भारतीय राजनीतिक रंगमंच का सबसे शानदार ड्रामा देखिए

करीब बीस साल बीते हैं और राजनीतिक समय चक्र ने पूरा एक चक्कर लगा लिया है। 1989 में वीपी सिंह की सरकार को दक्षिणपंथी भाजपा के साथ वामपंथी लेफ्ट पार्टियों का भी समर्थन था। ये दोनों मिलकर कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के लिए जनता दल को समर्थन दे रहे थे। और, उस समय दोनों का ये कहना था कि कांग्रेस देश की सबसे बड़ी दुश्मन है। उस समय मुद्दा भ्रष्टाचार था। आज भी स्थितियां करीब-करीब वैसी ही हैं। उस समय एक सरकार बनाने के लिए साथ थे। आज एक सरकार गिराने के लिए साथ हैं। बस मुद्दा बदल गया है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परमाणु करार पर प्रकाश करात की तारीफ कर रहा है। हार्डकोर संघी लाल कृष्ण आडवाणी और हार्डकोर मार्क्सिस्ट प्रकाश करात एक साथ खड़े हैं। वो, कांग्रेस को देश का सबसे बड़ा दुश्मन बता रहे हैं। एक-दूसरे को गाली दे रहे हैं लेकिन, कह रहे हैं कि संसद में यूपीए सरकार को गिराने के लिए साथ वोट देंगे। भाजपा तो पहले भी हाथी पर सवार हो चुकी है लेकिन, वामपंथी विचारधारा के अगुवा पहली बार किसी दलितवादी नेता के साथ हाथ मिला रहे हैं। वैसे इसके पहले वो, जातिवाद के सबसे पोषक नेताओं मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव के ही हितों की रक्षा करते रहे हैं। लेकिन, पहली बार पिछड़ी जाति के नेताओं को छोड़कर करात दलित नेता मायावती के दरवाजे पहुंचे।

अब अमर सिंह भाजपा-लेफ्ट-बीएसपी का गठजोड़ बेमेल है और, ये चल नहीं सकता। वो, एकदम सही कह रहे हैं। ये गठजोड़ कांग्रेस की सरकार गिराने के लिए साथ भले हो जाए। लेकिन, कांग्रेस के खिलाफ आडवाणी को प्रधानमंत्री को बनाने के लिए नहीं चल पाएगा। गठजोड़ तो 1999 जैसा ही होगा। चुनाव तक कांग्रेस को लेफ्ट और भाजपा भले ही एक सुर में गाली दें। लेकिन, चुनाव के बाद लेफ्ट, कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए के साथ ही जाएंगे, कैसे साथ आएंगे इसका बहाना अभी से तय हो चुका है। हां, बहनजी यूपी में लोकसभा चुनाव तक आपने भाजपाई भाइयों को भले ही जमकर गरियाएं। चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए बहनापा निभाएंगी और आडवाणी के साथ ही जाएंगी। ये मैंने काफी पहले बता दिया था, इसकी भी शर्त तय है।

वैसे, अमर सिंह के साथ सारे कांग्रेसियों को भी भरोसा है कि आसानी से बहुमत हासिल हो जाएगा। खैर, बहुमत हासिल हो या न हो। 6-8 महीने की सरकार चलाकर अमर सिंह को दलाली मजबूत करने के अलावा किसी को क्या मिल पाएगा। दरअसल, असली खेल चुनावी बिसात का है। अमर सिंह ने साफ कहाकि वो, कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन के लिए तैयार हैं। मैंने पहले ही बताया था कि अगर सपा-कांग्रेस साथ आएं तो, कैसे बेहतर कर सकते हैं।

अमर सिंह कह रहे हैं कि गठजोड़ नहीं भी हुआ तो, उनकी पार्टी का निशाना चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस नहीं भाजपा होगी। साफ है जहां सपा को उम्मीद है उस, उत्तर प्रदेश में फायदा कांग्रेस को गाली देने से तो नहीं होने वाला। लेकिन, मायावती शायद ही चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस को गाली देना चाहेंगी और, समाजवादी पार्टी को तो, बिल्कुल भी नहीं। वो, गाली देंगी भी तो, कांग्रेस-सपा को एंटी मुस्लिम (उनकी और लेफ्ट की परिभाषा के मुताबिक) परमाणु करार के मुद्दे पर ही। वरना, बहनजी के निशाने पर पुराने मुंहबोले भाइयों की पार्टी भाजपा ही रहेगी। जिससे वोटों का ध्रुवीकरण हो। और, कुछ ऐसा माहौल बने जैसा एक जमाने में उत्तर प्रदेश में भाजपा-सपा का बनता था। 2009 लोकसभा चुनाव में मायावती सपा के सांसदों की संख्या खुद झटकना चाहेंगी तो, बसपा सांसदों की संख्या के आसपास की उम्मीद भाजपा कर रही है।

अब सबने लोकसभा चुनाव के लिए अपनी रणनीति तो तैयार कर ली है। जिसमें जंग के बाद के कई पक्के साथियों को भी जंग (लोकसभा चुनाव पढ़िए) तक विरोधी खेमे की तरह दिखना है। बस अभी तो, ये अंगड़ाई है आगे और लड़ाई है देखते रहिए ...