बिन मांगे मोती मिले.. मांगे मिले न चून

पुरानी कहावतें यूं ही नहीं बनी होतीं। और, समय-समय पर इन कहावतों-मिथकों की प्रासंगिकता गजब साबित होती रहती है। कांग्रेस-यूपीए ने सबको साफ कर दिया। थोड़ा सा बच गया नहीं तो, अकेले ही सरकार बना लेते। अब 10-12 सांसदों का समर्थन बचा रह गया है।।


और, मनमोहन बाबू तो अपनी किस्मत भगवान के यहां से ही गजब लिखाकर लाए हैं। इतना पढ़ना-लिखना, राजनीति से एकदम दूर रहना और एकदम से राजनीति के शिखर पर पहुंच जाना। सब किस्मत का ही तो खेल है। अब कांग्रेस-यूपीए गजब जीती है तो, गजब-गजब विश्लेषण भी आ रहे हैं। राहुल की स्ट्रैटेजी, शरीफ मनमोहन पर आडवाणी का गंदा वार। लेकिन, दरअसल ये सब अपने मनमोहन जी की किस्मत का ही कमाल है।


किस्मत गजब लिखाई है। अब देखिए चुनाव के पहले तक सब कैसे मनमोहन के नाम पर भिन्ना रहे थे। लेफ्ट ने समर्थन ही इसी बात पर वापस ले लिया और समर्थन वापस लेने के बाद लेफ्ट की तरफ से बयान भी आए कि बिना मनमोहन के तो वो कांग्रेस को समर्थन दे भी सकते हैं। मनमोहन रहे तो, सवाल ही नहीं उठता। लीजिए साहब मनमोहनजी क्या गजब किस्मत लिखाकर लाए। लेफ्ट के समर्थन का ही सवाल नहीं उठा।


मुलायम-लालू-पासवान ने तिकड़ी बनाई थी। जरा तगड़ी सौदेबाजी के लिए। कि हमें तो, ये मंत्रालय चाहिए वो, रुतबा चाहिए। अब देखिए कैसे सर झुकाए सब खड़े हैं। यूपी की बहनजी को तो कांग्रेस हर दूसरे कदम पर कांग्रेस उनकी पार्टी के खिलाफ साजिश करती दिख रही थी। गुस्से में उन्होंने एक जमाने में तो, सोनिया गांधी को जेल तक भेजने की धमकी दे डाली थी। राहुल के खिलाफ ऐसे आरोप कि वो दलितों के घर से दिल्ली लौटने के बाद खास साबुन, इत्र से शुद्ध होते हैं।


एक पवार साहब भी थे। थे इसलिए कि अब जरा साहब कम रह गए हैं। महाराष्ट्र में पहले भी कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़े थे। केंद्र से लेकर राज्य तक की सत्ता में थे। लेकिन, लोकसभा चुनाव 2009 शुरू हुए तो, कहने लगे भई मनमोहन कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं-यूपीए के नहीं। इसलिए चुनाव बाद तय करेंगे। फोन से उड़ीसा में सभा तक संबोधित कर डाली।


चुनाव नतीजों के पहले तक ये सब कह रहे थे कि कांग्रेस को समर्थन की शर्त तय होगी। कुछ CMP की भी बात हो रही थी। CMP मतलब बाजार वाला करेंट मार्केट प्राइस नहीं। CMP मतलब था कॉमन मिनिमम प्रोग्राम यानी वो प्रोग्राम जिसमें इतने दबाव होते हैं कि सबसे कम काम हो पाता हो। लेकिन, अब सब CONDITION खत्म हो चुकी हैं। क्यों, अरे भाई चुनाव नतीजे जो आ गए हैं। हम लोगों का अंदाजा भी गड़बड़ा गया। कांग्रेस ने कमाल कर दिया। और, अब हर कोई UNCONDITIONAL सपोर्ट देना चाहता है मनमोहन सिंह जी के नेतृत्व में बनने वाली UPA सरकार को।


गजब सब कह रहे हैं कि हमें मंत्री पद की चाह नहीं है। एक दूसरे को गरियाते मुलायम-मायावती दोनों ने ही राष्ट्रपति को UPA के समर्थन की चिट्ठी भेज दी है बिना शर्त। मनमोहन सिंह जी के लिए वही पुरानी कहावत कहने का मन हो रहा है कि बिन मांगे मोती मिले ... मांगे मिले न चून। एक और देसी मिथक है-- हम घर से निकलते थे तो माताजी गुस्सातीं थीं कि बिना खाए मत निकलो नहीं तो कहीं कुछ नहीं मिलेगा। माताजी के अंधविश्वासी कहकर खारिज करने की कई बार कोशिश की। हर बार देर शाम घर भूखा ही लौटा। खाकर निकलता था तो, इतनी जगह से व्यंजनों के प्रस्ताव होते थे कि सारे स्वीकारना संभव नहीं होता था।


ये मिथक अपने मनमोहनजी पर तो पूरा लागू हो रहा है। सोनिया माता चुप रहीं। चुनाव तक सिर्फ कांग्रेस को घर से पूरा खाना खिलाकर तैयारी करती रहीं। मनमोहनजी घर से खाकर निकले तो, जगह बची थी पेट में हल्के नाश्ते भर की (10-12 सांसद)। लेकिन, हर कोई पूरी थाली सजाए खड़ा है। और, स्वागत घर जैसा हो रहा है कोई रेस्टोरेंट जैसा नहीं कि हर रोटी की कीमत वसूली जाती है। UNCONDITIONAL भरपेट भोजन।