Thursday, October 11, 2007

क्यों मर रहा है जवान भारत?

साठ साल का आजाद भारत दुनिया का सबसे जवान देश है। इस पर हम सबका सीना चौड़ा है। बीच-बीच में आते सर्वे ये भी बताते हैं कि जवान भारत दुनिया में सबसे ज्यादा खुश है। सबसे ज्यागा तरक्की जवान भारत ही कर रहा है। लेकिन, स्वास्थ्य मंत्रालय की एक रिपोर्ट पढ़कर मेरी भी जान निकल सी गई।
स्वास्थ्य मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट बता रही है कि देश में साल भर में एक लाख से ज्यादा लोगों ने खुद ही अपनी जान ले ली। दुनिया के सबसे खुश देशों में शामिल भारत के लोगों को क्या हो गया है। रिपोर्ट और भी ज्यादा डराती है। इसके मुताबिक, चार लाख लोगों ने अपनी जान गंवाने की कोशिश की थी जो, समय से इलाज मिल जाने से बच गए। जान गंवाने की कोशिश करने वाले 90 प्रतिशत लोग मानसिक असंतोष, डिप्रेशन और किसी तरह की बदसलूकी की वजह से जान गंवा रहे हैं।

भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देश की कुल आबादी के 7.5 प्रतिशत मानसिक समस्या से जूझ रहे हैं। मानसिक तनाव से जूझ रहे लोगों को सलाह देने वाले डॉक्टरों की भी जबरदस्त कमी है। देश को आबादी के लिहाज से 32,000 मानसिक रोग चिकित्सक चाहिए जबकि, सिर्फ 3,300 मानसिक रोग चिकित्सक ही मौजूद हैं। इनमें से भी 3,000 सिर्फ 4 महानगरों में हैं। इन्हीं में एक आंकड़ा ये भी है कि देश की 9 लाख से ज्यादा महिलाएं किसी न किसी मानसिक बीमारी से जूझ रही हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में हर 40 सेकेंड में कोई न कोई आत्महत्या कर लेता है। लेकिन, इसमें भी भारत जैसे देशों में इस बात का खतरा सबसे ज्यादा है। क्योंकि, 15 से 44 साल के लोगों की मौत के तीन कारणों में से सबसे बड़ी वजह आत्महत्या ही है। जवानों में तनाव का खतरा भी सबसे ज्यादा है। खुद की जान गंवा रहा जवान भारत अगर अपनी परेशानियों से निजात न पा पाया तो, ये बड़ी मुश्किल बन सकती है।

3 comments:

  1. मुश्किल तो हो चुकी है...अब पार निकलने का जुगाड ढ़ूंढ़ना है.

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  2. ऐसा कोई दार्शनिक सूत्र निकालने की जरूरत है जो हमें इस भंवर से निकाल दे। कितना अजीब है कि पहले लोग भस्म हो जाने का शाप लोगों को डराता रहा होगा, अब तो लोग खुद ही अपनी जान ले रहे हैं। इस जीवन-विरोधी सोच को जितना जल्दी हो सके, उतना जल्दी मिटाना होगा। ऐसे हताश लोगों को कोई खांटी भारतीय प्रासंगिक दार्शनिक सूत्र देना होगा।

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  3. भैया, दिक्कत तब होती है जब अवसाद को क्लीनिकल समस्या की बजाय कभी कभी लोग प्रेतबाधा जैसा रंग देने लगते हैं। ओझाई में जो देर होती है वह घातक होते है।

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