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Showing posts from February, 2015

मजबूत कर्म तो किस्मत मजेदार

नसीब बदनसीब की बड़ी चर्चा हुई दिल्ली विधानसभा के चुनाव में। वैसे तो ‘नसीबवाला’ कौन कितना है, ये समझना बड़ा मुश्किल है। लेकिन, कम से कम आज केंद्रीय सरकार के बजट के बाद मध्यम वर्ग तो खुद को बदनसीब ही महसूस कर रहा होगा। बदनसीबी इस बात की कि बजट महीने के अंत में क्यों आता है। फरवरी में ही क्यों आता है। फरवरी की बजाए दूसरा महीना होता तो शायद 2 दिन और मिलते तेल कंपनियों को कच्चे तेल की कीमतों की समीक्षा के लिए। लेकिन, 28 दिन की फरवरी, सुबह अरुण जेटली ने कम समझ में आने वाला बजट पेश किया तो, शाम को तेल कंपनियों ने रहा सहा मध्यवर्ग को समझा दिया। समझा दिया कि कोई छूट नहीं जेटली साहब कह रहे हैं कि मध्यवर्ग को अपने पैसे की चिंता खुद करनी है। इसलिए अपने ऊपर जरा सा भी बोझ न बढ़ाते हुए जल्दी से मध्यवर्ग पर तीन-तीन रुपये से ज्यादा पेट्रोल-डीजल महंगा कर दिया। अच्छा है अब चाहे डीजल गाड़ी हो या पेट्रोल- दोनों को समान तनाव मिल रहा है। अब भले ही ये पेट्रोल-डीजल महंगा कच्चे तेल के महंगे होने से हो रहा है। लेकिन, चूंकि दिल्ली चुनाव के समय खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोल गए हैं कि नसीब का बड़ा महत्व होता ह…

गवर्नमेंट विद द डिफ्रेंस

भारतीय जनता पार्टी के संदर्भ में पार्टी विद द डिफ्रेंस का नारा ही सबसे मजबूत पहचान हुआ करती थी। लेकिन, अब तो खुद भारतीय जनता पार्टी के नेता भी मुश्किल से ही इस नारे को इस्तेमाल करते देखे जा रहे हैं। क्या सचमुच भारतीय जनता पार्टी अब भारतीय राजनीति की पार्टी विद द डिफ्रेंस नहीं रह गई है। क्या भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस का ही थोड़ा भिन्न रूप हो गई है। मुझे लगता है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पहले की पूर्वाग्रही सोच अब और ज्यादा पूर्वाग्रही हो गई है। इसीलिए ऐसा लगने लगा है। इसीलिए नरेंद्र मोदी की सरकार के ढेर सारे सबसे अलग, बेहतर फैसलों के बावजूद बीजेपी को पार्टी विद द डिफ्रेंस मानने को तैयार नहीं है। और इसमें बड़ी बात ये भी है कि खुद बीजेपी के नेता, कार्यकर्ता इस नारे के साथ उतनी मजबूती से खड़े नहीं हो रहे हैं। और ये सब इसके बावजूद है कि ये सब मान रहे हैं कि काफी कुछ बदला है लेकिन, सिर्फ 9 महीने की हुई इस सरकार से लोग जाने क्या उम्मीद लगाए बैठे हैं जो पूरी होती नहीं दिख रही। किसी से भी बात करिए तो वो केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के एक भी गलत फैसले के बारे में मुश्किल से ही ब…

रेल बजट - गवर्नमेंट विद द डिफ्रेंस

रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने नई ट्रेन का एलान नहीं किया। मन में एक सवाल आ रहा है कि क्या इससे पहले कोई ऐसा रेल बजट था जिसमें किसी नई ट्रेन का एलान नहीं हुआ। ये छोटा सवाल नहीं है। जिस देश में एक हैंडपंप देने से लोगों की राजनीति चलती, बनती, बिगड़ती रही हो, वहां रेल बजट में एक भी नई ट्रेन न चलाने के एलान मतलब आसानी से समझा जा सकता है। मुझे तो रेलमंत्री ने पूरी तरह से खुश कर दिया है। राजनीतिक नहीं रेल बजट है ये। पहली बार रेल बजट पेश हुआ है वरना तो राजनीतिक वोट बजट पेश किया जाता था। वरना कितना बेहूदा बजट होता था। इलाके की ट्रेन का एलान और उस पर संसद मस्त। कब चलेगी, किस पटरी पर चलेगी, कुछ पता नहीं होता था। उस पर रेल मंत्री इस अंदाज में नई ट्रेन या रेलवे से जुड़ी नई परियोजनाओं का एलान करते, जैसे कोई राज प्रजा को देता है। धन्यवाद सुरेश प्रभु रेल बजट पेश करने के लिए। वरना तो राजनीतिक वोट बजट बनकर ही रह जाता था रेल बजट। एक बात और साफ हो जाए तो ठीक। अगले बजट में करिए कि कितना कमाकर कितना बचाया और उससे कितना कुछ बढ़ाया। जो चल रही हैं वो ट्रेनें समय से चलें, रफ्तार बढ़े, खाना अच्छा मिले, साफ सुथरा बि…

मौकापरस्त अन्ना हजारे और उनके शिष्य!

तेरह दिनों के रामलीला मैदान में हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की कवरेज करते-करते कब मैं अन्ना भक्त जैसा कुछ हो गया था। इसका मुझे अंदाजा ही नहीं लगा। और शायद मेरे जैसे हजारों लोग इसी भक्ति की अवस्था में पहुंच गए थे। ये स्वाभाविक था। अगर ये नहीं होता तो अस्वाभाविक होता। मनुष्य वृत्ति के खिलाफ होता। इसीलिए जब मैं अन्ना की भक्ति की अवस्था में पहुंचा तो मैं मानता हूं कि मुझमें मनुष्य वृत्ति ही है। देश से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए चल रहे उस आंदोलन की कमान अन्ना के हाथ में थी। लगता था जैसे एक बूढ़े में महात्मा गांधी का पुनर्जन्म जैसा कुछ हो गया है। अनशन की हालत में भी तिरंगा झंडा हाथ में थाम लेना। अनशन से शरीर भले ही कमजोर हो लेकिन, अन्ना का मानस हर क्षण मजबूत होता दिखता था। और वही ताकत थी कि अन्ना हजारे के पीछे देश का नौजवान टूटकर खड़ा था। टूटकर खड़ा था मतलब उस समय की व्यवस्था से पूरी तरह हताश, निराश लेकिन, अन्ना हजारे के प्रति पूरी निष्ठा से उनके पीछे खड़ा। हर कोई मैं हूं अन्ना चौबीस घंटे चौकन्ना, का नारा बुलंद कर रहा था। लोग अपना काम-धंधा छोड़कर, उसकी कमाई निस्वार्थ भाव से अन्ना हजारे के भ्…

ये मोदी सरकार की तारीफ का वक्त है

पेट्रोलियम मंत्रालय से जरूरी कागज, जानकारी लीक करने वाले पकड़े गए हैं। पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान @dpradhanbjp कह रहे हैं पहले की सरकार में ये सब खुलेआम होता था। हमने इंतजाम करके पकड़ा है। सलाह है कि संभलकर करें इस पेट्रोलियम मंत्रालय में दलालों का इतना जबर्दस्त कब्जा है कि कई मंत्री इसमें निपट चुके हैं। ये पूरी सरकार हिलाने की ताकत रखते हैं। इसलिए करिए संभलकर। और सही हो रहा है तो ये जमकर प्रचारित भी करें। कि आखिर इस सरकार के आने से क्या सही फर्क आ रहा है।

@dpradhanbjp इतना आसान नहीं है। पेट्रोलियम मंत्रालय के दस्तावेज चुराने के मामले में दिल्ली पुलिस ने RIL रिलायंस के एक कर्मचारी को गिरफ्तार किया है। आपके मंत्रालय का चपरासी और एक क्लर्क भी दिल्ली पुलिस की हिरासत में है। मामला संगीन है। पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान @dpradhanbjp न्यूज चैनलों पर मंत्रालय की जासूसी पर जिस तरह से बोल रहे हैं। वो बधाई के पात्र हैं। लेकिन, मुझे लगता है कि जिस तरह से इस सरकार ने पेट्रोलियम मंत्रालय में चल रहे गड़बड़झाले को पकड़ने के लिए बाकायदा पक्का प्रयास किया है, वो बिना प्रधानमंत्री @narendr…

काम पूरा हुआ अब निकल लो

पता नहीं पत्रकार इस सवाल का जवाब बार-बार क्यों खोजने में लग रहते हैं। इस बार फिर वो इसी सवाल का जवाब खोज रहे हैंकि हर बार की तरह इस सरकार को भी पत्रकार बेकार क्यों नजर आने लगे हैं। अब इसका जवाब अगले चार साल तक तो ठीक से मिलने से रहा। वैसे भी वो आम आदमी की सरकार है। और उनके प्रति पाँच साल के लिए जवाबदेह है। तो इसमें पत्रकारों की जवाबदेही कहां से साबित हो गई। वैसे ये लोकतंत्र के लिए बेहद सुखद स्थिति है कि हर पत्रकार को ध्यान में रहे कि पत्रकार सरकार का कभी नहीं हो सकता। बोलेंगे अंहकार नहीं आने देना है। इत्ते से मीडिया का काम चल जाना चाहिए। वैसे भी अरविंद को ढेर सारे पत्रकार परदे के पीछे से और ढेर सारे पूर्व पत्रकार पार्टी पदाधिकारी के तौर पर सलाह दे रहे हैं। तो मीडिया के बारे में वो अच्छे से जानते होंगे। इसीलिए सरकार बनने के बाद अरविंद सरकार को पत्रकार से बचा रहे है। और फिर सबसे बड़ी बात जब काम पूरा हो गया तो उठाओ, हटाओ अपनी कलम, कैमरा। काम पूरा होने के बाद मजदूरों को कोई सरकार बर्दाश्त करती है क्या? इत्ता आसान सा जवाब भी पत्रकार खोज नहीं पा रहे। कमाल है।

जय हो भारतीय लोकतंत्र

कई बार मैं सोचता था कि एक साथ देश के सारे चुनाव हों। और 5 साल तक चुनावी चकल्लस से मुक्ति रहे। देश अच्छे से चले। लेकिन, अब मुझे ये लगता है कि देश अच्छे से चलने के लिए जरूरी है कि अलग-अलग समय पर अलग-अलग चुनाव होते ही रहें। अब मेरी ये धारणा धीरे-धीरे मजबूत हुई है कि लोकतंत्र की असल खूबसूरती ही यही है कि जनता को सबको ठीक रखने का अवसर मिलता रहे। और एक समय में जीते चुनाव की समीक्षा के लिए या फिर जीत हार के आनंद या दुःख के लिए 6 महीने का भी समय नहीं मिले। देखिए न भाजपाई बौराने लगे तो दिल्ली में साफ हो गए। लेकिन, जब दिल्ली के बहाने पूरे देश के सड़े-गले, राजनीति में अस्तित्व खोजने वाले भी मोदी लहर की समाप्ति का एलान कर बैठे तो असम के स्थानीय निकायों में कमल जबरदस्त तरीके से खिल गया। यही लोकतंत्र है। और खूबसूरत है। पूरे कार्यकाल के बीच में प्रतिनिधि वापस बुलाने के कानून की जरूरत ही नहीं। वैसे ही जनता सबका बल-मनोबल तोड़ती-जोड़ती रहती है और रहेगी। राजनीति में साबित करने का दबाव निरंतर बना रहना चाहिए।

28 फरवरी बीजेपी की घर वापसी की तारीख!

भारतीय जनता पार्टी के लिए इससे तगड़ा झटका कुछ नहीं हो सकता। वो भी ऐसे समय में जब कुछ ही समय पहले अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को भारत बुलाकर और उन्हें अपना बचपन टाइप का दोस्त बताकर नरेंद्र मोदी ने सबको चकाचौंध कर दिया था। लग रहा था कि नरेंद्र मोदी ने जग जीत लिया है। लेकिन, ये क्या जगत छोड़िए, नरेंद्र मोदी और उनके सफलतम अध्यक्ष अमित शाह की अगुवाई वाली भाजपा दिल्ली ही हार गई। ये वो दिल्ली है, जिसे आप कितना भी नकारने की कोशिश करें। देश को समझ में यही दिल्ली आती है। ये दिल्ली चुनावी सर्वे के सैंपल साइज की तरह है। हालांकि, चुनावी सर्वे की ही तरह कई बार दिल्ली के चुनावी नतीजे भी गलत साबित होते हैं। लेकिन, सच्चाई ये भी है कि गलत साबित होने तक अबब इसी दिल्ली के चुवनावी नतीजे देश की दशा-दिशा बताएंगे। इस लिहाज से तो भारतीय जनता पार्टी की दशा-दिशा बेहतर खराब हो गई। लेकिन, क्या ऐसा सचमुच है। मेरी नजर में ऐसा बिल्कुल नहीं है। भारतीय जनता पार्टी की इतनी करारी हार की ढेर सारी समीक्षाएं हो रही हैं, होती रहेंगी। लेकिन, मैं समीक्षा नहीं करूंगा। मैं वो बात करने जा रहा हूं जो, देश के तौर पर भारत के ल…

ये नया वीआईपी कल्चर होगा

हालांकि ये संभव नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समय दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दें। दे देंगे तो उससे मुझे कोई एतराज भी नहीं है। लेकिन, दिल्ली पुलिस तो देश की ही होनी चाहिए। दिल्ली के होने वाले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कैसे सोचते हैं मुझे नहीं पता लेकिन, यही दिल्ली पुलिस जिसकी वजह से नोएडा से मयूर विहार पहुंचते ही सीट बेल्ट लग जाती है। डी पी यादव जैसों की गुंडई खत्म हो जाती है। मीडिया बताकर हम पत्रकार भी यातायात नियम नहीं तोड़ सकते। गलत हो गया तो विधायक, सांसद सब दिल्ली पुलिस से बचते हैं। इसे आम आदमी पार्टी के विधायकों की कृपा पर नहीं छोड़ा जा सकता। ये नया VIP कल्चर होगा। और अरविंद इसी वीआईपी संस्कृति के खिलाफ तो लड़ते रहे हैं। दिल्ली पुलिस की जेड प्लस सिक्योरिटी नहीं चाहिए लेकिन, पूरी दिल्ली पुलिस की कमान अपने हाथ में चाहिए। ये किस तरह से वीआईपी कल्चर खत्म कर रहे हैं अरविंद केजरीवाल। कृपा करके इसे दूसरे राज्यों की तर्ज पर बताकर तर्क मत देने लगिएगा। #DelhiDecides 7 RCR

10% की नई राजनीति

दस प्रतिशत यही वो आंकड़ा होता है जिसके आधार पर तय होता है कि किसी संसदीय व्यवस्था में औपचारिक तौर पर विपक्षी पार्टी होगी या नहीं। और ये अद्भुत संयोग बना है कि चुनावी राजनीति की सर्वोच्च संसद और देश की राजधानी दिल्ली की विधानसभा में जनता ने विपक्ष को चुनने से ही इनकार कर दिया है। कहने को लोकसभा में भी विपक्षी पार्टियां हैं जो किसी भी मामले पर हल्ला-हंगामा कर सकती हैं। लेकिन, दस प्रतिशत भी सीटें कांग्रेस को न मिल पाने की वजह से 2014 के चुनावों में लोकसभा विपक्ष विहीन हो गई है। और दिल्ली विधानसभा के ताजा चुनाव में तो जनता और आगे निकल गई। उसने लोकसभा चुनाव बंपर तरीके से जीतने वाली भाजपा को पांच प्रतिशत सीटें भभी देने से इनकार कर दिया। अराजक कही जाने वाली आम आदमी पार्टी को इतनी सीटें दे दी हैं कि अब कोई अराजकता भी करेगा तो दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी के विधायकों की हंसी में ही दबब जाएगा। वैसे तो ये अन्ना आंदोलन से जन्मी पार्टी है। सभी परंपरागत पार्टियों को गालियां देकर खड़ी हुई पार्टी है। इसलिए विश्लेषक चाहें तो इसे भारतीय राजनीति में चमत्कार की शुरुआत कह सकते हैं। लेकिन, सच्चाई ये …

लोकतंत्र की जीत के लिए!

लोकतंत्र में हार जीत होती रहती है। इसलिए दिल्ली कौन जीतेगा का जवाब है- कोई भी जीत सकता है। ये भी ठीक है कि सत्ता का नशा ऐसा होता है कि उसमें अहंकार बढ़ना पक्का है। ये भी ठीक है कि अहंकार बढ़ने से तानाशाही आ जाती है। इसलिए भाजपा का दिल्ली में चुनाव जीतना ठीक नहीं है। इसलिए लोकतंत्र बचाने के लिए जरूरी है कि अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी जीत जाए। अरविंद के जीत जाने से लोकतंत्र बच जाएगा। ऐसा बताने वाले बुद्धिजीवियों की बहुतायत है। मैं भी इस विचार से प्रभावित होता हूं। लेकिन, इसी विचार को जब मैं आगे ले जाता हूं तो मैं ठिठक जाता हूं। तब मुझे समझ आता है कि देश में बिना वजह की राजनीति चमकाने वाली ताकतें शायद इसी इंतजार में हैं। ये वही ताकतें हैं जिनके चलते न देश सुधारवादी हो पाया, न समाजवादी। न सीधे गरीबों के साथ खड़ा होकर उनका पेट भर पाया और न ही अमीरों के साथ खड़ा होकर उनकी फैक्ट्री, कारोबार को आगे बढ़ा पाया। जिससे अमीरों के जरिए ही गरीबों का पेट भर पाता। लालू, मुलायम, मायावती और देश की तमाम क्षेत्रीय पार्टियां इंतजार ही सिर्फ इस बात का कर रही हैं कि किसी भी तरह अरविंद केजरीवाल दिल्ली म…