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Showing posts from 2012

वो जीना चाहती थी और मैं भी चाहता हूं कि वो जिंदा रहे

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यहां उस लड़की की उसल तस्वीर लगाना चाहता हूं अब धीरे-धीरे उस लड़की की कहानियां दबे-छिपे लोगों के सामने आ रही है। दरअसल ये एक ऐसी कहानी है जिसे हर कोई जानना चाहता है। सुनना चाहता है। उस दर्द से दोबारा कोई न गुजरे ऐसा इस देश में ही नहीं दुनिया चाहने वाले लगभद पूरे ही हैं। वो, लड़की एक ऐसी कहानी बन गई है जिसक चर्चा, बातचीत हर कोई कर रहा है लेकिन, सच्चाई ये है कि बातचीत हम उसकी तो, कर रहे हैं। उसे जिंदा रखने की कसमें खा रहे हैं। उसके मरने से पूरे समाज के जिंदा होने की आशा भी जगा चुके हैं। मैं ये दरअसल इसलिए कर रहा हूं कि उसकी असल पहचान किसी को नहीं पता। अजीब टाइप के प्रतीकों के जरिए उसकी पहचान बनी हुई है। कोई उसे दामिनी कह रहा है तो, कोई निर्भय, वेदना या जाने क्या-क्या। अब सवाल यही है कि जिसके नाम पर सारा देश जग गया है। उसको हम मारने पर तुले हुए हैं। हम पता नहीं किस वजह से उसकी पहचान खत्म करने पर तुले हुए हैं। टीवी संपादकों की संस्था ब्रॉकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन ( BEA) ने सहमति बनाई कि हम उस सामूहिक दुष्कर्म की शिकार लड़की की निजी स्वतंत्रता को बचाए रखेंगे। और, इसके लिए उन्होंने

इस सरकार का फर्मा ही बिगड़ा हुआ है!

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बैरिकेड के पीछे छिपी सरकार, राजपथ से इंडिया गेट तक खड़ी जनता से मुंह छिपाती सरकार सवाल - दिक्कत कहां हैं? अगर सरकार के मुखिया से लेकर हर कोई एक ही बात कह रहा है कि बलात्कार/दुष्कर्म की शिकार लड़की के साथ न्याय होगा। प्रधानमंत्री के भी तीन बेटियां हैं। गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के भी तीन बेटियां हैं। वो, भी चिंतित हैं। फिर क्यों राजपथ से लेकर जनपथ तक जनता बवाल कर रही है। पगलाई भीड़ क्यों असामाजिक तत्वों को सरकार की छवि खराब करने का मौका दे रही है। क्यों, इस जनता को देश के राहुल बाबा की ये बात समझ में नहीं आ रही कि आखिर कोई कानून काम करे इसके लिए समय चाहिए होता है। ऐसे थोड़े  न होता है कि सत्ता के प्रतिष्ठानों को घेरकर भीड़ कोई कानून बनवा ले या कोई बना बनाया कानून लागू करना ले। सवाल वही कि दिक्कत कहां हैं? जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी राष्ट्र के नाम संबोधन कर दिया। सबको तो पता है देश ही नहीं दुनिया को भी। आखिर कहां अपने प्रधानमंत्री बोलते या बोल पाते हैं। मतलब उन्होंने इसे इतना महत्वपूर्ण तो समझा ना कि इस पर राष्ट्र के नाम संबोधन किया। अब और क्या करें? वो, भी तब जब पुराने ज

क्रांति ऐसे ही होती है!

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बड़े समय से ये बात कही जाने लगी थी कि उदारवाद/ग्लोबल विलेज की नीति के जमाने में भारत में पैदा हुए वर्ग की जवानी, मस्ती, मैकडोनल्ड, पिज्जा और डर्टी पिक्चर में ही बीतने वाली है। लेकिन, शायद ऐसा कहने वाले लोग ये भूले थे कि ऐसा होता नहीं है। हर आने वाली पीढ़ी पहले वाली से ज्यादा संवेदनशील, तेज और तरक्की पसंद होती है। हां, हो सकता है कि वो, बेवजह हर समय चौराहे पर नारे लगाते न दिखे। लेकिन, जब जरूरत पड़ेगी तो, निश्चित तौर पर वो, सड़क से संसद तक होगी और ज्यादा आक्रामक होगी। ये बात सरकारें भूल जाती हैं। या यूं कहें कि सत्ता में रहते-रहते उन्हें याद ही नहीं रहता कि सत्ता में आने का रास्ता क्या होता है। जनता क्यों सत्ता देकर मालिक बना देती है। वो, इसलिए तो, बिल्कुल नहीं कि दुष्कर्म के खिलाफ देश जब गुस्से में खड़ा हो तो, उस पर सरकार पानी की बौछार फेंके, आंसू गैस के गोले फेंके और लाठियां बरसाकर सर तोड़ दे। जिस तरह से आज इंडिया गेट से रायसीना हिल्स तक गुस्से में नौजवान दिख रहा है। वो, भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के आंदोलन के समय होने वाली आपसी चर्चा को बल देती दिख रही हैं। बात होने लगी है कि क्

फांसी!

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ये मांग पहले भी उठी थी। लेकिन, दिक्कत तो ये है कि अतिमानवतावादी लोग तो, अब मृत्युदंड की सजा के ही खिलाफ दुनिया में मोर्चा मजबूत कर पा रहे हैं। ऐसे में ये मांग कितनी सफल हो पाएगी, पता नहीं लेकिन, इतना तो, तय है कि दिल्ली में जिस तरह से एक लड़के के साथ रहते कुछ कुकर्मियों ने उस लड़की के साथ दुष्कर्म किया उसके बाद निजी तौर पर मुझे लगता है कि सरकार को और न्यायपालिका को इस बारे में कुछ सोचना चाहिए कि इसकी सजा क्या मौत की सजा से कम हो सकती है। न्यायपालिका भी इसलिए जोड़ रहा हूं कि सरकार कैसे सोचती/करती है। वो, तो इसी से साफ हो जाता है कि दिल्ली में हुए दुष्कर्म के मुद्दे को बीजेपी ने सदन में उठाया तो, कांग्रेसी मंत्री राजीव शुक्ला की हंसी के साथ जवाब देने की कोशिश करते जो, तस्वीरें दिखीं उसने फिर ऐसा अहसास कराया कि हमारी सरकार तो, हर समय हमारे साथ दुष्कर्म कर रही है। और, ऐसा किया ये बताने पर हंस रही है। इसी साल जुलाई में कुछ इसी किस्म की गुवाहाटी की घटना पता नहीं कितने लोगों को याद है। बड़ा हंगामा हुआ था। लेकिन, क्या सरकार की हनक वो बन रही है कि ऐसी घटनाएं न हों। मुंबई में 2007 की आखिर

12 साल में कितना बदल गया हिंदू!

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विश्व हिंदू परिषद याद है ना। अरे, वही इलाहाबाद वाले अशोक सिंघल जी जिसके अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे। अपना घर भी एक शोध संस्थान को दे दिया है। गजब के समर्पित व्यक्ति हैं। सिंघल  साहब के बाद गुजरात के एक डॉक्टर प्रणीण तोगड़िया उसकी कमान संभाल रहे थे। जरूरत से ज्यादा उग्रता लिए तोगड़िया साहब की अगुवाई में विहिप सबसे पहले तो, गुजरात से ही गायब हो गया। कहा जाता है कि गुजरात में हुए दंगों में मोदी सरकार से ज्यादा भूमिका विश्व हिंदू परिषद की थी। खैर, ये नरेंद्र मोदी का कमाल था। मोदी ने सिर्फ विपक्षी राजनीतिक दलों को ही नहीं। अपने विचार से जुड़े संगठनों को भी सत्ता के रास्ते में रोड़ा बनने पर उखाड़ना शुरू कर दिया। लेकिन, ये अचानक मैं क्यों याद कर रहा हूं। दरअसल एक समय में राम मंदिर आंदोलन या देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीतिक हावी हुई तो, विहिप, बजरंग दल में काम करने वाले बीजेपी से भी ज्यादा उसकी राजनीति में प्रभावी दिखने लगे। कई भगवाधारी बाबा विहिप के प्रभाव से लोकसभा, विधानसभा का टिकट पाकर वहां भी धर्म ध्वजा फहराने लगे। महाकुंभ 2013 का प्रतीक चिन्ह दरअसल ये अचानक मुझे य

रिश्वत लेने-देने में बुराई क्या है?

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कौशिक बसु किसी को याद हैं क्या? अरे वही वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार जो, अब विश्व बैंक में यही काम कर रहे हैं। उन्होंने एक प्रस्ताव दिया था कि रिश्वत देने को कानूनी कर दिया जाए। उस समय उनके प्रस्ताव का बड़ा मजाक बना था। लेकिन, अब लग रहा है कि मल्टीब्रांड रिटेल में #FDI लाने में लगी सरकार वॉलमार्ट के बहाने देश में ये पुण्य कार्य भी कर ही डालेगी। खैर, सरकार मुझे लगता है कि एक हाथ आगे जाएगी। कौशिक बसु का प्रस्ताव ये था कि रिश्वत देने को कानूनी कर दो। लेकिन, रिश्वत लेने वाले को पकड़ो इसमें मदद ये होगी कि रिश्वत देने वाला कानूनी छूट मिलने से रिश्वत लेने वाले को पकड़वाने में मदद करेगा। इसी प्रस्ताव का समर्थन इंफोसिस के चेयरमैन नारायणमूर्ति ने भी किया था। अब ये अलग बात है कि इसका खतरा ये कि काम बन गया तो, रिश्वत देने वाला किसी को बताएगा नहीं। और, काम कुछ गड़बड़ हुआ तो, पुलिस में रपट। खैर, सरकार मुझे लगता है कि विकसित होने का ये अवसर छोड़ेगी नहीं। अमेरिका और वॉलमार्ट दोनों ये बता चुके हैं कि उनके कानून के मुताबिक, लॉबीइंग या रिश्वत गलत नहीं है। भले ही इस आरोप में जांच भी वही लोग

संपादकीय सत्ता!

सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया की गिरफ्तारी मीडिया के हित में है या लंबे समय में सरकार इसे ही 'आधार' (वो, वाला आधार नहीं जिससे सब्सिडी सीधे खाते में मिलेगी, वो, वाला आधार जिससे मीडिया को सब्सिडाइज्ड करने में मदद मिलेगी) बनाकर संपादक, संपादकीय सत्ता, मीडिया को निपटाने का प्रयास करेगी। सुधीर चौधरी के कृत्य पहले से इतने जगजाहिर हैं कि चाहकर भी कोई पत्रकार उधर खड़ा शायद ही दिखे। फिर BMW से चलने वाला संपादक बनने के बाद शायद सुधीर ने दूसरे पत्रकारों-संपादकों को कुछ अजीब किस्म का जंतु भी समझ लिया होगा। उसका भी दुष्परिणाम है कि एक भी व्यक्ति कम से कम सुधार के पक्ष में बात करने से रहा। अपुष्ट खबरें ये भी आ रही हैं कि जिस सौदे को 100 करोड़ ले जाने के चक्कर में ये जेल चले गए। उस खबर पर कहीं-कहीं 20-25 करोड़ बन भी गए। इस सवाल का बस जवाब मिलना मुश्किल हो रहा है कि अभी सफाई कितनी और कैसे हो कि संपादक, प्रेस की व्यक्ति हित नहीं देश हित वाली सत्ता की छवि लौट पाए। एक विकल्प ये था कि जी ग्रुप विचारे और साफ सुथरी छवि वाले संपादक लाए। लेकिन, मुश्किल तो, ये है कि अगर खुद जी के लिए ही ये दोनों रण

पैसा देकर वोट जुटाने का जुगाड़

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यही आधार कार्ड बनेगा सरकारी रकम पाने का आधार भारत में आम जनता गजब बेवकूफ बनती है। पहले से कम पैसा, कम लोगों को पैसा लेकिन, सीधे खाते में #directcashsubsidy से जानकार उम्मीद जताने लगे हैं कि MNREGA (मनरेगा)की तरह #directcashsubsidy से यूपीए 3 हो सकती है। माना जा रहा है कि करीब 10 करोड़ गरीब परिवारों को ये सब्सिडी सीधे खाते में मिलेगी। आगे इसमें सब्सिडी के साथ वजीफा, पेंशन या फिर दूसरी सरकारी योजनाओं का फायदा भी जोड़ दिया जाएगा। 10 करोड़ परिवार मतलब 40 करोड़ लोगों को सीधे खाते में रकम आने का भ्रम। और, भारतीय लोकतंत्र में जिस तरह मतदान होता है। उसमें 10-12 करोड़ वोट अगर मिले तो, पार्टी सत्ता में। बस यही फॉर्मूला है यूपीए 2 का यूपीए 3 बनाने के लिए। इसीलिए वित्त मंत्री पी चिदंबरम इस योजना  का एलान करते हुए इसे खुलेआम गेम चेंजर कह रहे हैं। अब वोट के लिए नोट देने के लिए ये चुनाव आयोग के कानूनी दायरे में भी नहीं आएगा। और, सब्सिडी घटाने पर रोज सवाल करने वाली जनता भी शांत रहेगी। महंगाई, भ्रष्टाचार यूपीए 2 के लिए मुसीबत बन रहे हैं। उसका जवाब ये #directcashsubsidy है। सरकार कह रही है ये अ

मीडिया का परिपक्व व्यवहार

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बाल ठाकरे के निधन के बाद फेसबुक टिप्पणी की वजह से इन दोनों को पुलिस ने गिरफ्तार किया था  मुंबई के पालघर की दो बहादुर कन्याओं Shaheen Dhada और Rinu Shrinivasan ने वो कर दिखाया जो, न होता तो, बाल ठाकरे का असल चरित्र उनके मरने के साथ दफन हो जाता। दरअसल यही सारे जीवन बाल ठाकरे रहे। विवादित, दबंग, अपने खिलाफ खड़े लोगों को मुंहतोड़ जवाब देने वाले और मृत्यु के बाद कम से कम हिंदू संस्कार में तो, किसी को बुरा कहने का रिवाज नहीं है। सो, मीडिया ने भी नहीं कहा। इसमें गलत भी क्या था। अब जब Shaheen Dhada और Rinu Shrinivasan की फेसबुक पोस्ट के बाद शिवसैनिक मूल चरित्र में आए तो, मीडिया फिर फॉर्म में आ गया। कतार में लगे अनुशासित, आंसू बहाते शिवसैनिकों को भी अगर कोई मीडिया से गालूी खिलाना चाहता था तो, अच्छा हुआ वो, मंशा पूरी न हुई। मीडिया जाने-अनजाने खुद ही परिपक्व हो रहा है। दुखी होने वाले दुखी होते रहें।

निजी कंपनियों को रियायत के रास्ते में रोड़ा थे रेड्डी

कहते हैं बदलाव हमेशा अच्छे के लिए होता है। शायद यही सोचकर यूपीए सरकार के अपने दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कैबिनेट में कई बड़े बदलाव कर डाले। लेकिन, इस बदलाव के बाद अच्छे की कौन कहे। सरकार के खिलाफ माहौल और खराब हो गया है और इस माहौल को खराब करने में सबसे बड़ी वजह बन रहा है पेट्रोलियम मंत्रालय से जयपाल रेड्डी से बाहर जाना। पेट्रोलियम मंत्रालय छिनने से रेड्डी खुद खफा हैं ये उन्होंने साबित भी कर दिया। रेड्डी वीरप्पा मोइली को मंत्रालय सौंपने नहीं आए। अरविंद केजरीवाल के ट्वीट और मीडिया में रेड्डी की रिलायंस इंडस्ट्रीज को रियायत के रास्ते में रुकावट की खबर ने सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रही सरकार के लिए ये एक और बड़ी मुश्किल हो गई है कि आरोप साफ लग रहे हैं कि रेड्डी की विदाई सिर्फ इस वजह से हुई है क्योंकि, रेड्डी रिलायंस को उसकी मनचाही शर्तें सरकार पर लादने की छूट नहीं दे रहे थे। पेट्रोलियम मंत्रालय से जब मुरली देवड़ा की विदाई हुई और जयपाल रेड्डी ने पेट्रोलियम मंत्रालय का जिम्मा संभाला तो, एक संदेश साफ गया कि अब रिलायंस इंडस्ट्रीज को

चरित्र निर्माण की शाखा नए सिरे से लगानी होगी

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ये बात हमेशा सच साबित होती है कि और एक बार फिर तथ्यों के साथ साबित हो रही है कि किसी भी घटना का बीज कभी न कभी पड़ता है तभी आगे जाकर वो बड़ा पौधा बन जाता है। पार्टी विद् डिफ्रेंस का दावा करती रही भारतीय जनता पार्टी आजकल अजीब स्थिति में है। सबसे ज्यादा ईमानदारी, चरित्र, शुचिता के दावे वाली इस पार्टी की मुश्किल ये हो रही है कि जब देश में लंबे अर्से के बाद आंदोलन का माहौल है और सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम ताकतवर हो रही है तो, इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे हैं। बड़ी मुश्किल की बात ये है कि ये राष्ट्रीय अध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी को शुचिता, चरित्र, त्याग और ईमानदारी की शिक्षा देने वाले मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रिय होने की वजह से पद पर आसीन हुआ माना जाता है। जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बागडोर संघ के पहले सरसंघचालक डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार की तरह दिखने वाले मोहनराव भागवत ने संभाली थी तो, लगा था कि पार्टी नई उर्जा से पुराने आदर्शों को फिर से लौटा पाएगी। पार्टी बुजुर्ग हो चुकी भारत मां की तीन धरोहर अटल-आडवाणी-

एक विचार

अटल-आडवाणी-जोशी दरअसल संघ के स्वयंसेवक पहले थे। बीजेपी नेता बाद में। शुरुआती विरोध के बाद सर्वस्वीकार्य हो गए। क्या संघ अपने किसी ऐसे स्वयंसेवक को प्रचारक के तौर पर बीजेपी में नहीं निकाल सकता जिसने दरअसल त्याग का जीवन जिया हो। बेदाग हो और कम से कम 2 पीढ़ियों से जिसका ठीक संवाद हो और आगे की एक पीढ़ी से तरीके से संवाद करने लायक हो। रकम से राजनीति होती है इसे ध्वस्त करने वाला हो। ये स्थापित कर सके कि राजनीति ठीक रही तो, रकम तो, आती ही रहती है।

ये है किराया या घर की कीमत न घटने का गणित

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18000 रुपए महीने की नौकरी है और 18000 रुपए का 3 बेडरूम फ्लैट लेकर रहता हूं। सवाल- अरे, कैसे? जवाब- सर, नोएडा में 3 दोस्त मिलकर रहते हैं। बैचलर हैं ना। कोई लाइबिलिटी नहीं है। ये एक हैं जो, रहेंगे और दिल्ली-एनसीआर में फ्लैट-घर का किराया बढ़ाते रहेंगे। यही नहीं हैं। एक और हैं सैनी जी। सेक्टर 55 में जनरल स्टोर, पानी की दुकान चलाते हैं। बताते हैं कि वो, क्लास 1 राजपत्रित अधिकारी रहे हैं। तब सस्ते में दुकान खरीद ली थी। अब 50 लाख से कम की क्या होगी एक बेटा विदेश में बसने के आखिरी पायदान पर है, दूसरा यहीं नोएडा में कारोबार कर रहा है। घर बैठे बोर हो जाते हैं इसलिए दुकान पर आकर बैठ जाते हैं। एक कोठी 56 में, एक कोठी, वही सस्ते दाम वाली, सेक्टर 40 या 41 में है। और, फिर निवेश करना था तो, एक फ्लैट क्रॉसिंग रिपब्लिक में भी ले लिया। अब बताइए सैनी जी और 18000 रुपए महीने कमाने वाले ये बैचलर रहेंगे तो, कोई भी आफत आकर भला घरों को सस्ता कैसे कर पाएगी। और, ये हुआ तो, 60-70% मुनाफा बनाने वाले बिल्डर 6 महीने पुराने मुनाफे पर रोते हुए घर की कीमत बढ़ाए रहेंगे। अब बताओ कोई है सस्ता घर के इंतजार में।

विरोध FDI का नहीं सरकार शून्यता का करिए

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गजब का भ्रमित भारत है। किसी को कुछ पता नहीं। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा। एक FDI किसी को सभी रोगों का इलाज लग रहा है तो, वही FDI किसी को सभी नई बीमारियों की वजह बन रहा है। सरकार में रहते ये FDI सब अच्छा, सरकार से बाहर जाते ही यही FDI सबसे खराब। FDI के विरोध में सब वॉलमार्ट को अभी से गरिया रहे हैं। जबकि, सच्चाई ये है कि उससे भी गंभीर समस्या ये है कि यही काम बिग बाजार भी पिछले काफी समय से कर रहा है। वॉलमार्ट अगर सही-सही आ गया तो, भी कम से कम डेढ़ साल लग जाएगा। और, मेरा खुद का शोध है कि 2004 में जब मुझे मुंबई में रहने के दौरान बिग बाजार की आदत लगी थी और अब- जब बिल देखता हूं तो, साफ दिखता है कि बेवजह का ज्यादा, कभी-कभी बिना जरूरत का सामान ले लेता हूं और बचत शून्य है। तो, ये दिक्कत वॉलमार्ट के आने भर से नहीं होगी। बिग बाजार भी यही कर रहा है। मूल समस्या FDI आने की नहीं है, मूल समस्या है कि ये सरकार शून्य देश होता जा रहा है। किसी पर कोई नियंत्रण नहीं है। सब मुक्त है।

सरकार! नंगा होने के अलावा कोई विकल्प बचा है क्या?

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  आर्थिक विकास पर प्रधानमंत्री के भाषण के समय विरोध प्रदर्शन संतरी लूटे तो, जाए जेल-प्रधानमंत्री लूटे तो, कानून फेल   ये लिखा है प्रधानमंत्री के खिलाफ शर्ट उतारकर विरोध प्रदर्शन करने वाले वकील संतोष कुमार सुमन के फेसबुक प्रोफाइल पर।   ( इस विरोध प्रदर्शन के तुरंत बाद ये लाइनें लिखी हैं। दिल से निकली हैं इसलिए इसे लिखने भर का समय लगा। दिमाग नहीं लगाना पड़ा)   बात  जब  हद  से  गुजर  जाती है   जब  किसी  बात  पर  मन  का  गुस्सा  तिलमिलाहट  में  बदल  जाता है   जब  हमको  लगता  है  कि  हमारी  बात  सत्ता  सुनेगी नहीं   जब  हजारों  इराकियों  के  मरने  पर  भी  इराकी  कुछ  कर  नहीं  पाते  हैं   तो , दुनिया  के  सर्वशक्तिमान  अमेरिका  के  राष्ट्रपति  पर  जूता  चल  जाता है     बात  जब  हद  से  गुजर  जाती है   जब  किसी  बात  पर  मन  का  गुस्सा  तिलमिलाहट  में  बदल  जाता है   जब  हमको  लगता  है  कि  हमारी  बात  सत्ता  सुनेगी नहीं   जब  हजारों  सिखों  की  जान  की  कीमत  किसी  नेता  की  मौत  के  बदले  में  जायज  हो  जाती है   जब  सा