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Showing posts from March, 2015

भारतीय शिक्षा का आइना हैं बिहार से आई नकल की तस्वीरें

बिहार में नकल की तस्वीरें और वीडियो देखकर देश सोच रहा है कि बिहार ऐसे पढ़ता-बढ़ता है। तस्वीरें दिखें, सामने आती हैं तो उत्तर प्रदेश के लोगों को भी ऐसी ही लजाना पड़ता हो। मुझे बचपन में इलाहाबाद के गांव के एक स्कूल में ऐसे ही नकल कराने का वाकया बड़े अच्छे से याद है। लगभग इसी तरह खिड़कियों से नकल की पुर्ची फेंकना और बीच-बीच में, कानून व्यवस्था कायम है का अहसास दिलाने के लिए, पुलिस वालों का डंडा लेकर नकल कराने वालों को दौड़ाना। बचपन में गर्मी की छुट्टियों में हम करीब डेढ़-दो महीने के लिए गांव जाते थे। हम सभी भाई-बहन इलाहाबाद में रहते—पढ़ते थे। नकल जैसी संस्थागत व्यवस्था से परिचय नहीं था। इसका मतलब ये भी नहीं है कि कभी नकल ही नहीं किया। हां, पढ़ाई के दौरान दो बार छोड़कर कभी नकल नहीं किया। एक बार वाला परिणाम अच्छा हुआ निराशाजनक रहा। एलएलबी में दाखिले के लिए की गई नकल काम नहीं आई। दोबारा वाली नकल काम आई। लेकिन, गांव में छेउंगा में जो विद्यालय था, वहां की पढ़ाई अद्भुत तरीके से होती थी। ऐसे ही सब जिस बोरे पर बैठते थे। उसी बोरे के नीचे पेपर में लिखे प्रश्नों के उत्तर खोजने का जुगाड़ होता था। उस…

बारंबार खारिज हुए विचारकों का विचार मंथन

Press Club of India and Media Studies Group की वैकल्पिक राजनीति के भविष्य पर चिंता करने जुटे विद्वानों का मुंह सूख गया जब, एक नौजवान ने इनसे पूछ लिया कि जब आपको वंदेमातरम् और भारत माता की जय की वजह से देश की एकता को खतरा दिखता है तो आप कौन सी वैकल्पिक राजनीति की चर्चा करने यहां आए हैं। दरअसल कहने को तो ये वैकल्पिक राजनीति के भविष्य की चर्चा करने जुटे थे। लेकिन, पूरी चर्चा दरअसल आम आदमी पार्टी की टूटन या कह लें कि इनके पैमाने पर आम आदमी पार्टी का खरा न उतर पाना और नरेंद्र मोदी के अगले पाँच साल तक प्रधानमंत्री पद से हटाने का कोई जुगाड़ न मिल पाने का रुदन ही थी। ऐसे में नौजवान का सवाल सबके लिए संकट बन गया। ये अभी भी बेवकूफी कर रहे हैं। इनकी नजर में क्रांति का रास्ता बस इनका ही है। और वैकल्पिक राजनीति का रास्ता भी। इनको समझना चाहिए कि नौजवान अब इनकी भावनात्मक क्रांति का बस्ता ढोने तैयार नहीं है। ये नौजवान अब आपके कुतर्क में साथ नहीं देगा साथी। लाल सलाम को अब ये मजाक में ही बोलता है। गंभीरली नहीं लेता। आप गंभीर होइए। झुट्ठो गंभीर होने से अब बात बिगड़ेगी ही। सचमुच कुछ वैकल्पिक राजनीति करना …

भ्रष्टाचार की बुनियाद हिलाने वाले विनोद राय

सिर्फ 33 कोयला खदानों की नीलामी से दो लाख करोड़ रुपये सरकारी खजाने में आने से साफ है कि नीतियों के आधार पर सरकार चलने से भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल सकती है। अगर हम देश नीतियों के आधार पर चलाएंगे तो हम देश अच्छे से चला सकते हैं। देश को भ्रष्टाचार मुक्त कर सकते हैं। हम रिश्वत मुक्त तंत्र बना सकते हैं। हमने ये जिम्मेदारी उठाई है और हम देश को उसी रास्ते पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। 33 कोयला खदानों की नीलामी से दो लाख करोड़ रुपये सरकारी खजाने में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये कहा। लेकिन, जब कोयला खदानों के आवंटन में गड़बड़ियों की तरफ सीएजी ने इशारा किया था तो, कम ही लोगों को ये भरोसा रहा होगा कि कोयला खदानों के आवंटन में सरकारी हितों को इस तरह से दरकिनार किया गया है। जब सीएजी विनोद राय ने कोयला खदानों के आवंटन से देश के खजाने में एक लाख छियासी हजार करोड़ रुपये का नुकसान होने का अंदेशा जताया था तो, ज्यादातर आर्थिक विद्वान इसे देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालने वाली रिपोर्ट बता रहे थे। अर्थव्यवस्था के जानकार यही मान रहे थे कि सीएजी का ये आंकलन पूरी तरह से अनुमानों पर तैयार क…

हिंदुस्तान के भले के लिए बीजेपी-पीडीपी गठजोड़ बने रहना जरूरी

मसरत आलम की रिहाई के बाद लगा कि अब जम्मू कश्मीर के साथ देश का भ्रम भी बना रहने वाला है। वो भ्रम ये कि देश में भारतीय जनता पार्टी सिर्फ हिंदुओं की पार्टी है और इसका किसी भी ऐसी पार्टी के साथ गठजोड़ नहीं हो सकता जो, मुसलमानों के वोट के भरोसे ही राजनीति करती हो। मतलब साफ है कि ये भ्रम नहीं पक्की धारणा बन चुकी है कि भारतीय जनता पार्टी सिर्फ हिंदुओं और वो भी कट्टर किस्म के हिंदुओं के ही मतों से जीतने वाली पार्टी है। इसलिए भारतीय जनता पार्टी को गठजोड़ करने के लिए पंजाब में अकाली दल और महाराष्ट्र में शिवसेना के अलावा देश में कोई पक्का सहयोगी नहीं मिल सकता। सहयोगी मिलेगा भी तो तभी जब तक भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस के सामने कमजोर गठजोड़ की अगुवा हो, जिसमें राज्य की लड़ाई की वजह से जनता दल यूनाइडेट जैसे सहयोगी भारतीय जनता पार्टी को मिलते हैं। यही कुल मिलाकर देश की राजनीतिक स्थिति थी और काफी हद तक अभी भी है। इसीलिए 282 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत में भारतीय जनता पार्टी की सरकार होने के बावजूद बीजेपी को विपक्षी हिंदुओं और वो भी सिर्फ कट्टर हिंदुओं से आगे की पार्टी मानने को तैयार नहीं हैं। या ये कहें…

पत्रकारिता से जी ऊब गया है!

पत्रकारिता से जी ऊबने की बात लगभग हर उम्र का पत्रकार करता मिल जाएगा। शुरुआती से लेकर संपादक तक। ऐसा क्यों। इसका जवाब है मसरत आलम की रिहाई की घटना, जो साबित करती है कि दरअसल पत्रकारिता कहीं हो ही नहीं रही है। जबकि, इसकी देश को सख्त जरूरत है। लोकतंत्र के बेहतर रहने के लिए सख्त जरूरत है। सोचिए कि जाने कितने दिनों तक मसरत आलम की रिहाई पर चर्चा इस लिहाज से हुई कि पीडीपी बीजेपी के रिश्ते का क्या होगा। अब खबर आ रही है कि राष्ट्रपति शासन और उमर अब्दुल्ला के शासन के समय ये हुआ तो अब बहस बदल गई है। अभी भी ठीक से ये खबर कहां आ पाई है कि कितनी धारा उस पर लगी थी। कितने समय तक वो जेल में रहता। ऐसे ही दीमापुर जेल से आरोपी बलात्कारी को निकालकर मारने वाली खबर भी रही। दरअसल सबसे बड़े संकट में पत्रकारिता ही है। राजनीति, न्यायपलिका और कार्यपालिका में सुधार की बात हो रही है। दिख रही है। लेकिन, पत्रकारिता का संकट बढ़ रहा है। और इसके सुधरने के संकेत भी कम ही हैं। चमक में पहले से कई गुना ज्यादा पत्रकारिता में आ रहे हैं। लेकिन, कितने पत्रकारिता करने आ रहे हैं। कितने कभी कुछ नया लिखते दिखाते हैं। संपादक कहां ह…

इस तरह का महिला सशक्तिकरण न हो!

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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक बेहद शानदार खबर है। खबर है कि जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल ने वहां की कंपनियों को अपने बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में महिलाओं को कम से कम तीस प्रतिशत जगह देने का नियम बना दिया है। जर्मन संसद से इसे मंजूरी मिल चुकी है। सचमुच ये बहुत अच्छी खबर है। अब इसका इस्तेमाल जर्मन कंपनियां घर-परिवार की महिलाओं को ही बोर्ड में लाकर खानापूर्ति करेंगी या सचमुच इससे बोर्डरूम की तस्वीर कुछ बदलेगी। हालांकि, निजी तौर पर मैं आरक्षण पसंद नहीं करता। फिर वो किसी भी तरह का हो। लेकिन, सच्चाई यही है कि पुरुष हो, जाति हो, विशेष समाज हो या फिर कोई भी हो, जो मजबूत है उसके सामने कमजोर को मजबूत करने के लिएए या कहें कि मजबूत की बराबरी या उसके आसपास खड़ा करने के लिए उसी समाज को कुछ करना होता है। तो उस करने में आरक्षण भी एक कारगर तरीका है। और ये स्वस्थ समाज के लिए जरूरी भी है कि समाज में महिलाएं भी पुरुषों के आसपास हों। इससे वो बेहतर होते हैं, मानवीय होते हैं। सिर्फ पुरुषों या शायद सिर्फ महिलाओं को प्रभुत्व का समाज बड़ा खतरनाक होगा, है भी। भारत में जातिगत आरक्षण है। महिलाओं को भी काफी जगहो …

भारतीय लोकतंत्र के लिए अशुभ संकेत

ये शायद भारतीय राजनीति में किसी ने कल्पना नहीं की होगी। भारतीय राजनीति को बदलने के दावे के दम पर देश की राजधानी की सत्ता हासिल करने वाली पार्टी में ऐसा होगा, ये तो बिल्कुल भी किसी की कल्पना में नहीं रहा होगा। वो भी इतनी जल्दी हो जाएगा, ये तो दूर-दूर तक किसी ने सोचा नहीं रहा होगा। हम राजनीति बदलने आए हैं। ये कहकर देश की राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं को भ्रष्ट साबित करने के लिए हर हाल तक लड़ते दिखने वाले अरविंद केजररीवाल यहां पहुंच जाएंगे, इस बारे में सोचा नहीं गया था। लेकिन, ये हो गया है। भारतीय राजनीति को बदलने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी ने वो कर दिया जो परंपरागत राजनीति में बरसो से जमी जमाई पार्टियां भी करने से डरती हैं। आम आदमी पार्टी ने अपने दो प्रमुख संस्थापक सदस्यों, योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण, को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। हालांकि, अभी ये कहा जा सकता है कि पार्टी से दोनों कोनिकाला नहीं गया है। लेकिन, ये निकाले जाने जैसा ही है। क्योंकि, अगर योगेंद्र और प्रशांत की भूमिका पार्टी में इतनी नहीं है कि वो पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति में रह सकें, तो ये निकाले जाने जै…