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Showing posts from July, 2016

सब ध्वस्त कर अपनी शर्तों पर बनाई सत्ता का सुख चाहते हैं केजरीवाल

कई बार बेईमान दरोगा बेहद ईमानदारी से ही शुरुआत करता है। जिस इलाके में दरोगा की पोस्टिंग होती है, उस इलाके के सारे स्थापित गुंडों, बदमाशों, भ्रष्टाचारियों पर नकेल डाल देता है। फिर दरोगा धीरे-धीरे अपनी तय शर्तों पर गुंडे, बदमाश, भ्रष्टाचारी तैयार करता है। और इस प्रक्रिया में लंबे समय तक उस दरोगा के जलवे की चर्चा चहुं ओर हो रही होती है। आम आदमी पार्टी भी राजनीति में उसी दरोगा की तरह व्यवहार करती नजर आ रही है। संसदीय व्यवस्था और खासकर सांसद, विधायक के भ्रष्टाचार, काम न करने से ऊबी जनता को आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक पार्टियों में पुष्पित-पलल्वित हो रहे परिवारवाद, भ्रष्टाचार पर निशाना लगाना गजब का पसंद आया। अरविंद केजरीवाल ने चिल्लाकर इस तरह से हमला किया कि बरसों से राजनीति कर रही पार्टियों को चार कदम पीछे हटना पड़ गया। लंबे समय में राजनीति कर रही पार्टियों में ढेर सारी घर कर गई कमियों की वजह से पार्टियों को चार कदम पीछे हटना पड़ा। लेकिन, ये चार कदम पीछे हटना उनके लिए भारी पड़ गया। इसी दौरान अरविंद केजरीवाल ने बड़े सलीके से राजनीति के हर अच्छे-बुरे का प्रमाणपत्र दे…

देश की सबसे बड़ी सेवा के अधिकारी शाह फैजल के लिखे में देश, भारत कहां है?

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2009 के आईएएस टॉपर शाह फैजल के दर्द भरे लेख को पढ़ लेने वाले देश के अधिकांश लोगों के मन में ये अहसास गहरा सकता है कि दरअसल भारत सरकार ने कश्मीर के साथ संवाद का गलत तरीका अपनाया है। शाह फैजल ने अपने लेख में लगातार बताया है कि गलत तरीके से हो रहे संवाद से कश्मीर लगातार भारत से दूर होता जा रहा है। शाह का लेख दरअसल एक कश्मीरी की भावनाओं को सामने लाता है। लेकिन, ये भावनाओं से ज्यादा उस डर को ज्यादा सामने लाता है, जिसमें कश्मीर के आतंकवाद, अलगाववाद के खिलाफ बोलने से हर कश्मीरी की जिंदगी जाने का खतरा है। शाह फैजल अपने एक साल के बेटे के साथ अपनी कहानी जोड़कर भी बताते हैं कि कैसे कश्मीर घाटी में रहने वाला हर नौजवान परेशान है। हर कोई भारत के साथ खड़ा होने से डर रहा है। ये स्वीकारोक्ति कितनी खतरनाक है। इसका अंदाजा लगाइए कि ये बात शाह फैजल कह रहा है जो, भारत सरकार की सबसे बड़ी सेवा आईएएस का टॉपर है। और अभी जम्मू कश्मीर की सरकार में शिक्षा निदेशक के पद पर काम कर रहा है। इसका मतलब समझना बहुत जरूरी है। हालांकि, सारा मतलब सलीके से शाह फैजल का लिखा ही समझा देता है। शाह फैजल का सारा गुस्सा पता नहीं टेल…

दलित-स्त्री विमर्श का स्वर्णकाल!

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12 साल की है ये बच्ची। लेकिन, दलित नहीं है। किसी राजनीतिक दल के समर्थक भी इसके पीछे नहीं हैं। इसके पिता दयाशंकर सिंह भारतीय जनता पार्टी के उत्तर प्रदेश के उपाध्यक्ष थे। एक शर्मनाक बयान दिया। उस पर तय से ज्यादा प्रतिक्रिया हुई। संसद भी चल रही थी। मोदी के गुजरात में दलितों पर कुछ अत्याचार की घटनाएं आ रही थीं। मामला दलित विमर्श के लिए चकाचक टाइप का था। उस पर महिला विमर्श भी जुड़ा, तो चकाचक से भी आगे चमत्कारिक टाइप की विमर्श की जमीन तैयार हो गई। सारे महान बुद्धिजीवी मायावती की तुलना भर से आहत हैं। देश उबल रहा है। दलित-स्त्री विमर्श अपने स्वर्ण काल तक पहुंच गया है। इस दलित-स्त्री विमर्श के स्वर्णकाल में एक 12 साल की बच्ची को डॉक्टर के पास पहुंचा दिया। लखनऊ के हजरतगंज से लेकर देश भर से इस बच्ची को बसपा कार्यकर्ता पेश करने को कह रहे हैं। दयाशंकर की किसी भी राजनीति में इसका इकन्नी का भी योगदान नहीं है। इस बच्ची ने कभी किसी के खिलाफ कोई बयानबाजी नहीं की है। Mayawati मायावती के बाद बसपा में अब अकेले बचे बड़े नेता की अगुवाई में दयाशंकर की पत्नी और बेटी को बसपा कार्यकर्ता मांग रहे थे। दयाशंकर सिं…

हम दलितों-महिलाओं के सम्मान के लिए गंभीर हो रहे हैं

लीजिए उत्तर प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह को पद से हटा दिया गया। भारतीय जनता पार्टी इस कदर डरती है। दूसरी पार्टियों में ऐसी तुलना करने वाले को तरक्की मिल जाती है। लेकिन, छोड़िए इसे। सवाल ये है कि क्या दयाशंकर के बयान के मूल पर चर्चा होगी। दयाशंकर का बयान और पूरे उत्तर प्रदेश में हर किसी के संज्ञान में ये बात है कि टिकट का ज्यादा दाम मिला नहीं कि कम दाम वाले का टिकट बसपा से कटा नहीं। लेकिन, इस पर क्यों बात करना। इससे कोई लोकतंत्र मुश्किल में थोड़े ना है।

अच्छा मान लीजिए कि किसी ब्राह्मण, सवर्ण, पुरुष अध्यक्ष वाली पार्टी पर कोई पिछड़ों या दलितों वाली पार्टी का नेता ऐसे ही आरोप लगाता कि उस पार्टी में ऐसे टिकट बदल दिए जाते हैं कि वेश्याएं भी पीछे छूट जाएं, तो भी क्या ऐसे ही प्रतिक्रिया होती। क्योंकि, दलित या महिला होने के नाते तो कोई आरोप अभी भी नहीं लगा है। लेकिन, राजनीति में ऐसे सहूलियत हो जाती है और फिर खांचे में राजनीति में ज्यादा मुश्किल भी नहीं होती। बेवकूफ समर्थक उसी खांचे को आराध्य मान लेते हैं। भले ही मूर्तिपूजा छोड़ दें।

शाह फैजल, मुनव्वर राणा और मुसलमान

शाह फैजल Shah Faesal की ताजा चिट्ठी मुझे अवॉर्ड वापसी के समय#मुनव्वरराणाके टीवी पर सम्मान लौटाने की याद दिलाती है। हालांकि, मैं शाह और राणा की तुलना नहीं कर रहा हूं। क्योंकि, राणा अपनी जिंदगी में अपने हुनर से सब हासिल कर चुके हैं और शाह को अभी अपना हुनर बहुत दिखाना बाकी है। शाह की चिट्ठी का दर्द जायज है। लेकिन, इन दोनों को एक साथ रखना मुझे इसलिए जरूरी लगा कि मुसलमान पर कितना दबाव है#नरेंद्र_मोदीसरकार के खिलाफ कुछ तो करने का। जिन्होंने भी शाह और Burhan Wani#बुरहानकी तुलना की। क्या गलत किया? यही लिखा ना कि एक के पिता को आतंकवादियों ने मार डाला वो, आज भारत की सबसे ऊंची सेवा का अधिकारी है और दूसरा आतंकवादी। शाह का दर्द अपनी जगह लेकिन, मुसलमानों का, किसी भी मौके पर अपने चमकते चेहरे को दबाव में धकेलना, कहां तक जायज। मुनव्वर राणा ने अपने शुभचिंतकों को बताया कि मुल्ले पीछे पड़े हैं कि सम्मान वापस करो। खबरें बता रही हैं कि फैजल को अपना फोन बंद करना पड़ गया है। किनकी वजह से। सरकार की वजह से, हिंदुओं की वजह से या मुसलमानों की वजह से। इसकी जानकारी भी फैजल दे देते तो, काफी कुछ साफ हो जाता। कहीं इस…

इलाहाबादी प्रदेश अध्यक्ष की टीम से इलाहाबाद गायब

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उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष घोषित होने के तीन महीने से ज्यादा समय के बाद भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश पदाधिकारियों का एलान हो गया। तीन दिन में घोषित होने वाली टीम को बनने में तीन महीने लग गए। आठ अप्रैल को केशव प्रसाद मौर्या प्रदेश अध्यक्ष बने थे और 12 जुलाई को भाजपा की टीम घोषित हुई है। इलाहाबाद से प्रदेश अध्यक्ष चुनने के बाद जब इलाहाबाद में राष्ट्रीय कार्यसमिति हुई तो, संदेश साफ था। कांग्रेस की बुनियाद की जमीन को आधार बनाकर भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में अपना 14 साल का वनवास खत्म करना चाह रही है। लेकिन, प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या की नई टीम से दो बातें साफ हैं। पहली इसमें केशव के गृह जिले इलाहाबाद को और केशव के नजदीकियों को जगह नहीं मिल सकी है। पूरे इलाहाबाद मंडल से किसी को भी प्रदेश की टीम में जगह नहीं मिल सकी है। प्रदेश मंत्री बने अमरपाल मौर्य को छोड़ दें तो, ऐसा नाम खोजना मुश्किल है, जिस पर केशव की छाप हो। मजबूत नेता की केशव की छवि कमजोर पड़ रही है। दूसरी ये टीम भले कहने को प्रदेश अध्यक्ष की है। लेकिन, उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का मतल…

दबाव के ढक्कन के साथ जयंत सिन्हा भी हवा में उड़ गए

जयंत सिन्हा नरेंद्र मोदी की सरकार में प्रभावशाली नेता के तौर पर उभरने वालों में से थे। माना जाता था कि Narendra modi नरेंद्र मोदी की अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय छवि को दुरुस्त करने वाले मंत्रियों में जयंत सिन्हा हैं। जयंत सिन्हा विदेश में पढ़े हुए हैं। सिन्हा के पास आईआईटी दिल्ली से बीटेक की डिग्री है। जयंत ने हार्वर्ड से एमबीए किया है और पेनिसेल्विनिया विश्वविद्यालय से एनर्जी मैनेजमेंट और पॉलिसी की डिग्री ली है। मेकेंजी के साथ जयंत 12 साल काम कर चुके हैं। ये ऐसा प्रोफाइल है जो, पूरी तरह से किसी भी सरकार में वित्त या इससे जुड़े मंत्रालय के लिए पर्फेक्ट 10 जैसा होता है। इसीलिए जब जयंत सिन्हा को मोदी ने वित्त राज्यमंत्री बनाया और जब-जब इस बात की चर्चा हुई कि अरुण जेटली Arun Jaitley से वित्त लिया जा सकता है, तो जयंत सिन्हा एक स्वाभाविक दावेदार के तौर पर सामने आते रहे। लेकिन, ये तो जयंत सिन्हा के प्रोफाइल एक पैराग्राफ है। जयंत सिन्हा के बायोडाटा का असल यूएसपी Yashwant Sinha यशवंत सिन्हा का बेटा होना है। इसीलिए जब यशवंत सिन्हा ब्रेन डेड टाइप के बयान दे रहे थे, फिर भी जयंत सिन्हा की बुद्धि की मज…

आतंकवादियों की शवयात्रा निकलनी बंद हो

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‪#‎BurhanWani‬ भारतीय सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में बुरहान मुजफ्फर वानी की मौत के बाद निकले जनाजे में जमकर उत्पात हुआ। 15 से ज्यादा जानें जा चुकी हैं। हिंसक प्रदर्शन की वजह से अमरनाथ यात्रा रोकनी पड़ी है। हिंदुस्तान में हर साल करीब एकाध आतंकवादी ऐसा होता है, जिसकी शवयात्रा के दौरान हंगामा होता है। हिंदू-मुसलमान के बीच की कम होती खाई ऐसी घटनाओं के बाद बड़ी हो जाती है। वैसे भी इससे बड़ा कुतर्क कुछ नहीं हो सकता कि आतंकवादियों का मानवाधिकार होता है। जो मानव होने की न्यूनतम शर्त पूरी नहीं करते। वो मानवाधिकार की दुहाई देते हैं। घाटी में माहौल बेहतर करने की कोशिश में ये बड़ी रुकावट है। और ये कोई ऐसा नौजवान नहीं था। जिसके भटक जाने पर कोई संदेह हो। ये बाकायदा हिज्बल मुजाहिदीन के कमांडर के तौर पर काम कर रहा था। आतंकवादियों की भर्ती कर रहा था। जरूरी है कि हिंदुस्तान के सद्भाव के ताने बाने को बचाने के लिए किसी भी आतंकवादी का अंतिम संस्कार सार्वजनिक तौर पर होना बंद हो।

मोदी के नए मंत्री और चुनावी रणनीति

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आज के मंत्रिमंडल विस्तार से ये पूरी तरह साफ हो गया है कि भारतीय जनता पार्टी जिस तरह का जातिगत संतुलन कर रही है, उससे निपटना समाजवादी पार्टी और खासकर बहुजन समाज पार्टी के लिए आसान नहीं होगा। नरेंद्र मोदी और अमित शाह, सरकार और संगठन दोनों में ही इस तालमेल का विशेष ध्यान रख रहे हैं। इसीलिए 75 पार कर लेने के बाद भी कलराज मंत्रिमंडल में बने रहे। हालांकि, इसी बहाने नजमा भी बनी रही हैं। अनुप्रिया पटेल, कृष्णा राज और महेंद्र नाथ पांडेय का मंत्री बनना इसी संतलुन की कहानी बता रहा है। बीजेपी के बाहर के दो ही मंत्री हैं एक रामदास अठावले और दूसरी अनुप्रिया पटेल। अनुप्रिया को उनकी मां ही अपना दल की मानने को तैयार नहीं। मतलब वो भी भाजपा की ही समझिए अब। इसी संतुलन को आगे बढ़ता हुआ हम अमित शाह के संगठन विस्तार में देख सकेंगे। पूरी उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी को राष्ट्रीय टीम में शामिल किया जाएगा। 27 जून के CNBC AWAAZ पर अखिलेश यादव की छवि सुधारने की मशक्कत पर बात करते हुए मैंने कहा था कि भाजपा इस बार कई तरह की रणनीति पर एक साथ काम कर रही है। दरअसल भारतीय जनता पार्टी …

नजरिया सुधारिये सरकार, सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह, पेंशन बोझ नहीं है

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NDTV India पर #7thPayCommission पर मेरे विचार देख-सुन सकते हैं। सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट को सरकार ने मंजूर कर लिया है। मैं इस बात पर कतई बहस नहीं कर रहा कि वेतन कितना बढ़ा या और बढ़ना चाहिए था, क्या? मैं दूसरी बात कर रहा हूं या कहूं कि एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा हूं। वो बड़ा सवाल हर दस साल पर होने सरकारी कर्मचारियों की वेतन वृद्धि पर सरकार और मीडिया के नजरिये का है। करीब 70 साल के आजाद देश में 2016 में सातवां वेतन आयोग आया है। अब आप सोचिए जिस देश में निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारी हर साल मार्च के खत्म होते-होते अपनी तनख्वाह में बढ़त की उम्मीद लगा लेते हैं। वहीं सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह और सरकारी कर्मचारी रहे पेंशनधारियों को इसके लिए बाकायदा एक दशक तक का इंतजार करना पड़ता है। एक वेतन आयोग जैसी समिति इसके लिए बाकायदा सरकार बनाती है और जो अपनी रिपोर्ट देने में करीब-करीब 2 साल लगा देती है। फिर रिपोर्ट आती है, तो सरकार तुरंत अपने खजाने को ऐसे देखने लगती है, जैसे दान में कुछ देना हो। जबकि, सच्चाई यही है कि जैसे किसी कंपनी के आगे बढ़ने में उसमें काम करने वाले मानव संसाधन की मह…

साहेब महंगाई अर्थव्यवस्था की हर अच्छाई खाए जा रही है

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इस सरकार ने दाल की महंगाई रोकने के लिए जितना कुछ किया है। इतना इससे पहले किसी सरकार ने नहीं किया है। लेकिन, इसका दूसरा तथ्य ये भी है कि इस सरकार की सारी कोशिशों के बावजूद दाल जिस भाव पर जनता को खरीदनी पड़ रही है। उस भाव पर इतने लंबे समय तक किसी सरकार के समय में नहीं खरीदनी पड़ी। सरकार बार-बार ये बता रही है कि दाल की कीमतों पर काबू के लिए कितना कुछ किया जा रहा है। दाल का भंडार पहले डेढ़ लाख टन का किया गया। अब सरकारी दाल भंडार आठ लाख टन का किया जा रहा है। राज्यों को बार-बार इस बात की ताकीद की जा रही है कि एक सौ बीस रुपये किलो ऊपर के भाव पर दाल को न बिकने दें। हर कुछ दिनों में सरकार बताती है कि कितनी दाल आयात की जा रही है। लेकिन, इस सबके बावजूद दिल्ली की संसद के नजदीक के केंद्रीय भंडार तक में दाल एक सौ चालीस रुपये के नीचे बमुश्किल ही मिल पा रही है। इसी बीच टमाटर और आलू के भाव भी अचानक मंडी में मजबूती से सरकार की नाकामयाबी को बताने लगे। और सबसे बड़ी बात ये हुई कि देश के रिजर्व बैंक गवर्नर ने ये कहते हुए ब्याज दरें घटाने से इनकार कर दिया कि महंगाई दर फिर से बढ़ना शुरू हो गई है। हालांकि, रि…