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Showing posts from August, 2015

आरक्षण पर आखिरी बहस का आंदोलन

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अब तो आंदोलन के मंच वाली तस्वीर आ रही है। उससे पहले की हार्दिक पटेल की तस्वीर यही वाली है। जिसमें वो बंदूक कंधे पर रखे नजर आ रहे हैं। इससे समझा जा सकता है कि इस पटेल को आरक्षण की कितनी जरूरत है। गुजरात में भाजपा के 120 में से 40 विधायक पटेल हैं। मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल सहित सात मंत्री पटेल हैं। खेती तो कहने को पटेलों की है। टेक्सटाइल, डायमंड और फार्मा की बड़ी-छोटी कंपनियों पर पटेल ही काबिज हैं। कुल मिलाकर एक नौजवान पटेल नेता की राजनीतिक जमीन की वजह बन रहा है ये आरक्षण आंदोलन और बुढ़ाई आनंदीबेन पटेल के अलावा सौरभ और नितिन पटेल जैसे पटेल नेताओं की विफलता की कहानी भी कह रहा है ये पटेल आरक्षण आंदोलन। तथ्य ये भी है कि हार्दिक पटेल के पिता बीजेपी नेता हैं। और तथ्य ये भी है कि केशुभाई पटेल ने नरेंद्र मोदी को पलटने के लिए जाने कितने साल पटेलों का स्वाभिमान जगाने की कोशिश की। लेकिन, असफल रहे। अब केशुभाई कहां हैं ये भी पता नहीं चल रहा। लेकिन, वो खुश हो रहे होंगे। और खुश तो लोग दिल्ली से लेकर बिहार तक हो रहे होंगे। देखिए किसकी खुशी कब तक टिकती है।
वैसे सबसे बेहतर इस आरक्षण के आंदोलन का नतीजा यह…

ये अच्छे दिन नहीं तो क्या हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पीछे सबकुछ वही पलटकर आ रहा है। जो उन्होंने खुद लोगों को बताया समझाया था। अच्छे दिनों की चाहत तक दस साल के मनमोहन राज में शायद लोगों को खत्म हो गई थी। लेकिन, जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के लिए चुनावी रैलियों में अच्छे दिन आने वाले हैं का नारा बुलंद कराया तो, लोगों को ये अहसास हुआ कि अरे अच्छे दिन भी इस देश में आ सकते हैं। अहसास हुआ तो उस अहसास से भरे लोगों ने अच्छे दिन का नारा देने वाले नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बना दिया। और सिर्फ प्रधानमंत्री नहीं बनाया। पूर्ण बहुमत वाला प्रधानमंत्री बनाया। इसीलिए अब दूसरे पंद्रह अगस्त के प्रधानमंत्री के भाषण के साथ ये समीक्षा बनती है कि देश में अच्छे दिन आए या नहीं। समीक्षा के लिए अच्छी बात ये रही है कि खुद नरेंद्र मोदी ने पिछले पंद्रह अगस्त पर किए वादों की भी रिपोर्ट खुद पेश कर दी है। पिछले पंद्रह अगस्त से इस पंद्रह अगस्त के बीच हुए सरकार के काम से ये समझने की कोशिश करते हैं कि देश में अच्छे दिन आए या नहीं। वो अच्छे दिन जिसका भरोसा दिलाकर नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन गए।
अच्छे दिन की बात चुनावी रैली में…

सिर्फ विज्ञापनों में उत्तम है उत्तर प्रदेश

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सरकारें भूल जातीं हैं कि विज्ञापन अगर सिर्फ विज्ञापन है और धरातल पर वैसा नहीं है। जैसा सरकार विज्ञापन में जनता को बताने की कोशिश कर रही है तो, फिर सरकारें नहीं रहती हैं। सरकारों के लिए अच्छी बात ये हो सकती है कि जनता की याददाश्त बहुत लंबी नहीं होती है। लेकिन, सरकारों को को कम से कम पुरानी गलतियों से सबक तो लेना ही चाहिए। तब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री हुआ करते थे। और महानायक अमिताभ बच्चन अगर किसी एक राज्य के लिए समर्पित थे। तो, वो राज्य था उत्तर प्रदेश। अमिताभ बच्चन तब के विज्ञापन में पर्दे पर आते थे। और मुस्कुराते हुए कहते थे। यूपी में दम है, क्योंकि, जुर्म यहां कम है। अब अमिताभ बच्चन बोल रहे थे तो, जनता ने और गंभीरता पूर्वक देखना शुरू कर दिया कि आखिर जुर्म कितना कम है। जब जनता पता लगाने लगी तो, उसके साथ घटी घटनाओं ने बता दिया कि जुर्म तो कम नहीं यहां सबसे ज्यादा है। अब सरकार बदल चुकी है। हालांकि, सरकार फिर से समाजवादी पार्टी की ही है। लेकिन, अब पिता की जगह पुत्र अखिलेश यादव ने ले ली है। नौजवान मुख्यमंत्री से लोगों को बड़ी अपेक्षाएं थीं। लगा कि ये नौजवान मुख्यमंत्री पहले की समाजवादी…

ये नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं है

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ये पूरा सत्र साफ होता दिख रहा है। देश में भले ही कुछ ही इलाकों में बारिश से बाढ़ के हालात बने हों। लेकिन, अगर संसद की बात करें तो, पूरा का पूरा सत्र बाढ़ में बहता दिख रहा है। बड़े सुधारों को कानून का रूप देने की बात तो सोची भी नहीं जा सकती है। हालात ये हैं कि बमुश्किल बातचीत हो जाए यही बहुत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। 282 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत से आई सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। पार्टी के भीतर भी वो सर्वोच्च नेता हैं। संगठन में नरेंद्र मोदी के सिपहसालार अमित शाह कमान संभाले हैं। ऐसे में किसी भी तरह के दबाव की बात मानना संभव नहीं है। फिर क्या है कि ये नरेंद्र मोदी की सरकार लग नहीं रही है। अभी तक ऐसा मानने वाले मन ही मन ये बात कर रहे थे। लेकिन, अब ये खुली चर्चा का विषय है कि क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है, जिसे जनता ने पूर्ण बहुमत देकर मई 2014 में सत्ता में बिठाया था। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है जिसे जनता ने ये सोचकर सत्ता दी थी कि ये प्रधानमंत्री पहले के एक दशक के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह व्यवहार नहीं करेगा। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है …

ये उम्मीद से हैं

@narendramodi की सरकार अगले कम से कम दो कार्यकाल न हट पाने की आहट से जो, वैचारिक मैथुन करने वाले बंधु नरेंद्र मोदी में बहुतायत खूबियां देख पाए थे। अब फिर उनकी आंखों के चश्मे का नंबर बदल गया है। अब उन्हें नजदीक की मोदी सरकार धुंधली दिखने लगी है। दूर की राहुल गांधी की सरकार बहुत साफ-साफ। वजह ये कि कुछ आहट आई कि मोदी के लिए तो यही पांच साल असफलता के साबित हो जाएंगे। वैचारिकों के तर्क की टाइमलाइन सलीके से देख लीजिए। मेरी बात साबित हो जाएगी। दिक्कत उनकी आंखों की है लेकिन, वो कह रहे हैं कि आंख के चश्मे का नंबर नहीं बदलवाएंगे। जो दिख रहा है वही बदलिए।

बजरंगी भाईजान से सबक

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सलमान खान ने अभी दो कमाल किए हैं। एक कमाल ये कि फिल्म में पाकिस्तानी मुसलमान बच्ची के मुंह से जय श्रीराम कहलवा दिया। पूरे पाकिस्तान को हिंदुस्तानी पवन चतुर्वेदी को वापस हिंदुस्तान अवैध तरीके से पहुंचाने के लिए सीमा पर लाकर खड़ा कर दिया। और दूसरा कमाल ये कि लगे हाथ ये भी सवाल खड़ा कर दिया कि टाइगर मेमन की गलती के लिए उसके भाई याकूब मेमन को फांसी क्यों दी जा रही है। हालांकि, दूसरे कमाल के साथ ही उनके पिता सलीम खान ने तुरंत उससे भी बड़ा कमाल करके तुरंत ये कह दिया कि सलमान को मामले की जानकारी नहीं है। इसलिए सलमान खान के याकूब मेमन पर दिए गए बयान को गंभीरता से न लिया जाए। सलमान खान ने भी संस्कारी पुत्र की तरह पिता का हवाला देते हुए अपनी गलती स्वीकार करके बयान वापस ले लिया। ये कमाल ही था कि जिस दौर में साफ-साफ हिंदू-मुसलमान की रेखा खिंच गई थी। उस समय भी सलमान खान यानी बजरंगी भाईजान के लिए उतनी कटुता हिंदू-मुसलमान दोनों तरफ से नहीं दिखी। न तो बजरंगी भाईजान फिल्म में पाकिस्तानी मुसलमान बच्ची के मुंह से जय श्रीराम कहलाने पर बहुतायत मुसलमानों ने लाहौल विला कुव्वत कहकर भारत में उनकी फिल्म के कार…