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Showing posts from December, 2014

समाज की गंदी सोच का शिकार होती लड़कियां

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दिल्ली में एक डॉक्टर के ऊपर हुए एसिड हमले के बाद सरकार ने तेजी से ये दिखाने की कोशिश की है कि उसने अपना काम कर दिया है। सरकार ने इस जघन्यतम अपराध की श्रेणी में डाल दिया है। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि इस तरह के अपराध करने वालों को उम्र कैद या फिर फांसी की सजा हो सकती है। लेकिन, क्या इससे इस अपराध पर रोक लग सकेगी। फांसी की सजा या ज्यादा से ज्यादा सजा देकर अपराध रोकने का एक सिद्दांत है और वो काफी हद तक काम भी करता है। बलात्कार के मामले में भी इसीलिए बार-बार ये मांग उठती रही कि बलात्कार के अपराधियों को सीधे फांसी की सजा दी जाए। और किसी लड़की के चेहरे या फिर उसके शरीर पर तेजाब फेंककर उसे सजा देने की कोशिश भी काफी हद तक किसी लड़की के साथ बलात्कार करने जैसा ही है। बल्कि, कई मायने में तो किसी लड़की के शरीर या चेहरे पर तेजाब फेंकना, जान से मारने या बलात्कार करने से भी ज्यादा जघन्य है। क्योंकि, किसी लड़की के शरीर या चेहरे पर तेजाब फेंकने के अपराधियों के खिलाफ सरकारी या कानूनी तरीके से जितनी भी कड़ी से कड़ी सजा दी जाए वो, जायज ही है। सरकार ने अपनी तरफ से इसको लेकर समाज में गुस्से को कम करने

बंगाल में दक्षिणपंथ, दीदी और वामपंथ

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अमित शाह को अभी भी राष्ट्रीय मीडिया भारतीय जनता पार्टी के पुराने राष्ट्रीय अध्यक्षों की तरह सम्मान देने को तैयार नहीं है। दिल्ली में बैठे पत्रकार अभी भी ये मानने को तैयार ही नहीं हैं कि भारतीय जनता पार्टी को जो अप्रत्याशित सफलता देश के हर हिस्से में मिल रही है, उसमें मोदी लहर के अलावा अमित शाह की शानदार सांगठनिक क्षमता का भी कमाल है। अभी अगर ऐसी सफलता राजनाथ सिंह या किसी हिंदी पट्टी के नेता के नेतृत्व में बीजेपी को मिल रही होती तो यही हिंदी मीडिया उस अध्यक्ष को महानतम साबित कर देता। उसके पीछे सबसे बड़ी वजह ये है कि दिल्ली के पत्रकारों से या ये कह लें कि ज्यादातर पत्रकारों से अमित शाह कम ही मिलते-जुलते हैं। इस वजह से निजी तौर पर पत्रकारों के पास अमित शाह को समझने की दृष्टि कम ही बन पाती है। पत्रकार अमित शाह को गुजरात में नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद के तौर पर हर बुरे काम से जोड़कर याद करना ज्यादा पसंद करते हैं। उसके पीछे वजह ये कि आसानी से साबित किया जा सकता है। लेकिन, अगर अमित शाह को समझना है और अमित शाह की संगठन चलाने की क्षमता समझना है तो इसके लिए अमित शाह को सुनना होगा। फिर चाहे वो न