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Showing posts from September, 2016

मोदी ने ये हमला ठोंक-बजाकर किया है

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  मैं बार-बार कहता हूं, फिर से कह रहा हूं कि नरेंद्र मोदी किसी को बख़्शने वाले नेता नहीं हैं। जब घरेलू मोर्चे पर विरोधियों को नहीं बख़्शा तो देश के दुश्मन भला कैसे बच जाते। @thequint की घुसकर मारने वाली ख़बर भी सही थी। लेकिन तब दूसरे मीडिया वाले इसे मानने को तैयार नहीं थे। क्योंकि, इस देश में सीमा पर हो रही घटनाओं की एक्सक्लूसिव खबर देने के लिए कुछ ही लोग तय थे। एक अच्छी बात ये है कि भारतीय सेना का ये पूरा ऑपरेशन सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के उन्हीं क्षेत्रों में किया गया, जहां आतंकवादी अपना कैम्प चला रहे हैं। जाहिर है #PoK में आतंकवादी कैम्प से उन्हें भारत में घुसने का रास्ता मिलता है। जो पाकिस्तानी सेना की मदद से मिलता है। इससे एक और बात साबित हो रही है कि भारतीय सेना का खुफिया तंत्र बेहतर है। अजीत डोभाल की भी इसके लिए तारीफ की जानी चाहिए। कहा जाता है कि रॉ एजेंट के तौर पर पाकिस्तान में डोभाल ने काफी कुछ समझा-जाना है। सेना ने ये सब छिपकर नहीं किया है। सब बताकर किया है। पाकिस्तान की सेना को भी। उसी का वो बयान याद दिलाया है, जिसमें पाकिस्तान ने कहा था कि व

यूपी का सबसे हिट चुनावी नारा- “पंडित जी पांवलागी”

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भ्रष्टाचार के आरोपी गायत्री प्रजापति फिर से अखिलेश यादव मंत्रिमंडल में शामिल हो गए हैं। लेकिन, ये अब खबर नहीं है। इस पर तो जितना बोला-लिखा जाना था, हो चुका। खबर ये है कि गायत्री के साथ प्रतापगढ़ की रानीगंज विधानसभा से चुनकर आए शिवाकांत ओझा फिर से कैबिनेट मंत्री बनाए गए हैं। शिवाकांत ओझा इसी सरकार में मंत्री बने और हटाए गए थे। अब फिर से बना दिए गए हैं। शिवाकांत ओझा का अखिलेश मंत्रिमंडल में शामिल होना इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि अभी हफ्ते भर पहले ही बीजेपी के एक कार्यक्रम में ओझा का स्वागत किया गया था। प्रतापगढ़ जिले में बीजेपी के संभावित प्रत्याशियों में शिवाकांत ओझा का भी नाम चल रहा है। शिवाकांत भाजपाई रास्ते से ही राजनीतिक सफलता हासिल करने के बाद समाजवादी हुए थे। अगर आपको इसमें कोई बड़ी खबर नहीं नजर आ रही है। तो उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार के दूसरे कुछ नए मंत्रियों के नाम सुनिए। मनोज पांडेय को भी कैबिनेट में ले लिया गया है। अखिलेश यादव के बेहद करीबी अभिषेक मिश्रा कैबिनेट मंत्री बनाए गए हैं। ये अखिलेश की कैबिनेट के नए नाम नहीं हैं। ये दरअसल इस समय हर रोज बदलती उत्तर प्र

89 का गणित जो सुलझा पाएगा, वही यूपी में सरकार बनाएगा

उत्तर प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी। ये सवाल किसी से भी पूछने पर वो यही कहेगा कि जिस रफ्तार में उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने का खेल बन-बिगड़ रहा है, उसमें अभी से ये बता पाना असंभव है कि किसकी सरकार बनने वाली है। ये काफी हद तक ठीक भी लगता है क्योंकि, 2007 विधानसभा में मायावती को पूर्ण बहुमत, 2012 में अखिलेश यादव को उससे भी ज्यादा सीटें और 2014 के लोकसभा चुनाव में उसी उत्तर प्रदेश ने बीजेपी के लिए राजनीतिक चमत्कार वाला जनादेश दिया। इसलिए सही बात यही है कि यूपी की जनता के मन की बात समझना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर है। लेकिन, इसी मुश्किल को समझने में 89 का एक आंकड़ा मिला जो, साफ-साफ बता देता है कि किसकी सरकार उत्तर प्रदेश में बनने जा रही है। 2007 में ये आंकड़ा 149 का था। लेकिन, 7 चरणों में हुए 2012 के विधानसभा चुनाव में रिकॉर्ड 60 % मतदान ने 149 के आंकड़े को 89 का कर दिया। अब इस 89 के गणित को समझते हैं। दरअसल ये वो 89 सीटें हैं जहां हार-जीत का अंतर 5000 से भी कम रहा है। अगर मत प्रतिशत के लिहाज से समझें, तो ये 3-4 % के बीच कहीं बैठता है। 2012 में बुआ जी से भतीजे के हाथ में आई सत्ता

हिन्दी दिवस के बाद हिन्दी की बात

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मेरी आदत है कि मैं हर वक्त समाज समझने की कोशिश करता रहता हूं। और ये अनायास है। इसके लिए मुझे कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता। एक दशक पहले शुरू हुई ब्लॉगिंग ने मुझे मंच भी दे दिया। अभी मैं तिरुपति दर्शन के लिए गया था, चेन्नई होकर। संयोग से वो समय सरकारी हिन्दी पखवाड़े के समय का था। हिन्दी दिवस के पहले नोएडा वापस आ गया। छोटी-छोटी कई बातें मेरे ध्यान में आईं। कुछ टुकड़ों में फेसबुक, ट्विटर पर लिखा। अब उसे समेटकर ब्लॉग पर डाल रहा हूं। जिससे ये आसानी से सब पढ़ सकें। भीमराव अंबेडकर की दक्षिण भारत की बड़ी प्रतिष्ठा है। चेन्नई शहर से लेकर ग्रामीण इलाके तक में चमकीले , पीले रंग के बाबा साहेब नजर आ जाएंगे। अंबेडकर भी हिन्दुस्तान जोड़ सकते हैं। हालांकि , एक गड़बड़ हो गई है। अंबेडकर ने दलितों को उस समय के   #EliteClass के बराबर लाने के लिए जो अंग्रेजी सीखने की सलाह दी थी। दक्षिण भारत ने उसे हिन्दी विरोध के तौर पर शायद ले लिया। ये चेन्नई में स्कूलों से पढ़कर लौट रहे  बच्चे   हैं। लेकिन , ये इतना पढ़े-लिखे नहीं हैं कि मेरा लिखा , समझ सकें। ये अच्छा पढ़ रहे हैं। लेकिन , जैसे हम हिन्दीभाषी अ

मम्मी-पापा, उसकी गाड़ी हमारी गाड़ी से बड़ी क्यों है?

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तस्वीर-JEEP कार, एसयूवी खरीदने की इच्छा रखने वाले भारतीयों के लिए अगले दस हफ्ते बेहद रोमांचित करने वाले हैं। भारतीयों के लिए दो दर्जन से ज्यादा नई कारें, एसयूवी आ रही हैं। दरअसल नए वाले भारत में कारों की बिक्री के लिहाज से तो लगातार अच्छे दिन दिख रहे हैं। और उसमें भी बड़ी कार कंपनियों के अच्छे दिन तो और भी अच्छे हुए हैं। निसान, ह्युंदई, होंडा, टोयोटा, टाटा, फॉक्सवैगन, जैगुआर और दूसरी ढेर सारी कंपनियां 10 लाख से लेकर एक करोड़ रुपये तक की गाड़ियां भारतीय बाजार में लाने के लिए तैयार हैं। इससे पहले मशहूर अमेरिकी जीप भारत में आ गई। ये असली जीप है। अभी तक आम भारतीय की नजर में जीप का मतलब महिंद्रा की जीप होती थी। लेकिन, ये जो नया भारत तैयार हुआ है। आई लव माई इंडिया वाला। इस इंडिया को असली जीप का बेसब्री से इंतजार था। आखिरकार वो इंतजार खत्म हुआ। लेकिन, जीप अभी जिस कीमत के साथ आई है। उसकी वजह से असली जीप का इंतजार करने वाले भारतीयों का उत्साह थोड़ा को हुआ है। 75 लाख की शुरुआती कीमत के साथ जीप खरीदने के दीवाने कम ही है। लेकिन, कंपनी को भारत में बड़ा बाजार नजर आ रहा है। और इस बाजार को पकड़

छोटे किसानों का बड़ा भला कर सकता है GST

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GST को देश के सबसे बड़े आर्थिक सुधार के तौर पर देखा जा रहा है। करों में पारदर्शिता से कर घटने और ज्यादा कर वसूली का भी अनुमान है। लेकिन, एक बड़ा खतरा बार-बार बताया जा रहा है कि इससे महंगाई शुरुआती दौर में बढ़ सकती है और उससे भी बड़ी खतरनाक स्थिति ये बताई जा रही है कि इससे किसानों की मुश्किल बढ़ सकती है। उसके पीछे भारतीय किसान संघ तर्क दे रहा है कि किसान को हर तरफ से घाटा होगा। क्योंकि, किसान अपनी उपज के लिए कम कीमत हासिल कर पाएगा। जबकि, उसे बाजार में जरूरी चीजों के लिए ज्यादा कीमत देनी होगी। भारतीय किसान संघ के इस तर्क के पीछे तथ्य ये है कि अभी कृषि जिंस से बने खाद्य उत्पादों पर कम कर है। लेकिन, जीएसटी के बाद लगभग एक जैसा कर ही लगेगा और इसकी वजह से किसानों की मुश्किल बढ़ सकती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अनुषांगिक संगठन होने के नाते कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह भी भारतीय किसान संघ की बात को गंभीरता से ले रहे हैं। लेकिन, कृषि मंत्री का ये मानना है कि जीएसटी सभी के भले के लिए है। भारतीय किसान संघ ये भी चाहता है कि संसद के शीतकालीन सत्र में इस पर चर्चा हो और अगर सरकार

हिन्दी दिवस पर चेन्नई की एक सड़क के बहाने

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# हिन्दीदिवस ये चेन्नई की एक सड़क का नाम भर नहीं है। ये पूरे दक्षिण भारत का मानस है। जो हिन्दी पर अंग्रेजी को वरीयता दे रहा है। दोष उनका नहीं है। क्योंकि , हम हिन्दी वाले भी तो अंग्रेजी को वरीयता देते हैं। और #EnglishElite तो उत्तर भारत और उनके नेताओं ने ही तैयार किया। कांग्रेस की इसमें बड़ी भूमिका है। वरना ऐसे क्यों होता कि इंदिरा इज इंडिया इंडिया इज इंदिरा का नारा देने वाले के कामराज के राज्य में हिन्दी इतनी अछूत हो जाती है। अपनी सहूलियत की राजनीति में कांग्रेस ने ऐसे छत्रपों को तैयार किया जो दूसरे राज्य में अछूत से हो जाते। हां , इंदिरा , राजीव हर जगह देश के बड़े नेता रहे। हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं की लड़ाई में शातिर अंग्रेजी ने ऐसे जगह बनाई है कि वही हिन्दुस्तानी भाषाओं के बीच संवाद की भाषा बन गई है। टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलकर हिन्दी वाले तमिल , तेलुगू , कन्नड़ वालों से और वो लोग हम हिन्दी वालों से बात करते हैं। अंग्रेजी न उनको स्वाभाविक तौर पर आती है , न हमको। मैं तमिल की पुस्तक देख रहा था तो कई शब्द हैं जो हिन्दी से मिलते-जुलते हैं। लेकिन , हमें एकदम भिन्न अंग्रेजी सीखने

मेरे नए फेसबुक तमिल दोस्त तिरुनावकर

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ये   Thiru Thirunavukkarsau   हैं। मेरे नए फेसबुक दोस्त हैं। फेसबुक दोस्ती से पहले ये मेरी टैक्सी के ड्राइवर हैं , जिसने मुझे 3 दिनों तक चेन्नई एयरपोर्ट से तिरुपति-तिरुमला , महाबलीपुरम की शानदार यात्रा कराकर फिर से चेन्नई एयरपोर्ट पर छोड़ा। तिरुनावकर संभवत: मैं सही नाम का उच्चारण कर रहा हूं। 3 दिनों तक जमकर तमिल संगीत सुनाया। सिवाय एकाध घंटे के हिंदी गानों के विविध भारती पर कार्यक्रम को छोड़कर। तिरू ने बताया वो 12 वीं तक पढ़े हैं लेकिन , हिन्दी उन्होंने तब सीखा जब एक हिन्दी वाली कम्पनी में काम किया। शानदार यात्रा कराने के लिए धन्यवाद। उम्मीद करता हूं अब आप थोड़ी और हिन्दी सीख लेंगे। और अगली बार उत्तर भारतीय पर्यटकों के लिए एकाध अच्छी हिन्दी गानों की सीडी या पेन ड्राइव रखेंगे। एयरपोर्ट पर साथ ली ये तस्वीर। तिरू ने बताया कि वो फेसबुक पर हैं। मैंने कहा मैं भी। अब हम दोनों दोस्त हैं। अगली बार जब भी चेन्नई जाना हुआ , तिरू को ही पहले खोजूंगा।   # हिन्दी _ दिवस

हिन्दी दिवस पर तमिल, तेलुगू सीखने की किताब

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हिन्दी दिवस पर मेरी वापसी दक्षिण भारत से हो रही है। यकीन मानिए पिछले 3 दिनों से हिन्दी पढ़ने , सुनने को तरस गया। लेकिन , ये एकतरफा विलाप होगा कि दक्षिण भारतीय हिन्दी को नापसंद करते हैं। दोतरफा संवाद बनाने का तरीका ये हम उत्तर भारतीय ये बता पाएं कि दक्षिण भारतीय भाषाओं के लिए हमारे मन में कितना सम्मान है। दूसरी भाषा/बोली सीख पाने की मेरी क्षमता बहुत ज्यादा नहीं है। देहरादून रहकर गढ़वाली और मुंबई रहकर मराठी नहीं सीख सका। सामाजिक व्यवसायिक दबाव की वजह से अंग्रेजी समझता/जानता हूं। लेकिन , बहुत अच्छी नहीं है। लेकिन , किसी भी दक्षिण भारतीय भाषा को जरा सा समझना भी कठिन है। इसीलिए हिन्दी दिवस पर 30 दिन में सीखें तमिल , तेलुगू अब मेरी दूसरी किताबों का हिस्सा हैं। कल   # चेन्नई   के मरीना बीच से ये दोनों किताबें खरीदी हैं। मैं इन भाषाओं को अच्छे से जान समझ सकूंगा, ये तो कह पाना मुश्किल है। लेकिन, कोशिश ये होगी कि खुद कुछ समझने लायक हो सकूं। और सबसे जरूरी दोनों बेटियों को तो तमिल, तेलुगू के जरूरी शब्दों से परिचित करा ही दूं। मेरे पिताजी ने भी इलाहाबाद में इसका एक प्रमाणपत्र हासिल किया था। ल

शहाबुद्दीन से नीतीश कुमार डरे तो होंगे ही?

@narendramodi से अहं की लड़ाई में @laluprasadrjd से हर लड़ाई खत्म करके @NitishKumar ने दोस्ती पक्की कर ली है। आप क्या सोच रहे हैं , सिर्फ बिहार के आम लोग , बीजेपी कार्यकर्ता डर रहे हैं।   #Shahabuddin   के जेल से छूटने के बाद नीतीश भी डर रहे हैं। मेरी बात मत मानिए। शहाबुद्दीन ने कहा है कि नीतीश परिस्थितियों के मुख्यमंत्री हैं। इसका मतलब जो भी समझेगा , वो ये भी समझ रहा होगा कि नीतीश डर तो बहुतै रहे होंगे। मुख्यमंत्री हैं , कैसे और किससे कहें। अब तो बीजेपी भी साथ नहीं है। और बड़े भाई लालू से क्या कहेंगे। लालू से फिर राजनीति में मार खा गए , नीतीश कुमार। अब बिहार पर बड़ी मार पड़ेगी। टीवी चैनलों पर जेल से छूटे   #Shahabuddin   का 1500 बड़ी-बड़ी गाड़ियों का काफिला देखकर लग रहा है कि   #Bihar   बहुत गरीब है।   # दुर्भाग्य _ देश _ का   # दुर्भाग्य _ बिहार _ का #Shahabuddin   के जेल से बाहर आने के बाद क्या होगा ? ये सवाल सब पूछ रहे थे। जवाब मोहम्मद शहाबुद्दीन ने जेल से बाहर निकलते ही दे दिया है। शहाबुद्दीन ने कहा लोगों ने 26 सालों से इसी छवि के साथ स्वीकारा है। अब इसका मतलब बिहार के

सरपट भागते सेंसेक्स की बुनियाद

भारतीय शेयर बाजार को जैसे अचानक कोई संजीवनी सी मिल गई हो। इस साल अब तक सेंसेक्स 10.5 % से ज्यादा चढ़ चुका है। 29000 को छूने के बाद सेंसेक्स थोड़ा सुस्ताता नजर आ रहा है। सेंसेक्स को 29000 छूने में करीब डेढ़ साल लग गए। दरअसल ये पिछले डेढ़ साल सरकार के लिए भी ढेर सारी मुश्किलों वाले रहे हैं। लेकिन, अब सरकार भी मजबूतत नजर आ रही है और शेयर बाजार में निवेशकों का भरोसा भी पक्का नजर आ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब अर्थव्यवस्था को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त नजर आ रहे हैं। इसकी ढेर सारी वजहें हैं और शेयर बाजार की मजबूती में दिल्ली से लेकर वॉशिंगटन तक की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। मौसम से लेकर महंगाई ने बाजार को मारक रफ्तार दे दी है। उन ढेर सारी वजहों में से सबसे अहम 5 वजहें ये रहीं। GST कानून बनने की ओर भारत में कर सुधारों का सबसे बड़ा कानून बनने जा रहा है। मोदी सरकार के दो साल होने के बाद संसद ने GST बिल को पास कर दिया। संसद से मंजूर होने के बाद तेजी से GST कानून बनने की तरफ बढ़ रहा है। 17 राज्यों की विधानसभा ने GST को मंजूर कर लिया है। जिस तेजी से राज्यों ने इसे मंजूर किया है। उससे