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Tuesday, March 03, 2009

पिटते राष्ट्रीय मुद्दे और राष्ट्रीय पार्टियां

लोकसभा चुनाव का एलान हो गया है। देश भर से चुने गए सांसद अपनी पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के लिए एक दावेदार पेश करेंगे जो, देश चलाने का दावा करेगा। लेकिन, चुनावी महासमर से पहले इतना तो साफ हो गया है कि प्रधानमंत्री भले ही दोनों राष्ट्रीय पार्टियों (कांग्रेस या बीजेपी) में से किसी का किसी तरह से बन जाए। देश पर राज अब क्षेत्रीय पार्टियां ही करेंगी। क्षेत्रीय पार्टियों का दबाव होगा, स्थानीय मुद्दे हावी होंगे। राष्ट्रीय मुद्दों पर भाषण खूब होंगे लेकिन, वोट नहीं मिलेंगे।


मैं अगर कह रहा हूं कि सब कुछ क्षेत्रीय-स्थानीय हो गया है। राष्ट्रीय मुद्दा, राजनीति पीछे छूट रहे हैं तो, ऐसे ही नहीं कह रहा हूं। कल जब गोपालस्वामी चुनाव की तारीखों का एलान कर रहे थे तो, देश की दोनों बड़ी पार्टियां राज्यों में अपने सांसद बढ़ाने के लिए स्थनीय-क्षेत्रीय दलों को साष्टांग प्रणाम कर रहीं थीं। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस, लेफ्ट का गढ़ ढहाने के लिए ममता के सहारे थी तो, उत्तर प्रदेश में उसे मुलायम-अमर की जोड़ी का सहारा है जिन्होंने साम-दाम-दंड-भेद से यूपीए सरकार को परमाणु समझौते के मुद्दे पर बचा लिया था।



मामला सिर्फ इतना ही नहीं है कि कांग्रेस का हाथ इन क्षेत्रीय पार्टियों से मिलने के लिए बेकरार है, असल बात तो कांग्रेस को क्षेत्रीय पार्टियों का पिछलग्गू बनने से गुरेज नहीं है। बंगाल में कांग्रेस के संकटमोचक प्रणव मुखर्जी प्रदेश अध्यक्ष हैं। लेकिन, राष्ट्रीय पार्टी के इस अंतराष्ट्रीय संकटमोचक के पास अपनी पार्टी की राष्ट्रीय उपस्थिति बनाए रखने का कोई नुस्खा नहीं है।


लेकिन, संकटमोचक महाराज पर ही सवाल क्यों खड़ा किया जाए? जब त्यागी सोनिया माता के साथ देश भर में कांग्रेस को खड़ा करने की अनोखी योजना तैयार करने का दावा करने वाले राहुल भइया और नौजवान आंधा-प्रियंका गांधी अपनी खानदानी विरासत वाले राज्य उत्तर प्रदेश में ही कोई ढंग की योजना नहीं दे पा रहे हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के समय दिल्ली में गांधी परिवार के एक निकट व्यक्ति ने मुझसे कहाकि राहुल भइया की नजर लोकसभा चुनाव पर है। विधानसभा चुनाव तो सिर्फ रिहर्सल भर है।


योजना ये थी कि राहुल के विदेशों में पढ़ी नौजवानों की एक टीम लोकसभा चुनाव का खाका तैयार करेगी। विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए मजबूत सीटों को तलाशा जाएगा और पुराने-नए चेहरों को मिलाकर 15-20 सांसद उत्तर प्रदेश से भेजने को कोशिश होगी। अब वो कोशिश कहां तक पहुंची है ये तो मुझे नहीं पता। लेकिन, कांग्रेस का हाल ये है कि 80 सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में मुलायम उसे 17 से ज्यादा देने को तैयार नहीं हैं। वो, भी तब जब बहनजी के प्रकोप से मुलायम डरे-डरे से घूम रहे हैं। अब 17 सीटं लड़ने को ही मिलेंगी तो, 15-20 सांसद जीतेंगे कैसे ये गणित तो, किसी चमत्कार से ही सिद्ध हो पाएगा।


राष्ट्रीय पार्टियों का हाल कितना बुरा है। इसका सही-सही अंदाजा उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के अभी हुए विधानसभा चुनावों से मिल जाता है। इन दोनों ही राज्यों में सत्ता में काबिज बसपा और लेफ्ट फ्रंट को अभी हुए विधानसभा चुनावों में करारी हार झेलनी पड़ी है। दोनों ने ही पूरा दम लगा रखा था। लेकिन, सब टांय-टांय फिस्स हो गया। काबिलेगौर बात ये कि इसका फायदा मिला दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों को- उत्तर प्रदेश में सपा और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस। दोनों ही जगह कांग्रेस-बीजेपी बहुत पिछड़ी हुई दिखीं।


पश्चिम बंगाल की विश्णुपुर (पश्चिम) विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने सीपीएम प्रत्याशी को 30 हजार वोटों के भारी अंतर से हरा दिया। लेकिन, राजनीति की नब्ज बताने वाली हार थी उत्तर प्रदेश की भदोही विधानसभा सीट से बहनजी की बसपा की। भदोही सीट मई 2007 में बसपा ने 5000 वोटों से जीती थी। अब करी इतने ही वोटों से सपा ने ये सीट जीत ली है।


भदोही विधानसभा सीट जीतने के लिए मायावती ने पूरी ताकत झोंक दी थी। 80 हजार दलित, 55 हजार मुस्लिम और इतने ही ब्राह्मण मतदाताओं वाली सीट पर बहनजी के पक्ष में सारे समीकरण दिख रहे थे। लेकिन, सब उल्टा हो गया। बावजूद इसके लिए मायावती की रैली हुई। ब्राह्मण-दलित एकता फॉर्मूले को अग्रदूत सतीश चंद्र मिश्रा और उनके खास ब्राह्मण सिपहसालारों – नकुल दुबे, अनंत मिश्रा, राकेशधर त्रिपाठी (सारे मंत्री)- और मायावती सरकार के ताकतवर मुस्लिम चेहरे नसीमुद्दीन सिद्दिकी ने पूरी ताकत झोंक दी थी।


यहां जो वोट मिले हैं वो, राष्ट्रीय पार्टियों की हैसियत को देश के इस सबसे बड़े सूबे में आइना दिखाते हैं। भदोही उपचुनाव में सपा की मधुबाला पासी को 60,507 वोट मिले। दूसरे नंबर पर रहे बसपा के अमर सिंह सरोज को 55,487 वोट मिले। अब जरा दोनों राष्ट्रीय पार्टियों का हाल देखिए। बीजेपी के दीनदयाल सोनकर बसपा, सपा से बहुत पीछे – हां, तीसरे नंबर पर ही- 14,693 वोट ही जुटा पाए। अब आपको लग रहा होगा कि चौथे नंबर पर तो कांग्रेस ही होगी। जी नहीं, कांग्रेस प्रत्याशी को यहां सिर्फ 2,275 वो मिले हैं। जो, क्षेत्रीय में क्षेत्रीय किसी प्रगतिशील मानव समाज पार्टी के प्रत्याशी के 4,258 वोटों से भी कम हैं।


यही वजह है कि लौह पुरुष आडवाणी को अजीत की राष्ट्रीय लोकदल को 7 सीटें देना फायदे का सौदा लग रहा है। लेकिन, ये भी काफी हद तक तय है कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को गाजियाबाद सीट से लोकसभा में पहुंचने का फायदा भले इस गठजोड़ से हो जाए। ज्यादा फायदा अजीत सिंह को ही मिलना है।


ये हाल सिर्फ उत्तर प्रदेश बंगाल का नहीं है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और 7 लोकसभा सीटों वाली दिल्ली को छोड़ दें तो, पूरे देश में राष्ट्रीय पार्टियां क्षेत्रीय पार्टियों के पीछे कदमताल कर रही हैं। यही वजह है कि दिल्ली में बैठे नेताओं का पुराना दंभ – कि लोकसभा चुनाव में तो राष्ट्रीय मुद्दों पर बात होती है- टूट गया है। मुझे क्षेत्रीय पार्टियों के उत्थान से समस्या नहीं है। मुझे समस्या ये है कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग क्षेत्रीय पार्टियों के पीछे जैसे राष्ट्रीय पार्टियां चल रही हैं। वैसे ही हर राज्य में क्षेत्रीयता ही लोकसभा चुनाव पर हावी होती दिख रही है।



राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे रैली में झंडा-बेनर लगाने वाले कार्यकर्ता की तरह दरी पर किनारे बैठाए गए हैं। सजे मंच पर क्षेत्रीयता, जातिवाद, सांप्रदायिकता हावी है। इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार वैसे दोनों राष्ट्रीय पार्टियां ही हैं। आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा, महंगाई, परमाणु करार पर अखबारों, टीवी चैनलों पर बहस तो चलेगी। कोई 4-6-10 हजार लोगों को लेकर मीडिया घरानों के सर्वे में इस पर 50-60 प्रतिशत लोग चिंता भी जताएंगे। लेकिन, देश की दिशा तय करने वाला एक और चुनाव पूरी तरह से क्षेत्रीय हो गया है। ये एक संप्रभु देश का चुनाव नहीं, अलग-अलग छोटे-छोटे देशों की सहमति से बने एक समूह का चुनाव हो रहा है। ये स्थिति थोड़ी बहुत बदल सकती है तो, हमारे-आपके वोट से। लेकिन, इसके लिए बहुत प्रयत्न करना होगा।


(ये लेख अमर उजाला के संपादकीय पृष्ठ पर छपा है)

Tuesday, July 22, 2008

आडवाणी ने बड़ा मौका खो दिया

मनमोहन की सरकार बचेगी या जाएगी ये, आज तय हो जाएगा। बीजेपी के बागी सांसद मनमोहन की डूबती नैया पार कराते दिख रहे हैं। खैर, सरकार बचे या जाए कोई बहुत बड़ा फरक इससे नहीं पड़ने वाला। लेकिन, कल विश्वासमत के विरोध की शुरुआत करने वाले लालकृष्ण आडवाणी ने एक बहुत बड़ा मौका गंवा दिया लगता है।

दरअसल, PM IN WAITING के खिताब से खुद को नवाजने वाले लालकृष्ण आडवाणी को विश्वासमत पर बहस के दौरान हर कोई सुनना चाहता था। उनके प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखने वाले भी उनके आजीवन PM IN WAITING रह जाने की इच्छा रखने वाले भी। सब ये देखना चाहते थे कि अटल बिहारी वाजपेयी के वारिस लालकृष्ण आडवाणी वाजपेयी के कहीं आसपास तक पहुंच पाते हैं या नहीं। लेकिन, ज्यादातर लोगों को मेरी तरह निराशा ही हाथ लगी। मौका ये था कि इस मौके का इस्तेमाल चुनावी रैली की तरह करते।

विश्वासमत के खिलाफ बोलने खड़े हुए आडवाणी से हर किसी को उम्मीद यही थी कि वो, परमाणु करार पर बीजेपी का पूरा पक्ष रखने के साथ ही महंगाई और दूसरे मुद्दों पर सरकार के खिलाफ चुनावी बिगुल की शुरुआत करेंगे। आडवाणी के पास बड़ा मौका था कि वो, संसद में मिले मौके का सदुपयोग करते और वाजपेयी की कमी को पूरा करते। लेकिन, आडवाणी बड़ा मौका चूक गए। पता नहीं कौन से रणनीतिकार-सलाहकार आजकल आडवाणी के चारों तरफ हैं जिन्होंने इतने अहम मौके पर आडवाणी को अंग्रेजी ज्ञान पेलने की सलाह दे डाली।

अब क्या आडवाणी इंटरनेशनल मीडिया और अमेरिका भर को ही अपनी बात सलीके से समझाना चाहते थे। क्योंकि, देश की करोड़ो जनता जो आज कल के प्रधानमंत्री को देखने बैठी थी। उसे तो आडवाणी छू भी नहीं पाए होंगे। हां, इसमें मायावती ने बाजी मार ली। मैंने बहुत पहले लिखा था कि किस तरह मायावती, फिर से बीजेपी के नजदीक आती दिख रही हैं। और, उत्तर प्रदेश के समीकरणों के लिहाज से आडवाणी और मायावती में एक अनकहा समझौता भी हो गया है। लेकिन, अब मायावती का प्रधानमंत्री बनने का दावा और मजबूत होता दिख रहा है। और, अब अगर लोकसबा चुनाव के बाद समझौते की नौबत आई तो, साफ ज्यादा सांसद संख्या के साथ आई मायावती और तीसरे मोरचे का साथ आडवाणी की बीजेपी-एनडीए को मायावती का साथ देने के लिए मजबूर कर देगा।

इधर, लोकसभा में आडवाणी ने बोलना शुरू किया। कुछ ही देर बाद संसद में आडवाणी के बोलने के साथ-साथ मायावती की प्रेस कांफ्रेंस की तस्वीर भी नजर आने लगी। और, मायावती की हैसियत की झलक ये थी कि ज्यादातर हिंदी चैनलों ने मायावती का ऑडियो बढ़ा दिया और आडवाणी सिर्फ दिखते रह गए। उनका कहा किसी को सुनाई नहीं दे रहा था। वजह ये कि वैसे भी वो अंग्रेजी में बोल रहे थे जो, हिंदी दर्शकों कम ही लुभा रहा था। इसी फॉर्मूले पर अंग्रेजी चैनलों को आडवाणी की ही बोली अच्छी लग रही थी। लेकिन, वोट अंग्रेजी चैनल का दर्शक शायद ही देता हो। इस मामले में बंगाल के सीपीएम सांसद मोहम्मद सलीम भी शानदार हिंदी भाषण देकर महफिल लूटने में कामयाब रहे।

Monday, July 14, 2008

भारतीय राजनीतिक रंगमंच का सबसे शानदार ड्रामा देखिए

करीब बीस साल बीते हैं और राजनीतिक समय चक्र ने पूरा एक चक्कर लगा लिया है। 1989 में वीपी सिंह की सरकार को दक्षिणपंथी भाजपा के साथ वामपंथी लेफ्ट पार्टियों का भी समर्थन था। ये दोनों मिलकर कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के लिए जनता दल को समर्थन दे रहे थे। और, उस समय दोनों का ये कहना था कि कांग्रेस देश की सबसे बड़ी दुश्मन है। उस समय मुद्दा भ्रष्टाचार था। आज भी स्थितियां करीब-करीब वैसी ही हैं। उस समय एक सरकार बनाने के लिए साथ थे। आज एक सरकार गिराने के लिए साथ हैं। बस मुद्दा बदल गया है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परमाणु करार पर प्रकाश करात की तारीफ कर रहा है। हार्डकोर संघी लाल कृष्ण आडवाणी और हार्डकोर मार्क्सिस्ट प्रकाश करात एक साथ खड़े हैं। वो, कांग्रेस को देश का सबसे बड़ा दुश्मन बता रहे हैं। एक-दूसरे को गाली दे रहे हैं लेकिन, कह रहे हैं कि संसद में यूपीए सरकार को गिराने के लिए साथ वोट देंगे। भाजपा तो पहले भी हाथी पर सवार हो चुकी है लेकिन, वामपंथी विचारधारा के अगुवा पहली बार किसी दलितवादी नेता के साथ हाथ मिला रहे हैं। वैसे इसके पहले वो, जातिवाद के सबसे पोषक नेताओं मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव के ही हितों की रक्षा करते रहे हैं। लेकिन, पहली बार पिछड़ी जाति के नेताओं को छोड़कर करात दलित नेता मायावती के दरवाजे पहुंचे।

अब अमर सिंह भाजपा-लेफ्ट-बीएसपी का गठजोड़ बेमेल है और, ये चल नहीं सकता। वो, एकदम सही कह रहे हैं। ये गठजोड़ कांग्रेस की सरकार गिराने के लिए साथ भले हो जाए। लेकिन, कांग्रेस के खिलाफ आडवाणी को प्रधानमंत्री को बनाने के लिए नहीं चल पाएगा। गठजोड़ तो 1999 जैसा ही होगा। चुनाव तक कांग्रेस को लेफ्ट और भाजपा भले ही एक सुर में गाली दें। लेकिन, चुनाव के बाद लेफ्ट, कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए के साथ ही जाएंगे, कैसे साथ आएंगे इसका बहाना अभी से तय हो चुका है। हां, बहनजी यूपी में लोकसभा चुनाव तक आपने भाजपाई भाइयों को भले ही जमकर गरियाएं। चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए बहनापा निभाएंगी और आडवाणी के साथ ही जाएंगी। ये मैंने काफी पहले बता दिया था, इसकी भी शर्त तय है।

वैसे, अमर सिंह के साथ सारे कांग्रेसियों को भी भरोसा है कि आसानी से बहुमत हासिल हो जाएगा। खैर, बहुमत हासिल हो या न हो। 6-8 महीने की सरकार चलाकर अमर सिंह को दलाली मजबूत करने के अलावा किसी को क्या मिल पाएगा। दरअसल, असली खेल चुनावी बिसात का है। अमर सिंह ने साफ कहाकि वो, कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन के लिए तैयार हैं। मैंने पहले ही बताया था कि अगर सपा-कांग्रेस साथ आएं तो, कैसे बेहतर कर सकते हैं।

अमर सिंह कह रहे हैं कि गठजोड़ नहीं भी हुआ तो, उनकी पार्टी का निशाना चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस नहीं भाजपा होगी। साफ है जहां सपा को उम्मीद है उस, उत्तर प्रदेश में फायदा कांग्रेस को गाली देने से तो नहीं होने वाला। लेकिन, मायावती शायद ही चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस को गाली देना चाहेंगी और, समाजवादी पार्टी को तो, बिल्कुल भी नहीं। वो, गाली देंगी भी तो, कांग्रेस-सपा को एंटी मुस्लिम (उनकी और लेफ्ट की परिभाषा के मुताबिक) परमाणु करार के मुद्दे पर ही। वरना, बहनजी के निशाने पर पुराने मुंहबोले भाइयों की पार्टी भाजपा ही रहेगी। जिससे वोटों का ध्रुवीकरण हो। और, कुछ ऐसा माहौल बने जैसा एक जमाने में उत्तर प्रदेश में भाजपा-सपा का बनता था। 2009 लोकसभा चुनाव में मायावती सपा के सांसदों की संख्या खुद झटकना चाहेंगी तो, बसपा सांसदों की संख्या के आसपास की उम्मीद भाजपा कर रही है।

अब सबने लोकसभा चुनाव के लिए अपनी रणनीति तो तैयार कर ली है। जिसमें जंग के बाद के कई पक्के साथियों को भी जंग (लोकसभा चुनाव पढ़िए) तक विरोधी खेमे की तरह दिखना है। बस अभी तो, ये अंगड़ाई है आगे और लड़ाई है देखते रहिए ...

Tuesday, April 01, 2008

मायावती प्रधानमंत्री बनेंगी या उप प्रधानमंत्री

लोकसभा चुनावों की तैयारियों में सभी राजनीतिक पार्टियां जुट गई हैं। और, इस तैयारी में सबसे अहम ये कि किसके साथ, दिल्ली के रास्ते पर कितनी दूर चला जा सकता है। ऐसे देखने पर साफ तौर पर देश पूरी तरह से जाने-अनजाने दो दलीय व्यवस्था पर ही चल रहा है। एक पक्ष एनडीए यानी नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) और दूसरा पक्ष यानी सरकार में बैठा यूपीए, यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (संयुक्त विकासशील गठबंधन)। दोनों के अलावा कहने को एक तीसरा मोर्चा भी है जो, यूपीए को बाहर से समर्थन दे रहे लेफ्ट की अगुवाई में अलग-अलग राज्यों के कुछ क्षेत्रीय दल हैं।

लेकिन, सच्चाई यही है कि तीसरा मोर्चा नाम का विकल्प फिलहाल तो मरा हुआ सा दिख रहा है। तीसरे मोर्चा का अगुवा लेफ्ट तो, पूरी तरह से ही कांग्रेस के साथ है। और, कांग्रेस के साथ चल रहे छद्म मल्लयुद्ध के बीच हुए सम्मेलन में लेफ्ट पार्टियों ने फिर से साफ कर दिया है कि भाजपा उनकी पहली दुश्मन है और अगर जरूरत पड़ी तो, वो फिर से कांग्रेस की मदद कर सकते हैं। तीसरे मोर्चे की बात भी सुनाई नहीं पड़ी। और, जिस तरह के जनादेश आते दिख रहे हैं उसमें, साफ है कि एनडीए या फिर यूपीए किसी को भी पूर्ण बहुमत तो नहीं मिलने वाला। कांग्रेस-भाजपा ही सबसे बड़ी पार्टियां बनी रहेंगी और 15 से 25 सीटों के फासले से सत्ता का सुख भोगेंगी या फिर विपक्ष में बैठकर संसद का काम रोकती रहेंगी।

ज्यादातर राज्यों में दोनों गठबंधनों के साथी चुनाव के पहले से ही तय हैं और जो, चुनाव के पहले साथ नहीं लड़ेंगे वो, पहले से ही न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सरकार में शामिल हो जाएंगे। लेकिन, इस सबमें एक जो, अचानक पलटा समीकरण है वो, बन रहा है सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश से। उत्तर प्रदेश ही वो राज्य है जिसमें बदहाल होने से भाजपा की अगुवाई वाला एनडीए सत्ता से बाहर रह गया और लालकृष्ण आडवाणी हाथ ही मलते रह गए। अभी भी इस राज्य में न तो भाजपा के हालात ज्यादा बदले हैं और न ही कांग्रेस जमीन से उबर पाई है। यही वजह है कि दोनों ने अलग-अलग तरीके से सपा-बसपा के साथ एक अनकहा गठबंधन बनाना शुरू कर दिया है।

उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ मुस्कुराती मायावती की तस्वीर फ्रेम में धुंधली पड़ चुकी है। राहुल के कहने मायावती एक छोटा सा अफसर हटाने को तैयार नहीं हैं। गांधी परिवार की बड़ाई पर मायावती ने सुल्तानपुर के जिलाधिकारी को नाप दिया और राहुल गांधी दलितों की दुर्दशा पर सबसे ज्यादा आंसू बहा रहे हैं। उन्हें दलित बस्ती के बच्चे सबसे प्यारे लग रहे हैं। अब तो, सोनिया गांधी कह रही हैं कि मायावती के खिलाफ कांग्रेस कार्यकर्ता आंदोलन करें। जेल जाएं, पीछे से राहुल भी जेल जाएंगे। ये बयान ठीक उसी दिन आया जब किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने मायावती को जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया और टिकैत समर्थकों के बवाल के आगे टिकैत के पैतृक गांव सिसौली (मुजफ्फरनगर) से पुलिस टिकैत को नहीं पकड़ सकी। टिकैत का बेटा भले पुलिस हिरासत में पहुंच गया। वैस, देर-सबेर टिकैत सरकारी मेहमान बनेंगे ही। लेकिन, इस वाकये ने कांग्रेस-सपा की जुगलबंदी थोड़ी बेहतर कर दी है। मुलायम और उनकी पार्टी पूरी तरह से टिकैत के समर्थन का ऐलान कर चुकी है हो, सकता है मुलायम को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुछ फायदा भी हो जाए।

वैसे, मुलायम और कांग्रेस लाख कह रहे हों कि मायावती के राज में अंधेरगर्दी चरम पर है। लेकिन, भाजपा अभी भी मायावती सरकार के खिलाफ कुछ भी कड़ाई से नहीं बोल पा रही है। वजह शायद लोकसभा चुनाव 2009 के बाद के समीकरण का ध्यान है। अगर कुछ बहुत बदलाव नहीं हुए तो, देश भर में कुल मिलाकर मायावती की पार्टी को 35 से 45 सीटें मिल सकती हैं जो, केंद्र की लंगड़ी सरकार की बैसाखी बन सकते हैं। वैसे तो, उत्तर प्रदेश में मायावती और भाजपा का गठंधठन बुरी तरह से फ्लॉप हो चुका है। लेकिन, केंद्र में सत्ता की मलाई चखने को आतुर मायावती और खुद को पहले से ही एनडीए की ओर से पीएम इन वेटिंग कहलाने वाले लालकृष्ण आडवाणी के बीच कुछ तार जुड़ते से दिख रहे हैं।

आडवाणी को ये अच्छी तरह पता है कि ये चुनाव उनके लिए करो या मरो का चुनाव है। चतुर राजनीतिज्ञ आडवाणी को मायावती के बढ़ते प्रभाव का भी बखूबी अंदाजा है। बस, मायावती का अडियल रवैया थोड़ी मुश्किल कर सकता है। क्योंकि, माया मैडम अब प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं। साथ ही उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कई सीटों पर बसपा और भाजपा के प्रत्याशियों के बीच सीधा मुकाबला भी कुछ मुश्किल करेगा।

लेकिन, राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा के आगे क्षेत्रीय या राज्य की महत्वाकांक्षा की तिलांजलि भारतीय राजनीति के लिए नया किस्सा नहीं होगा। मायावती की इस राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा ने पहले भी कई राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा को ही फायदा पहुंचाया है। वैसे भी मायावती के सिर कभी भी तीसरे मोर्चे का भूत नहीं चढ़ता और वो, मुलायम की तरह लेफ्ट नेताओं के साथ मंच पर भाषण देने नहीं जातीं। ये भाजपा के लिए काफी सुकून की बात है। अब बस सवाल यही है कि मायावती को आडवाणी उपप्रधानमंत्री बनने के लिए मनाकर खुद प्रधानमंत्री बनते हैं या फिर मायावती सत्ता से बाहर रहकर सत्ता की सौदेबाजी का मन बनाती हैं। क्योंकि, मायावती खुलेआम कहती हैं- दलितों को समाज में सबसे ऊपरी तबके में शामिल करने के लिए वो किसी से भी किसी भी शर्त पर हाथ मिला सकती हैं। इस फॉर्मूले से उत्तर प्रदेश में तो, दलित, समाज का सबसे ऊपरी तबका हो गया है। तो, क्या अब बारी केंद्र की है।

Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

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