हमारे पिताजी का नाम भी कृष्ण चन्द्र है। खैर, इस संयोग का अभी मेरे लिखने से कोई वास्ता नहीं है, सिवाय इसके कि उस दौर की पैदाइश वाले तो लगभग सारे ही लोगों के नाम राम, कृष्ण के नाम पर ही होते थे। आज लालकृष्ण आडवाणी की कुछ तस्वीरें भेजी, देखी जा रही हैं, जिसे लेकर सोशल मीडिया में खूब मजाक चल रहा है। ताजा तस्वीर है राष्ट्रपति चुनाव में मत डालते लालकृष्ण आडवाणी की। इस तस्वीर को लेकर सोशल मीडिया में चुटकुला चल रहा है कि अपनी गर्लफ्रेन्ड…

मायावती को इस्तीफा देने की याद क्यों आई ?

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ये बात मायावती को लोकसभा चुनाव परिणाम के तुरन्त बाद अच्छे से ध्यान में आना चाहिए था। क्योंकि, उत्तर प्रदेश ने हाथी निशान पर एक भी व्यक्ति को संसद में पहुंचने लायक नहीं माना। चलिए उस समय ध्यान में नहीं आया। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे के तुरन्त बाद ये बात पक्के तौर पर ध्यान में आ जाना चाहिए था। लेकिन, उस समय भी मायावती को ये समझ नहीं आया कि वो दलितों की बात नहीं कह पा रही हैं। अब जाकर मायावती को समझ में आया, जब वो लोकसभा चुनाव में साफ हो गईं और विधानसभा में भी बहुजन समाज पार्टी के सिर्फ 19 विधायक चुनकर पहुंचे। 1984 में बीएसपी के अस्तित्व में आने के बाद से पार्टी का इतना बुरा हाल कभी नहीं रहा। 1989 में भी बीएसपी के 2 सांसद चुनकर लोकसभा में पहुंचे थे और 13 विधायक उत्तर प्रदेश विधानसभा में थे। वो उठान पर जाती बीएसपी थी। अब 2014 में बीएसपी का एक भी सांसद लोकसभा में नहीं है और 2017 में सिर्फ 19 विधायक उत्तर प्रदेश में बीएसपी के हैं। बीएसपी के इस हाल पर ‘पुनर्मूषको भव’ एकदम सटीक बैठता है। ‘पुनर्मूषको भव’ होने के बाद भी मायावती को कतई याद नहीं आया कि मायावती दलितों की बात कह नहीं पा …

मोदी के पीएम बनने के बाद अडानी के भाव गिरे!

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हिन्दुस्तान में हर आदमी एक बात पक्के तौर पर जानता है। वो बात ये है कि अडानी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दोस्त हैं। इसी आधार पर वो हिन्दुस्तान का हर आदमी ये भी जानता है कि देश के प्रधानमंत्री से दोस्ती का फायदा अडानी की कम्पनियों को जमकर मिलता रहता है। कई लोग तो चौक-चौराहे पर खड़े ऐसे बात करते हैं, जैसे नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अडानी की कम्पनियों के भाव लगातार बढ़ते जा रहे हैं। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से अडानी को फायदा मिलने की ये जो धारणा देश के लोगों में बनी है, उसके पीछे बहुत मजबूत आधार हैं। नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते अडानी समूह ने गुजरात में कई बड़ी परियोजनाओं को तेजी से पूरा किया। और जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने की यात्रा शुरू कर रहे थे, तो शेयर बाजार में गौतम अडानी के अडानी समूह को तो जैसे पंख लग गए थे। नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का असर था कि 13 सितम्बर 2013 को जिस अडानी एंटरप्राइजेज का बाजार भाव 141 रुपये था, वही अडानी एंटरप्राइजेज 2014 में लोकसभा चुनाव होने के ठीक पहले के महीने यानी अप्रैल 2014 में 471 रुपय…

क्रूर मशीनी देश चीन मानवता के लिए खतरा है

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चीन मानवता के लिए ख़तरा है। वहाँ के नागरिक मानव नहीं, मशीन हो चुके हैं। किसी भी विचार के लिए वहाँ जगह ही नहीं है। कल प्रभाष प्रसंग में शामिल होने सत्याग्रह मण्डप में था। सामने हरी घास पर पीले कपड़ों में कुछ लोग योग जैसा कुछ कर रहे थे, चाइनीज़ जैसी भाषा में लिखा था। मैंने एक से पूछा- ये चीनी योग है क्या? जवाब मिला- शाक्य मुनि की परम्परा को चाइनीज़ मास्टर ने आगे बढ़ाया है। चीन ने इस प्रतिबन्धित कर दिया है। 1999 में चीन ने करोड़ों चीनियों को गिरफ़्तार कर लिया, नौकरी से निकाल दिया गया। स्कूल, घर सबसे बाहर कर दिए गए, सिर्फ इस वजह से कि वो लोग फालुन दफ़ा के साधक थे। क़रीब 10 लाख लोग अभी भी चीन में इस वजह बन्धक हैं। क्रूर यातना के शिकार हुए। वामपन्थी बुनियाद पर तैयार हुआ चीन ऐसा ही हो चुका है। वहाँ सुधार की उम्मीद कितनी ख़त्म है, इसका इसी से लगाइए कि वहाँ वामपन्थ की ही गुन्जाइश सबसे पहले ख़त्म हुई। मानव से मशीन में तब्दील हो चुका इतनी बड़ी आबादी वाला देश पूरी दुनिया के लिए ख़तरा है। मशीनें हमेशा पहली नज़र में मानव से ताक़तवर दिखती हैं लेकिन, मानव मस्तिष्क ही हर मशीन का जनक (बाप) होता है। इस…

जीएसटी से जरूरी सामान सस्ते होंगे

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जीएसटी को लेकर सबसे बड़ा खतरा यही बताया जा रहा था कि इससे महंगाई बढ़ेगी। इस महंगाई के बढ़ने की डर दिखाकर उन कारोबारियों ने भी जमकर प्री जीएसटी सेल लगा रखी थी, जो जीएसटी को कारोबारियों के लिए मुश्किल बताकर इसके विरोध में सांकेतिक दुकान भी बन्द कर चुके थे। कार कम्पनियों ने भी ग्राहकों को डराकर प्री जीएसटी सेल में काफी गाड़ियां बेच लीं। लेकिन, अब समझ में आ रहा है कि प्री जीएसटी सेल में खरीद करने वाले ज्यादातर लोग घाटे में रहे होंगे। क्योंकि, ज्यादातर जरूरी सामान जीएसटी के बाद सस्ते हो गए हैं। फोन और कार भी आज के मध्यवर्ग के लिए जरूरी सामानों में ही आता है। इसके अलावा भी जरूरी सामान कैसे सस्ते हुए हैं, इसका अन्दाजा 30 जून की रात 12 बजे से शुरू हुई बिग बाजार जीएसटी सेल से ही पता चल गया। इलाहाबाद जैसे देर शाम उनींदे हो जाने वाले शहर से सारी रात जागने वाली मुम्बई तक में लोग बिग बाजार की जीएसटी सेल में कतार में लगे थे। 1 जुलाई की सुबह वही कार कम्पनियां जो एक दिन पहले तक जीएसटी का डर दिखाकर कारें बेच लेना चाह रही थीं, अब बता रही थीं कि जीएसटी के बाद उनकी कम्पनी की कार कितनी सस्ती हुई है। आईफोन…

हिन्दुस्तान में इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ खुली लड़ाई का वक्त

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बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए गए 7 हिन्दू श्रद्धालुओं को इस्लामी आतंकवादियों ने मार डाला। मारे गए 7 हिन्दू श्रद्धालुओं में से 6 महिलाएं हैं। इन हत्याओं से इस्लामिक आतंकवाद का वो खतरा सामने आ गया है, जिसे भारत की सरकारें, राजनीतिक दल, समाज और हिन्दू-मुसलमान भी मानने को तैयार नहीं हैं। इस्लामिक आतंकवाद पर लम्बे समय से भारत की सरकार, राजनीतिक दल और कश्मीर की सरकार और राजनीतिक दलों ने आंखें मूंद रखी थीं। भारत में मुसलमानों की बड़ी आबादी होने से और कश्मीर में घाटी में लगभग मुसलमान रह जाने की वजह से कोई भी राजनीतिक दल या सरकार कश्मीर घाटी में हो रही आतंकवादी घटनाओं को इस्लामी कहने का खतरा मोल नहीं लेना चाह रही थी। हालांकि, हिज्बुल मुजाहिदीन के कमान्डर रहे जाकिर मूसा ने इस्लामी आतंकवाद के सारे आवरण उतार दिए। मूसा 4 मिनट के वीडियो में साफ कह रहा है कि भारतीय मुसलमान दुनिया के सबसे कायर मुसलमान हैं। हम इस्लाम का राज कायम करने की लड़ाई लड़ रहे हैं। हम कश्मीरियत को बचाने की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं। कश्मीर में कोई राजनीतिक लड़ाई हम नहीं लड़ रहे हैं। हम इस्लाम की लड़ाई लड़ रहे हैं। और इसके रास्ते मे…

फिलहाल घरेलू झगड़े में टूटी जमीन भरने में लगे हैं अखिलेश यादव

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विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद अखिलेश यादव के लिए सबसे बड़ा सवाल था कि प्रचण्ड बहुमत से आई सरकार के सामने निराश समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल कैसे बढ़ाया जाए। ये सवाल इसलिए भी और बड़ा हो गया है क्योंकि, चाचा शिवपाल यादव नई पार्टी बनाने के लिए ताल ठोंक रहे थे और पिता मुलायम सिंह यादव हमेशा की तरह हर बीतते पल के साथ रंग बदल रहे हैं। ऐसे में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी पर कब्जा कर लेने के आरोप के साथ नई समाजवादी पार्टी की शुरुआत करने की बड़ी जिम्मेदारी अखिलेश के कंधों पर आ गई है। 44 साल की उम्र में अखिलेश के सामने ये बड़ी चुनौती है कि वो कैसे समाजवादी पार्टी का आधार सुरक्षित रखते हुए नए लोगों को समाजवादी पार्टी के साथ जोड़ पाते हैं। कमाल की बात ये है कि 44 साल के अखिलेश के 17 साल सत्ता के साथ बीते हैं। पिछले 5 साल से अखिलेश राज्य के मुख्यमंत्री थे, उसके पहले 10 साल तक सांसद। लेकिन, उस सत्रह साल की राजनीतिक मजबूती को चाचा शिवपाल यादव कृपा से मिली सफलता बताते हैं। इसीलिए जब आज 1 जुलाई को अखिलेश अधिकारिक तौर पर 44 साल के हो गए हैं, तो ये सवाल उठता है कि अखिलेश वाली नई…

हिन्दी ब्लॉगिंग ने तैयार किया नागरिक पत्रकारिता का आधार

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हिन्दुस्तान में आज जो कुछ भी होता है, उसकी बुनियाद सोशल मीडिया पर ही तैयार होती है। यहां तक कि खुद को मुख्य धारा कहने वाले, टीवी और अखबार, मीडिया संस्थान भी सोशल मीडिया से ही खबरों को ले रहे हैं, विस्तार दे रहे हैं। लेकिन, इस बात का अन्दाजा कितने लोगों को होगा कि इस बुनियाद की बुनियाद हिन्दुस्तान में कैसे तैयार हुई होगी। आपको क्या लगता है कि फेसबुक या ट्विटर आया और इसी वजह से इस देश में सोशल मीडिया खड़ा हो गया। ये बहुत बड़ा भ्रम है। दरअसल, फेसबुक और ट्विटर या फिर दूसरे ऐसे माध्यम आए ही तब, जब हिन्दुस्तान में सोशल मीडिया का आधार तैयार हो गया। एक पक्की बुनियाद बन गई थी, जिस पर फेसबुक, ट्विटर जैसे मंच कमाई कर सकते थे। एक दशक से भी ज्यादा समय पहले जब देश में सोशल मीडिया नाम का कोई मंच नहीं था, उस समय ब्लॉगर पर कुछ लोगों ने लिखना शुरू किया था। जानबूझकर मैं किसी का नाम नहीं लिख रहा हूं। लेकिन, एक बड़ी जमात थी। उस समय मैं मुम्बई सीएनबीसी आवाज में हुआ करता था। और हमारे मित्र शशि सिंह मुझे भी ब्लॉग बनाने के लिए कहते थे। सीएनबीसी आवाज में मेरी जिम्मेदारी प्रोड्यूसर की थी, इसलिए रिपोर्ट करने की …

नोएडा की सबसे ऊंची सड़क पर नीचे जाती राजनीति

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नोएडा के सबसे बड़े बुनियादी ढाँचे का लोकार्पण करने भी @MYogiAdityanath नहीं आ रहे। हालाँकि, इसका लगभग काम @yadavakhilesh के ही शासनकाल में पूरा हो चुका था। क़रीब आधा पुल लखनऊ से ही लोकार्पण करके अखिलेश ने खोल दिया था। दरअसल कोई भी मुख्यमंत्री प्रदेश के सबसे चमकते शहर नोएडा आने से डरता है। डर उस अन्धविश्वास का है कि जो यहाँ आया, उसकी सत्ता गई। ख़ैर, अपना घर-गाँव रहते मायावती नहीं आईं। फिर भी २०१२ में सत्ता से बेदख़ली हो गई। २०१७ में लखनऊ रहकर नोएडा की सारी योजनाओं का लोकार्पणकरते अखिलेश भी चले गए। योगी आदित्यनाथ साधु हैं, फिर भी सत्ता जाने के मोह से उबर नहीं पा रहे हैं। ख़ैर, ये तो पहली बात हुई। दूसरी जरूरी बात ये कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ख़ुद तो आ नहीं रहे हैं। अच्छा होता कि इस सड़क का ज़्यादातर काम जिस अखिलेश यादव के कार्यकाल में पूरा हुआ था, उन्हें भी बुला लेते। हालाँकि, राजनीति में ये कोई नहीं करता। हर सरकार आने के बाद पहले की सरकारों के पूरे किए काम को लोकार्पण करके अपना बना लेती है। लेकिन, मुझे लगता है कि जिस तरह से सोशल मीडिया के जरिए हर छोटी-बड़ी बात सबको पता हो जाती है, उसमें …

नौकरी में भागते रहने का सुख !

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ये सलाह अनुभव से उपजी है और सभी के लिए है। लेकिन ख़ासकर पत्रकारों के लिए। ये सही है कि हम पत्रकार या तो दिल्ली, मुम्बई जैसी बड़ी जगह या फिर अपने राज्य की राजधानी या फिर अपने जिले के ही धाँसू पत्रकार बनना चाहते हैं। इसमें से किसी भी एक मोह से उबर पाना बेहद कठिन होता है। मैं मूलत: प्रतापगढ़ से हूँ। पैदाइश के बाद हमारी पूरी बनावट इलाहाबाद की देन है। सबसे कठिन फैसला था, इलाहाबाद छोड़ना। बहुत कड़ा मन करके ये फैसला लिया था। आज उस फैसले पर मुग्ध होने जैसा भाव रहता है। फिर कानपुर, देहरादून, मुम्बई होते अभी दिल्ली टिका हूँ। हालाँकि, मैं ठहरना दिल्ली ही चाहता था। पहली बार ११ जुलाई २००१ को दिल्ली आकर गिरा था। लेकिन, दिल्ली निरन्तर भगाती रही। उसी भागने में ऊपर लिखे शहरों में रहना हुआ। आत्मीय सम्बन्ध बने। कानपुर और मुम्बई दोनों ही शहरों को लेकर मन में अच्छा भाव नहीं था। लेकिन, कानपुर में ग़ज़ब के आत्मीय सम्बन्ध बने और समझ भी बेहतर हुई। ईमानदार विश्लेषण ये किहर शहर ने मुझे बेहतर होने में मदद की और सबसे बड़ी बात कि समझ का दायरा बहुत बड़ा कर दिया। हिन्दुस्तान इतनी विविधता वाला देश है कि यहां आप एक छो…

मोदीराज में रायसीना पहाड़ी पर एक दलित के विराजने का मतलब

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भारतीय जनता पार्टी के सांसदों को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए प्रस्तावक के तौर पर दस्तखत करने के लिए मुख्तार अब्बास नकवी के यहां जाना था। कमाल की बात ये थी कि उनमें से किसी को भी नहीं पता था कि दिल्ली की सबसे ऊंची और सम्वैधानिक तौर पर देश की सबसे ऊंची रायसीना पहाड़ी पर विराजने के लिए वो लोग किसके नाम पर मुहर लगाने जा रहे हैं। ज्यादातर सांसद लालकृष्ण आडवाणी के ही पक्ष में सहानुभूति रख रहे थे। लेकिन, राष्ट्रपति बनाने के लिए सांसदों की सहानुभूति नहीं, उनके मतों की जरूरत थी। और वो मत पार्टी के तय उम्मीदवार के ही पक्ष में जाना तय था। सांसद मुख्तार अब्बास नकवी के घर पहुंच रहे थे और ठीक उसी समय 11 अशोक रोड में भाजपा मुख्यालय पर राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बताया कि रामनाथ कोविंद एनडीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार होंगे। बिहार के राज्यपाल को राष्ट्रपति बनाने की नरेंद्र मोदी और अमित शाह की इस योजना की जानकारी किसी को नहीं थी। भारतीय राजनीति नरेंद्र मोदी और अमित शाह को आगे कैसे याद करेगी ? एक शातिर राजनीतिक जोड़ी के तौर पर ? उनकी योजना से बाहर काम करने वाले हर नेता का खात्मा करने वाली जो…

मुम्बई की बारिश और पानी की कमी

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टेलीविजन के जरिए मुम्बई को देखते लोगों को लग रहा होगा कि मुम्बई पूरा बारिश में भीगा/डूबा हुआ है। लेकिन, ऐसा है नहीं। बारिश हो रही है, लगभग रोज ही। लेकिन, ऐसी भी झमाझम वाली नहीं हो रही है। हां, इतनी बारिश जरूर हो रही है कि मुम्बई के लिए रेल या सड़क, किसी भी रास्ते से जाते चारों तरफ नदियां, जलाशय लबालब भरे मिलेंगे। इतना पानी बरस चुका है। प्रकृति ने साल भर के लिए पानी का इन्तज़ाम कर दिया है। इसे सम्भालने की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है मुम्बईकरों। लबालब भरे पानी के समय जल संरक्षण की सोचना/करना चाहिए। वरना मार्च आते फिर पानी पानी चिल्लाओगे। ये मसला कितना गम्भीर है, इसका अन्दाजा इससे लगाकि 3 दिन ठाणे में रहते 2 दिन पानी समय से नहीं आया।