Skip to main content

मायावती प्रधानमंत्री बनेंगी या उप प्रधानमंत्री

लोकसभा चुनावों की तैयारियों में सभी राजनीतिक पार्टियां जुट गई हैं। और, इस तैयारी में सबसे अहम ये कि किसके साथ, दिल्ली के रास्ते पर कितनी दूर चला जा सकता है। ऐसे देखने पर साफ तौर पर देश पूरी तरह से जाने-अनजाने दो दलीय व्यवस्था पर ही चल रहा है। एक पक्ष एनडीए यानी नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) और दूसरा पक्ष यानी सरकार में बैठा यूपीए, यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (संयुक्त विकासशील गठबंधन)। दोनों के अलावा कहने को एक तीसरा मोर्चा भी है जो, यूपीए को बाहर से समर्थन दे रहे लेफ्ट की अगुवाई में अलग-अलग राज्यों के कुछ क्षेत्रीय दल हैं।

लेकिन, सच्चाई यही है कि तीसरा मोर्चा नाम का विकल्प फिलहाल तो मरा हुआ सा दिख रहा है। तीसरे मोर्चा का अगुवा लेफ्ट तो, पूरी तरह से ही कांग्रेस के साथ है। और, कांग्रेस के साथ चल रहे छद्म मल्लयुद्ध के बीच हुए सम्मेलन में लेफ्ट पार्टियों ने फिर से साफ कर दिया है कि भाजपा उनकी पहली दुश्मन है और अगर जरूरत पड़ी तो, वो फिर से कांग्रेस की मदद कर सकते हैं। तीसरे मोर्चे की बात भी सुनाई नहीं पड़ी। और, जिस तरह के जनादेश आते दिख रहे हैं उसमें, साफ है कि एनडीए या फिर यूपीए किसी को भी पूर्ण बहुमत तो नहीं मिलने वाला। कांग्रेस-भाजपा ही सबसे बड़ी पार्टियां बनी रहेंगी और 15 से 25 सीटों के फासले से सत्ता का सुख भोगेंगी या फिर विपक्ष में बैठकर संसद का काम रोकती रहेंगी।

ज्यादातर राज्यों में दोनों गठबंधनों के साथी चुनाव के पहले से ही तय हैं और जो, चुनाव के पहले साथ नहीं लड़ेंगे वो, पहले से ही न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सरकार में शामिल हो जाएंगे। लेकिन, इस सबमें एक जो, अचानक पलटा समीकरण है वो, बन रहा है सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश से। उत्तर प्रदेश ही वो राज्य है जिसमें बदहाल होने से भाजपा की अगुवाई वाला एनडीए सत्ता से बाहर रह गया और लालकृष्ण आडवाणी हाथ ही मलते रह गए। अभी भी इस राज्य में न तो भाजपा के हालात ज्यादा बदले हैं और न ही कांग्रेस जमीन से उबर पाई है। यही वजह है कि दोनों ने अलग-अलग तरीके से सपा-बसपा के साथ एक अनकहा गठबंधन बनाना शुरू कर दिया है।

उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ मुस्कुराती मायावती की तस्वीर फ्रेम में धुंधली पड़ चुकी है। राहुल के कहने मायावती एक छोटा सा अफसर हटाने को तैयार नहीं हैं। गांधी परिवार की बड़ाई पर मायावती ने सुल्तानपुर के जिलाधिकारी को नाप दिया और राहुल गांधी दलितों की दुर्दशा पर सबसे ज्यादा आंसू बहा रहे हैं। उन्हें दलित बस्ती के बच्चे सबसे प्यारे लग रहे हैं। अब तो, सोनिया गांधी कह रही हैं कि मायावती के खिलाफ कांग्रेस कार्यकर्ता आंदोलन करें। जेल जाएं, पीछे से राहुल भी जेल जाएंगे। ये बयान ठीक उसी दिन आया जब किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने मायावती को जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया और टिकैत समर्थकों के बवाल के आगे टिकैत के पैतृक गांव सिसौली (मुजफ्फरनगर) से पुलिस टिकैत को नहीं पकड़ सकी। टिकैत का बेटा भले पुलिस हिरासत में पहुंच गया। वैस, देर-सबेर टिकैत सरकारी मेहमान बनेंगे ही। लेकिन, इस वाकये ने कांग्रेस-सपा की जुगलबंदी थोड़ी बेहतर कर दी है। मुलायम और उनकी पार्टी पूरी तरह से टिकैत के समर्थन का ऐलान कर चुकी है हो, सकता है मुलायम को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुछ फायदा भी हो जाए।

वैसे, मुलायम और कांग्रेस लाख कह रहे हों कि मायावती के राज में अंधेरगर्दी चरम पर है। लेकिन, भाजपा अभी भी मायावती सरकार के खिलाफ कुछ भी कड़ाई से नहीं बोल पा रही है। वजह शायद लोकसभा चुनाव 2009 के बाद के समीकरण का ध्यान है। अगर कुछ बहुत बदलाव नहीं हुए तो, देश भर में कुल मिलाकर मायावती की पार्टी को 35 से 45 सीटें मिल सकती हैं जो, केंद्र की लंगड़ी सरकार की बैसाखी बन सकते हैं। वैसे तो, उत्तर प्रदेश में मायावती और भाजपा का गठंधठन बुरी तरह से फ्लॉप हो चुका है। लेकिन, केंद्र में सत्ता की मलाई चखने को आतुर मायावती और खुद को पहले से ही एनडीए की ओर से पीएम इन वेटिंग कहलाने वाले लालकृष्ण आडवाणी के बीच कुछ तार जुड़ते से दिख रहे हैं।

आडवाणी को ये अच्छी तरह पता है कि ये चुनाव उनके लिए करो या मरो का चुनाव है। चतुर राजनीतिज्ञ आडवाणी को मायावती के बढ़ते प्रभाव का भी बखूबी अंदाजा है। बस, मायावती का अडियल रवैया थोड़ी मुश्किल कर सकता है। क्योंकि, माया मैडम अब प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं। साथ ही उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कई सीटों पर बसपा और भाजपा के प्रत्याशियों के बीच सीधा मुकाबला भी कुछ मुश्किल करेगा।

लेकिन, राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा के आगे क्षेत्रीय या राज्य की महत्वाकांक्षा की तिलांजलि भारतीय राजनीति के लिए नया किस्सा नहीं होगा। मायावती की इस राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा ने पहले भी कई राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा को ही फायदा पहुंचाया है। वैसे भी मायावती के सिर कभी भी तीसरे मोर्चे का भूत नहीं चढ़ता और वो, मुलायम की तरह लेफ्ट नेताओं के साथ मंच पर भाषण देने नहीं जातीं। ये भाजपा के लिए काफी सुकून की बात है। अब बस सवाल यही है कि मायावती को आडवाणी उपप्रधानमंत्री बनने के लिए मनाकर खुद प्रधानमंत्री बनते हैं या फिर मायावती सत्ता से बाहर रहकर सत्ता की सौदेबाजी का मन बनाती हैं। क्योंकि, मायावती खुलेआम कहती हैं- दलितों को समाज में सबसे ऊपरी तबके में शामिल करने के लिए वो किसी से भी किसी भी शर्त पर हाथ मिला सकती हैं। इस फॉर्मूले से उत्तर प्रदेश में तो, दलित, समाज का सबसे ऊपरी तबका हो गया है। तो, क्या अब बारी केंद्र की है।

Comments

  1. Mayawati ke sath gathbandhan BJP kee majboori hai lekin ek bat sabko dhyan men rakhni hai ki mayawati kisi ki sagi nahi hain wo apni bat se firane me ek minute bhi nahi lagatin.

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

किसान राजनीति के बीच सरकार आधुनिक किसान नेता बनाने में जुटी है

हर्ष वर्धन त्रिपाठी दिल्ली की सीमा पर तीन तरफ़ सिंघु , टिकरी और ग़ाज़ीपुर पर कृषि कानूनों के विरोध में किसान संगठन बैठे हुए हैं और फ़िलहाल कोई रास्ता निकलता नहीं दिख रहा है। सरकार और किसानों के नाम आंदोलन कर रहे संगठनों के बीच में वार्ता भी पूरी तरह से ठप पड़ गयी है। किसानों के नाम पर संगठन चला रहे नेताओं ने अब दिल्ली सीमाओं पर स्थाई प्रदर्शन के साथ रणनीति में बदलाव करते हुए देश के अलग - अलग हिस्सों में किसान पंचायत , बंद और प्रदर्शन के ज़रिये सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाना शुरू किया है , लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार कृषि क़ानूनों को लेकर ज़्यादा दृढ़ होती जा रही है। चुनावी सभाओं से लेकर अलग - अलग कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों को आधुनिक कृषि व्यवस्था से जोड़कर उनकी आमदनी दोगुना करने के सरकार के लक्ष्य को बार - बार दोहरा रहे हैं , लेकिन बड़ा प्रश्न यही है कि आख़िर किसानों को यह बात समझाने में सरकार कैसे कामयाब हो पाएगी , जब

भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में दम तोड़ेगी यूनियनबाज किसानों की “अराजकता”

भारतीय संविधान निर्माताओं ने जब संविधान बनाया था तो स्पष्ट तौर पर उसमें यह व्यवस्था स्पष्ट करने की कोशिश की थी कि किसी भी हाल में विधायिका , न्यायापालिका और कार्यपालिका के बीच किसी तरह का टकराव न हो। हालाँकि , इसमें लोकतंत्र की मूल भावना का ख्याल रखते हुए विधायिका और न्यायपालिका को एक दूसरे पर इस नज़रिये से नज़र रखने का बंदोबस्त किया गया कि किसी भी हाल में निरंकुश व्यवस्था न हावी हो जाए , लेकिन सबके मूल में लोकतंत्र को ही सर्वोच्च भावना के साथ स्थापित करना था , इसीलिए कई बार भारतीय लोकतंत्र में इस बात की भी चर्चा होने लगती है कि भारत में अतिलोकतंत्र की वजह से सरकारें निर्णय नहीं ले पाती हैं। पहले नागरिकता क़ानून के विरोध में चले शाहीनबाग और अब कृषि क़ानूनों के विरोध में चल रहे सिंघु - टिकरी - गाजीपुर के आंदोलन को लेकर अतिलोकतंत्र की बहस फिर से छिड़ गई है और इसी अतिलोकतंत्र की बहस के बीच सर्वोच्च न्यायालय ने तीनों कृषि क़ानूनों को नि

पिंजरा या भारत तोड़ने की कोशिश ?

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मुख्य परिसर से सटा हुआ या यूं कह लें कि मुख्य परिसर में ही महिला छात्रावास है। और, विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली छात्राएं, महिला छात्रावास से निकलकर सीधे परिसर में आ जातीं थीं, लेकिन यह रास्ता पूरी तरह से उन्हीं छात्राओं के लिए था जो महिला छात्रावास में रहती थीं। महिला छात्रावास में छात्रों या किसी को भी जाने के लिए मुख्य द्वार से ही जाना होता था और इसके लिए बाकायदा सुरक्षा में लगे जवानों के पास नाम वगैरह दर्ज कराकर ही जाया जा सकता था। 90 के दशक तक 3 महिला छात्रावास हुआ करते थे और उन तीनों के पहले छात्रावास अधीक्षिका का कक्ष, छात्रावास कार्यालय होता था, वहीं तक जाकर छात्राओं से मुलाकात होती थी। वर्ष में एक बार विश्वविद्यालय के छात्रों को महिला छात्रावास के अंदर जाने का अवसर मिलता था और वह अवसर होता था छात्रसंघ चुनाव के दौरान इलाहाबाद विश्वविद्यालय की बेहद अनोखे मशाल जुलूस वाले दिन। हर प्रत्याशी अपने जुलूस के साथ महिला छात्रावास में जाता था, जहां छात्राएं, छात्रसंघ प्रत्याशियों के ऊपर फूल फेंकती थीं और जिस नेता के ऊपर ज्यादा गुलाब गिरे, उसकी जीत पक्की मान