लखनऊ की सत्ता से गांवों में बदलती सामाजिक-आर्थिक हैसियत

(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। शहर वालों जैसे क्यों नहीं रह पाते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। इसी ठहराव-बदलाव की इस छठवीं कड़ी में आज कोशिश इस बात को समझने-समझाने की कि आखिर, राजनीतिक पार्टी की सत्ता बदलने से कैसे गांवों में समीकरण बदल जाते हैं। कैसे इज्जत से कोई फूल जाता है और कैसे कोई बाजार में मूछें ऐंठने वाला दुम दबाकर अपने घर में बैठा सरकार के बदलने का इंतजार करता है।)

गांव जब गया तो, हमारे गांव की बाजार में मेडिकल स्टोर चलाने वाले बबलू तिवारी के घर का न्यौता भी करने का इरादा बन गया। बबलू की बहन की शादी थी। लेकिन, चूंकि हम लोगों को शाम को इलाहाबाद भी लौटना था। इसलिए दोपहर में ही जाकर न्यौता देकर लौट आने पर हम लोगों में सहमति बनी। भयानक गरमी में हम लोग अपने गांव से करीब दस किलोमीटर दूर चकवड़ गांव के लिए निकले।

बाघराय बाजार से नहर के बगल-बगल गांव के लिए थोड़ा शॉर्टकट रास्ता जाता है। नहर के दोनों तरफ बबूल के पेड़ लगे थे। मैं ही गाड़ी चला रहा था। बड़ी होने की वजह से टाटा सफारी को बबूल के कांटों से बचाकर चलना थोड़ा सा दुष्कर भी लग रहा था। तभी उस चटकती धूप में गमछा बांधे यामहा मोटरसाइकिल पर आ रहे दो लोगों में से पीछे वाले ने अपनी दुनाली बंदूक हवा में लहराकर गाड़ी किनारे करने का इशारा किया। खैर, न इतनी जगह ही थी नहर की पटरी पर और न ही बंदूक लहराने का अंदाज मुझे डरा पाया कि मैं गाड़ी किनारे करता। उनके मुंह से कुछ अपशब्दों के निकलने का अंदाजा लगा तो, मैंने गाड़ी धीमी कर ली (आखिर, मेरी भी तो पैदाइश प्रतापगढ़ की थी। मैं भला उनके बंदूक के रुतबे में कैसे आ जाता।) लेकिन, वो लोग रुके नहीं। शायद उनको भी लगा होगा कि सफारी में जा रहे हैं तो, कुछ अड़बंग लोग ही होंगे।


खैर, बंदूक के रुतबे से बचते-बचाते हम चकवड़ गांव के मोड़ पहुंचे तो, अंबेडकर ग्राम का चमकता बोर्ड और गांव तक चमकती पक्की सड़क थी। हम सीधे पहुंच गए। हमारे लिए पानी पीने के लिए बढ़िया पेठा आया। तब तक बबलू बाहर निकल आए थे और उन्होंने डांटकर कहा- बरातियन बिना जउन मिठइया आइबा, ओका लावा न यार। अरे, मैनेजर साहब (मेरे पिताजी) इलाहाबाद से इही तक चला आय अहैं। बबलू का छोटा भाई बिना चप्पल पहने ही मोटरसाइकिल लिए कराह और दूसरे जरूरी सामान टेंट में रखवा रहा था। पिताजी का पैर छूने के बाद बबलू ने सीना चौड़ा करके बताया (आखिर छोटे भाई की नौकरी जो, लगवा दी थी)- चाचा महेशौ क जिंदगी बनि ग अब। डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव म मैनेजर पर होई ग बा। हमहूं सोचे रहे कि स्वामी प्रसाद के साथे लाग अही तो, छोट काम न कहब। इहै सोचे रहे होई गवा चाचा आप सबेक आशीर्वाद आ। शुरू म रामपुर जाइ क परी लेकिन, मंत्रीजी कहे अहैं कि जल्दिन इलाहाबाद या प्रतापगढ़ बोलवाए लेब।

दरअसल, ये मंत्रीजी हैं बहनजी की सरकार के बेहद ताकतवर मंत्री और निष्ठावान बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य। यही वजह थी कि ब्राह्मण बहुल गांव होने के बाद भी ये गांव अंबेडकर गांव की श्रेणी में शामिल हो गया था। चूंकि इसी गांव में स्वामी प्रसाद मौर्य का भी घर था। और, सबसे बड़ी बात ये कि स्वामी प्रसाद मौर्य भले ही लखनऊ में बहुत रुतबे वाले हों। अपने गांव के आसपास वो बहुत शांति से रहते हैं, अंग्रेजी में लो प्रोफाइल। उसकी वजह भी साफ है- इसके पहले तक राजा (कुंडा के निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह) की हनक के आगे बेइज्जत होने से बचना चाहते थे। अब बहनजी की सत्ता आने के बाद राजा ठउरुक (शांत) होई ग अहैं। रघुराज प्रताप सिंह यूथ ब्रिगेड के बोर्ड तो पहले ही बाजारों से गायब हो गए थे अब, यूथ ब्रिगेड के कार्यकर्ता (रघुराज प्रताप सिंह के नाम पर प्रतापगढ़ की छोटी बाजारों में लफंगई करने वाले बेरोजगार लड़के) भी नहीं दिखते। अब इस इलाके में प्रमोद की टाटा सफारी पहचानी जाती है। राजा जैसा डर तो नहीं है लेकिन, रुतबा जबरदस्त है। बाभन तो, राज्य भर में बहनजी की सलामी बजा ही रहे हैं। यहां ठाकुर भी स्वामी मौर्य और उनके भतीजे प्रमोद के आगे सलामी बजाते हैं।

समाज बदल रहा है। अगड़े वर्ग के अगुवा बाभन की रोजी-रोटी (नौकरी) का जुगाड़ दलित (मायावती सरकार के मंत्री) की सिफारिश पर हो रहा है। अब बताइए, दलित उत्थान हो रहा है ना। वैसे, कुछ लोग दबी जुबान से ये भी कह रहे हैं कि प्रमोद बहुत बौराइ ग अहैं, ढेर उधरइहैं तो, मराइउ जइहैं। सरकार तो, आवत जात रह थे। खैर, अभी तो मायावती की ही सत्ता है और, बसपा के हाथी लगे नीले झंडे लगी गाड़ियों से उतरने वाले को सलाम-नमस्ते करने वाले ही बाजारों में ज्यादा दिख रहे हैं।

लखनऊ की सत्ता बदलते ही अचानक सबकुछ बदल जाता है। एसपी, डीएम के तबादले सुर्खियों में आते हैं। इससे बड़े लोगों को फरक पड़ता है। लेकिन, गांव में असली फरक पड़ता है ऐसे तबादलों से जिनके बारे में तो मीडिया खबर भी नहीं बनाता। लोक निर्माण विभाग(PWD), ग्रामीण अभियांत्रिकी विभाग(RES), फैक्सपेड, जल निगम, सिंचाई विभाग—के इंजीनियर, प्रोजेक्ट इंजीनियर के चार्ज तेजी में बदल जाते हैं। सपा की सरकार में एक साथ 5 करोड़ रुपए का काम करवा रहा ठेकेदार पैदल हो चुका है (मैं जानबूझकर नाम नहीं लिख रहा हूं), बसपा के निष्ठावान कार्यकर्ता ठेकेदार बन गए हैं (ये सतत प्रक्रिया है, यूपी में हर सरकार बदलने पर चुपचाप सबसे तेज धंधा यही होता है)।

आधी गिरी गिट्टी, डामर कोई दूसरा आकर कब्जा लेता है, काम शुरू करा देता है। पुरानी सरकार के लोगों के पेमेंट रुक गए हैं और नई सरकार के ठेकेदार सिर्फ गिट्टी गिराकर एडवांस पेमेंट पा जा रहे हैं। ये सामाजिक संतुलन है जो, एक सरकार बदलने और दूसरी सरकार बनने से बदल जाता है। यही आगे का मुनाफा पोलिंग बूथ पर अलग-अलग पार्टियों के कार्यकर्ताओं को अपने नेताजी के लिए गोली-बम चलाने, मतपत्र फाड़ने को उकसाता है। उत्तर प्रदेश में राजनीति का ये धंधा पूरी तरह से प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलता है। और, जिस प्राइवेट लिमिटेज कंपनी (पार्टी) से जो, जुड़ा है, उसका फायदा पक्का। बहन-बेटी की शादी में दरवाजे पर सत्ताधारी पार्टी के नेता के आने भर से गांव में मेजबान की काफी दिन तक हवा-पानी बनी रहती है।

सपा नेताओं के गांव तक स्वीकृत पक्की सड़क अब बसपा नेता के गांव तक जा रही है। कांग्रेस-भाजपा के छुटभैये नेता कह रहे हैं कि भई सरकार तो, बहनजी की ही अच्छी है और किसी बसपाई से सटकर अपना छोटा-मोटा काम निकाल ले रहे हैं। कुर्ता-पाजामा तो, सफेद ही रहता है किसी पार्टी की ड्रेस तो, है नहीं, बस थोड़ी जुबान सरका देनी है बहनजी के पक्ष मे। जुबान सरक रही है, ठेका चल रहा है। नीला झंडा लहरा रहा है। दलित उत्थान हो रहा है। और, कुछ लोग अगले चार सालों के लिए राजनीति से तौबा कर चुके हैं। इसीलिए मुझे लगता है कि यूपी के गांवों में तो लोकसभा चुनावों में नीला झंडा ही लहराएगा। 5 साल बाद यूपी के गांव में मुझे सामाजिक संतुलन कुछ इसी तरह दिखा।

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