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Showing posts from April, 2015

भारत में नेतृत्व का फर्क दुनिया को दिखने लगा है

विदेश सचिव, गृह सचिव और रक्षा सचिव- इन तीनों की एक साथ प्रेस कांफ्रेंस किसी भी खास मौके पर होने का उदाहरण भारत में ध्यान में नहीं आता। लेकिन, ये तीनों महत्वपूर्ण सचिव लगातार मीडिया से एक साथ मुखातिब हो रहे हैं और नेपाल में भारत के राहत कार्यों का पूरा विवरण देते हैं। ये कोई छोटी घटना नहीं है। ये भारत सरकार के नेतृत्व का फर्क है जो, भारत के लोग तो देख ही रहे हैं। दुनिया भी महसूस कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से नेपाल की मदद करने में तेजी दिखाई है वो, अद्भुत है। और ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री सिर्फ नेपाल की ही मदद करने में लग रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भूकंप की शुरुआती खबर आते ही काम शुरू कर दिया। उन्होंने सबसे पहले बिहार और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों से तुरंत बात की और केंद्र की तरफ से मदद भेज दी। नेपाल के प्रधानमंत्री तक पहुंचे। हर मदद का भरोसा दिलाया और उस भरोसे को पूरा कर रहे हैं। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ये भी चाहते हैं कि दुनिया और देश के लोगों को ये पता चले कि इस भयानक आपदा में सरकार कैसे काम कर रही है। उसी का नतीजा है कि देश के तीनों महत्वपूर…

दस प्रतिशत की तरक्की का मजबूत होता आधार

दस प्रतिशत की तरक्की की सपना भारत फिर देख रहा है। सवाल ये है कि क्या भारत दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार के लिए जमीन तैयार कर पाया है। सवाल ये है कि क्या भारत के इस सपने को दुनिया सच मान रही है। उससे भी बड़ा सवाल ये कि क्या भारतीय कंपनियां नए उद्योग लगा रही हैं। क्या रोजगार के नए मौके बनते दिख रहे हैं। ये सारे सवाल इसीलिए खड़े हो रहे हैं कि इसके पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी यही सपना दिखाया था लेकिन, दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार के नजदीक पहुंचते-पहुंचते सरकारी नीतियों में भ्रम से ये सपना बुरी तरह टूट गया। और इस कदर टूटा कि यूपीए दो के शासनकाल के आखिरी दिनों में भारत पांच प्रतिशत के आसपास की तरक्की की रफ्तार पर आकर टिक गया। अब एक बार फिर से नई सरकार के वित्तमंत्री अरुण जेटली ने दस प्रतिशत की तरक्की की तरफ्तार हासिल करने की बात की है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के अनुमान साफ कर चुके हैं कि इसी वित्तीय वर्ष में भारत दुनिया का सबसे तेजी से तरक्की करने वाला देश बन जाएगा। ज्यादातर अनुमानों में भारत की तरक्की की रफ्तार इस वित्तीय वर्ष में साढ़े सात प्रतिशत या उससे ज्यादा…

लाइव टीवी ने कराई गजेंद्र की आत्महत्या

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राजस्थान के एक किसान की आत्महत्या ने भारतीय राजनीति की अब तक की सबसे बड़े गिरावट देश के सामने पेश की है। ये गिरावट सिर्फ चरित्रहीनता, बेईमानी, मौकापरस्ती तक सीमित नहीं है। राजस्थान के किसान गजेंद्र की आत्महत्या भारतीय लोकतंत्र में संवेदना के मर जाने का पुख्ता प्रमाण है। एक और बबात जो एकदम साफ है कि गजेंद्र न तो उस तरह से किसान था और न ही उस तरह से किसी तरह की ऐसी समस्या में था जिसकी वजह से उसे दौसा से दिल्ली आकर इस तरह से आत्महत्या करनी पड़ती। अगर गजेंद्र विपन्न किसान नहीं थे जिसे अपनी फसल बर्बाद होने के गम में आत्महत्या करनी पड़ जाए तो, गजेंद्र सिंह इस तरह से आम आदमी पार्टी की किसान रैली में क्यों आया और क्या सचमुच वो जंतर मंतर पर आत्महत्या करने ही आया था। इसका जवाब पक्के तौर पर ना में है। क्योंकि, न तो वो विपन्न किसान था और न ही वो आत्महत्या करने आया था। दरअसल जबर्दस्त राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाला गजेंद्र लाइव टेलीविजन के जरिए मिलने वाली प्रतिष्ठा और इस लाइव टेलीविजन को अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए इस्तेमाल करने में माहिर अरविंद केजरीवाल के खेल में फंस गया। गजेंद्र सिंह …

किसान विरोधी नरेंद्र मोदी!

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#KisaanVirodhiNarendramodi इस समय ट्विटर ट्रेंड पर सबसे ऊपर चल रहे हैं। भावनात्मक तौर पर ऐसे नारे बड़े अच्छे लगते हैं। लेकिन, ये नारे जिसके लिए लगते हैं, उसके साथ कैसा अन्याय करते हैं, ये देश के गरीबों, महिलाओं और किसानों की हालत देखकर जाना जा सकता है। ये ट्विटर ट्रेंड भी उस समय है जब कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी करीब दो महीने की छुट्टी बिताकर किसानों की चिंता करने लौटे हैं। किसान की फसल खराब हुई। एक दिन भी राहुल खेत तक नहीं पहुंच सके। किसान ही राहुल के लौटने पर जैसे उनके घर के बाहर इंतजार में बैठे थे। @narendramodi ने कृषि मंत्री सहित दूसरे कईमंत्रियों को खेतों तक भेजा, फसल की बर्बादी का सही अनुमान लगाने के लिए। मुआवजा बढ़ा, मुआवजे के लिए फसल आधी की बजाए 33% खराब होने को आधार बना दिया। सवाल ये है कि कौन है जो, किसान, गरीब को नारे से आगे नहीं निकलने देना चाहता। ये बड़ा सवाल इसलिए भी है कि 21वीं सदी में हर नारेबाज को 6-8 लेन की सड़क पर 100 के ऊपर रफ्तार में फर्राटा भरने वाली कार चाहिए। हर किसी को चमकता, वातानुकूलित घर, दफ्तर, स्कूल चाहिए। लेकिन, हर नारा लगाने वाला किसान को …

आज पूंजीवादी होते बाबा साहब!

महापुरुष होते हैं। बनाए जाते हैं। अद्भुत व्यक्तित्व के बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर दोनों थे। ये अलग बात है कि उनके हाथ में कानून की किताब संविधान विशेषज्ञ टाइप का और दलित हितों के रक्षक का ठप्पा, यही वाला उनके साथ सबसे मजबूती से जुड़ा रहा। लेकिन, डॉक्टर अम्बेडकर को समझना है तो, उन्हें समग्रता, संपूर्णता में समझना होगा। और यही उन्हें सबसे अच्छी श्रद्धांजलि होगी। अगर आज भी उनकी 22 प्रतिज्ञाओं को लेकर कोई हिंदू धर्म से उन्हें विरोध में खड़ा करने की कोशिश कर रहा है तो वो दरअसल बाबा साहब को समझ ही नहीं सका। कोई अगर आज भी उन्हें सिर्फ एक जाति के हितों का रक्षक बनाना-बताना चाह रहा है तो, उसकी नीयत में खोट है। बाबा साहब अद्भुत इस कदर थे कि आज हर कोई अपने तरीके से उनके जीवन के अलग-अलग समय के कर्तव्यों, वक्तव्यों में से अपने लिहाज से फिट बैठने वाली निकालकर उसी खांचे में बाबा साहब को फिट कर देना चाहता है। लेकिन, बाबा साहब आज होते तो आज के संदर्भ में उनकी सोच एकदम ही अलग होती। ये बात मैं इतने भरोसे से इसलिए कह रहा हूं कि उनके बचपन से लेकर जीवन के अलग-अलग पड़ाव पर उन्होंने ढेर सारे सिद्धांत प…

अच्छा लगता है!

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किसान कराहता ही अच्छा लगता है किसान कर्ज के तले दबा ही अच्छा लगता है किसान बर्बाद फसल दिखाता अच्छा लगता है किसान गंदा दिखता ही अच्छा लगता है किसान वोटबैंक बना अच्छा लगता है किसान गरीब ही अच्छा लगता है किसान फसल के भाव के लिए गिड़गिड़ाता ही अच्छा लगता है किसान मैला कुचैला ही अच्छा लगता है किसान चिंता करते बड़ा अच्छा लगता है किसान कर्ज माफी पर खुश होता अच्छा लगता है किसान भूखा रहे लेकिन, अन्नदाता कहलाना ही अच्छा लगता है किसान के मरने की खबर टीवी पर देखना अच्छा लगता है किसान अपनी छवि के नीचे दबा अच्छा लगता है किसान का खुद की पहचान भूल जाना ही अब अच्छा लगता है किसान याचक ही अच्छा लगता है किसान कराहता ही अच्छा लगता है।

भरोसा लौटने की राह पर भारतीय शेयर बाजार

भारतीय शेयर बाजार दुनिया के दूसरे बाजारों के मुकाबले बेहतर ही रहा है। जब भारतीय शेयर बाजार एक ही स्तर पर लगातार करीब तीन सालों तक बने रहे, तब भी सेंसेक्स और निफ्टी दुनिया के दूसरे बाजार सूचकांकों से बेहतर करते रहे। लेकिन, यूपीए दो में भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों का भरोसा बहुत बन नहीं सका। फिर वो विदेशी निवेशक हों या देसी निवेशक या फिर कहें रिटेल इनवेस्टर। विदेशी निवेशकों यानी एफआईआई को लुभाने के लिए यूपीए की सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में हरसंभव कोशिश की लेकिन, मामला बन नहीं सका। मल्टीब्रांड रिटल में एफडीआई को मंजूरी देने के सरकार के फैसले के बाद भी धरातल पर इसका असर नहीं दिखा। यहां तक वॉलमार्ट और दूसरे विदेशी मल्टीब्रांड रिटेलर की कोई बड़ी रिटेल दुकान भारत के किसी कोने में चमकती नहीं दिख सकी। इस सबका असर ये रहा कि भारतीय शेयर बाजार में विदेशी और देसी निवेशक प्रवेश करने से बचते रहे। उस पर दुनिया की रेटिंग एजेंसियों ने भी भारत और भारतीय शेयर बाजार की साख बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। तीन साल से स्थिर शेयर बाजार से विदेशी निवेशक भाग रहे थे। साथ ही 2008 में बुरी तरह से मार खाए दे…