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Showing posts from March, 2017

लोकतंत्र टनाटन है!

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पहली नज़र में देखने पर ये बड़ी सामान्य तस्वीर लगती है। लेकिन ये तस्वीर ख़ास है। संसद मार्ग थाने के सामने हो रहे इस प्रदर्शन में शामिल लोगों को पीने का पानी देने के लिए#NDMCका टैंकर खड़ा है। लोकतंत्र का मतलब भी यही है कि कोई भी कहीं से सरकार के ख़िलाफ़ खड़ा हो जाए और सरकार उसके मूलभूत अधिकारों का हनन न करे।#भारत_में_लोकतंत्रमुसीबत में नहीं है, ये जानना जरूरी इसलिए है कि बहुत से लोग हाल ही देश में सम्वैधानिक अधिकारों के ख़त्म होने को लेकर बड़े चिन्तित हो रखे हैं। देखिए शायद कुछ चिन्ता कम हो।

काल गणना, पंचांग और नववर्ष

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आज से नवरात्रि शुरू हो रही है। और ये नवरात्रि का पता तो पंचांग से ही चलता है। पंचांग को पोंगापंथी साबित करने की कोशिश जमकर हुआ। यहां तक कि सभी भारतीय पारम्परिक तथ्यों को भी अवैज्ञानिक साबित करके खारिज करने की कोशिश बरसों से खूब हुई। अब जरा नए साल को ही देखिए। भारतीय नववर्ष की बात करें तो देश भर में भारतीय नववर्ष मौसम चक्र, फसल चक्र के बदलाव के साथ बदल जाता है। जिस पंचांग को हम पोंगापन्थी मान लेते हैं। उस पंचांग के लिहाज से हर मौसम की पक्की वाली जानकारी होती है। यहां तक कि मौसम के बदलने के आज के मौसम विज्ञान जैसी पक्की सूचना भी वहां होती है। दिसम्बर-जनवरी या फिर मार्च-अप्रैल से वो बात कहां पक्की होती है। लेकिन, दुनिया में पसर गया और वैज्ञानिक ग्रहों, तथ्यों के आधार पर होने वाली भारतीय काल गणना के आधार को ही खारिज कर दिया गया। साल, महीने के बाद इसी तरह दिन की बात भी करें, तो दफ्तर की छुट्टी के लिहाज से रविवार से हफ्ता शुरू हो गया। लेकिन, सामान्य समझ के लिहाज से देखें, तो कोई भी दिन क्यों हुआ, इसका कोई पक्का तर्क तो है नहीं, सिवाय रविवार को चर्च जाने के। जबकि, भारतीय एकादश, द्वादश या फिर…

सबका 'विकास' दूसरे के हिस्से में से हो

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#विकासकितना मुश्किल होता है। उसका उदाहरण हैं, ये दोनों सड़कें। दरअसल ये एक ही सड़क के दो हिस्से हैं। पक्की सड़क मेरे घर के सामने से आ रही है और जहाँ ये खड़ंजा बिछा दिख रहा है। हमारे गाँव के ही शुक्ला जी के खेत से गुज़रती है। पहले चकरोड यानी मिट्टी की सड़क थी तो पतली थी। अब पक्की करने के लिए उनके खेत का भी कुछ हिस्सा जा रहा है। उन्होंने बस उसी उतने हिस्से के लिए कुंडा तहसील न्यायालय में मुक़द्दमा दायर कर दिया। हालाँकि, अब मामला सुलझ गया है, ऐसा इस बार गाँव में पता चला लेकिन, इसी से अंदाज़ा लगाइए कि सामूहिक विकास करना, बेहद बुनियादी सुविधाएँ देने के लिए भी, सरकारों को कितना लड़ना पड़ता है। जब भी किसी के निजी में से थोड़ा सा कटकर ढेर सारे लोगों के सामूहिक भले में जुड़ने की बात होती है, निजी हावी हो जाता है। 

“सबका साथ” भी भाजपा से बड़ा हो पाएगा क्या?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर बात में सबका साथ सबका विकास कह रहे हैं। लेकिन, राजनीतिक तौर पर देखें, तो ये नारा सिर्फ और सिर्फ भाजपा का विकास कर रहा है। अब सवाल ये है कि क्या “सबका” साथ हो जाए, तो भाजपा का विकास रोका जा सकता है। यहां सबका मतलब राजनीतिक तौर पर सपा+बसपा+कांग्रेस से हैं। दरअसल इस महागठबंधन या “सबका” साथ का मजबूत आधार उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में पार्टियों को मिले मतों के आधार पर बनता दिख रहा है। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 39.7% मत मिले। बहुजन समाज पार्टी को 22.2% और समाजवादी पार्टी को 21.8% मत मिले हैं। कांग्रेस को 6.2% मत मिले हैं। तो अगर सीधे-सीधे इन तीनों पार्टियों के मतों को मिला दिया जाए, तो वो 50.2% बनता है। यानी बीजेपी के 39.7% मत “सबका” साथ होते ही बहुत कम पड़ जाएंगे और बिहार की तरह तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतें जीत हासिल कर लेंगी। ये एक सीधा आंकलन हुआ। लेकिन, इसको अगर थोड़ा गहराई से समझने की कोशिश करें, तो तस्वीर इतनी साफ नहीं है। 2019 छोड़िए, भारतीय जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री और दोनों उपमुख्यमंत्री गैर विधायक बनाकर इस “सबका बना…

मणिशंकर अय्यर के महागठबंधन की कल्पना और योगी सरकार में मंत्री मोहसिन रजा

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आदित्यनाथ योगी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुके हैं। ये भी सही है कि योगी का नाम चुनाव के पहले से, चुनाव के दौरान और चुनाव के बाद भी सबसे ज्यादा मजबूती से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के लिए सामने आता रहा। लेकिन, हम मीडिया विश्लेषकों को ये लगता रहा कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह राज्य में किसी भी ऐसे मजबूत नेता को मुख्यमंत्री नहीं बनाएंगे, जिसकी अपनी खुद की बड़ी हैसियत हो। इसी आधार पर राजनाथ सिंह का नाम भी खारिज किया जाता रहा। हालांकि, राजनाथ सिंह ने दिल्ली मीडिया में अपने सम्बन्धों के बूते इस खबर को मजबूती से चलवा लिया कि उनके इनकार करने के बाद ही कोई उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बन सकेगा। जबकि, ये सच्चाई अब जगजाहिर हो चुकी है कि राजनाथ सिंह किसी भी वक्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की दौड़ में नहीं थे। इसी दौरान मीडिया में कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर का नरेंद्र मोदी के मुकाबले महागठबंधन का प्रस्ताव भी बड़ी मजबूती से चला। कुछ इस तरह से उस प्रस्ताव पर विपक्षी नेताओं के साथ ही, मीडिया विश्लेषकों के बयान आने लगे कि बस अब महागठबंधन बना और कल-परसों से देश भर में मोदी के मुकाबले विपक्षी एक…

देखिए कितने तरह के भ्रम टूट रहे हैं

देखिए कितने तरह के भ्रम टूट रहे हैं। @BJP4India को रुढिवादी पिछड़ी सोच की पार्टी के तौर पर स्थापित किया गया। राजीव गांधी के कम्प्यूटर का विरोध उस समय बीजेपी ने किया था, इसे सबसे पक्के आधार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा। बीजेपी समय के साथ चलती रही। मोदी उससे आगे निकल गए। नोटबंदी जैसा फैसला ले लिया। डिजिटल लागू करने के लिए ज़िद सी कर बैठे हैं। सबकुछ आधुनिक, प्रगतिशील कर रहे हैं। कांग्रेस कहती रही, मोदी हमारे किए को आगे बढ़ाकर श्रेय ले रहे हैं। इसी दौरान उत्तर प्रदेश के चुनाव में बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिल गया। फिर क्या था प्रगतिशीलों को प्रतिगामी होने का पक्का आधार मिल गया। मायावती ने शुरुआत की और अब प्रगतिशीलों की आख़िरी उम्मीद अरविन्द केजरीवाल कह रहे हैं कि नया कूड़े में डालो और पुराने को प्रणाम करो।#EVMकूड़े में डालो और बैलट पेपर पर मतदान कराओ। कांग्रेस भी अरविन्द जी के विचार से प्रभावित है। देखिए ना कितने तरह के भ्रम टूट रहे हैं।

नई वाली बीजेपी में यूपी के मुख्यमंत्री श्रीकांत शर्मा होंगे?

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राजनाथ सिंह ने अब साफ कह दिया है कि वो उत्तर प्रदेश लौटना नहीं चाहते हैं। राजनाथ सिंह ने शुरू से ही अपना ये रुख साफ कर रखा है। चुनाव के बीच में भी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के सवाल पर वो फीकी हंसी के साथ यही जवाब देते रहे कि सब मुझे ही मिलना चाहिए क्या? पार्टी में बहुत से योग्य लोग हैं। लेकिन, राजनाथ सिंह के नाम की चर्चा एक बार फिर से तब तेज हो गई जब, 14 मार्च को हेडलाइंस टुडे के सम्पादक राहुल कंवल ने एक ट्वीटकर बताया कि राजनाथ सिंह को यूपी का मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव मिला है और उन्होंने इस पर सोचने के लिए समय मांगा है। राहुल कंवल ने इसी ट्वीट में केशव मौर्या और मनोज सिन्हा को भी दावेदार बताया। नरेंद्र मोदी और अमित शाह वाली भारतीय जनता पार्टी में किसी भी तरह का कयास लगाना खुद को बेवकूफ साबित करने से ज्यादा कुछ भी नहीं है। इसलिए उत्तर प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री कौन होने जा रहा है, इसका अनुमान लगाने की बेवकूफी मैं नहीं कर सकता। लेकिन, एक विश्लेषण इस आधार पर करने की कोशिश कर रहा हूं कि जैसा खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह कह रहे हैं कि नए वाले भारत में नई वाली बीजेपी बन र…

पुरुषवादी सोच है किराए की कोख में अपना बच्चा

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करण जौहर ने एक बार फिर से वो साबित कर दिया, जिसकी आशंका मैं किराए की कोख पर जताता रहता हूं। किराए की कोख में मां का कोई मतलब ही नहीं है। बच्चा भले ही पुरुष के पौरुष का प्रतीक माना जाता है लेकिन, सच यही है कि बच्चा तो मां के ममत्व से तैयार होता है। और मां का ममत्व किसी भी बाप के पौरुष से बड़ा होता है। कम से कम पारम्परिक व्यवस्था में मां के ममत्व का ये स्थान बना हुआ है। लेकिन, किराए की कोख से अपना बच्चा पैदा करने की आधुनिक व्यवस्था ने तो पुरुष के पौरुष का अहम और बड़ा कर दिया है। करण जौहर विवाहित नहीं हैं। मुझे इससे कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन, उनका किसी स्त्री के साथ किसी तरह का रिश्ता नहीं है, आधुनिकता की आधुनिकतम परिभाषाओं के अनुसार भी। अब वो करण जौहर बाप बन गए हैं। करण जौहर किराए की कोख से जुड़वा बच्चों के पिता बन गए हैं। उसी अस्पताल में ये हुआ, जहां शाहरुख खान अपने तीसरे बच्चे के लिए किराए की कोख खोजने गए थे। अब सोचिए जिस बच्चे को किसी भी वजह से गौरी खान 9 महीने अपनी कोख में न रख सकी, उसकी चाहत शाहरुख और उनकी पत्नी गौरी को क्यों थी। हाल ही में केंद्र सरकार ने किराए की कोख पर नियंत्रण …

समाजवादी पार्टी के पुरबिया किले में दरार का जिम्मेदार कौन होगा ?

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गांधीनगर से बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी सांसद हैं। लेकिन, गांधीनगर क्या पूरे गुजरात में चुनावी हार-जीत का जिम्मा लम्बे समय से नरेंद्र मोदी के ही ऊपर है। अब नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने और अमित शाह के बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद गुजरात की हर जीत इस जोड़ी को ताकतवर करती है और हर हार के बाद लोगों के निशाने पर यही दोनों होते हैं। 2017 के पहले तक उत्तर प्रदेश में होने वाली हर जीत-हार की जिम्मा मुलायम सिंह यादव पर ही रहता है। हालांकि, मुलायम सिंह यादव ने बेटे से लड़ाई में कई बार ये बोला कि अखिलेश के मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष रहते समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में 5 सीटों पर सिमट गई। वो भी भला हो मुलायम सिंह का कि उन्होंने आजमगढ़ जाकर एक सीट बीजेपी के मुंह से अपने खाते में खींच ली। अब सवाल ये है कि 2014 में मुलायम सिंह यादव को जिताने वाला आजमगढ़ 2017 में कैसे वोट करने जा रहा है। 4 मार्च को छठवें चरण में आजमगढ़ में मतदान होना है। आजमगढ़ को लेकर अखिलेश यादव कितने दबाव में हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 28 फरवरी को 7 विधानसभा क्षेत्रों में अखिलेश या…