Posts

Showing posts from June, 2010

राष्ट्रीय पार्टी के पिछलग्गू नेता

लग रहा है कि किसी तरह जनता दल यूनाइटेड कम से कम साथ चुनाव लड़ने पर तो राजी हो गई है। अब दबी-छिपी शर्तें जो भी हों लेकिन, शायद नीतीश को भी ये लगा कि बीजेपी से टूटे तो, लालू-पासवान और कांग्रेस उनके चमकदार मुख्यमंत्री के कार्यकाल को जाने कहां इतिहास में ले जाकर पटक देंगे। लेकिन, नीतीश कुमार ने नवीन पटनायक बनने की हर संभावना तलाशने की कोशिश की थी। ये भले ही अभी हुआ नहीं लेकिन, बार-बार उभरने वाला एक सवाल जरूर फिर से खड़ा हो गया है कि क्या बीजेपी भले ही कांग्रेस के अलावा दूसरी अकेली राष्ट्रीय पार्टी होने का दावा करती हो लेकिन, उसका व्यवहार राष्ट्रीय पार्टी होने के उसके दावे को बल नहीं देता। क्या वजह है कि अकसर वो, अपने क्षेत्रीय सहयोगियों से मात खा जाती है।

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी बार-बार ये चिल्लाकर कहने की कोशिश कर रहे हैं कि बिहार के चुनाव में भाजपा का कौन नेता प्रचार के लिए जाएगा कौन नहीं ये भाजपा तय करेगी ये तय करने का हक सहयोगी पार्टियों को नहीं है। लेकिन, जब उनसे ये पूछा जाता है कि क्या नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी बिहार विधानसभा चुनाव में प्रचार के लिए जाएंगे तो, उनकी …

तलाक ले लो, तलाक

सरकार का मानना है कि देश में तलाक न मिलने से लोगों की जिंदगी दूभर हो गई है इसलिए वो, हिंदू विवाह कानून में बदलाव करके विवाह विच्छेद यानी पति-पत्नी के बंधन को तोड़ने के 9 आधारों में दसवां आधार शामिल करने जा रही है जिससे लोगों को आसानी से तलाक मिल सके।
भारत में अभी 1.9 प्रतिशत लोग ही हैं जो, शादी करने के बाद उसे तोड़ने का साहस जुटा पाते हैं। अब हमारी सरकार ज्यादा से ज्यादा लोगों में ये साहस भरना चाहती है और इसीलिए शादी तोड़ने के कानून में पश्चिमी देशों की नकल करके बदलाव करना चाहती है। अब अगर वहां की बात करें तो, हम तलाक के मामले में काफी पिछड़े दिखते हैं। जैसे शादी करने वाले 100 अमेरिकियों में से 55 तलाक लेते हैं और शायद फिर शादी करते हैं या बिना शादी किए ही कई शादियों का मजा लेते हैं। शादी तोड़ने का जो दसवां आधार प्रस्तावित है वो, है इनएविटेबल ब्रेकअप- यानी पति-पत्नी अब एक साथ नहीं रह सकते इस आधार पर उन्हें तलाक मिल जाएगा। इसमें ये साबित करने की जरूरत शायद थोड़ी कम रह जाएगी कि आखिर क्यों साथ नहीं रह सकते।

ये जो नया प्रस्ताव है इसे महिलाओं के पक्ष का बताने की कोशिश हो रही है ये कहकर क…

जाति बताइए, जताइए नहीं

भारतीय समाज में कुछ मिथक ऐसे स्थापित हो जाते हैं कि आगे चलकर वो तथ्यों की तरह इस्तेमाल होते हैं। जैसे- कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष पार्टी है, भारतीय जनता पार्टी सांप्रदायिक है और वामपंथ समाजवादियों से भी ज्यादा समाजवादी है। जैसे- मायावती दलितों के हितों की सबसे बड़ी चिंतक हैं। ऐसे ही अब एक नया तथ्य लगभग स्थापित होता जा रहा है। वो, जुड़ा है जनगणना से। जनगणना में अलग-अलग जातियों की संख्या जानने का कोई कॉलम नहीं है और लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव कह रहे हैं कि पिछड़ों की जाति गणना अलग से होनी ही चाहिए जिससे ये साबित हो सके कि पिछड़ों को मिल रहा 27 प्रतिशत आरक्षण उनकी जनसंख्या के लिहाज से काफी कम है। बस इसके बाद तो, उसी सुर में ये भी आवाज तेज होने लगी कि देश के 90 प्रतिशत संसाधनों पर सिर्फ 10 प्रतिशत लोगों (सवर्ण जातियों) का कब्जा है और ये सवर्ण ही हैं जो, नहीं चाहते कि किसी भी तरह से जातियों की असल संख्या सामने आए। क्योंकि, इससे उनके प्रभुत्व पर खतरा दिखता है।

अब सवाल ये है कि जाति गणना को जरूरी बताने वाले लोग कौन हैं। क्या ये लोग सचमुच जाति गणना इसलिए चाहते हैं कि दबी-कुचली या फिर आर…

इस बार बीती मत बिसारिये

देश के बड़े इलाके में बारिश की फुहारें लोगों को ठंडक देना शुरू कर चुकी हैं। महाराष्ट्र और दूसरे कुछ इलाकों में तो, लगातार हुई बारिश ने बाढ़ से माहौल बना दिए हैं। जून के आखिर तक आग के शोले सी गिरती गर्मी शायद ही किसी को इस समय याद करने का मन हो रहा होगा। लेकिन, यही समय है जब निश्चित तौर पर बीती गर्मी की सुध अच्छे से करनी चाहिए। भले ही गर्मी बीत गई हो लेकिन, बारिश की फुहारों के बीच भी जब सेब और लीची खरीदने जाएंगे तो, उसके दामों पर गर्मी का असर साफ-साफ दिखाई देगा। और, अगर इस बारिश और सर्दी में अगली गर्मी का पुख्ता इंतजाम हम सबने न शुरू किया तो, अगली गर्मी में ये लीची-सेब वैसे ही सिकुड़े मिलेंगे जैसे गर्मियों में आग के शोले के बीच हम-आप सिकुड़ते घूम रहे थे।
ये पर्यावरण दिवस पर मैं कोई रस्मी चिंता वाला लेख नहीं लिख रहा हूं। तापमान जिस तरह से 50 डिग्री सेल्सियम की तरफ बढ़ रहा है उसमें रस्म अदायगी भर से अब काम नहीं चलने वाला। बढ़ते उपभोक्तावाद के दौर में जिस तरह से हर कोई अपनी तरक्की और अपनी तरक्की यानी जेब में ढेर सारे पैसे के बूते सारी सहूलियतें खरीद लेने का सपना देख रहा है वो, खतरनाक है।…

राजीव पर उंगली उठाते क्यों नहीं बनता

Image
21 मई 1991 को राजीव गांधी की मौत हुई लेकिन, उसकी खबर देश भर में 22 मई की सुबह पहुंची। मुझे याद है कि इलाहाबाद में मेरे पढ़ाई के दिन थे। जब सोकर उठा तो, पता चला कि रात में जबरदस्त तूफान आया था। बारिश-तूफान की वजह से पानी-बिजली का संकट बन गया था। घर में शायद मेरी माताजी को जब पता चला कि राजीव गांधी की हत्या हो गई है तो, राजनीति से बिल्कुल अनजान होने के बावजूद उन्हें जैसे झटका सा लग गया। उन्होंने कहाकि एतना बड़ा-भला मनई मरा इही से आंधी-तूफान आएस।
राजीव गांधी तो, हमारे कॉलेज से विश्वविद्यालय पहुंचते तक ही दुनिया से चले गए। लेकिन, जाने-अनजाने पता नहीं कैसे राजीव गांधी का वो, मुस्कुराता, निर्दोष चेहरा ऐसे हमारे जेहन में समा गया कि कांग्रेस की ढेर सारी हरकतें बुरी लगने के बावजूद हमेशा लगता रहा कि राजीव होते तो, देश की राजनीति का चेहरा बेहतर होता। स्वच्छ राजनीति होती। लेकिन, क्या ये मेरे दिमाग में बसी भ्रांति भऱ है या सचमुच कुछ बदलाव होता।
ज्यादा ध्यान से देखने पर और पत्रकारीय कर्म करते 12 साल हुई नजर से देखता हूं तो, साफ दिखता है कि ये मेरे दिमाग की भ्रांति भर ही है। राजीव गांधी के सिर पर इस …

उत्तर प्रदेश में पावर फुल NDA

चौंकिए मत उत्तर प्रदेश में बहन मायावती की बहुजन समाज पार्टी भले ही सत्ता में है लेकिन, यहां चलती NDA की है। कम से कम सरकारी अधिकारियों के लिए तो सुकून का यही रामबाण है। दरअसल ज्यादा कमाई वाले विभागों में पोस्टिंग के लिए पैसे देना तो अभ पुरानी बात हो गई है। नई-- वैसे इसको भी लागू हुए काफी टाइम हो गया है—बात ये है कि अगर किसी अच्छी जगह (मलाईदार-कमाई वाली) टिके रहना है तो, NDA देना ही होगा।
NDA यानी नॉन डिस्टर्बेंस अलाउंस। मायावती सरकार में इस समय पैसे लेने-देने के मामले में गजब की पारदर्शिता है। नौकरी चाहिए रेट तय हैं। नौकरी में बने रहना है रेट तय हैं। और, अब तो, हाल ये है कि किसी पोस्ट पर जरा थमकर रहना है तो, उसका पैसा अलग से देना होता है। एक मित्र से बात हो रही थी तो, उसने बताया कि सिंचाई विभाग बाढ़ प्रखंड में एक इंजीनियर साहब 50 लाख रुपए देकर पहुंचे और दो महीने बाद ही फिर से उन्हें वहां पर टिके रहने के लिए NDA यानी नॉन डिस्टर्बेंस अलाउंस देना पड़ा। अब ये रकम कम-ज्यादा हो सकती है। लेकिन, चल ऐसा ही रहा है।
हमारे एक रिश्तेदार जो, पंचायत विभाग में हैं, NDA यानी नॉन डिस्टर्बेंस अलाउंस न दे…

बंधक है लोकतंत्र

अमेरिकी सरकार के उप सचिव ने लगभग डांटने के अंदाज में उम्मीद जताई है कि भारत सरकार भोपाल गैस त्रासदी पर सीजेएम कोर्ट के फैसले के आधार पर फिर से ये केस नहीं खोलेगी। मेरा ये बहुत साफ भरोसा है कि भारतीय संविधान बड़ा बदलाव मांगता है जो, भारतीय लोकतंत्र को सही मायने में मजबूत कर सके। क्योंकि, आज संविधान में ऐसे प्रावधान ही नहीं हैं जो, असाधारण परिस्थितियों से निपटने की ताकत देते हों। भारत में सीबीआई और दूसरे जांच आयोगों को ऐसी ताकत क्यों नहीं मिल पा रही कि वो, राजनीतिक दबाव को दरकिनार करके जनता के हित में सही फैसले ले सकें।
भोपाल गैस त्रासदी मामले में तब सीबीआई के ज्वाइंट डायरेक्टर रहे बीआर लाल ने आज बड़ा खुलासा किया कि उन्हें इस मामले में सरकार की तरफ से निर्देश दिए गए थे कि वॉरेन एंडरसन के प्रत्यर्पण की कोशिश न की जाए। विदेश मंत्रालय की तरफ से आई चिट्ठी में ये बात साफ-साफ कही गई थी। अब बीआर लाल साहब रिटायरमेंट के बाद ये बात कहने का साहस जुटा पा रहे हैं इतने के लिए भी उनको बधाई देनी चाहिए।
बीआर लाल ने वो खुलासे किए हैं जो, अब तक आरोप के तौर पर सरकारों पर लगते थे कि सीबीआई का इस्तेमाल सिर्फ …

संविधान बदले बिना बात नहीं बनेगी

Image
हजारों बेगुनाहों को मौत की नींद सुला देने वाले मामले पर आखिरकार 25 साल बाद भोपाल की सीजेएम कोर्ट ने फैसला सुना ही दिया। पंद्रह हजार से ज्यादा लोग भोपाल की यूनियन कार्बाइड से निकली जहरीली गैस से मारे गए। जबकि, अभी भी कम से कम से कम छे लाख लोग ऐसे हैं जिनके भीतर यूनियन कार्बाइड से निकली जहरीली गैस अभी भी समाई है। और, इसके बुरे असर से सांस की बीमारी से लेकर कैंसर तक की बीमारी के शिकार ये लोग हो रहे हैं। लेकिन, 1 दिसंबर 1984 की रात हुए दुनिया के इस सबसे बड़े औद्योगिक हादसे की सुनवाई के बाद जब फैसला आया तो, इसमें धारा 304 A लगाई गई यानी ऐसी धारा जिसमें अधिकतम दो साल तक की सजा हो सकती है।
और तो और दोषी पाए सभी लोगों को निजी मुचलके पर जमानत पर भी छोड़ दिया गया। ये असाधारण मसला था लेकिन, इसकी पूरी जांच और सुनवाई भारतीय संविधान के उन कमजोर कड़ियों का इस्तेमाल करके की गई कि ये एक साधारण लापरवाही भर का मामला बनकर रह गया। और, कमाल तो ये है कि उस समय यूनियन कार्बाइड के सीईओ रहे वॉरेन एंडरसन को आज भी दोषी नहीं बताया गया। जबकि, वो इसी मामले में करीब दो दशक से भारत में भगोड़ा घोषित है। इसलिए जरूरी ये …