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Showing posts from November, 2015

एक दिन मैं भी पीएम के साथ तस्वीर लूंगा

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टेलीग्राफ अखबार की ये सवाल-जवाब वाली शानदार तस्वीर वाली खबर नहीं देखी होती, तो इस विषय पर मैं शायद ही कुछ लिखता। लेकिन, इसके बाद मेरे मन में जो था। वो लिखना जरूरी लगा। प्रधानमंत्री के साथ तस्वीर होना किसी के लिए भी बड़ी खुशी की वजह हो सकती है। इसलिए#Selfie लेना कोई गुनाह नहीं है। लेकिन, सेल्फी दौड़ मेरी दिक्कत की वजह है। पिछले साल की सेल्फी भगदड़ पर भी मेरे यही विचार थे। लेकिन, उसके खारिज होने की एक वजह ये जायज रही कि मुझे आमंत्रण ही नहीं मिला था। इस बार ससम्मान मैं भी आमंत्रित था। औरसेल्फी दौड़ छोड़िए, सेल्फी भीड़ में भी शामिल नहीं हुआ। हां, तारीफ करनी चाहिए भारतीय जनता पार्टी के मीडिया विभाग की इतने सलीके वाले दीपावली मंगल मिलन समारोह को करने के लिए। जिसमें प्रधानमंत्री @narendramodi बीजेपी अध्यक्ष @AmitShah के अलावा ढेर सारे मंत्री भी पक्षकारों से सहज रूप से मिल रहे थे। थोड़ा बहुत बोलने के बाद प्रधानमंत्री, अमित शाह दोनों ही मंच से नीचे उतरकर पत्रकारों के बीच में आ गए। भाजपा के राष्ट्रीय सचिव और मीडिया प्रभारी श्रीकांत शर्मा @ptshrikant ने दो बार मंच से अपील की कि प्रधानमंत्री खुद …

इतनी असहिष्णुता देश में कभी नहीं रही

असहिष्णु भारत इस समय दुनिया में चर्चा का विषय है। भारत अचानक इतना असहिष्णु हो गया है कि देश के सबसे ज्यादा पसंदीदा कलाकारों में से एक आमिर खान की पत्नी उनसे कह देती हैं कि क्या उनको भारत छोड़ देना चाहिए। पत्रकारिता के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार रामनाथ गोयनका अवॉर्ड के मौके पर अभिनेता आमिर खान की इस बात ने देश में उस बहस को तेज कर दिया है कि क्या सचमुच भारत असहिष्णु हो गया है। खासकर अल्पसंख्यकों के खिलाफ, उसमें भी खासकर मुसलमानों के खिलाफ। सांप्रदायिक हिंसा पर गृह मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट इस बहस को और आगे बढ़ाती है। 2014 के पहले पांच महीने और 2015 के पहले पांच महीने की बहस साफ करती है कि मोदी सरकार में ज्यादा सांप्ररदायिक हिंसा बढ़ी है। मतलब असहिष्णुता बढ़ी है। हालांकि, भारतीय जनता पार्टी इस बात पर बहस करना बेहतर समझेगी जिसमें 2015 में 2014 से कम जानें सांप्रदायिक हिंसा में गई है। इसी बहस को थोड़ा और आगे बढ़ाने के लिए गृह मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट से पिछले पांच साल के आंकड़े देखते हैं। मोदी सरकार के इस साल यानी 2015 के पहले पांच महीने में सांप्रदायिक हिंसा के 287 मामले सामने आए हैं। इसमें…

बाजार बड़ा भला कर सकता है

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बाजार की बात करिए और एक सांस में कोई भी बाजार की बुराई ही बुराई गिना देगा। वो भी जो बाजार में सिर से पांव तक डूबा है। वो भी जो बाजार के बिना जी नहीं सकता। वो भी जो बाजार की हर सुविधा के लिए सारी जिंदगी कसरत करते रहते हैं। खैर, मैं तो आमतौर पर बाजार का समर्थक ही हूं। बाजार की सुविधाओं का भी। हां, ये भी उतना ही दृढ़ विश्वास है कि बाजार में भी दूसरी सारी व्यवस्थाओं की तरह ढेर सारी कमियां हैं। जिसे सुधारते रहना जरूरी है। इस रविवार को स्टार प्लस पर आने वाला आज की रात है जिंदगी शो देख रहा था। अमिताभ बच्चन हैं, तो आकर्षण बढ़ जाता है। और अमिताभ बच्चन की तराकी भी अद्भुत है। खैर, मैं जो शो देख रहा था। उसमें गीता प्रतियोगिता जीतने वाली मरियम सिद्दीकी थी। मरियम है तो सिर्फ 13 साल की लेकिन, मरियम का ज्ञान किसी बड़े विद्वान का आभास दे रहा था। 13 साल की उम्र में मरियम कह रही थी कि किसी को चोट लगे और हिंदू मुसलमान पूछकर उसका इलाज हुआ तो, इंसानियत मर जाएगी। 
और शो में जब अमिताभ बच्चन ने मरियम के पिता आरिफ सिद्दीकी से पूछा कि उन्हें क्यों लगा कि बेटी को इस तरह के धार्मिक ग्रंथों को पढ़ाना चाहिए। आरिफ का…

काहे का OccupyUGC

एक#OccupyUGC आंदोलन चल रहा है। ज्यादातर मैं छात्र आंदोलन के पक्ष में ही खड़ा रहता हूं। वजह कि ज्यादातर छात्र आंदोलन के मुद्दे सही होते हैं। लेकिन, ये मुद्दा पूरी तरह से राजनीतिक दिख रहा है। इसलिए इसके घोर विरोध में हूं। कई वामपंथी और इस मुद्दे के पक्षधर विद्वानों से मैंने पूछा कि भावनात्मक विरोध, साजिश की बात छोड़कर तथ्य बताइए कि इस नॉन नेट फेलोशिप को क्यों जारी रखना चाहिए। शोध करने के लिए कुछ तो न्यूनतम योग्यता होनी चाहिए और उसी आधार पर सरकारी सहायता भी। मेरा ज्ञान इस मामले में बहुत कम है। फिर भी बताइए कि ये आंदोलन सिवाय सरकार विरोध के एक और फ्रंट के क्या है। लेकिन, किसी ने भी जवाब नहीं दिया है। 5 से 8 हजार रुपये सरकार की सब्सिडी से घर चलाते रहो। उसी में शादी-ब्याह भी हो जाए। बच्चे भी पैदा कर लो। और फिर गरियाओ कि भारत में पढ़े-लिखे लोगों की अहमियत नहीं। जो JRF या फिर कम से कम NET की परीक्षा नहीं पास कर पा रहे हैं उन्हें क्यों शोध करने के लिए सरकार पैसे दे। सवाल बड़ा है पर कोई सरोकारी साथी बता नहीं पा रहा है Why #OccupyUGC

चुनाव के शोर में दब गई अर्थव्यवस्था की अच्छी खबरें

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भारत में कोई भी चुनाव हों, उत्सव की तरह होते हैं। ऐसा उत्सव जिसके उत्साह और शोर में सबकुछ दब जाता है। उस पर अगर बिहार जैसे राज्य का चुनाव हों, तो जाहिर है कि ये शोर और उत्साह ज्यादा तेज हो जाता है। यही वजह रही कि पांच चरणों में हुए इस चुनाव के दौरान देश के लोगों को दूसरी कोई बात ज्यादा अहम नहीं दिखी। खासकर तरक्की और इससे जुड़े आंकड़े तो चुनावी माहौल में पूरी तरह से नीरस ही होते हैं। दाल की महंगाई के आंकड़े भी सीधे चुनावी भाषण में तड़का दे सकते थे। इसीलिए दाल की महंगाई की चर्चा तो मीडिया से लेकर चुनावी रैलियों तक खूब रही। लेकिन, इसके अलावा पूरे अक्टूबर महीने और कोई भी खबर सुर्खियां नहीं बन सकीं। लेकिन, यही अक्टूबर महीना रहा जिसमें तेजी से भारत की अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ती दिखने लगी है। और सबसे अच्छी बात ये है कि इन तेजी के संकेतों में संतुलन भी है। यानी लोगों की जेब में पैसे आते दिख रहे हैं। साथ ही कल कारखाने फिर से रफ्तार में आ रहे हैं। उद्योगों के कुछ ऐसे आंकड़ें जिन पर ध्यान कम ही जाता है। लेकिन, उन आंकड़ों में ही दरअसल अर्थव्यवस्था की कमजोरी या मजबूती के लक्षण छिपे होते हैं। उन आं…