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Wednesday, February 05, 2014

यूपीए 2 का आर्थिक शीर्षासन !


राजनीति अर्थनीति पर हमेशा भारी पड़ती है ये तो समय-समय पर साबित होता रहा है। लेकिनखुद को सुधारवाद की सबसे बड़ी अगुवा घोषित करने वाली सरकार  5 साल बीतते-बीतते अगर अपने सारे सिद्धांतों को उलट दे तो क्या कहेंगे। यूपीए सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में कुछ ऐसा ही कर रही है। मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री बने थे तो लगा था कि देश-दुनिया में अर्थशास्त्र के विद्यार्थी, अध्यापक रहते जो कुछ भी उन्होंने सीखा, समझा है उसे ठीक से लागू करेंगे और देश की अर्थव्यवस्था कुछ ऐसी हो जाएगी कि दुनिया के विकसित देशों के साथ हम कंधे से कंधा मिला सकेंगे। मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री रहते हुए जो कमाल किया था, वो भारत के लोगों को अच्छे से याद है। इसीलिए मजबूरी में ही सही जब ऐसा आदमी प्रधानमंत्री बनता दिखा तो नौजवान भारत को लगा कि अब तक सब्सिडी से सरकार और देश चलाने के आदी नेताओं का वक्त खत्म हो गया। क्योंकि, पी वी नरसिंहाराव के प्रधानमंत्री रहते वित्त मंत्री बने मनमोहन सिंह ने वो कर दिखाया था जो, होना संभव ही नहीं था। मनमोहन सिंह ने इस देश को काफी हद तक लालफीताशाही से मुक्ति दिला दी थी। भारत का 1991 दुनिया के लिए मिसाल बना और मौका भी। मनमोहन सिंह की नीतियों का ही असर था कि ये देश दुनिया के लिए खुले मन से बांहे खोलकर खड़ा हो गया था। दुनिया को अनछुआ बाजार दिखा और दुनिया दौड़ पड़ी भारत के बाजार में अपने को सिद्ध करने के लिए। इससे दबाव भारतीय कंपनियों पर भी पड़ा जो, भारत सिर्फ टाटा, बिड़ला का नाम और पंरपराएं लेकर जी रहा था। वो भारत टाटा, बिड़ला का नाम सम्मान से लेने के साथ ये भी पूछने, समझने लगा था कि आखिर दुनिया की दूसरी कंपनियों के साथ मुकाबले में हमारे उद्योगपति कहां हैं। हमारी कंपनियां बनाती क्या हैं, कहां बेचती हैं और दुनिया में इनकी स्थिति क्या है। ये बड़ा परिवर्तन था। लालफीताशाही टूटने का असर था। इंस्पेक्टर राज खत्म होने का असर था। और ये सब किया प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहाराव की खुली छूट के साथ अर्थशास्त्री वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने।

2004 आया। विदेशी मूल के मुद्दे पर सोनिया को देश जब स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिखा तो सोनिया को मनमोहन सिंह याद आए। बेहद विनम्र व्यवहार के मनमोहन सिंह ने विनम्रता से देश को सपना ये दिखाया कि आर्थिक सुधार ही आज के समय में सारे सुखों की वजह बन सकता है। हालांकि, ये बहस का विषय है कि आर्थिक सुधार क्या है। यूपीए एक के समय शुरू हुआ आर्थिक सुधार के कार्यक्रम में मोटे तौर पर दो बातें शामिल थीं। पहला सबकुछ विदेशियों के लिए खोलना। मतलब साफ था कि अपने बाजार की ताकत दिखाकर विदेशियों को भारत में नए जमाने का विकसित भारत तैयार करने वाला बुनियादी ढांचा तैयार करवाना। साथ ही सब्सिडी देकर समाज के कमजोर तबके को संतुलित करने की जो राजनीतिक प्रक्रिया थी उसे धीरे-धीरे खत्म करना। मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधार का कार्यक्रम ये सपना दिखाता था कि दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार होगी। हर भारतीय की जेब में इतनी रकम होगी कि वो सबकुछ बाजार की कीमत पर खरीद सकेगा। फिर भला सब्सिडी की जरूरत क्यों होगी। और कमाल की बात ये यूपीए एक से यूपीए दो बना तो इसमें जरा सा भी जिक्र सोनिया गांधी की अगुवाई वाली यूपीए एक ने इस बात का नहीं करना जरूरी समझा कि ये चमकते भारत के मनमोहिनी सपने पर वोट मिला। सोनिया गांधी के मनरेगा यानी 100 दिन 100 रुपये की न्यूनतम मजदूरी वाले कार्यक्रम को ही यूपीए दो लाने का पूरा श्रेय दे दिया गया। फिर यूपीए दो भी आया। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश को इसी पर खुश करते रहे कि दुनिया मुसीबत में हैं हम कम मुसीबत में हैं। और वो फिर से सपना दिखाने लगे कि चिंता मत करो अब सब ठीक हो जाएगा। ये अलग बात थी कि भारत सरकार की लुंजपुंज आर्थिक नीतियों की वजह से दुनिया की बाजारू नीति भारत की साख घटाना शुरू कर चुकी थी। फिर बहुप्रतीक्षित प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का फैसला भी ले लिया गया। इस भरोसे कि एक वॉलमार्ट या टेस्को आएगा और देश के हर नागरिक को विकसिक देशों के लोगों जैसा अहसास कम से कम खरीदारी करते समय तो देने ही लगेगा। हुआ उल्टा। भारत के संवैधानिक संघीय ढांचे की वजह से दिल्ली, महाराष्ट्र छोड़ कहीं भी दुकान खोलने की इजाजत सलीके से नहीं मिली। हर राज्य की अपनी शर्तें थीं। इतनी शर्तें देखकर विदेशी रिटेलर ऐसे घबड़ाए कि अबतक कोई भी विदेशी मल्टीबांड रिटेलर की दुकान का बोर्ड चमकता नहीं दिख रहा है। खबरें तो ये भी आ रही हैं कि जो अकेला रिटेलर भारत आ भी रहा है टाटा के साथ समझौता करके वो भी सरकार की नाक बचाने के लिए बड़ी लॉबीइंग का नतीजा है। ये तो हुआ मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधार के कार्यक्रम का। देश की तरक्की की रफ्तार अब तक घटकर साढ़े चार तक लुढ़क चुकी है।

ये तो था विदेशों से पैसे लाने के सरकारी नीतियों का हाल। लेकिन, बात और बुरी हो गई जब घरेलू हालात दुनिया के बाजार के मुताबिक करने के लिए चल रही योजना भी उलटती दिखने लगी। वो योजना थी धीरे-धीरे सब्सिडी खत्म करने और भारत के लोगों को बाजार की कीमत पर पेट्रोलियम उत्पादों के मिलने का। एकबारगी तो ऐसा लगा कि सरकार कलेजा कड़ा कर चुकी है। उसे देश की तरक्की की चिंता सबसे पहले है वोटबैंक की बाद में। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस सबकी कीमत बाजार तय करने लगा। कहीं पूरी तरह से कहीं आंशिक तौर पर। लेकिन, ये सब तब हो रहा था जब लोकसभा चुनाव में काफी वक्त था। लोकसभा चुनाव नजदीक आ गए। चार राज्यों में कांग्रेस का खाता बंद हो गया। हर सर्वे यूपीए की किसी भी संभावना तक को दूर-दूर तक नकारने लगा। बस मनमोहन सिंह को प्रेस कांफ्रेंस करनी पड़ गई। ये तक कहना पड़ गया कि मैं नहीं बनूंगा प्रधानमंत्री। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की तालकटोर स्टेडियम की बैठक में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सब्सिडी, कालाबाजारी घटाने की महत्वाकांक्षी 9 सिलिंडर की गैस को 12 सिलिंडर की गैस में बदलने की बात कह दी। तीन बढ़े सिलिंडर से निकली गैस से मनमोहन सिंह और यूपीए की सुधारवादी आर्थिक नीतियों का दम घुटना शुरू हो चुका था। शीर्षासन लोगों की सेहत ठीक करता है। लेकिनअगर कोई सरकार अपनी आर्थिक नीतियों का शीर्षासन करने लगे तो क्या होगा। कुछ ऐसा ही हुआ है जब देश को सुधारों की पटरी पर दौड़ाते-दौड़ाते यूपीए की सरकार अपने दूसरे कार्यकाल के आखिरी दिनों में उल्टी दौड़ लगा रही है। लेकिन, मामला यहीं नहीं रुका। अचानक बुलाई गई प्रेस कांफ्रेंस में पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली ने सीएनजीपीएनजी के दाम करीब एक तिहाई घटा दिए। लौट के बुद्धू घर को आए की तर्ज पर लौटकर सुधारों से सब्सिडी पर आए। अब जिस रास्ते लौट आए हैं उसे जायज तो ठहराना ही है। दरअसल नेताओं को लगता है कि जनता की याददाश्त बड़ी छोटी होती है। लोकसभा चुनावनजदीक हैं और पिछले साढ़े चार सालों से महंगाई से त्रस्त जनता को 15 रुपए सस्ती सीएनजी और रुपये सस्ती पीएनजी मिलेगी तो वो पिछली महंगाई भला कहां याद रख पाएगी।  मोइली जी कल तक सारे बाजारू फॉर्मूले गिनाकर हर पेट्रोलियम पोडक्ट महंगा कर रहे थे। अचानक उन्होंने सीएनजी-पीएनजी सस्ता करने का फॉर्मूला निकाल दिया। आम लोग बमुश्किल ही समझ पाएंगे कैसे। तरक्की की रफ्तार बढ़ाने वाले उद्योगों के हिस्से की गैस रोक दी गई है और उसे सिटी गैस वितरण कंपनियों को दे दिया गया। अब 100 प्रतिशत सस्ती गैस सिटी गैस वितरण कंपनियों को मिलेगी। उन्हें घरेलू गैस फील्ड वाली सस्ती गैस मिलेगी। महंगी गैस आयात करने से उनको मुक्ति मिली और इसका लाभ जनता को सस्ती सीएनजी-पीएनजी के तौर पर मिलेगा। यूपीए सरकार को उम्मीद यही कि देश की जनता यूपीए के आखिरी दिनों में मिली इस सस्ती गैस का कर्ज यूपीए बनाकर उतार देगा। अब सवाल यही है कि क्या इस जमाने में भी साढ़े चार साल की नीति को साढ़े चार महीने के लिए उल्टा करके सरकार बनाई जा सकेगी। इस प्रयोग का परिणाम मई 2014 में पता चलेगा कि ये प्रयोग सफल हुआ या नहीं।

Tuesday, January 28, 2014

मनमोहिनी सिद्धांतों की कब्र पर होगी राहुल की ताजपोशी!


भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के रामलीला मैदान पर कहाकि दिल्ली आए थे कांग्रेसी कार्यकर्ता प्रधानमंत्री लेने और लेकर लौटे तीन गैस के बॉटल। नरेंद्र मोदी के मुंह से ये बात भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में निकली तो इस पर चर्चा भी शुरू हो गई। हालांकि, ये जुमला नरेंद्र मोदी के श्रीमुख से निकला था तो इसे सिर्फ कांग्रेस भाजपा के बीच के विरोधी बयान के तौर पर देखा जाना भी स्वाभाविक है। कुछ लोग इसे भाषण की तुकबंदी की तरह ही देख रहे हैं कि अच्छा लगता है इस तरह से अपने कार्यकर्ताओं के बीच में तुकबंदियां उछालना। और खुद राहुल गांधी 17 जनवरी की तालकटोरा वाली एआईसीसी बैठक में मान चुके हैं कि भाजपा और नरेंद्र मोदी की मार्केटिंग रणनीति इतनी अच्छी है कि वो गंजों को कंघी बेच देते हैं और अब तो उनका हेयर स्टाइल भी बनाने लगे हैं। बड़ा हिट हुआ था राहुल गांधी का ये वाला बयान और इतना ही हिट हुआ था राहुल गांधी का वो वाला बयान जिसमें वो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से चहकते हुए कह रहे थे कि प्रधानमंत्री जी 9 सिलिंडर से घर नहीं चलता। हमें 12 सिलिंडर चाहिए। जिन्होंने उस समय टीवी स्क्रीन देखा होगा उन्हें बगल में अतिप्रसन्न हो रही सोनिया गांधी की शक्ल भी दिखी होगी। हो भी क्यों ना। सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष और एक बेटे की मां, दोनों ही रिश्तों से खुश होने की वजह दिख रही थी। बेटा और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पूरे फॉर्म में था। प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाने के लिए रुदन करते कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के सामने भाषणों के चौके-छक्के लगा रहा था। पहली बार लगा कि राहुल गांधी नेता हो गए हैं। और इस नेता होने वही दोनों लाइनें सबसे मददगार रहीं। अब नरेंद्र मोदी और भाजपा की मार्केटिंग रणनीति की राहुल गांधी बात करते हैं, काट निकालते हैं तो उसमें मुझे कोई तकलीफ नहीं होती। लेकिन, अर्थशास्त्र का विद्यार्थी होने के नाते राहुल गांधी का दूसरा बयान मुझे बेहद तकलीफ दे रहा है।


राहुल गांधी ने तो अपनी राजनीतिक इमारत की बुलंदी के लिए उछलकर कह दिया कि प्रधानमंत्री जी 9 सिलिंडर से काम नहीं चलेगा। 12 सिलिंडर चाहिए। प्रधानमंत्री न तो ऐसे बड़े मुद्दों पर बोलते हैं और न बोलने लायक बचे हैं। क्योंकि, अध्यादेश पर राहुल के बगावती तेवर ने उन्हें अंदर तक हिला दिया है। इसीलिए उन्होंने सत्ता के दो ध्रुवों के सफलतापूर्वक चलने की बात भी कह डाली। और अब अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में मनमोहन सिंह ये भी देख रहे हैं कि किस तरह से उनके सारे अर्थशास्त्री सिद्धांतों को बलि देकर एक मां अपने बेटे की राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है। अर्थशास्त्र का विद्यार्थी होने के नाते राहुल गांधी का 9 की बजाय सब्सिडी वाले 12 सिलिंडर देने की जरूरत वाला बयान और उस पर तुरंत पेट्रोलियम मंत्री की प्रतिक्रिया की हम कैबिनेट में इस पर विचार करेंगे, बेहद खतरनाक संकेत दे रहा है। 2004 में जब आठ प्रतिशत से ज्यादा की तरक्की की रफ्तार विरासत में लेकर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने थे तो हर कोई ये आसानी से मान ले रहा था कि भले ये एनडीए ने काम किया लेकिन, इसकी बुनियाद नरसिंहा राव-मनमोहन की जोड़ी के देश को दुनिया के साथ जोड़ने वाले सुधारवादी फैसलों ने किया था। इसीलिए जब 2004 में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तो देश ही नहीं दुनिया के लोगों को लगा कि अब हम बड़ी आसानी से दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार हासिल कर लेंगे। नई पीढ़ी ये सपना देखने लगी थी कि अब हमारा भी जीवन अमेरिका-लंदन में रहने वालों जैसा होगा यानी हम विकासशील से विकसित देशों की कतार में पहुंच जाएंगे। लेकिन, हुआ क्या। हुआ ये कि 2004-2009 यानी यूपीए के पहले शासनकाल में तो तरक्की की रफ्तार आठ प्रतिशत पर बनी रही लेकिन, उस तरक्की की मजबूत बुनियाद में सीलन डाल दी सोनिया गांधी के प्रिय महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना ने। सब्सिडी से हटकर देश के लोगों को बाजार के सिद्धांतों के अनुकूल बनाकर तरक्की की मनमोहिनी योजना में ये पहला बड़ा छेद था। भ्रम ये फैलाया गया कि 2009 में लोगों ने इसी मनरेगा से मिलने 100 रुपये रोज की गारंटी पर यूपीए 2 के लिए वोट कर दिया। जबकि, सच्चाई ये थी कि दरअसल नौजवान वोटर, शहरों में कमाने निकला मध्यमवर्गीय परिवार यूपीए 2 के लिए इस गलतफहमी में वोट कर गया था कि मनमोहन सिंह हैं तो 10 प्रतिशत की तरक्की हम हासिल कर ही लेंगे। अर्थव्यवस्था की खराब हालत के लिए ठीकरा दुनिया की मंदी पर मनमोहन सिंह ने आसानी से फोड़ दिया। लोग भूलते जल्दी हैं इसलिए याद दिलाता हूं कि किस तरह से पी चिदंबरम ने और फिर प्रणब मुखर्जी ने वित्त मंत्री रहते हुए यूपीए सरकार की सब्सिडी का बोझ करने वाली योजना अमल में लाने की बात बजट भाषण के दौरान लगातार देश को बताई थी। उस भाषण पर ज्यादा नहीं लेकिन, सिर्फ एक महत्वपूर्ण बात कि धीरे-धीरे पेट्रोलियम उत्पादों से सब्सिडी कम कर दी जाएगी। और उसी योजना के तहत पेट्रोल को पूरी तरह बाजार के हवाले, डीजल को आंशिक तौर पर बाजार के हवाले और एलपीजी यानी रसोई गैस के सब्सिडी वाले सिलिंडरों की संख्या कम करने के ऐलान किए गए।

हालांकि, इस सब्सिडी खत्म करने के फैसले का राजनीतिक तौर पर कई बार इस्तेमाल भी किया गया। लेकिन, धीरे-धीरे इस सब्सिडी खत्म करके बाजार के सिद्धांतों पर पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत तय करने के सरकार के फैसले के अच्छे असर भी दिखने शुरू हो गए थे। पेट्रोलियम मंत्रालय से आने वाली साधारण प्रेस विज्ञप्तियों में से एक के आंकड़े असाधारण हैं। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानी DBTL योजना से जोरदार फायदा हो रहा था। लीकेज पर रोक लग रही थी। रसोई गैस की सब्सिडी का पैसा सीधे खाते में जाने की योजना अभी पूरी तरह लागू नहीं हुई है लेकिन,जितनी भी लागू हुई है उसका असर दिखना शुरू हो चुका है। जून 2013 को ये योजना शुरू हुई थीदेश में कुल 15 करोड़ रसोई गैस ग्राहक परिवार हैं। इनमें से दो करोड़ तीस लाख ग्राहक परिवार आधार, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर योजना के दायरे में आ चुके हैं। इसका मतलब ये हुआ कि 2000 करोड़ रु सीधे ग्राहकों के खाते में जा रहे हैं। देश के 54 जिलों में ये योजना पूरी तरह लागू है। अब इस योजना के फायदे देखिए 8लाख मल्टीपल कनेक्शन बंद किए गए हैं। सालाना 2500 करोड़ रुपये की बचत की बात की जा रही है। ये सुधार के सिद्धांतों का असर था। लोग रसोई गैस की बचत करना सीख रहे हैं। लोगों को लग रहा है कि ठीक से एक कनेक्शन ही घर में होना चाहिए। वजह ये कि अब सब्सिडी सीधे खाते में आएगी और बिना आधार कार्ड के नहीं मिलेगी। डुप्लिकेट रसोई गैस खाते बंद होंगे। इसके साथ एक और तथ्य समझना जरूरी है। वो तथ्य ये है कि किसी भी परिवार में रसोई गैस की जो खपत होती है लगभग वही पहले भी होती थी। फर्क सिर्फ इतना है कि अब उसके एक ही वैध कनेक्शन पर वो खपत है। पहले उसके 2-3 कनेक्शनों में उसकी खपत के अलावा सब कालाबाजारी का जरिया बन जाता था। और यही लीकेज है, भ्रष्टाचार है जो सुधारवादी सिद्धांतों से सुधर रहा था। 9 सिलिंडर एक परिवार के लिए पर्याप्त होते हैं। हां बड़े परिवारों में शायद जरूरत ज्यादा की होती हो। लेकिन, अच्छा था कि धीरे-धीरे लोग 80 प्रतिशत आयातक पेट्रोलियम उत्पाद वाले देश के लिहाज से संयमित भी हो रहे थे। कालाबाजारी पर रोक भी लग रही थी। लेकिन, अचानक एक युवराज की ताजपोशी का संकट देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के सामने आ खड़ा हुआ। और प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार युवराज को बनाने की चाहत लेकर आए देश भर के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और देश के दूसरे लोगों को भी 9 से 12 सस्ते सिलिंडर देकर ही युवराज को बिना घोषित किए प्रधानमंत्री बनाने का रास्ता तैयार करने की कोशिश हुई है। लेकिन, ये सबकुछ मनमोहन सिंह के सारे अर्थशास्त्री सिद्धांतों को कब्र में डालकर हो रहा है। सब्सिडी पर देश के लोगों का मत बन चुका था। अब देखना ये होगा कि 2009 में मनरेगा से चुनाव जीतने का भ्रम फैलाने वाली कांग्रेस क्या 2014 की लड़ाई तीन सस्ते सिलिंडर के भ्रम से जीत पाती है। 

(ये लेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपा है।)

Tuesday, September 03, 2013

मनमोहन सरकार ये तूने क्या किया !

हम भारतीयों को सपना देखने में बड़ा मजा आता है। ऐसा कि कोई भी हमें सपना दिखा दे तो हम मजे से उसके साथ हो लेते हैं। ये बात हमारे नेताओं को गजब समझ में आई। जवाहर लाल नेहरु ने नया भारत बनाने का सपना दिखाया। भारत एक खोज हो गई, हम भारतीय नेहरु के साथ हो लिए। इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का सपना दिखाया। फिर हम भारतीय इंदिरा के साथ हो लिए। राजीव गांधी ने इक्कीसवीं सदी में ले जाने का सपना दिखाया। हम भारतीय अब राजीव के साथ हो लिए। लेकिन, हम भारतीयों को सबसे तगड़ा सपना दिखाया  गैरराजनीतिक मनमोहन सरकार ने। मनमोहन सरकार कभी नेता नहीं रहे। लेकिन, हमेशा जीवन की सर्वोच्च सुख सुविधा का भोग करते रहे। उन्होंने भी एक सपना इस देश को दिखाया। और, वो अब तक का सबसे तगड़ा सपना था। हम भारतीय बिस्तर पर पड़े इस सपने की आहट भर से गुदगुदाने लगे। वो सपना था हम भारतीयों को अमेरिकी बनाने का। वो सपना था दुनिया की सारी सुख सुविधा भारत में जुटाने का। वो सपना था हम भारतीयों को जेब में जमकर रुपया भर जाने का। वो सपना था हम भारतीयों की देह पर दुनिया के सारे ब्रांडेड कपड़ों के सज जाने का। वो सपना था हम भारतीयों के पास दुनिया की सबसे शानदार कारों के होने का। वो सपना था हम भारतीयों के हंसते-खेलते बिना संयुक्त परिवार के तनाव के मियां-बीवी और बच्चे के साथ मॉल में घूमने का। वो सपना था हर गांव के शहर बन जाने का। वो सपना था हर भारतीय शहर में अमेरिकी शहरों जैसी चमक का। वो सपना था 10% की तरक्की का। हम मनमोहन सरकार के साथ हो लिए। 2004 में, फिर 2009 में। सपना टूट गया है। आधा रह गया है हमारी तरक्की की रफ्तार की तरह। अब देखिए सपने में जीने वाले भारतीय बिस्तर से बूथ तक पहुंचते हैं या इस सपने के लिए 2014 में मनमोहन सरकार का साथ देते हैं। क्योंकि, सपना तो बहुत बड़ा है। और, पूरे तो पहले के भी सपने नहीं हुए थे।

Saturday, September 22, 2012

सरकार! नंगा होने के अलावा कोई विकल्प बचा है क्या?

 
आर्थिक विकास पर प्रधानमंत्री के भाषण के समय विरोध प्रदर्शन
संतरी लूटे तो, जाए जेल-प्रधानमंत्री लूटे तो, कानून फेल
 
ये लिखा है प्रधानमंत्री के खिलाफ शर्ट उतारकर विरोध प्रदर्शन करने वाले वकील संतोष कुमार सुमन के फेसबुक प्रोफाइल पर।
 
( इस विरोध प्रदर्शन के तुरंत बाद ये लाइनें लिखी हैं। दिल से निकली हैं इसलिए इसे लिखने भर का समय लगा। दिमाग नहीं लगाना पड़ा)
 
बात जब हद से गुजर जाती है
 
जब किसी बात पर मन का गुस्सा तिलमिलाहट में बदल जाता है
 
जब हमको लगता है कि हमारी बात सत्ता सुनेगी नहीं
 
जब हजारों इराकियों के मरने पर भी इराकी कुछ कर नहीं पाते हैं
 
तो, दुनिया के सर्वशक्तिमान अमेरिका के राष्ट्रपति पर जूता चल जाता है
 
 
बात जब हद से गुजर जाती है
 
जब किसी बात पर मन का गुस्सा तिलमिलाहट में बदल जाता है
 
जब हमको लगता है कि हमारी बात सत्ता सुनेगी नहीं
 
जब हजारों सिखों की जान की कीमत किसी नेता की मौत के बदले में जायज हो जाती है
 
जब सालों के बाद भी देश की न्याय प्रक्रिया गुनहगारों को खुला छोड़े रहती है
तो, एक सिख को गृहमंत्री से डर लगना बंद हो जाता है
 
फिर जूता चल जाता है
 
 
 
बात जब हद से गुजर जाती है
 
जब किसी बात पर मन का गुस्सा तिलमिलाहट में बदल जाता है
 
जब हमको लगता है कि हमारी बात सत्ता सुनेगी नहीं
 
जब सरकारी प्रवक्ता कुछ भी बोलकर चला जाता है
 
जब उसकी बात को जायज ठहराना ही नियति बनने लगती है
 
तो, फिर जूता चल जाता है
 
 
बात जब हद से गुजर जाती है
 
जब किसी बात पर मन का गुस्सा तिलमिलाहट में बदल जाता है
 
जब हमको लगता है कि हमारी बात सत्ता सुनेगी नहीं
 
जब देश के प्रधानमंत्री बताने लगते हैं कि पेड़ों पर पैसे नहीं उगते
 
जब प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार, महंगाई को जायज ठहराने लगते हैं
जब प्रधानमंत्री देश की हर समस्या का इलाज विदेशी नुस्खे से करने को जायज ठहराने लगते हैं
जब न बोलने वाले प्रधानमंत्री ऐसा बोलते हैं कि आम आदमी जख्म पर मिर्ची जैसा लगता है
तो, जूता नहीं चलता, आम आदमी नंगा हो जाता है
देश का हाल तो, प्रधानमंत्री जानें, बता ही चुके हैं कि सोना गिरनी रखने की नौबत आ चुकी है
लेकिन, अगर ऐसे ही देश सुधारते रहे
तो, आम आदमी के तन बदन पर कपड़ा भी नहीं बचने वाला
लोकतंत्र में क्या आम आदमी अपना असल हाल भी देश के मुखिया के सामने बता नहीं सकता
फिर बताइए विरोध का और तरीका क्या होगा

Thursday, July 29, 2010

मनमोहन जी आप भी!


अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी गजब भोले हैं। कह रहे हैं कि जब अच्छे मॉनसून की वजह से फसलें अच्छी हो जाएंगी। देश में अनाज और दूसरी जरूरी चीजों की अधिकता हो जाएगी तो, दिसंबर तक महंगाई अपने आप कम हो जाएगी।

अब मनमोहन जी तो सचमुच बहुत सीधे आदमी हैं। वो, बहुत कठिन समीकरणों को न राजनीति में समझने की कोशिश करते हैं न महंगाई के मामले में। इसीलिए दूसरा कार्यकाल आराम से पूरा करते दिख रहे हैं। लेकिन, चूंकि वो अर्थशास्त्री हैं तो, आंकड़े जरूर समझते हैं।


कुछ आंकड़े मेरे पास हैं वो, मैं पेश कर रहा हूं खुद ही अंदाजा लग जाएगा कि ये महंगाई किसी मांग-आपूर्ति के असंतुलन का नतीजा है क्या ?


2006 के बाद से लगातार हमारा अनाज का उत्पादन बढ़ा है। पिछले साल के कुछ सूखे की वजह से इस साल की फसल पर थोड़ा असर जरूर पड़ा है फिर भी वो, मांग से काफी ज्यादा है।


2007-08 में भारत का गेहूं का उत्पादन रिकॉर्ड 7 करोड़ 80 लाख टन हुआ था। जबकि, उम्मीद 7 करोड़ 68 लाख टन की ही थी।


2009-10 में सिर्फ गेहूं ही नहीं सभी अनाजों की बात करें यानी गेहूं और दालों की तो, अनाज का कुल उत्पादन 21 करोड़ 80 लाख टन तक होने की उम्मीद है। ये पिछले साल से करीब 1 करोड़ 60 लाख टन कम है लेकिन, फिर भी कुल पैदावार इतनी ज्यादा है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में लाखों टन गेहूं सड़ चुका है।


2009-10 में गेहूं का उत्पादन पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए 8 करोड़ 7 लाख टन होने की उम्मीद है। जबकि, दालों का उत्पादन भी रिकॉर्ड 1 करोड़ 46 लाख टन।

चावल भी इस साल करीब 9 करोड़ टन हुआ। और तिलहन उत्पादन करीब ढाई करोड़ टन का है। गन्ना 27 करोड़ 78 लाख टन का सरकारी अनुमान है।

महंगाई में अब बचती है सब्जी तो, उसका कोई ऐसा बुआई चक्र नहीं होता कि जुलाई-अगस्त की बारिश से सब सुधर जाएगा या सब बिगड़ जाएगा। फिर इस बारिश के भरोसे अपने प्रधानमंत्री जी से लेकर उनके आर्थिक सलाहकार सी रंगराजन, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और सारी सरकार को भुलावा क्यों है कि दिसंबर तक सब ठीक हो जाएगा। वैसे ऐसे ही भुलावे में रखकर पिछले 5 साल और नई यूपीए के साल भर से ज्यादा हो गए हैं। जय हो ...

Friday, May 22, 2009

ट्रॉमा सेंटर बनते जा रहे हैं शहर

सेक्टर 49 नोएडा में रहता हूं। पॉश कॉलोनी है। सब बड़ी-बड़ी कोठियां हैं। सामने ही प्रयाग हॉस्पिटल है। अभी थोड़ा ही समय हुआ जब प्रयाग हॉस्पिटल में ट्रॉमा सेंटर भी खुल गया है। मेरी डॉक्टर पत्नी ने बताया- मतलब इमर्जेंसी में यहां इलाज कराया जा सकता है।


लेकिन, मुझे तो लग रहा है कि जब पूरा शहर ही ट्रॉमा सेंटर बन गया हो तो, ऐसे सेक्टरों के बीच में खुले एकाध अस्पतालों के ट्रॉमा सेंटर से कैसे काम चल पाएगा। चुनाव में नोएडा (गोतमबुद्ध नगर) से BSP प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह नागर जीते हैं। BSP जीती है लेकिन, S से सड़क छोड़कर BP- बिजली, पानी- का बुरा हाल है। इतना कि लोगों का BP- ब्लड प्रेशर इतना बढ़ जाए कि उन्हें ट्रॉमा सेंटर खोजने की जरूरत पड़ जाए।


पता नहीं लोग कह रहे हैं- बार-बार सुनते-सुनते मुझे भी कभी-कभी लगता है- कि अब BSP ही चुनावों में सबसे बड़ा मुद्दा बन रही है। जहां नेता जनता की BSP- बिजली, सड़क,पानी- की जरूरत नहीं पूरी कर रहे हैं। जनता उन्हें लात मारकर भगा रही है। जो, BSP से जनता को संतुष्ट रख पा रहे हैं उन्हें, जनता दोबारा मौका दे रही है।


पता नहीं समझ में तो नहीं आता ये सब। सड़के नोएडा में शानदार हैं तेज रफ्तार से गाड़ियां दौड़ती हैं। लेकिन, बिजली 4 घंटे तो कम से कम कट जाती है। बिजली जाने का तरीका भी गजब है। ऐसा नहीं है कि एक तय समय पर जाए जिससे पता हो कि कब से कब तक बिजली रानी के इंतजार में बैठना है। कभी भी निकल लेती है। रात साढ़े ग्यारह के आसपास लेटा- सोने की कोशिश रंग लाई ही थी कि 11.50 पर बिजली रानी भाग गईं। छत पर गया तो, इतने मच्छर। अब मच्छर पता नहीं कहां से आते हैं मैंने तो, सेक्टर में किसी को गंदगी करते नहीं देखा। समय से कूड़े वाला आता है। सबके डस्टबिन उसकी ट्रॉली में पलट दिए जाते हैं। फिर मच्छर कहां से आए। खैर, जहां से भी आए। मेरे सोने की कोशिश को गजब का असफल कर दिया।


ऐसा गंदे नाले जैसा पानी मैंने अपने अब तक के जीवन में नहीं देखा था जैसा नोएडा में सप्लाई हो रहा है। पीला-काला ये पानी। पता नहीं कौन सी अथॉरिटी इसे साफ करके लोगों के घरों तक भेजती है। और, क्या नोएडा में साफ पानी भेजने के लिए जिम्मेदार सारे अफसर-कर्मचारी नोएडा से बाहर रहते हैं जो, इन्हें पता भी नहीं चलता कि ये क्या सप्लाई कर रहे हैं। ये पानी पीने के लिए एक्वागार्ड वॉटर प्योरीफायर भी कम असरदार होने लगा है। एक दिन एक मार्केटिंग वाला लड़का आया वाला ये तो, पानी को सिर्फ उबालता है। लेकिन, कंकड़-मिट्टी, गंदगी को साफ नहीं कर पाएगा। RO लगवा लीजिए- एक्सचेंज ऑफर भी बता गया। करीब 8000 का प्योरीफायर साल भर बाद 2000 की कीमत का बचा है। RO 10000 रुपए से शुरू ही हो रहा है।


लेकिन, सिर्फ पीने का ही मसला नहीं है। नहाने-कपड़े धोने लायक भी ये पानी नहीं है। अखबारों के साथ आने वाले सप्लीमेंट में ड्रीमगर्ल हेमामालिनी की बिटिया एक मशीन से बने बढ़िया पानी से नहाकर-तरोताजा होकर निकलती हैं। अब बताइए घर में नहाने, कपड़े धोने तक का पानी साफ करने के लिए मशीन चाहिए। बिजली के लिए इनवर्टर से भी काम नहीं चल पाता। खाक BSP मुद्दा है। चलिए फिर भी हम उस जश्न में शामिल होते हैं जो, उत्तर प्रदेश से निकले उस जनादेश की जय हो कर रहा है। जहां राष्ट्रीय पार्टियों के फिर से भरोसेमंद साबित होने पर मनाया जा रहा है।


हम बिजली, पानी जैसे स्थानीय मुद्दों पर बात करके नाहक कलेजा जला रहे हैं। वैसे भी रात भर सो नहीं पाया हूं। आंख जल रही है। ऑफिस भी जाना है। आज सबके मनमोहन प्रधानमंत्री बनने की शपथ लेने वाले हैं। उन पर स्पेशल तैयार करना है। राष्ट्रीय मुद्दों की चिंता करनी है। मेरा क्या अधिक से अधिक यही तो होगा- गंदे पानी से बीमारी मिलेगी। बिजली जाने से रात भर नींद नहीं आएगी- थोड़ा चिड़चिड़ापन होगा। थोड़ा ब्लड प्रेशर बढ़ेगा। कोई बात नहीं ट्रॉमा सेंटर है ना।

Wednesday, July 09, 2008

आखिर क्यों मनमोहन के सर ठीकरा फूटा

क्या मनमोहन सिंह कांग्रेस में इस स्थिति में हैं कि उनके आत्मसम्मान को बचाने के लिए सरकार को दांव पर लगाया जाता। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और दूसरे कांग्रेसी ये जानने के बावजूद की अभी के हालात में चुनाव जीतना बहुत मुश्किल होगा और चुनाव होना अभी बचा भी लें तो, इसके लिए सरकार पर समर्थन की जो शर्तें समाजवादी पार्टी जैसे दल लादेंगे वो, और भी बड़ी कीमत होगी और क्या उसकी भरपाई हो पाएगी।

आखिर हो भी तो यही रहा है सरकार के समर्थन की कीमत कभी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार चुका रहे हैं तो, कभी पीएमओ से लेकर दूसरे मंत्रालयों के बड़े-बड़े अफसर। अमर सिंह का सूखा चेहरा फिर खिल गया है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अमर सिंह और मुलायम सिंह यादव को परमाणु समझौते पर सफाई देते हैं। इतने पर ही बात नहीं बनी तो, अमर सिंह के दुश्मन कॉरपोरेट घरानों (अनिल अंबानी के विरोधी भाई मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज पढ़िए।) के पर कतरने पर भी सहमति बनने लगी है। दिग्गज वित्त मंत्री पी चिदंबरम और पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा हटें न हटें उनके विभाग के अफसर अमर सिंह के सामने दरबारी की मुद्रा में खड़े हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय में विशेष सचिव टीकेए नायर अमर सिंह की अगुवाई में खडे हैं। क्या इतना सिर्फ मनमोहन के उस आत्मसम्मान को बचाने के लिए सोनिया कर सकती हैं जो, मनमोहन ने बुश के साथ परमाणु समझौते पर आगे बढ़कर वादा किया था।

मुझे तो ये लगता है कि चुनाव की तय तारीख के कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सर लेफ्ट से गठजोड़ टूटने का ठीकरा फोड़ने के पीछे कुछ और ही वजह है। दरअसल प्रधानमंत्री पद त्यागने के बाद कांग्रेस के सबसे कमजोर नेता को जिस तरह से देश का सबसे कमजोर प्रधानमंत्री बनाकर गद्दी पर सोनिया गांधी ने बैठाया। उसके बाद ये तो संभव नहीं था कि वो फिर से प्रधानमंत्री की गद्दी के लिए खुद को पेश करतीं। इससे फिर से संघ परिवार और बीजेपी को विदेशी मूल का मुद्दा मिलने का भी खतरा था।

यही वजह है कि येन केन प्रकारेण सोनिया ने राहुल गांधी को इस पद के लिए सबसे योग्य प्रत्याशी बनाने की हरसंभव कोशिश की। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (जिसको हमारे इलाहाबाद में बड़की कांग्रेस कहते हैं)में राहुल गांधी को महासचिव बना दिया गया। साथ में राहुल की उम्र के कई खानदानी कांग्रेसी विरासत वाले नेता सचिव बना दिए गए। फिर राहुल ने यूपी चुनाव से पहले ऊटपटांग बयान देकर बड़ा नेता बनने की कोशिश की। फिर फेल हो गए। राहुल अपने परदादा जवाहर लाल नेहरू की किताबों से सीखकर इंडिया डिस्कवर करने निकले। इस सबके बीच मीडिया के जरिए ये भी खबरें आईं कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होने की वजह से राहुल ने मंत्री बनने इनकार कर दिया।

इस बीच मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह और कुछ दूसरे दरबारी कांग्रेसियों ने भी राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के लिए काबिल बता दिया। इस पर जब सारे मीडिया में कई दिनों तक जमकर हल्ला हो चुका। उसके बाद राहुल गांधी ने कहाकि मनमोहन सिंह योग्य प्रधानमंत्री हैं। सोनिया ने भी कहा- राहुल बाबा सही कह रहे हैं। और, जब सब मानने लगे कि मनमोहन ही प्रधानमंत्री पद के अगले उम्मीदवार होंगे। तो, अब आखिर क्या जरूरत थी सोनिया को लेफ्ट को नाराज करने के लिए प्रधानमंत्री से हवाई जहाज से जापान जाते समय हवा-हवाई बयान दिलाने की। अब ये तो कोई नहीं मानेगा कि इतना महत्वपूर्ण बयान सोनिया से बिना पूछे मनमोहन दे डालेंगे। मुझे तो ये लगता है कि सोनिया ने दूरदृष्टि की वजह से ये बयान मनमोहन से दिलाया।

मुझे लगता है कि मनमोहन सिंह की शहादत पर राहुल की ताजपोशी की कहानी शुरू होगी। अब ये तो सोनिया को क्या सबको अच्छे से पता है कि शायद ही अगली सरकार बिना गठजोड़ के बन सकेगी। ये भी तय है कि जब ध्रुवीकरण होगा तो, लेफ्ट को कांग्रेस के ही साथ आना होगा। अब साफ है कि जब लोकसभा चुनाव के बाद लेफ्ट को कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए को समर्थन करना होगा तो, लेफ्ट के लोग भी कम से कम इतना तो करेंगे ही कि गठजोड़ टूटने की वजह बनने वाले मनमोहन की अगुवाई से मना कर दें। और, तब राहुल गांधी के नाम पर सहमति बनवाना सोनिया गांधी के लिए शायद सबसे आसान होगा। मुझे तो मनमोहन सिंह के सर ठीकरा फूटने की यही वजह लगती है। आपको क्या लगता है बताइए।

Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

 Harsh Vardhan Tripathi हर्ष वर्धन त्रिपाठी #Bangladesh में @trahmanbnp प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। @PMOIndia @narendramodi ने उन्हें बध...