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Showing posts from August, 2007

बदलते बाजार के साथ बदलते शहर

बाजार अब लोगों को नए जमाने के साथ रहने की तमीज सिखा रहा है। छोटे शहरों में पहुंचते बड़े बाजार ये सिखा-बता रहे हैं कि अब कैसे रहना है, कैसे खाना है, क्या खरीदना है, कहां से खरीदना है, कितना खरीदना है और क्या किसके लिए खरीदना जरूरी है। बस एक बार बाजार तक पहुंचने की जरूरत है। छोटे शहरों के लोग बाजार पहुंचने में लेट न हो जाएं। इसके लिए छोटे शहरों तक खुद ही बड़ा बाजार पहुंच रहा है। घर की जरूरत का हर सामान करीने से वहां लगा है। इतने करीने से कि, काफी ऐसा भी सामान वहां जाने के बाद जरूरी लगने लगता है जो, अब तक घर में किसी जरूरत का नहीं था। हमारे शहर इलाहाबाद में भी बड़ा बाजार पहुंच गया है।
अब इलाहाबाद छोटा शहर तो नहीं है लेकिन, बाजार के मामले में तो, छोटा ही है। कम से कम मैं तो, ऐसा ही मानता हूं। लेकिन, बड़ा बाजार वालों को यहां के बड़ा बाजार की समझ हो गई। इससे सस्ता और कहां का नारा लेकर बड़ा बाजार ने अपनी दुकान इलाहाबाद में खोल ली। बड़ा बाजार पहुंचा तो, 40 रुपए के खादी आश्रम के तौलिए से हाथ-मुंह पोंछने वाले इलाहाबादियों को एक बड़ा तौलिया, महिलाओं के लिए एक नहाने का तौलिया, दो हाथ पोंछने के त…

हमारा इंडिया मेड इन चाइना हो गया है!

नोकिया की BL-5C बैटरी की खराबी ने एक बार फिर चीनी माल की घटिया क्वालिटी के बारे में दुनिया को बता दिया। नोकिया जैसी बड़ी कंपनी थी, उसे अपनी प्रतिष्ठा की परवाह थी इसलिए 8 करोड़ रुपए से ज्यादा का खर्च झेलकर भी नोकिया ने इस सिरीज की 30 करोड़ बैटरियों में से 4 करोड़ 60 लाख वो बैटरियां वापस ले लीं। जो, नोकिया को जापानी कंपनी मात्सुशिता ने बनाकर दी थीं। आपको लगता होगा कि जापानी कंपनियां तो क्वालिटी के मामले में समझौता नहीं करतीं। फिर ये कैसे हो गया। दरअसल ये सारी बैटरियां मात्सुशिता के चीन के प्लांट में लगी हुई थीं। भारत में इन बैटरियों ने बिना फटे ही खूब हल्ला किया। दूसरा एक मामला है अमेरिकी खिलौना कंपनी मटेल टॉयज के जहरीले खिलौनों का। इन खिलौनों से बच्चों को तरह-तरह की बीमारियां होने के खतरे की बात सामने आई तो, कंपनी ने अपने कई खिलौने बाजार से वापस ले लिए। ये कंपनी भले ही अमेरिकी थी लेकिन, ये खिलौने कंपनी के चीन के प्लांट में ही बन रहे थे।
चीन के घटिया सामानों के ये उदाहरण भर हैं। चीन हमसे तेज रफ्तार से तरक्की कर रहा है। और, कई मामलों हमारे देश के नीति-नियंता भी चीन का ही उदाहरण देकर विक…

सेक्युलरिज्म नहीं देश बचाइए

तसलीमा की हत्या करके कोई भी कितने भी पैसे कमा सकता है। ये फतवा जारी किया है कोलकाता के एक मस्जिद के इमाम ने। मौलाना मानते हैं कि तसलीमा ने इस्लाम का अपमान किया है, जिसकी कीमत तसलीमा की जान से कम नहीं हो सकती। देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतें तसलीमा के बचाव में भी खुलकर नहीं आ रही हैं। वैसे अगर एमएफ हुसैन की भारत माता या किसी देवी-देवता को गलत तरीके दिखाने वाली पेंटिंग पर किसी हिंदू संगठन ने कुछ कहा होता तो, अब तक देश की सभी धर्मनिरपेक्ष ताकतें मिलकर हुसैन की तरफदारी में अभिव्यक्ति की आजादी के कसीदे पढ़ने लगतीं। वो, सिर्फ इसलिए हो पाता है क्योंकि, किसी उग्र हिंदू संगठन या लोगों का विरोध करके उन्हें भारत के उस धर्मनिरपेक्ष जमात में शामिल होने का मौका मिल जाता है जो, भारत में सेक्युलर नाम से बड़ा सम्मान पाती है।
आखिर क्या वजह है ऐसे ही मामले में तोगड़िया का विरोध करने वाले तसलीमा के खिलाफ फतवा जारी करने वाले मौलाना के खिलाफ कुछ न बोलकर अपनी बात कहने वाली तसलीमा के ही विरोधी हो जाते हैं। और, ये मौलाना कोलकाता की एक मस्जिद के हैं जिस राज्य पश्चिम बंगाल में पिछले तीस सालों से सेक्युलर लेफ्ट पार्…

शूटआउट एट सिविल लाइंस!

बीसों पुलिस वाले निहत्थे-निरीह आदमी पर गोलियां चला रहे थे। खून से लथपथ दुबला-पतला सा दिखने वाला आदमी टीवी पर चिल्ला रहा था। मुझे बचा लो, मैं सरेंडर करना चाहता हूं। आजादी के साठ साल पूरे होने के एक दिन पहले से लेकर एक दिन बाद तक एक टीवी चैनल के कैमरे पर पहली बार लाइव शूटआउट के उदघोष के साथ शुरू हुआ वीडियो लगातार लाइव चलता रहा। कैमरे पर चीख रहा एंकर बार-बार ये बताना नहीं भूल रहा था कि ये एक्सक्लूसिव वीडियो सिर्फ उसी के पास है। यहां तक कि 15 अगस्त को जब सभी चैनलों के पास ये वीडियो पहुंच गया, तब भी। आखिर, शूटआउट एट लोखंडवाला फिल्म से भी बेहतर दृश्य जो थे।
चैनल पर काफी देर तक देखने के बाद ही ये रहस्य खुल पा रहा था कि टीवी पर खून से लथपथ अपनी जान की गुहार लगाने वाला कोई सामान्य आदमी नहीं था। उसने कुछ देर पहले ही पुलिस के एक सिपाही के सिर पर बम मारकर उसकी जान ले ली थी। उसने और उसके साथियों ने मिलकर एक इंस्पेक्टर का पैर भी गोली मारकर खराब कर दिया था। इतनी जानकारी देने के बाद टीवी एंकर या उससे फोनलाइन पर जुड़ा संवाददाता फिर चीखने लगता था... ये सही है कि पिंटू मिश्रा नाम के इस बदमाश ने एक पुलि…

जवान भारत के जवानों नेता बनो

दुनिया के सबसे जवान देशों में से भारत के जवान तरक्की कर रहे हैं। इंजीनियर बन रहे हैं, डॉक्टर बन रहे हैं, बीपीओ में रात-रात भर जागकर अंग्रेजी बोलने की नौकरी कर रहे हैं। मैनेजमेंट कोर्स कर रहे हैं, मीडिया में किस्मत आजमा रहे हैं। सरकारी नौकरी के लिए आधा जीवन बिता दे रहे हैं। बड़े-बड़े बिजनेस कर रहे हैं। यानी वो सबकुछ कर रहे हैं जिससे उनको लग रहा है कि तरक्की की जा सकती है। लेकिन, शायद ही कोई लड़का या लड़की नेता बनना चाहता है। चाहता भी है तो, सोचता है और फिर उस रास्ते की दुश्वारियां देखकर रास्ते से ही लौट आता है।
सवाल ये कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में जहां चुने हुए लोग ही देश चलाते हैं। कायदे-कानून बनाते हैं देश में रहने वालों के लिए शर्तें तय करते हैं। सरकार, इंडस्ट्री, किसी भी बिजनेस के लिए पॉलिसी बनाते हैं, वहां कोई युवा नेता क्यों नहीं बनना चाहता है। और, ये तब है जब देश की हर समस्या के लिए नेता ही जिम्मेदार माना जाता है। यहां तक कि हर कोई ये भी दुहाई देता मिल जाता है कि अगर नेता सुधर जाएं तो, देश सुधर जाएगा। फिर कोई लड़का-लड़की नेता क्यों नहीं बनना चाहता। सुधार में खुद शाम…

मनमोहन जी कैसे करिएगा शिक्षा क्रांति

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आजाद भारत के साठ साल पूरे होने पर लाल किले से देश में शिक्षा क्रांति की बात कही है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने शिक्षा पर खर्च करने के लिए 11वीं पंचवर्षीय योजना में 80,000 करोड़ रुपए मांगे हैं। निश्चित तौर पर अगर अगले बीस सालों में भारत को अपने मानव संसाधन यानी काबिल लोगों का इस्तेमाल दुनिया में अपनी साख बढ़ाने के लिए करना है तो, शिक्षा क्रांति बहुत जरूरी है। क्योंकि, भारत के लिए यही सबसे आसान जरिया है दुनिया पर राज करने का। लेकिन, क्या प्रधानमंत्री को इस बात का अंदाजा है कि भारत में शिक्षा क्रांति के रास्ते की असली रुकावटें क्या हैं।
हर किसी को शिक्षा जो, सबसे जरूरी है। अब भारत में इसके दो एक दूसरे एक एकदम विपरीत चेहरे जो, मैंने खुद भी देख लिए। गांव के सरकारी स्कूलों में पढ़ने के लिए बच्चे और पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं मिलते। तो, मुबंई जैसे शहर में स्कूलों में दाखिले के फॉर्म लेने के लिए सुबह चार बजे से ही लाइन लगती है। मुंबई वाला अनुभव मुझे पिछले साल ही हुआ जब मैं दोपहर में ऑफिस पहुंचा तो, रात से ही लाइन में अभिभावकों की लाइन के विजुअल के साथ खुला पैकेज…

60 साल के आजाद भारत के नेता

कल दिल्ली के टाउनहॉल में बीजेपी और बीएसपी के सभासद (पार्षद) एक दूसरे से भिड़ गए। बीजेपी के सभासद संख्याबल में ज्यादा थे। इसलिए उन्होंने बीएसपी के सभासदों को पीट दिया।2009 में दिल्ली में विधानसभा के चुनाव होने हैं। उसकी ये एक बानगी भर थी। दरअसल अब नगर निगम से लेकर लोकसभा तक ऐसे नेता (बहुतायत में) चुनाव लड़ते-जीतते हैं जिनके लिए समाजसेवा कभी कोई मकसद ही नहीं होता है। उनके लिए नगर निगम, विधानसभा या फिर लोकसभा तक पहुंचना सिर्फ और सिर्फ अपनी उस हैसियत (दबंगई) को बनाए रखने या फिर उसे और बढ़ाने के लिए होता है। और, फिर जब इस हैसियत पर कोई उनकी बिरादरी की भी हमला करता है। तो, फिर वो हमलावर हो जाते हैं।ये कोई पहला मामला नहीं है। जब किसी लोकतांत्रिक संस्था के भीतर लोकतंत्र के पहरेदारों ने ही लोकतंत्र की अस्मिता पर हमला किया हो। इससे पहले उत्तर प्रदेश और बिहार के ही नेता बदनाम थे कि वहां के नेता गुंडे, लुच्चे लफंगे होते हैं। और, विधानसभा तक एक दूसरे से गाली-गलौज-मारपीट पर आमादा हो जाते हैं। वैसे हाथापाई और मारपीट का दिल्ली के टाउन हॉल से कुछ मिलता-जुलता नजारा देश की राजधानी में पहले भी हो चुका ह…

60 साल का बूढ़ा या 60 साल का जवान देश

ये किसी च्यवनप्राश का विज्ञापन नहीं है। ये भारत के लोगों के लिए दुनिया में मौके की राह दिखाने वाली लाइन है। 2020 तक दुनिया के सभी विकसित देशों में काम करने वाले लोगों की जबरदस्त कमी होगी। यहां तक कि भारत से ज्यादा आबादी वाले देश में भी बूढ़े लोग ज्यादा होंगे। दुनिया के इन देशों में आबादी बढ़ने की रफ्तार पर काबू पाया जा चुका है। और, अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं की वजह से विकसित देशों में लोग ज्यादा उम्र तक जियेंगे। तब दुनिया के विकसित देशों को अपने यहां काम की जरूरतों को पूरा करने के लिए विकासशील कहे जाने वाले देशों की ही तरफ देखना होगा। और, इसमें भी भारत को सबसे ज्यादा फायदा होगा। क्योंकि, यहां पर अभी 60 प्रतिशत लोग 30 साल से कम उम्र के हैं। यानी जिन्होंने अभी काम करना कुछ पांच-आठ साल पहले ही शुरू किया है। अगर भारत के 45 साल के लोगों की उम्र तक जोड़ ली जाए तो, ये लोग कुल मिलाकर देश की जनसंख्या के 70 प्रतिशत हो जाते हैं।
दरअसल आजादी के साठ सालों में भारत अभी जवान हुआ है। और, इसी जवानी के बूते पर दुनिया भर में अपनी ताकत का लोहा मनवाने लायक भी हो गया है। लोकतंत्र और मजबूत हुआ है। लालफीताशाह…

ये फर्क इंडिया और भारत का है

दो दिन पहले मैंने हांगकांग की एक कंसल्टेंसी फर्म के सर्वे के लिहाज से लिखा था कि किस तरह देश के शहर तेजी से महंगे हो रहे हैं। लेकिन, इसके बाद भी दुनिया के कामकाजी लोगों के लिहाज भारत अभी एशिया के ही शहरों में भी सबसे सस्ता ही है। इस पर उम्दा सोच की टिप्पणी आई कि यहां आमदनी कम है वरना तो, दुनिया के दूसर शहरों के लिहाज से भारत के शहर अभी भी बहुत सस्ते हैं। इस पर अनिल रघुराज की टिप्पणी आई जो, ज्यादा वाजिब थी कि इस लिहाज से दुनिया के दूसरे शहरों में रहना ज्यादा सुखकर है। और, मुझे लगता है कि कहीं भी महंगाई का पैमाना वहां रहने वालों कमाई के लिहाज से ही तय होता है।
मैंने क्यों कहा कि मुंबई और दूसरे मेट्रो शहरों में रहना मुश्किल होता जा रहा है। इसको नेशनल कमीशन फॉर इंटरप्राइजेज इन अनरिकॉगनाइज्ड सेक्टर (NCEUS) का ताजा सर्वे भी पुख्ता करता है। इस सर्वे के मुताबिक, देश में 83 करोड़ 60 लाख लोग ऐसे हैं जो, हर रोज बीस रुपए यानी सिर्फ 600 रुपए महीने की कमाई कर पाते हैं। वैसे देश में गरीबी रेखा की परिभाषा में ये सभी लोग गरीबी रेखा के ऊपर ही आते हैं। क्योंकि, गरीबी रेखा के नीचे उन्हीं लोगों को रखा जा…

हम महंगाई से मरे जा रहे हैं औ विदेशियों के लिए सबसे सस्ता भारत

दुनिया भर में घूमने वाले कामकाजी विदेशियों के लिए रहने-खाने-मस्ती करने के लिए लिहाज से भारत सबसे सस्ता है। और, ये हम पूरी दुनिया की बात नहीं कर रहे हैं। महंगाई के लिहाज से अभी तो हम एशिया के ही दूसरे कई देशों से पीछे चल रहे हैं। वैसे भारतीय शहर इस बात के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं कि वो दुनिया के महंगे शहरों में शामिल होकर जरा तो इज्जत कमा सकें। उन्हें इसमें कुछ सफलता भी हासिल हुई है। मुंबई (यहां मैं रहता हूं, जानता हूं कि यहां रहना कितना मुश्किल है), दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद और बैंगलोर के साथ पुणे भी महंगे शहरों की लिस्ट में एक से तीन नंबर तक आगे बढ़ गए हैं। ये सब बातें कही गई हैं हांगकांग की एक कंसल्टेंसी फर्म ECA इंटरनेशनल के अभी की सर्वे रिपोर्ट में। दरअसल ये सर्व ये भी जानने की कोशिश थी कि प्रोफेशनल्स के लिए अच्छी लाइफस्टाइल (जीवन शैली ) वाले शहर कौन से हैं। जाहिर है कि अच्छी लाइफस्टाइल वहीं मिल सकती है, जहां सुविधाएं-विलासिता होंगी। और, आज की सुविधा बिना महंगाई के मिलती नहीं।

दुखद ये रहा कि काफी दौड़ लगाने के बाद भी भारत के सबसे महंगे सात शहर एशिया के 41 महंगे शहरों को ल…

मैं मुन्नाभाई के जेल जाने से दुखी नहीं हूं

संजय दत्त को जेल हो गई है। इससे देश-समाज में बहुत लोग दुखी हो गए हैं। सबको लगता है कि संजू बाबा, अब ज्यादातर लोग उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं, ने इधर तो कोई ऐसा अपराध किया नहीं है। जिसके लिए उन्हें जेल भेज दिया जाए। वैसे इनमें से ज्यादातर लोग ऐसे होंगे, जिन्हें बंबई 93 धमाकों के सभी अभियुक्तों के लिए फांसी की सजा भी कम लगती होगी। फिर संजय दत्त को सजा मिलने से लोग दुखी क्यों हैं।
दरअसल लोग संजय दत्त को नहीं मुन्नाभाई को सजा मिलने से दुखी है। वो मुन्नाभाई जो, बॉक्स ऑफिस पर अच्छे बिजनेस की गारंटी बन गया। वो, मुन्नाभाई जो, गांधीजी के मरने के करीब पांच दशकों के बाद गांधीवाद को गांधीगिरी में बदलकर नए जमाने के लोगों को भी हंसाता है, रुलाता है और वो गांधीगिरी से ही एक सुंदर सी गर्लफ्रेंड भी पा लेता है।

लोगों को उस मुन्नाभाई के जेल जाने से दुख है जिसके ऊपर अभी कम से कम फिल्म इंडस्ट्री की 100 करोड़ रुपए दांव पर लगा हुआ है, 100 करोड़ सिर्फ उन फिल्मों की कीमत है, जिनकी शूटिंग अधर में लटक गई है।
मुन्नाभाई के जेल जाने से वो लोग भी दुखी हैं। जो, ज्यादातर मुन्नाभाई की स्टाइल में ही जिंदगी आगे बढ़ान…